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जब 1963 में भारत-पाक बॉर्डर के पास हेलिकॉप्टर हादसे में मारे गए थे टॉप रैंक के 6 ऑफिसर्स

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत नहीं रहे. इंडियन एयरफोर्स ने ट्वीट कर ये जानकारी दी. लिखा,

गहरे अफसोस के साथ अब यह पता चला है कि इस दुर्भाग्यपूर्ण हादसे में जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी मधुलिका रावत और हेलिकॉप्टर में सवार 11 अन्य लोगों की मौत हो गई है.

तमिलनाडु के कुन्नूर में बुधवार, 8 दिसंबर को चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी समेत अन्य अधिकारियों को ले जा रहा सेना का हेलिकॉप्टर क्रैश हो गया. हेलिकॉप्टर में 14 लोग सवार थे. 13 लोगों की मौत हो चुकी है.

सेना के बड़े ऑफ़िसर्स को ले जा रहे हेलिकॉप्टर के साथ हुआ ये हादसा न इकलौता है न पहला. हालांकि हम नहीं जानते कि हमने इन हाई-प्रोफ़ाइल हादसों से क्या सीख ली, लेकिन ऐसे हादसों का इतिहास फिर से जान लेने से शायद हम इस तरह के हादसों से और ज़्यादा सचेत हो पाएं. इतिहास में झांकने पर क़रीब-क़रीब ऐसा ही एक और हादसा दिखाई देता है, जब 22 नवंबर, 1963 को भारतीय वायु सेना का एक हेलिकॉप्टर पुंछ जिले में दुर्घटनाग्रस्त हो गया. इस हादसे में हेलिकॉप्टर में सवार सभी छह लोग मारे गए थे. ये दुर्घटना इस मामले में हाई प्रोफ़ाइल बन गई थी, क्योंकि दुर्घटना में मारे गए लोगों में सभी सेना में ऊंचे पदों पर थे.

22 नवंबर, 1963 के न्यूयॉर्क टाइम्स में एक ख़बर छपी:

भारत और पाकिस्तान को विभाजित करने वाली युद्धविराम रेखा के अंदर ढाई मील की दूरी पर पुंछ में एक हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया. इसमें भारत के सशस्त्र बलों के पांच जनरलों की मौत हो गई.

पुंछ शहर के पास दुर्घटनाग्रस्त हुए एचएएल चेतक (Aérospatiale Alouette) में सवार अधिकारियों पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारियां थीं –

लेफ्टिनेंट जनरल दौलत सिंह – जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ, वेस्टर्न कमांड.

लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह – जनरल ऑफिसर कमांडिंग, 15 कोर

एयर वाइस मार्शल एर्लिक पिंटो – एयर ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ, वेस्टर्न एयर कमांड

मेजर जनरल नलिन कुमार धीरजलाल नानावती – जनरल ऑफिसर कमांडिंग, 25 इन्फेंट्री डिवीजन

ब्रिगेडियर एसआर ओबेरॉय, कमांडर, 93 इन्फेंट्री ब्रिगेड

फ्लाइट लेफ्टिनेंट एसएस सोढ़ी

# इतने बड़े-बड़े ऑफ़िसर्स एक ही हेलिकॉप्टर में क्यों यात्रा कर रहे थे?

असल में ये सभी पुंछ जा रहे थे. ‘बेतर नाले’ के एक चैनल से ही पुंछ को बिजली और पानी मिलता था. चैनल का हेडवर्क पाकिस्तान के कब्जे वाले स्थान पर स्थित था. अक्टूबर 1963 में, पाकिस्तान ने ये हेडवर्क उड़ा दिया था. इसके चलते पुंछ में पानी और बिजली की व्यवस्था ठप्प पड़ गई. अब सेना को एक नया ‘वाटर हेड’ बनाने का काम सौंपा गया. सेना ने जल और बिजली सप्लाई 21 नवंबर, 1963 तक पूरी तरह से बहाल कर दी थी. और ये सभी बड़े अधिकारी इस पूरी व्यवस्था का निरीक्षण करने जा रहे थे.

लेफ्टिनेंट जनरल दौलत सिंह का बस्ट (विकीपिंडिया)
लेफ्टिनेंट जनरल दौलत सिंह का बस्ट (विकीपिडिया)

घटना स्थल की संवेदनशीलता इतनी थी कि इसने कई कॉन्स्पिरेसी को जन्म दिया. जैसे, ‘ये हादसा नहीं एक टेरर अटैक था’ वग़ैरह. लेकिन भारतीय सेना ने इन सभी कॉन्स्पिरेसी को खारिज कर दिया और कहा कि यह एक हादसा ही था.

