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विकिपीडिया ने मोदी सरकार को गंभीर मामले पर चिट्ठी लिखी, जिसपर कोई बात नहीं कर रहा

विकिपीडिया का नाम आप जानते होंगे. नाम न भी सुना हो मगर इस्तेमाल जरूर किया होगा. दुनियाभर की जानकारी यहां मिलती है. इसके बिना आधे से अधिक कॉलेज स्टूडेंट्स के असाइंमेंट पूरे नहीं हो पाते, ऐसा मज़ाक करते हैं लोग. पञ्चमहाभूत से लेकर थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी तक, आम से लेकर आवाम तक- सबके बारे में यहां आपको जानकारी मिल जाएगी.

अब इसी को चलाने वाली जो संस्था है, उसने भारत को चिट्ठी लिखी है. ये हुई सीधी बात. अब चलते हैं डीटेल में.

विकिमीडिया फाउंडेशन है. अमेरिका का एक NGO है. ये चलाते हैं विकिपीडिया, और विकिमीडिया कॉमन्स. इनकी खासियत ये हैं कि इन पर कोई भी जानकारी शेयर कर सकता है. अपलोड कर सकता है. एडिट कर सकता है. इन लोगों को वॉलंटियर कहते हैं. विकिपीडिया पर लिखे हुए आर्टिकल मिलते हैं, विकिमीडिया पर तस्वीरें, ड्रॉइंग जैसे मल्टीमीडिया रिसोर्स मिलते हैं.

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चिट्ठी लिखने वाली अमांडा केटन. इनकी लिखी हुई चिट्ठी विकिपीडिया ने अपनी साईट पर भी अपलोड की है ताकि सभी उसे देख सकें. (तस्वीर: विकिमीडिया)

इसी फाउंडेशन की जनरल काउंसल अमांडा केटन ने आईटी मिनिस्टर रवि शंकर प्रसाद को चिट्ठी लिखी है. इसमें उन्होंने लिखा है, कि इंटरमीडियरी लायबिलिटी नियमों में जो बदलाव सुझाये गए हैं, उन पर दुबारा विचार किया जाए.

ये इंटरमीडियरी लायबिलिटी एक्ट क्या है?

इंटरमीडियरी यानी मध्यस्थ. लायबिलिटी यानी जिम्मेवदारी. इंटरनेट पर साइट्स जैसे सर्च इंजन (गूगल, बिंग, याहू), पेमेंट साइट्स (पेपाल, एमेज़ोन पे), मार्केटिंग साइट्स (मिन्त्रा, जबोंग) इत्यादि इंटरमीडियरी होते हैं. यानी ऐसे प्लेटफ़ॉर्म जिन पर यूजर अपना कंटेंट डालते हैं. इनके ऊपर लगने वाले कानून में बदलाव की घोषणा सरकार ने पिछले साल दिसंबर में की थी. कहा था, पब्लिक से सुझाव लेकर नया ड्राफ्ट बनाएंगे. लेकिन अभी तक उन सुझावों को लेकर बनाया गया ड्राफ्ट, या नए नियम सरकार ने अभी तक नहीं दिखाए हैं. इसी को लेकर अमांडा केटन ने ये चिट्ठी लिखी.

आईटी एक्ट 2011 का सेक्शन 79 इंटरमीडियरी लायबिलिटी की बात करता है. इसमें वो सभी डिजिटल पोर्टल आते हैं जिन पर सूचना, जानकारी इत्यादि का लेन-देन होता हो. इसमें सरकार ने संशोधन की पेशकश की थी. इस संशोधन के मुताबिक़:

# ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स ऐसी तकनीक का इस्तेमाल शुरू करेंगे जिससे ‘गैर-कानूनी कंटेंट’ पर लगाम लगाई जा सके.

# एंड टू एंड इन्क्रिप्शन (जैसे वॉट्सऐप में होता है, कि आपके मैसेज बीच में कोई पढ़ नहीं सकता) को हटाया जाए ताकि ये पता लगाया जा सके कि कोई भी मैसेज सबसे पहले किसने भेजा था. इसके पीछे सरकार का तर्क था कि सोशल मीडिया का बुरा इस्तेमाल अपराधी और एंटी नेशनल तत्त्व कर कर रहे हैं. इस चैलेन्ज से निबटने के लिए नए बदलावों की ज़रुरत है.

# एक नोडल पॉइंट ऑफ कांटेक्ट सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बनवाने पड़ेंगे. जोकि लोकल होंगे. ताकि ज़रूरत पड़ने पर सरकार उनसे कांटेक्ट कर सके. ये कानूनी जांच एजेंसियों और अफसरों के साथ 24×7 संपर्क में रहेगा.

# 50 लाख से ज्यादा यूजर्स वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को सरकार की किसी भी क्वेरी का 72 घंटे के भीतर जवाब देना होगा.

