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क्या विंड टर्बाइन से पानी और ऑक्सीजन निकाले जा सकते हैं?

पीएम नरेंद्र मोदी का एक वीडियो जमकर वायरल हुआ. मोदी हेनरिक एंडरसन से बात कर रहे थे. एंडरसन डेनमार्क की कंपनी वेस्टास के सीईओ हैं. वेस्टास विंड एनर्जी सेक्टर में काम करती है, इसलिए मोदी वेस्टास के सीईओ को विंड टर्बाइन से जुड़े कुछ सुझाव दे रहे थे.

पीएम मोदी ने विंड टर्बाइन को लेकर संभावनाओं से जुड़े दो सुझाव दिए-

1. नमी वाली हवा से पानी अलग किया जा सकता है.

2. हवा से ऑक्सीजन अलग की जा सकती है.

तो इस तरह ये विंड टर्बाइन ‘थ्री इन वन’ वाला काम करेगा. बिजली, पानी और ऑक्सीजन. इन सुझावों के बाद मीम्स की बरसात हो गई. और प्रधानमंत्री ट्रोल हो गए. लेकिन क्या ये सुझाव विज्ञान से कोसों दूर हैं?

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साइंसकारी के इस एपिसोड में हम विंड टर्बाइन की बात करेंगे. विंड टर्बाइन कैसे काम करता है? और समझेंगे कि हवा से पानी और ऑक्सीजन अलग करने वाला आइडिया कितना साइंटिफिक है.

सबसे पहले विंड टर्बाइन की बात कर लेते हैं.

हवा से बिजली

विंड टर्बाइन का मामला सिंपल है. हवा बहती है. बहती हवा टर्बाइन से टकराती है. पंखे घूमते हैं और बिजली पैदा होती है. यानी एक तरफ़ से हवा डालो, दूसरी तरफ़ से बिजली निकलेगी.

विंड टर्बाइन के ज़रिए काइनेटिक एनर्जी इलेक्ट्रिकल एनर्जी में कन्वर्ट होती है. ये मशीन इलेक्ट्रोमैग्नेटिक प्रिंसिपल पर काम करती है. जैसे बांध में पानी से टर्बाइन घुमाकर बिजली बना ली जाती है, वैसे ही यहां हवा से टर्बाइन घुमाकर बिजली बनाते हैं.

वेस्टास डेनमार्क में विंड टर्बाइन बनाती है. (विकिमीडिया)
वेस्टास डेनमार्क में विंड टर्बाइन बनाती है. (विकिमीडिया)

विंड टर्बाइन में बहुत सारे सोफ़िस्टिकेटेड इंस्ट्रूमेंट लगे होते हैं. कई सेंसर हवा की दिशा का अंदाज़ा लगाते हैं. उसी हिसाब से वो टर्बाइन घूम जाता है, ताकि ब्लेड से ज़्यादा से ज़्यादा हवा टकराए. ब्लेड भी इस हिसाब से एडजस्ट होती रहती हैं कि हवा सही ऐंगल पर उनसे टकराए.

विंड टर्बाइन एक रिन्युएबल एनर्जी सोर्स है. यानी इसमें कोई ईंधन खर्च नहीं करना पड़ता. जैसे कि सोलर एनर्जी है. हाइड्रोइलेक्ट्रसिटी है. जब तक सूरज-चांद रहेगा, रिन्युएबल एनर्जी का नाम रहेगा. जब हवा बहती रहेगी, विंड टर्बाइन से बिजली बनती रहेगी.

रिन्युएबल एनर्जी के स्त्रोत. (विकिमीडिया)
रिन्युएबल एनर्जी के स्रोत. (विकिमीडिया)

ये तो हुई बिजली की बात. अब पानी और ऑक्सीजन का खेल समझ लेते हैं.

हवा से पानी?

क्या हवा से पानी अलग किया जा सकता है?

हां. ऐसा किया जा सकता है. ये कोई नई चीज़ नहीं है. ऐसे डिवाइस को ऐट्मॉस्फियरिक वॉटर जनरेटर कहते हैं.

हम जानते हैं कि हवा में नमी होती है. अगर ज़्यादा नमी वाली हवा को इकट्ठा किया जाए, तो इसमें से ठीक-ठाक मात्रा में पानी निकाला जा सकता है. वो कैसे?

कुछ प्राचीन सभ्यताएं जाल बिछाकर कोहरे से पानी निकालती थीं. ऐसे जाल को फ़ॉग फैंस कहा जाता है. इस सिस्टम में किसी तरह की एनर्जी की ज़रूरत नहीं होती. ये बहुत बुनियादी तरीक़ा है.

कोहरा पानी की बूंदे ही होती हैं. हवा में लटकी. (विकिमीडिया)
कोहरा हवा में लटकी पानी की बूंदें ही होती हैं. (विकिमीडिया)

मॉर्डन टेक्निक कूलिंग कंडेंसेशन के सिद्धांत पर काम करती है. कंडेंसेशन मतलब भाप का तरल पानी में बदलना. और कूलिंग मतलब ठंडा करना. कूलिंग कंडेंसेशन का फ़ंडा ये है कि अगर हवा को ठंडा किया जाए, तो उसमें मौजूद नमी पानी बन जाती है.

आप फ्रिज से ठंडी बॉटल निकालकर बाहर रख देंगे, तो क्या होगा? कुछ देर बाद आपको बॉटल पर पानी की बूंदें दिखेंगी. ये पानी की बूंदें बॉटल के अंदर से नहीं आती. ये बाहर की हवा से आती हैं. जब नम हवा किसी ठंडी सतह से टकराती है, तो हवा में मौजूद मॉइस्चर पानी बनने लगता है. कंडेंसेशन होता है.

