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विश्वयुद्ध के दौर की ये चिट्ठियां कैसे इतिहास का सबसे ईमानदार दस्तावेज बन गईं?

1977 में एक हिंदी फ़िल्म आई थी. अपनापन. इस फ़िल्म का एक गाना ख़ूब मशहूर हुआ. आनंद बक्षी का लिखा. लता मंगेशकर की आवाज़ में.

क्या साथ लाए, क्या तोड़ आए

रस्ते में हम क्या क्या छोड़ आए

मंज़िल पे जा के याद आता है

आदमी मुसाफ़िर है, आता है, जाता है

आते-जाते रस्ते में यादें छोड़ आता है.

अपनापन फ़िल्म का गाना 'आदमी मुसाफ़िर है' बहुुत मशहूर हुआ.
अपनापन फ़िल्म का गाना ‘आदमी मुसाफ़िर है’ बहुुत मशहूर हुआ.

इंसानों वाला ये गुण ‘वक़्त’ को भी हासिल हुआ. ये धारणा उलटी भी हो सकती है. उस पर चर्चा फिर कभी.

फिलहाल, वक़्त के सफ़र की बात. वक़्त सफ़र में चलते-चलते मोबाइल और इंटरनेट युग में पहुंच चुका है. रस्ते में क्या छूटा? चिट्ठियों वाला दौर.

चिट्ठियां, जो एक समय संवाद का इकलौता माध्यम हुआ करतीं थी. बीसवीं सदी में युद्धकाल में इनकी अहमियत बढ़ गई. उस दौर में संचार की इतनी सुविधाएं नहीं थी. सैनिकों को अगले पल का भी पता नहीं होता था. युद्ध के मैदान में बर्बरता और बर्बादी के अलावा कुछ नहीं दिखता था. इसके बावजूद सैनिकों ने अपनी प्रेमिकाओं और अपने घरवालों को प्यार भेजा. उम्मीद भेजी. जो नहीं भेज पाए, उन्होंने अपनी डायरी में लिखकर रखा. ताकि किसी दिन अपनी बात ख़ुद से पहुंचा पाएं. उनमें से अधिकतर अपना वादा पूरा नहीं कर पाए. वे युद्ध के मैदान से नहीं लौट सके. उन्हें ये पहले से पता था. फिर भी उन्होंने उम्मीद कायम रखी. ये अभूतपूर्व जीजिविषा का प्रतीक था.

दुनियादारी में हम रोज़ाना की हालिया घटनाओं की कहानियां सुनाते हैं. आज थोड़ा अलग चलते हैं. आज हम दोनों वर्ल्ड वॉर की कुछ चिट्ठियों की कहानियां सुनाएंगे. जानेंगे, कैसे ये चिट्ठियां इतिहास का अभिन्न हिस्सा बन गईं? और, उन चिट्ठियों से युद्ध के बारे में क्या पता चलता है?

सबसे पहले फ़र्स्ट वर्ल्ड वॉर का क़िस्सा सुनिए.

पहला विश्व युद्ध जुलाई 1914 में शुरू हुआ. ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के उत्तराधिकारी फ़्रेंज़ फर्डीनेण्ड की हत्या के ठीक एक महीने बाद. हत्यारा सर्बिया का रहने वाला था. इसको लेकर दोनों देशों में तनाव हुआ. बातचीत से मसला नहीं सुलझा. 28 जुलाई 1914 को ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा कर दी. सर्बिया के बचाव में रूस आया. धीरे-धीरे बाकी देश भी इसमें शामिल होते गए. आख़िरकार, एक हत्या से शुरू हुआ मामला पहले विश्व युद्ध में बदल गया.

इसी लड़ाई में एक ब्रिटिश सैनिक विलियम जेम्स मार्टिन को लड़ने के लिए फ़्रांस भेजा गया. उसकी उम्र 23 साल थी. मार्टिन की सगाई हो चुकी थी. लड़ाई के मैदान से उसने अपनी मंगेतर को 70 से अधिक चिट्ठियां लिखी. उन चिट्ठियों में युद्ध के हालात का थोड़ा बहुत ज़िक्र होता था. ज़्यादा फ़ोकस शादी और आगे की ज़िंदगी को लेकर सपने बुनने पर था.

