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पाकिस्तान में पोलियो टीकाकरण मिशन क्यों नहीं सफल हुआ? कोरोना का क्या होगा?

पोलियो और पाकिस्तान. एक-दूसरे के लंगोटिया यार हो चुके हैं. अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं, की तर्ज़ पर पाकिस्तान तमाम कोशिश कर पोलियो को जाने से रोक लेता है.

एक आंकड़े से समझने की कोशिश करते हैं. साल 2017 में पाकिस्तान में पोलियो के केवल आठ नए मामले सामने आए थे. यानी पोलियो वायरस खत्म होने की कगार पर पहुंच चुका था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 2018 में बारह नए मामले पकड़ आए. जबकि 2019 में नए संक्रमण की संख्या बढ़कर 147 तक पहुंच गई. 2020 में 84 नए केस दर्ज़ हुए. इस साल अभी तक सिर्फ़ एक केस सामने आया है. लेकिन आशंका है कि अगर इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया गया तो कुछ महीनों में ये ग्राफ़ दो लाख तक पहुंच सकता है. जैसा कि भारत में पोलियो अभियान का नारा था – एक भी बच्चा छूटा, सुरक्षा चक्र टूटा.

दुनिया में केवल दो देश ऐसे हैं, जहां पोलियो का अस्तित्व अभी भी बना हुआ है. पहला है पाकिस्तान और दूसरा अफ़ग़ानिस्तान.

आज हमारा फ़ोकस पाकिस्तान पर होगा

आज इस मुद्दे पर चर्चा की वजह क्या है? पाकिस्तान का एक प्रांत है, ख़ैबर-पख्तूनख़्वाह. प्रांत के मरदान जिले में बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाई जा रही थी. खुराक पिलाने आई एक टीम को सुरक्षा दे रहे दो पुलिसवाले ड्यूटी के बाद थाने पहुंचे. रजिस्टर पर साइन कर उन्हें अपने घर जाना था. तभीबाइक पर सवार हमलावरों ने उन्हें गोलियों से भून दिया. दोनों पुलिसवालों की मौके पर ही मौत हो गई. पाकिस्तान में इस तरह की ये पहली घटना नहीं है. गूगल पर एक कीवर्ड सर्च करिए और आपको ऐसी भतेरी ख़बरें मिल जाएंगी.

अब आपके मन में कई सवाल उठ रहे होंगे. पहला, पाकिस्तान अभी तक पोलियो से मुक़्त क्यों नहीं हुआ है? और दूसरा सवाल ये कि टीका पिलाने वाली टीम के साथ पुलिसवाले क्यों जाते हैं? साथ में बताएंगे, पाकिस्तान की इस समस्या के पीछे ओसामा बिन लादेन की क्या भूमिका है? और, किस तरह ये ट्रेंड कोरोना महामारी को ख़त्म करने में सबसे बड़ा रोड़ा बन सकता है?

Pakistan Polio Vaccination Security Killed
पोलियो की खुराक पिलाने आई टीम को सुरक्षा दे रहे दो पुलिसवाले को हमलावरों ने मार डाला. (तस्वीर: एएफपी)

सबसे पहले समझते हैं, पोलियो है क्या?

ये एक संक्रामक बीमारी है. इसे पोलियोमेलाइटिस के नाम से भी जाना जाता है. पोलियो वायरस मुंह के जरिए शरीर में प्रवेश करता है. उसके बाद ये रक्त कोशिकाओं के माध्य से शरीर के सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर अटैक करता है. इसके चलते हड्डियों का विकास रुक जाता है और व्यक्ति अपंग हो जाता है. इस वायरस का सबसे अधिक प्रभाव बच्चों पर होता है. इसलिए इसे शिशु अंगघात भी कहा जाता है. कई मामलों में ये जानलेवा भी होता है.