# किसी भी ‘गैरकानूनी गतिविधि’ का रिकॉर्ड अब 180 दिन तक रखना होगा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को. पहले ये सीमा 90 दिनों की थी.

इस पर सरकार ने कहा था कि लोगों के सुझाव आमंत्रित हैं. 15 जनवरी 2019 तक की डेडलाइन दी गई थी. लेकिन उसके बाद से इसमें कोई भी बदलाव हुए हों, या नए सुझाव जोड़े गए हों, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई है.

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2018 में सरकार ने वॉट्सऐप पर फ़ैल रही अफ़वाहों पर लगाम लगाने की बात छेड़ी थी. उसी का हवाल देते हुए ये बदलाव भी सुझाए गए थे. इलेक्ट्रोनिक्स एंड इनफार्मेशन टेक्नोलोजी मंत्रालय के तहत आने वाले इस मुद्दे पर दुबारा बहस छिड़ गई है. (तस्वीर: PTI)

विकीपीडिया को इससे क्या दिक्कत है?

ये अमांडा केटन की चिट्ठी में साफ़-साफ़ बताया गया है. उसी चिट्ठी की मुख्य बातें, और इंटमीडियरी लायबिलिटी एक्ट से होने वाली दिक्कतों का असर हम आपको यहां पढ़ा रहे हैं :

# इस बिल में सुझाए गए कुछ बदलाव जानकारी के मुफ्त एक्सेस में बाधा पहुंचाएंगे. यूजर जो कुछ भी साइट पर अपलोड करते हैं, उनको खुद-ब-खुद फ़िल्टर करना ज़रूरी हो, या कंटेंट को हटाने के लिए कम समय दिया जाए, ये सब विकीपीडिया पर कंटेंट की उपलब्धता और उसकी विश्वसनीयता को उथल-पुथल कर देगा.

# विकिपीडिया का स्ट्रक्चर जियोग्राफी के हिसाब से तय नहीं होता. भाषाओं के हिसाब से होता है. लोग साथ मिलकर विकिपीडिया पर आर्टिकल लिखते हैं. कुछ लोग उसमें छोटे बदलाव करते हैं, कुछ बहुत बड़े बदलाव करते हैं और बड़े-बड़े सेक्शन जोड़ते हैं. नई जानकारी डालते हैं आर्टिकल में. कुछ व्याकरण सुधारते हैं.अब अगर इन सब पर फ़िल्टर लगा दिया जाएगा तो पूरा प्रोसेस ही गड़बड़ा जाएगा.

# किसी एक क्षेत्र में अगर कोई कंटेंट गैर कानूनी है, जबकि बाकी दुनिया में वो पूरी तरह लीगल हो और मानवाधिकारों के अनुसार हो, तो तो उसे हटाना भी विकीपीडिया के ग्लोबल नज़रिए और पहुंच के खिलाफ है. पूरी दुनिया के लोग विकिपीडिया पर एक जैसा ही कंटेंट देखते हैं. भारत से कोई लेखक बर्लिन में बैठे एडिटर से एक ही आर्टिकल पर कोलैबोरेट कर सकता है. अब इसमें हुए बदलावों को एक देश में दिखने देना और दूसरे में प्रतिबंधित करना असंभव है.

# इस तरह की मांगें विकिपीडिया जैसे फ्री रिसोर्स के नॉन-प्रॉफिट मॉडल पर बहुत बुरा असर डालेगी. बड़ी कम्पनियां तो अपने लोकल ब्रांच खोल सकती हैं. लेकिन सीमित संसाधनों में काम करने वाली कम्पनियों के लिए ये बहुत मुश्किल होगा.

# ऑनलाइन बातचीत/कम्युनिकेशन पर नज़र रखने की इस तरह की जरूरत को थोपना अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए एक गंभीर खतरा है. इससे विकिपीडिया पर कंट्रीब्यूट करने वाले लोग खुलकर प्रोजेक्ट्स में हिस्सा नहीं ले पाएंगे. विकीपीडिया अपने यूजर्स को ट्रैक नहीं करता. ये डेटा की रखवाली के लिए और पढ़ने/लिखने वालों की स्वतंत्रता के लिए ज़रूरी है. उनकी सुरक्षा के लिए भी जो संवेदनशील मुद्दों पर कंटेंट लिखते/एडिट करते हैं.

# अपने यूजर्स को ट्रैक करने के लिए वेबसाइट्स को कहना फ्री कम्युनिकेशन को बाधित करेगा. और इंटरनेट पर वैध आर्थिक गतिविधियों में भी अड़ंगा डालेगा. ख़ास तौर पर उन देशों में जहां पर ऑनलाइन सेंसरशिप काफी है.


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