मार्टिन ने 24 मार्च 1917 को अंतिम चिट्ठी लिखी. तीन दिन बाद स्नाइपर की गोली से उसकी मौत हो गई. मार्टिन की मंगेतर एमिली चिटिक्स को इस बारे में पता नहीं चला. 28 मार्च को उसने मार्टिन के नाम लिखा,

“प्यारे विल,

मेरे पास बताने के लिए बहुत कुछ नहीं है. फिर भी मुझे लगा कि तुमसे बात करनी चाहिए. मुझे तुम्हारी हिम्मत पर अचरज होता है. तुम्हारी चिट्ठी मिलती है तो दिल को सुकून आ जाता है. मुझे पता है कि समय मिलते ही तुम अपने दिल का हाल लिखोगे. तुम्हारी बारे में जाने बिना दिन का कोई मोल नहीं रहता. काश! ये लड़ाई जल्दी खत्म हो जाए. तभी हम फिर से एक साथ रह सकेंगे. वो दिन भी ज़रूर आएगा.

डार्लिंग, तुम खुश रहना. मेरे बारे में चिंता मत करना. मैं एकदम सही हूं. सिर्फ़ तुम्हारी चिट्ठियों के लिए थोड़ी परेशान रहती हूं, बस. अख़बारों में अच्छी ख़बरें छपने लगीं है. मां-पापा की तरफ़ से प्यार.”

जब तक ये चिट्ठी पहुंचती, मार्टिन हमेशा के लिए जा चुका था. एमिली ने फिर कभी शादी नहीं की. उन्होंने कहा,

मेरा दिल और प्यार मार्टिन के साथ फ़्रांस में दफ़्न हो चुका है.

एमिली की आख़िरी चिट्ठी. एमिली ने फिर कभी शादी नहीं की.
एमिली की आख़िरी चिट्ठी. एमिली ने फिर कभी शादी नहीं की.

1974 में एमिली नहीं रहीं. उनकी मौत के बाद सभी चिट्ठियां लंदन के इम्पीरियल वॉर म्युज़ियम में जमा करा दीं गई.

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पहले विश्व युद्ध में ऑस्ट्रेलिया के तीन लाख से अधिक सैनिक विदेशी मोर्चों पर लड़ने गए. उनमें से अधिकतर चिट्ठी लिखना पसंद करते थे. कुछ अपने साथ डायरी भी रखते थे. न्यू साउथ वेल्स के जैक थॉमस हटन अक्टूबर 1915 में सेना में शामिल हुए. उन्हें भी फ़्रांस भेजा गया.

जैक ने अपनी डायरी के पहले पन्ने पर लिखा,

जब तक सेना में रहना है

आदेश का पालन करना है.

जैक ने अपनी डायरी में युद्ध से ज़्यादा फ़्रेंच शहरों की ख़ूबसूरती का बखान किया है. जानकार बताते हैं कि कई मामलों में ये युद्ध के अवसाद से बचने का इकलौता ज़रिया था.

विश्व युद्ध खत्म होने के बाद जैक इंग्लैंड चला गया. वहां उसने क्लर्क की नौकरी पकड़ ली. सितंबर 1919 में वो वापस ऑस्ट्रेलिया लौट आया. उसने अपनी डायरी एक लाइब्रेरी को सात पौंड में बेच दी.

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इसी तरह एक ऑस्ट्रेलियन नर्स हुई. एनी डोनेल. उसने फ़र्स्ट वर्ल्ड वॉर में ग्रीस, फ़्रांस और इंग्लैंड में मिलिटरी अस्पतालों में काम किया. डोनेल कई वीभत्स घटनाओं की गवाह रही. उसने इन घटनाओं को नोट भी किया. वो ऑस्ट्रेलिया में अपने दोस्तों के नाम चिट्ठी भेजा करती. साथ ही, उसके पास एक पर्सनल डायरी भी थी.

शुरुआती दिनों में डोनेल को ख़ूब मज़ा आया. जनवरी 1916 तक उसके अस्पताल में सात हज़ार से अधिक घायल और बीमार सैनिक आए थे. उनमें से अधिकतर को बचा लिया गया था. इस दौरान एक भी स्टाफ़ की जान नहीं गई.