# क्या हुआ था हादसे वाले दिन?

22 नवंबर की सुबह के क़रीब साढ़े नौ बजे थे. (हालांकि विकीपिडिया और बाकी जगहों पर आपको घटना की तारीख़ 23 नवंबर दिखेगी, लेकिन लेफ्टिनेंट जनरल दौलत सिंह की प्रतिमा के नीचे और कुछ अन्य आधिकारिक स्रोतों में तारीख़ 22 नवंबर, 1963 अंकित है.)

हेडवाटर का निरीक्षण करने के वास्ते लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह उधमपुर से पुंछ पहुंच चुके थे. इसके बाद एयर वाइस मार्शल एर्लिक पिंटो दिल्ली से पुंछ पहुंचे. फ्लाइट लेफ्टिनेंट एस एस सोढ़ी हेलिकॉप्टर में पहुंचे.

जनरल ऑफिसर कमांडिंग, 15 कोर, एयर वाइस मार्शल एर्लिक पिंटो
जनरल ऑफिसर कमांडिंग, 15 कोर, एयर वाइस मार्शल एर्लिक पिंटो.

ये लोग पुंछ के आसपास की दो चौकियों का भी निरीक्षण करने वाले थे. हादसे से जुड़ी ये एक ज़रूरी जानकारी है कि निरीक्षण के वास्ते हर चौकी पर एक नहीं, दो हेलिकॉप्टर लैंड होने थे. अब दिक्कत ये थी कि पहली चौकी में हेलिकॉप्टर लैंड करना थोड़ा मुश्किल था वो चौकी छोटी भी थी और उसमें लैंडिंग करते वक्त बहुत धूल भी उड़ती थी.

एर्लिक पिंटो ने फैसला किया कि दूसरा हेलिकॉप्टर सीधे दूसरी चौकी पर जाएगा और सिर्फ़ अधिकारियों वाला हेलिकॉप्टर ही पहली चौकी में लैंड करेगा. दूसरी चौकी का लैंडिंग बेस पर्याप्त चौड़ा था. यानी वहां पर आसानी से दो हेलिकॉप्टर लैंड हो सकते थे. इसलिए दूसरे, बिना बड़े अधिकारियों वाले, हेलिकॉप्टर को आदेश दिया गया कि दूसरी चौकी पर अधिकारियों का इंतज़ार करे.

पहली चौकी, जिसमें लैंडिंग मुश्किल थी, वहां पर अधिकारियों को लैंडिंग और टेक ऑफ़ करने में कोई दिक्कत नहीं हुई. चौकी का निरीक्षण बिना किसी दिक्कत के समाप्त हुआ.

यहां का निरीक्षण पूरा होने के बाद, दल ने दूसरी चौकी के लिए उड़ान भरी जो 15 मील दूर थी. उड़ान भरने के तीन मिनट बाद ही एस एस सोढ़ी का हेलिकॉप्टर टेलीग्राफ वाली तारों से टकरा गया. इन तारों की कल्पना ऐसे कीजिए कि ये तारें किसी प्लेन एरिया में नहीं पहाड़ी एरिया में थीं. यानी एक पोल ऊंचाई में और दूसरा गहराई में. इन तारों में हेलिकॉप्टर उलझ गया. तब हेलिकॉप्टर करीब 200 फीट की ऊंचाई पर था. इसके बाद सोढ़ी ने हेलिकॉप्टर से नियंत्रण खो दिया और हेलिकॉप्टर पुंछ नदी के तट पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया.

लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह
लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह

# लेकिन सभी अधिकारी एक साथ क्यूं?

दी ट्रिब्यून अपने एक आर्टिकल में लिखता है-

इसका उत्तर ये है कि इस तरह की दुर्घटना पहले कभी नहीं हुई थी और जब कुछ होता है तभी हम भारतीय जागते हैं. जैसे पुलवामा आतंकी हमले और 40 CRPF जवानों की मौत के बाद ही काफिले की आवाजाही, समय, पड़ावों में बदलाव किए गए. (उससे पहले नहीं).

1963 की इस घटना के बाद सरकार ने एहतियाती नियम के तौर पर सशस्त्र बलों के वरिष्ठ अधिकारियों के एक साथ यात्रा करने पर प्रतिबंध लगा दिया.


वीडियो देखें: गृहमंत्री की बेटी को छुड़ाने के लिए 5 आतंकियों की रिहाई, क्या कोई षड्यंत्र था?

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