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आशुतोष ने कहा सफर खत्म, लेकिन बात यहां तक पहुंची कैसे?

15 अगस्त माने आज का दिन प्रधानमंत्री के लाल किले के भाषण के नाम रहता है. सो पूरे देश का मीडिया सुबह-सुबह नहा-धोकर लालकिले पर पहुंच गया था. कि मोदी जी जो भी बोलें, उसके चंक फुर्ती से टीवी पर चला दें. लेकिन चांदनी चौक पर मोदी जी की चांदनी को काट मिली उस खबर से जो गाज़ियाबाद से आई.

पूर्व पत्रकार और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष ने ट्विटर पर ऐलान कर दिया कि वो पार्टी छोड़ रहे हैं. लिखना जानते हैं, इसलिए ऐलान भी कुछ अदा के साथ किया. कि जैसे हर सफर का अंत होता है, वैसे ही मेरी आम आदमी पार्टी के साथ चले सफर का भी अंत आज हो गया है. इस्तीफे के ऐलान वाले ट्वीट में या फिर उसके बाद भी आशुतोष की जानिब से कोई कड़वी बात नहीं आई. आशुतोष ने आम आदमी पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी से इस्तीफा कबूलने की गुज़ारिश की थी. लेकिन पार्टी का जवाब खुद अरविंद केजरीवाल ने दे दिया.

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केजरीवाल ने आशुतोष के ट्वीट पर रिप्लाई करते हुए कहा कि हम कइसे इस्तीफा ले लेंगे भाई, इस जनम में तो ये हो ही नहीं सकता है.
पार्टी के प्रवक्ता दिलीप पांडे ने तो ट्विटर पर आशुतोष के साथ एक तस्वीर शेयर कर दी और लिखा –

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दिलिप पांडे के ट्वीट में बने लाल दिल पर सबका ध्यान गया. और साथ में तस्वीर पर भी, जिसमें वो आज्ञाकारी शिष्य की तरह आशुतोष की बात सुन रहे हैं. फिर एक दूसरे ट्वीट में अरविंद केजरीवाल ने भी आशुतोश ‘सर’ से अपने प्यार का इज़हार किया.

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माने देश इंडिपेंडेंस डे मना रहा था और आम आदमी पार्टी वैलेंटाइन डे मना रही थी. लेकिन ये पीडिए माने पब्लिक डिस्प्ले ऑफ अफेक्शन बड़ी देर से हुआ. आशुतोष तभी से कट्टी हुए बताए जाते हैं जब पार्टी ने उनकी जगह माने आशुतोष गुप्ता की जगह सुशील गुप्ता और एनडी गुप्ता को राज्यसभा भेज दिया था. जी हां, आशुतोष के नाम के साथ गुप्ता लगा था, जिसे वो अब इस्तेमाल नहीं करते. तब से आशुतोष पार्टी के बचाव के लिए टीवी पर कुछ कम नज़र आने लगे. हाल ही में मुज़फ्फरपुर शेलटर होम रेप केस के खिलाफ प्रदर्शन करने जब सारी विपक्षी पार्टियां जंतर-मंतर पहुंचीं, AAP के कई नेता संजय सिंह, मनीष सिसोदिया, सोमनाथ भारती सारे नेता भी गए. लेकिन आशुतोष कहीं नज़र नहीं आए.

हर बार ‘नया’ चुनते रहे हैं आशुतोष

आशुतोष ने अपने करियर में लगातार नई चीज़ों को चुना है. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से वो पहले ग्रैजुएट हुए साइंस में. लेकिन मास्टर्स के लिए पकड़ा फिलॉसफी को. किसी ने पिता से कहा लड़के को यूपीएससी करवाओ, तो आशुतोष दिल्ली आ गए. जेएनयू में दाखिला लिया इंटरनैशनल रिलेशन के कोर्स में. दो अटैंप्ट में UPSC नहीं निकला तो एक अखबार के लिए शौकिया लिखने लगे. फिर वरिष्ठ पत्रकार मृणाल पांडे के कहा, तुम्हें टीवी करना चाहिए तो न्यूज़ चैनल जॉइन कर लिया.

टीवी पत्रकार के तौर पर ही 1996 साल में एक दिन आशुतोष कांशीराम के घर के बाहर खड़े थे. मायावती का मायावती और बसपा को बसपा बनाने वाले कांशीराम. कांशीराम चिढ़े हुए थे. घर से बाहर आते ही पत्रकारों की ओर लपके और आशुतोष को थप्पड़ मार दिया. एक पत्रकार को थप्पड़ मारने के लिए कांशीराम की बहुत आलोचना हुई. लेकिन इस थप्पड़ ने आशुतोष को फेमस कर दिया. पत्रकार के तौर पर फिर आशुतोष ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. जब ‘आप’ में आए तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि आशुतोष जी सीनियर आदमी हैं, इन्हें बड़ी जिम्मेदारी देंगे.

आशुतोष को फेमस बनाने वाला थप्पड़ः

कितनी जायज़ है आशुतोष की नाराज़गी?

आशुतोष पार्टी की ”वादाखिलाफी” नाराज़ ज़रूर बताए जा रहे हैं लेकिन इस बात को भी पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि पार्टी के लिए उनकी उपयोगिता भी सीमित रही. 2014 में उन्हें चांदनी चौक से लोकसभा चुनाव का टिकट दिया गया. वो कांग्रेस के कपिल सिब्बल से तो आगे रहे लेकिन भाजपा के हर्षवर्धन को नहीं हरा पाए. कुछ तो इसकी वजह मोदी लहर रही और कुछ ये कि आशुतोष ज़मीन पर कभी मज़बूत नहीं रहे. इस्तीफे से ठीक पहले तक उनके पार्टी में अपने समर्थक नहीं थे.