एनी डोनेल ने पहले विश्व युद्ध में नर्स के तौर पर काम किया था.
एनी डोनेल ने पहले विश्व युद्ध में नर्स के तौर पर काम किया था.

युद्ध लंबा खींचता रहा. 1916 बीता. 1917 के अंतिम महीनों में एनी बीमार हो गई. उसे अपने घर की याद भी सताने लगी थी.

तब एनी ने लिखा,

समय थम सा गया था. हर वक़्त दुश्मन के गोले और हमारी गोलियों की आवाज़ आती थी. घर बहुत याद आ रहा था. इसलिए, मैं पुरानी चिट्ठियां निकालकर उन्हें फिर से पढ़ने लगी. मैं थकी हुई थी. मैंने सोने की कोशिश की. लेकिन धमाकों की आवाज़ ने फिर से जगा दिया. कफ़ भी परेशान कर रहा था. मैंने मिसेज़ विग्स की सलाह भी नहीं मानी. उन्होंने कहा था कि बिस्तर पर बैठकर मुस्कुराने की कोशिश करो. इसकी बजाय मुझे ख़ुद पर रोना आ गया. 1918 की शुरुआत एनी के लिए बहुत सुखद नहीं रही.

लड़ाई खत्म होने के बाद एनी डोनेल वापस लौटी. उसने वापसी की यात्रा को भी अपनी डायरी में दर्ज़ किया. पर्थ में उतरने से पहले एनी ने लिखा,

पेड़ों की अनोखी गंध आने लगी है. ये ऑस्ट्रेलिया की मिट्टी की खुशबू है.

एनी डोनेल ने अपनी डायरी उस समय पांच पौंड में बेची थी.

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अब सेकंड वर्ल्ड वॉर का जिक़्र कर लेते हैं.

दूसरा विश्वयुद्ध एक सितंबर 1939 को शुरू हुआ था. जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया. पोलैंड के लिए फ़्रांस और ब्रिटेन लड़ने आए. जल्दी ही दूसरे देशों को भी इसमें शामिल होना पड़ा. 

दूसरे विश्वयुद्ध में बैटल ऑफ़ स्टालिनग्राद का खासा महत्व है. स्टालिनग्राद सोवियत संघ में था. अब उसे वोल्गोग्राद के नाम से जाना जाता है.

पोलैंड पर हमला करने से पहले हिटलर ने स्टालिन से समझौता कर लिया था. दोनों ने मिलकर पोलैंड को आपस में बांट लिया. ये भी तय हुआ कि दोनों एक-दूसरे के मामले में ऊंगली नहीं करेंगे. ये समझौता दो साल तक कायम रहा. जर्मनी आसानी से यूरोप में तबाही मचाता रहा. फिर उसने सोवियत संघ पर हमला करने का प्लान बनाया. 22 जून 1941 को ऑपरेशन बार्बारोसा के तहत जर्मन सेना सोवियत संघ में दाखिल हो गई. हालांकि, बहुत कोशिशों के बावजूद भी जर्मनी को निर्णायक जीत नहीं मिली.

स्टालिनग्राद का मोर्चा दूसरे विश्व युद्ध के सबसे भयानक मोर्चों में से एक था.
स्टालिनग्राद का मोर्चा दूसरे विश्व युद्ध के सबसे भयानक मोर्चों में से एक था.

अगस्त 1942 में जर्मनी ने स्टालिनग्राड पर हमले का प्लान बनाया. स्टालिनग्राड सोवियत संघ के लिए काफी अहम था. जर्मनों ने शुरुआत में बढ़त हासिल की. लेकिन फिर सर्दी आ गई. जर्मन सेना को इस मौसम में लड़ने को कोई अनुभव नहीं था. वे फंसकर रह गए. हिटलर ने वापस लौटने की इजाज़त नहीं दी. 

स्टालिनग्राड में फंसे जर्मन सैनिकों को घर चिट्ठी भेजने की इजाज़त दी गई थी.

एक सैनिक ने लिखा,

यहां का मौसम लगातार ख़राब हो रहा है. कपड़े हमारे शरीर के साथ चिपक कर जम गए हैं. हमने तीन दिनों से ना तो कुछ खाया और ना ही एक मिनट सो ही पाए हैं. सैनिक यहां से भागना चाहते हैं. वे दुश्मनों के आगे सरेंडर करने के लिए तैयार हैं.

