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क्या केंद्र का वन्यजीव संशोधन कानून जंगली जानवरों के लिए जानलेवा साबित होगा?

केंद्र सरकार ने लुप्तप्राय प्रजातियों के व्यापार पर रोक लगाने के अंतरराष्ट्रीय प्रावधानों को लागू करने के नाम पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में कई प्रकार के संशोधन पेश किए हैं. कहा जा रहा है कि इसके कारण लाभ होने के बजाय वन्यजीवों के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न हो सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे हाथियों का व्यापार शुरू हो सकता है और मौजूदा कानून के तहत लकड़बग्घा, लोमड़ी, सियार जैसे जानवरों को मिली सुरक्षा छीनी जा सकती है. नतीजतन, इन जानवरों की हत्या करने पर कोई कार्रवाई नहीं होगी और इनके चमड़ों के गैरकानूनी व्यापार में बढ़ोतरी होने की आशंका है.

इसके साथ ही केंद्र के प्रस्तावित संशोधन के चलते राज्य वन्यजीव बोर्ड के करीब-करीब निष्क्रिय हो जाने की आशंका जताई गई है. कहा गया है कि राज्य वन्यजीव बोर्ड की जगह छोटे दर्जे की समिति बनाने का प्रावधान किया गया है, जिसके पास न तो फैसले लेने की पर्याप्त शक्तियां होंगी और न ही ये जवाबदेह होगा.

इस कानून को बीते साल 17 दिसंबर को संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया गया था, जिसे संसद की स्थायी समिति के पास विचार-विमर्श के लिए भेज दिया गया है. पर्यावरण के मामलों पर काम करने वाली संस्थाओं ने इस प्रस्तावित कानून पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए अपनी आपत्तियां और सलाह भेजना शुरू कर दिया है.

कानून में क्या है?

भारत सरकार का कहना है कि वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2021 इसलिए लाया गया है ताकि लुप्तप्राय जानवरों के व्यापार को लेकर बने अंतरराष्ट्रीय नियमों को लागू किया जा सके. इन नियमों को कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन इन्डैन्जर्ड स्पीशीज (सीआईटीईएस) कहते हैं.

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने विधेयक के उद्देश्यों एवं कारणों में कहा है, ‘भारत संकटग्रस्त वन्य प्राणी एवं वनस्पति के अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते का एक पक्षकार है, जो यह अपेक्षा करता है कि समझौते के उपबंधों को लागू करने के लिए समुचित उपाए किए जाएं, इसलिए अधिनियम में संशोधन करने का प्रस्ताव किया गया है.’

सीआईटीईएस दुनियाभर की सरकारों के बीच एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है. इसके तहत ये सुनिश्चित करने के लिए नियम बनाए गए हैं कि जंगली जानवरों के व्यापार से उनकी प्रजातियों के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न न हो. भारत ने अभी तक इन नियमों को अपने यहां लागू नहीं किया है. लेकिन प्रस्तावित संशोधन के जरिये इन्हें यहां भी लागू किया जा सकेगा. कुछ कारणों से इसे बेहतर समझा जा रहा है, लेकिन साथ में ये भी कहा गया है कि इसमें वन्यजीव कानून को कमजोर करने वाले प्रावधान जोड़े गए हैं.

मौजूदा कानून के तहत हाथियों समेत कई जंगली जानवरों के व्यापार पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा हुआ है. हालांकि इसके एक प्रावधान के मुताबिक मुख्य वन्यजीव वार्डन (सीडब्ल्यूएलडब्ल्यू) की मंजूरी के आधार पर अनुसूचित प्रजाति के जानवर को पाला जा सकता है, लेकिन ये विरासत मामला होना चाहिए. मतलब वही व्यक्ति हाथी को अपने पास रख सकता है, जिसे ये अपने पूर्वजों से विरासत में मिला हो. ऐसा व्यक्ति हाथी को ट्रांसफर तो कर सकता है, लेकिन उसमें पैसे का लेन-देन नहीं होना चाहिए. यानी हाथी को किसी और के हवाले करने के बदले खरीद-फरोख्त नहीं की जा सकती.

लेकिन प्रस्तावित कानून के तहत ‘जीवित हाथियों’ को इस प्रावधान से बाहर कर दिया गया है. जानकारों के मुताबिक इसका मतलब ये है कि अब हाथियों का व्यापार या खरीद-फरोख्त किया जा सकता है. साथ ही इसमें राज्य वन्यजीव बोर्ड को भी कमजोर करने का प्रावधान किया गया है. मौजूदा कानून के तहत राज्य वन्यजीव बोर्ड के अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं और वन मंत्री उपाध्यक्ष होते हैं. इसके अलावा इसके सदस्यों में अधिकारियों के साथ-साथ 10 पर्यावरण विशेषज्ञ शामिल होते हैं.

लेकिन इस कानून में संशोधन करते हुए अनुच्छेद 6ए का प्रावधान किया गया है, जिसके तहत राज्य वन्यजीव बोर्ड की एक ‘स्थायी समिति’ का गठन करने का प्रस्ताव है. इसकी अगुवाई वन मंत्री करेंगे. समिति के सदस्यों की संख्या 10 से ज्यादा नहीं होगी, जिनके नाम मंत्री द्वारा नामित किए जाएंगे. जानकारों के मुताबिक इसका मतलब ये हुआ कि अगर मंत्री चाहेंगे तो स्थायी समिति सिर्फ दो सदस्यों (वन मंत्री और एक सदस्य) के साथ भी काम कर सकती है.