इस माइस्चर से बहुत सारे बच्चों के स्कूल बैग गीले हो चुके हैं. (विकिमीडिया)
इस माइस्चर से बहुत सारे बच्चों के स्कूल बैग गीले हो चुके हैं. (विकिमीडिया)

कूलिंग कंडेसेशन टेक्निक में कंप्रेसर से एक रॉड को ठंडा किया जाता है. फिर पंखे से हवा को अंदर खींचा जाता है. ये हवा जब ठंडी रॉड से गुज़रती है, तो उस में से पानी अलग होने लगता है. सूखी हवा को बाहर छोड़ दिया जाता है. और पानी को फ़िल्टर करके पीने लायक़ बना लेते है.

अब यहां लोचा ये है कि इस डिवाइस में कंप्रेसर और फ़ैन जैसी कई इलेक्ट्रिकल चीज़ें लगी हैं, तो इसके लिए बिजली चाहिए होगी. ये बिजली कहां से आएगी? यहां विंड टर्बाइन काम में आ सकता है.

इयोल वॉटर का प्रस्टावित डिज़ाइन. (इयोल वॉटर)
इयोल वॉटर का प्रस्तावित डिज़ाइन. (इयोल वॉटर)

फ़्रांस की एक कंपनी है इयोल वॉटर. 2012 में इस कंपनी ऐसे विंड टर्बाइन का मॉडल सामने रखा, जो हवा से पानी बना सकता था. ये ख़बर CNN में छपी. जब पीएम मोदी ट्रोल किया जाने लगा, तब उनके समर्थक CNN के इस आर्टिकल का लिंक देने लगे.

लेकिन इस विंड टर्बाइन की क़ीमत 7,00,000 डॉलर के आसपास थी. यानी लगभग 5-6 करोड़ रुपए. इयोल वॉटर ने दावा किया था कि जैसे ही ये मार्केट में आएगा, इसकी क़ीमत कम होने लगेगी. लेकिन ये प्रोडक्ट मार्केट में नहीं है. ये विंड टर्बाइन बनाने वाली कंपनी इयोल वॉटर फ़िलहाल बंद हो चुकी है.

अब दूसरे सवाल पर आते हैं.

हवा से ऑक्सीजन?

हमारे आसपास मौजूद हवा में बहुत सारी गैस हैं. लगभग 78% नाइट्रोजन और 21% ऑक्सीजन. और बचे 1% में बाक़ी का अगड़म-बगड़म. हवा में से ऑक्सीजन निकालना मुश्किल तो है, लेकिन नामुमकिन नहीं.

हवा में से गैसों को अलग करने की सबसे पॉपुलर टेक्निक का नाम है फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन. आप ने लैब में देखी होगी. इसका लैब वाला फ़ंडा सिंपल है.

लैब में रखा फ्रेक्शनल डिस्टिलेशन का बुनियादी सैटअप. (विकिमीडिया)
लैब में रखा फ्रेक्शनल डिस्टिलेशन का बुनियादी सेटअप. (विकिमीडिया)

एक गैस का मिक्सचर है. पहले उसको साफ़ कर लीजिए. धूल और बाक़ी की गंदगी अलग कर लीजिए.

फिर इसे ठंडा करते जाइए. एक तापमान पर गिरकर ये गैस का मिक्सचर लिक्विड हो जाएगा.

फिर इस लिक्विड को धीरे-धीरे गर्म करते हैं. इसमें मौजूद गैसों का बॉइलिंग पॉइंट अलग-अलग होगा. बॉइलिंग पॉइंट, मतलब जिस तापमान पर लिक्विड गैस बन जाता है. तो अलग-अलग तापमान पर इस लिक्विड के अलग-अलग हिस्से गैस बनकर निकलेंगे.

आपको जो गैस चाहिए, निकलते वक़्त उसे अलग कर लीजिए.

ये फ़ंडा थ्योरी में आसान है. लेकिन प्रैक्टिकल में कठिन है. और इंडस्ट्रियल लेवल तो और भी जटिल है. लेकिन इंडस्ट्री में ऐसा किया जाता है. इसमें बहुत सॉफिस्टिकेटेड इक्विपमेंट और बहुत सारी एनर्जी लगती है. हवा में से पानी निकालना फिर भी आसान है. लेकिन ऑक्सीजन निकालना ‘भोत हार्ड’ है.

औद्योगिक स्तर गैस अलग करने के लिए होने वाला फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन. (विकिमीडिया)
औद्योगिक स्तर गैस अलग करने के लिए होने वाला फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन. (विकिमीडिया)

ये थी हवा में से पानी और ऑक्सीजन निकालने की साइंस. एक चीज़ यहां गौर करनी होगी. इन दोनों प्रोसेस में विंड टर्बाइन का काम एनर्जी देना है. यहां उसके विंड वाले हिस्से का कुछ ख़ास लेना-देना नहीं है. तो ये दोनों आइडिया किसी और एनर्जी सोर्स के साथ भी की जा सकती हैं. जैसे कि सोलर पैनल या हाइड्रो-इलेक्ट्रिसिटी.

ये थ्योरिटिकली तो पॉसिबल है. लेकिन ये प्रोसेस बहुत एनर्जी भी डिमांड करती हैं. तो ये प्रैक्टिकली कितनी सही होंगी, ये दूसरा विषय है. कई एक्सपर्ट्स के मुताबिक़, यहां असली खेल साइंस का न होकर इकोनॉमिक्स का है. अगर कोई आइडिया आर्थिक पैमानों पर खरा उतरता है, तभी उसे एक प्रॉडक्ट बनाकर मार्केट में लाया जा सकता है.


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