एक और जर्मन सैनिक ने लिखा,

कल हमें वोदका मिला. उसी समय हमने एक कुत्ते को मारा था. वोदका बहुत काम आ गया. एक दिन हमने चार कुत्ते मारे, लेकिन मेरे साथियों का पेट नहीं भरा. एक दिन हमें चिड़िया पकाकर खाना पड़ा.

उसी दौर में एक और सैनिक ने अपनी डायरी में लिखा,

स्टालिनग्राड धरती का नर्क है. हम रोज़ हमला करते हैं. अगर हम सुबह में 20 मीटर आगे बढ़ते हैं तो शाम तक वो हमें पीछे धकेल देते हैं.

एक सैनिक ने लिखा,

स्टालिनग्राड में ईश्वर की बात करने का मतलब है, ईश्वर को नकारना. मैंने हर तरफ़ उसे तलाशा, मगर वो कहीं नहीं मिली. अगर ईश्वर कहीं है तो वो सिर्फ़ प्रार्थनाओं, पादरियों की बड़ी-बड़ी बातों, गिरजाघर की घंटियों और धूप की सुगंध तक ही सीमित है. वो स्टालिनग्राड में तो कतई नहीं.

सच्चाई तो ये है कि ईश्वर नाम की कोई चीज़ है ही नहीं.

हथियार, खाने और मनोबल की कमी से जूझ रहे 6th जर्मन आर्मी ने फ़रवरी 1943 में स्टालिनग्राड में सरेंडर कर दिया. इस हार ने दूसरे विश्वयुद्ध का नतीजा लगभग तय कर दिया था.

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अप्रैल 1945 में हिटलर ने अपने बंकर में आत्महत्या कर ली. जर्मनी के सरेंडर के बाद यूरोप में विश्व युद्ध लगभग समाप्त हो चुका था. इसी दौर में फ़्रांस में तैनात यूएस आर्मी के एक सार्जेंट ने अपनी प्रेमिका के नाम चिट्ठी लिखी.

उसने लिखा,

यहां मैं अपने बिस्तर पर लेटकर खिड़की से बाहर देख रहा हूं. सामने खेत है. दूर कहीं नहर और नदी चली जा रही है. अभी ये कितना शांत है. किसी को यकीन ही नहीं होगा कि एक साल पहले तक इस जगह पर युद्ध चल रहा था. नहर के किनारे छोटी सी पगडंडी बनी हुई है. वो तुम्हारे और मेरे जैसे लोगों के लिए ही है.

अगर किसी दिन मेरे सपने सच हुए तो मैं तुमसे तुम्हारा हाथ मांग लूंगा.

विश्व युद्ध के दौर की चिट्ठियां इस दुनिया के सबसे ईमानदार रेकॉर्ड्स कहे जा सकते हैं. क्योंकि उनमें कोई छल नहीं था. कोई लंपटता नहीं थी. उस क्षण में उन्हें जो दिखा, उन्होंने जो महसूस किया, उसे उन्होंने हुबहू काग़ज़ों पर उतार दिया.

आज के दिन इन कहानियों को सुनाने की एक वजह है. सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान जर्मनी में तैनात एक अमेरिकी सैनिक की चिट्ठी 76 बरस बाद उसके परिवार को मिली. जॉन गोन्जाल्विस नाम के इस सैनिक ने लड़ाई खत्म होने के बाद अपनी मां को चिट्ठी भेजी थी. ये बताने के लिए कि वो बहुत जल्द उनके पास आने वाला है. उन तक कभी पहुंच नहीं पाई. 2015 में जॉन की मौत हो गई. जॉन की मां भी ज़िंदा नहीं है. लेकिन पोस्टल सर्विस ने जॉन की विधवा पत्नी का पता खोजकर उन तक चिट्ठी पहुंचाई.

चिट्ठियों के लिफाफे को फिलहाल ताखे पर रखते हैं. जब तक इंसान रहेंगे. वे लिफाफे खोले जाते रहेंगे. उनकी खुशबू कायम रहेगी. शायद चिरकाल तक.

संदर्भ:

Imperial War Museum, London

State Library | New South Wales

Canadian Virtual War Memorial

Australian War Memorial

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