एक स्टार पत्रकार के पार्टी प्रवक्ता बनने का ‘आप’ को कभी कोई बड़ा फायदा नहीं हुआ. वो टीवी पर बहस के दौरान प्रोवोक हो जाते थे. माने भावुक हो जाते थे. तो उनके बयानों से पार्टी का पक्ष लोगों तक पहुंचने के बजाय नया बखेड़ा खड़ा हो जाता था. बतौर प्रवक्ता ‘आप’ के लिए आतिशी मरलेना और राघव चड्ढा आशुतोष से बीस साबित हुए. अरविंद केजरीवाल ने दूसरी बार जब दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली, तो कहा कि पार्टी कार्यकर्ताओं को बड़बोलेपन से बचना चाहिए. माना गया कि ये इशारा आशुतोष की तरफ ही था. आप नेता संदीप कुमार को लेकर जब एक विवादित वीडियो जारी हुआ (इसे संदीप कुमार सेक्स सीडी कांड लिखा जाना सही नहीं है) तो आशुतोष ने संदीप के बचाव में एक ब्लॉग लिखा था. इसमें गांधी, नेहरू और अटल पर कुछ ऐसी बातें थीं जिसे कुछ लोगों ने अभद्र माना था. इस मामले में केस भी दर्ज हुआ था.

दिल्ली में एक प्रदर्शन के दौरान फांसी लगाकर जान देने वाले किसान गजेंद्र सिंह की बेटी से बात करते हुए आशुतोष टीवी पर रो दिए थे. भावुक होना अपराध नहीं. लेकिन तभी तक जब तक वो आपके संदेश को न खा जा रही हो.
दिल्ली में एक प्रदर्शन के दौरान फांसी लगाकर जान देने वाले किसान गजेंद्र सिंह की बेटी से बात करते हुए आशुतोष टीवी पर रो दिए थे. भावुक होना अपराध नहीं. लेकिन तभी तक जब तक वो आपके संदेश को न खा जा रही हो.

क्या आशु मान जाएंगे?

आशुतोष ने कहा है कि इस्तीफे के कारण निजी हैं लेकिन निजी कारणों से इस्तीफा कहां दिया जाता है. तो एक कयास ये लगाया जा रहा है कि राज्यसभा की मायूसी आशुतोष लोकसभा में दूर करना चाहते होंगे. और ऐसे में शायद उन्हें ये मालूम चल गया हो (या अंदाज़ा हो गया हो) कि 2019 में उन्हें दोबारा चांदनी चौक या कहीं और से टिकट नहीं मिलेगा, तो उन्होंने पार्टी से नमस्ते कर ली.

पार्टी ने आशुतोष के इस्तीफे को तुरंत नहीं स्वीकारा. तो सवाल ये बचता है कि आशुतोष को इस्तीफा वापस लेने के लिए मनाया कैसे जाएगा. अब ऐसा है कि आम आदमी पार्टी ने लगातार बड़े नाम खोए हैं. योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और कुमार विश्वास मिसाल हैं. लेकिन अरविंद केजरीवाल का ट्रैक रिकॉर्ड लोगों को मनाने के मामले में बहुत अच्छा नहीं रहा है. क्योंकि वो ये तक मानने से परहेज़ ही करते हैं कि किसी नेता के जाने से पार्टी को नुकसान होता है. पार्टी के दीगर नेता भले कह दें कि कुमार विश्वास या फिर योगेंद्र यादव के जाने से पार्टी कुछ कमज़ोर हुई है, केजरीवाल कभी अफसोस नहीं करते. फिर एक बात ये भी है कि आशुतोष के जाने से पार्टी को छवि के स्तर पर जो नुकसान हो न हो, उसके हार्डवेयर को चोट नहीं पहुंचेगी (क्योंकि आशुतोष का अपना वोटर या काडर बेस नहीं है).

अकेले पड़ते केजरीवाल. पहले कुमार विश्वास और अब आशुतोष.
अकेले पड़ते केजरीवाल. पहले कुमार विश्वास और अब आशुतोष.

लेकिन ट्विटर पर जिस तत्परता से केजरीवाल ने आशु ‘सर’ को मनाने की कोशिश की है, उससे ये लगता है कि आशुतोष को रोकने की एक कोशिश तो की ही जाएगी. और पार्टी के भविष्य के लिहाज़ से ये ज़रूरी भी है. क्योंकि दिल्ली वो आखिरी जगह है (और ‘आप’ के दुर्भाग्य से पहली ही) जहां भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली इस पार्टी के पास अपना वजूद बचाने और दम ठोंकने, दोनों की ताकत बाकी है. पंजाब पार्टी का किला हो सकता था, लेकिन आउटपोस्ट ही बन पाया. और अब उस आउटपोस्ट की दीवारें भी दरकने को होती हैं.

आशुतोष को मनाया जाएगा. लेकिन वो लौटेंगे या नहीं, ये वक्त ही बताएगा. तब तक का समय ‘आप’ के भविष्य पर जुगाली करते हुए काटा जा सकता है. और अगर आप जुगाली करते हुए चटखारे भी लेना चाहें तो कुमार विश्वास का ये ट्वीट देख सकते हैं

kumar vishwas


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