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इंजीनियरिंग में लड़कियां इतनी कम क्यों होती हैं?

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यह लेख डेली ओ से लिया गया है. जिसे लिखा है पॉलोमी घोष ने. 
दी लल्लनटॉप के लिए हिंदी में यहां प्रस्तुत कर रही हैं शिप्रा किरण.


इंजीनियरों पर बने चुटकुले बहुत मशहूर हैं. ये चुटकुले इंजीनियरों पर लिखे गए हैं और सिर्फ इंजीनियर ही उन्हें समझ पाते हैं. उनमें ऐसे चुटकुले ज़्यादा हैं जिनमें लड़कियों के इंजीनियरिंग नहीं करने को लेकर मजाक बनाया जाता है (खासकर सुंदर लड़कियों के बारे में). सिविल और मेकैनिकल इंजीनियरिंग में इनकी संख्या और भी कम है. इसलिए इन स्ट्रीम्स से जुड़े चुटकुले भी ज़्यादा हैं.

लेकिन 2018 में IIT दिल्ली में खुशी की लहर दौड़ गई जब वहां दाखिला पाने वाले बच्चों में 16 प्रतिशत लड़कियां थीं. ये छात्राओं की अब तक की सबसे बड़ी संख्या है. भारत में 23 IIT हैं. जहां 12,071 स्टूडेंट्स का दाखिला होता है. जिसमें 10,219 लड़के और 1,852 लड़कियां हैं. सीटों को लेकर इस तरह का भेदभाव खतरनाक है. इस साल पहली बार इस संस्थान ने लड़कियों की संख्या को बढ़ाने के लिए और लैंगिक असमानता को ख़त्म करने के लिए एक नए तरह के कोटे की शुरुआत की है- सुपरन्युमेरेरी कोटा. (इसमें पहले की सीटों के अलावा अलग से भी कुछ और सीटें लड़कियों के लिए रखी जाएंगी)

लेकिन ये भी कोई पक्का हल नहीं है. जैसे ही छात्र-छात्राओं का अनुपात ठीक हो जाएगा वैसे ही ये कोटा ख़त्म कर दिया जाएगा. बहुत शिक्षाविदों का ये भी मानना है कि इस तरह के कोटे लड़कियों की प्रतिभा पर सवाल खड़ा करते हैं. जबकि सच्चाई है कि हमेशा बोर्ड परीक्षाओं में लड़कियां ही लड़कों से आगे ही रहती हैं. ये भी बहस का एक मुद्दा है कि छात्र और छात्राओं का लैंगिक अनुपात से जुड़े इस तरह के मानदंड आखिर बनाता कौन है? इस साल IIT ने 14 प्रतिशत छात्रों को दाखिला देने का लक्ष्य रखा है जबकि 2020 तक इस संख्या को 20 प्रतिशत तक बढ़ा देने का लक्ष्य है. पिछले कुछ वर्षों में ये संख्या 8 प्रतिशत घटी है.  

सुपरन्युमेरेरी सीटें ये सुनिश्चित करेंगी कि जिन लड़कियों ने IIT की प्रवेश परीक्षा पास की है उन्हें अपने आसपास के IIT में भी सीटें मिल पाएंगी. उन्हें इंजीनियरिंग के लिए अपने घरों से बहुत दूर नहीं जाना पड़ेगा. लेकिन इसके अलावा ये भी सच है कि क्या एडमिशन चाहने वाली लड़कियां हैं भी? 2018 में सिर्फ 6.7 प्रतिशत लड़कियों ने JEE एडवांस की परीक्षा पास की है. JEE (एडवांस) पास करने वाले टॉप 500 रैंकर्स में सिर्फ 14 लड़कियां हैं.

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IIT-Delhi में इस साल 14 प्रतिशत लड़कियों का ऐडमिशन होना बेशक एक अच्छी खबर है. लेकिन इस से पता चलता है कि दिल्ली आईआईटी के अलावा दूसरे आईआईटी में एडमिशन लेने वाली लड़कियों की संख्या कितनी कम है. क्योंकि एंट्रेंस एग्जाम पास करने वाली लड़कियों की संख्या भी बहुत कम है. असल में कुछ ही लड़कियां आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास कर पाती हैं और उनमें से भी बहुत कम हैं जो आईआईटी में ऐडमिशन लेती हैं. अगर 2018 में भी ऐसी स्थितियां हैं तो इनके लिए कौन जिम्मेवार है? एक समीति ने इसका पूरा दोष सामाजिक भेदभाव को दिया है. एक अध्ययन से ये बात पता चली है कि मां-बाप JEE की तैयारी के लिए लड़कियों पर खर्च करने को राज़ी ही नहीं होते. कोटा के कोचिंग में होने वाले ऐडमिशन इसका नमूना हैं. जबकि मेडिकल के क्षेत्र में ऐसी बात नहीं है. मेडिकल के लिए ली जाने वाली NEET परीक्षाओं में ये अनुपात 50-50 का है. एक रिपोर्ट के अनुसार देश के मेडिकल कॉलेज में 51 प्रतिशत लड़कियां हैं. तो अब इस मुद्दे पर सामाजिक भेदभाव को कैसे पारिभाषित करेंगे? क्या मेडिकल की पढ़ाई इंजीनियरिंग की पढाई से कम खर्चीली है?

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ये साफ़ है कि समस्या कुछ ज्यादा ही गंभीर है. दुनिया भर की बहसें चल रही हैं इस मुद्दे पर. कुछ का कहना है कि JEE की परीक्षा भी लड़कियों को लेकर असंवेदनशील  है. मतलब जानबूझकर लड़कियों को इसमें पास नहीं किया जाता. अगर ये बात सच है तो चाहे कितनी भी सीटें बढ़ा दी जाएं या कोटा लगा दिए जाएं समस्या ख़त्म नही होगी. इंजीनियरिंग सेक्टर चाहे वो पढ़ाई हो या इससे जुड़ी नौकरियां सबको ही लड़कियों के मामले में उदार होना होगा. उन्हें अपने साथ लेकर चलना होगा. समाज अजीब तरह के पूर्वाग्रहों से भरा पड़ा है. लड़कियां बायोलॉजी में ज्यादा इंट्रेस्ट रखती हैं और इसलिए वे मेडिकल की पढ़ाई करना चाहती हैं या लड़कियां मैथ्स में कमजोर होती हैं या लड़कियों के पास लड़कों से अधिक विकल्प होते हैं जैसी न जाने कितनी ही बातें. तर्कहीन बातें. ऐसी बातें स्थितयों को और अधिक बिगाड़ती हैं. बराबरी की सारी संभावनाएं ख़त्म कर देती हैं.

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सीटें बढ़ाना एक अच्छा कदम है और इसकी तारीफ़ भी होनी चाहिए लेकिन ज्यादा जरूरत इस बात की है कि ऐडमिशन लेने वाली लड़कियों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो. मेकैनिकल या सिविल इंजीनियरिंग की शाखाओं को गर्व से ‘बॉयज़ोन’ या लड़कों का स्ट्रीम बता देना कभी जेंडर से सम्बंधित भेदभाव को दूर नहीं कर पाएगा. बल्कि कहीं न कहीं प्रतिभाएं भी वंचित रह जाएंगी और संस्थान भी.


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