दरअसल, ये प्रस्ताव केंद्रीय स्तर पर बने राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के मॉडल की नकल है. इस बोर्ड की स्थायी समिति बनाने के चलते खुद राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की बैठक हुए कई साल बीत गए हैं. इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं और साल 2014 से इसकी कोई बैठक नहीं हुई है. चूंकि राज्य वन्यजीव बोर्ड में विभिन्न क्षेत्र के लोग शामिल होते हैं, इसलिए वे वन्यजीव के हित में आवाज उठा पाते हैं. लेकिन स्थायी समिति के गठन के चलते ऐसा संभव नहीं हो पाएगा.

केंद्र ने इस कानून के जरिये लकड़बग्घा, अंडमान जंगली सुअर, भारतीय लोमड़ी, बंगाल लोमड़ी, जंगली बिल्ली, एशियाई सियार जैसे जानवरों को ऐसे जीव-जन्तु की श्रेणी में डालने का प्रस्ताव किया है, जो फसल या अनाज को नुकसान पहुंचाते हैं. आशंका जताई गई है कि इसी कारण इनकी आसानी से हत्या की जा सकती है, इनका व्यापार किया जा सकता है और ऐसा करने वालों पर कोई कार्रवाई भी नहीं होगी.

अभी तक इन जानवरों को इससे संरक्षण मिला हुआ है. हालांकि सरकार ने इन जानवरों को अब ‘अनाज को हानि पहुंचाने वाले जीव-जन्तु’ की श्रेणी में डालने का प्रस्ताव किया है.

क्या कहते हैं जानकार?

इस संशोधन कानून के कई प्रावधानों का विरोध करते हुए प्रतिष्ठित गैर सरकारी संस्था लाइफ (लीगल इनिशिएटिव फॉर फॉरेस्ट एंड एन्वाइरन्मेंन्ट) ने पर्यावरण और वन पर संसद की स्थायी समिति को विस्तृत पत्र लिखा है, जिसका नेतृत्व कांग्रेस सांसद जयराम रमेश कर रहे हैं.

संस्था ने कहा है,

‘साल 2003 के बाद इस कानून में इतना बड़ा संशोधन किया जा रहा है. केंद्र सरकार इस कानून के जरिये अपने आप को बेतहाशा शक्तियां दे रही है कि वे किस तरह संरक्षित जानवरों या पशुओं की श्रेणी बदल सकते हैं. ये ध्यान देने की जरूरत है कि आज तक विभिन्न प्रजातियों को बिना किसी वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर वर्मिन (अनाज को हानि पहुंचाने वाले जीव-जन्तु) घोषित किया जाता रहा है. आमतौर ये राजनीतिक दबाव में होता है.’

लाइफ के मुताबिक ये ध्यान देने की जरूरत है कि एक जंगली जानवर को वर्मिन घोषित किए जाने से अन्य जन्तुओं पर भी प्रभाव पड़ता है. उदाहरण के तौर पर, ऐसा कई बार देखने को मिला है कि जंगली सूअर के लिए गए बिछाए गए जाल के चलते तेंदुआ, बाघ और अन्य जानवरों की हत्या हुई है.

वहीं ‘यमुना जिये’ अभियान के मनोज मिश्र कहते हैं कि इस तरह का संशोधन कानून लाकर सरकार असल मुद्दे से भटकती हुई दिख रही है. उन्होंने कहा,

‘दरअसल इसका मकसद वन्यजीव व्यापार पर अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन के प्रावधानों को देश में लागू करना था. ताकि इसका उल्लंघन होने पर घरेलू कानून के आधार पर कार्रवाई हो सके. लेकिन इन्होंने इसके साथ ही तीन-चार और चीजें शामिल कर ली हैं, जिसकी जरूरत नहीं थी.’

मनोज ने कहा कि लकड़बग्घा, लोमड़ी, सियार जैसे जानवरों को वर्मिन घोषित करना काफी जोखिम भरा होगा, क्योंकि इनमें से कोई भी जानवर ऐसा नहीं है जो मनुष्यों की जान के लिए खतरा हो. ये फसल भी बर्बाद नहीं करते हैं. इसलिए सवाल उठता है कि क्या सोचकर ये संशोधन किया जा रहा है. मनोज के मुताबिक,

‘इसके कारण इनके चमड़ों का गैरकानूनी व्यापार हो सकता है. सियार के चमड़े तो काफी पॉपुलर हैं. अभी भी इसका गैरकानूनी शिकार होता है. मेरा कहना है कि यदि ये सब करना है तो सोच समझकर होना चाहिए.’

मनोज ने बताया कि ये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य है कि जब कभी प्राकृतिक संपदा से जुड़े कानूनों पर विचार किया जाए, तो उसे कमजोर नहीं करना होता है. लेकिन यहां तो वन्यजीव कानून को कमजोर किया जा रहा है. इस पर विस्तृत विचार-विमर्श किया जाना चाहिए, बिना इसके इसमें कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए.


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