पोलियो का इतिहास कम-से-कम साढ़े तीन हज़ार बरस पुराना है. इसके खतरे को मापने में लंबा समय लग गया. बीसवीं सदी की शुरुआत में पश्चिमी देशों में इसका प्रभाव दिखने लगा था. अमेरिका के 32वें राष्ट्रपति हुए, फ़्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट. जब वो 39 बरस के थे, तब उन्हें भी पोलियो का संक्रमण हो गया था. उनका कमर से नीचे का हिस्सा सुन्न पड़ गया. रूज़वेल्ट ने इसपर बहुत मेहनत की. तब जाकर वो कुछ दूर तक पैदल चल पाने में कामयाब हुए. हालांकि, वो कभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए. और, ताउम्र अपनी अपंगता को छिपाने की कोशिश करते रहे.

जब पोलियो से अमेरिका की हालत ख़राब हो गई!

1952 का साल अमेरिका के लिए बेहद दुखदायी रहा. इस साल पोलियो के 58 हज़ार से अधिक नए मामले पाए गए, जबकि तीन हज़ार से अधिक की मौत हो गई. इनमें से ज़्यादातर बच्चे थे. मार्च 1953 में अमेरिकी वैज्ञानिक जोनास साल्क ने ऐलान किया कि उन्होंने पोलिया का इलाज खोज लिया है. क्लिनिकल ट्रायल्स के बाद इसे सुरक्षित घोषित कर दिया गया. वैक्सीन की मदद से अमेरिका ने जल्दी ही पोलियो पर काबू पा लिया. विकसित देशों में तो पोलियो खत्म हो चुका था. लेकिन विकासशील और अल्प-विकसित देशों की तरफ किसी का ध्यान था ही नहीं.

Jonas Salk
अमेरिकी वैज्ञानिक जोनास साल्क. (तस्वीर: एएफपी)

इन देशों में भी पोलियो की बीमारी एक समस्या हो सकती है, ये मानने तक 1970 का दशक आ चुका था. तब जाकर वैश्विक स्तर पर टीका लगाने का काम शुरू हुआ. 1988 में WHO के प्रयास से ग्लोबल पोलियो इरैडिकेशन इनीशिएटिव (GPEI) की स्थापना हुई. इसमें कई और भी संस्थाओं ने मदद का हाथ बढ़ाया. और, सिलसिला चल निकला. पोलियो उन्मूलन अभियान को इतिहास के सबसे विस्तृत और सबसे विस्तृत सफ़ल मिशनों में गिना जाता है.

अफ़्रीकी महाद्वीप के देश विकास के मानकों पर सबसे नीचे माने जाते हैं. पोलियो अभियान की सफ़लता देखिए कि वहां के देश भी आगे निकल चुके हैं. नाइजीरिया अंतिम देश था, जिसने 2020 में ख़ुद को पोलियो-मुक्त घोषित किया.

लेकिन पाकिस्तान में अभी तक ऐसी नौबत नहीं आई है. पाकिस्तान में पोलियो टीकाकरण 1994 के साल से चल रहा है. इसके बावजूद वो ज़ीरो नए केस का लक्ष्य हासिल करने में नाकाम रहा. 2014 में भारत ने पोलियो-मुक्त होने का ऐलान किया था. उसी साल पाकिस्तान में 306 नए मामले दर्ज़ हुए थे. साल 2000 के बाद से एक साल में सबसे ज़्यादा.

Nigera Polio Vaccination
नाइजीरिया अंतिम देश था, जिसने 2020 में ख़ुद को पोलियो-मुक्त घोषित किया. (तस्वीर: एएफपी)

पाकिस्तान में पोलियो टीकाकरण को मनचाही सफ़लता न मिलने का कारण क्या है?

– पहला, टीके के प्रति दुष्प्रचार. लोगों को ये लगता है कि वैक्सीन पश्चिमी देशों का हथियार है. इसके जरिए अमेरिका जासूसी करता है. कोरोना वैक्सीन में चिप वाली जो थ्योरी आज चल रही है, वो पाकिस्तान में बहुत पहले से कायम है. एक मिथ्या धारणा ये है कि पोलियो का टीका लगा तो बच्चा नपुंसक हो जाएगा. एक अफ़वाह ये है कि टीके में सुअर का मांस और अल्कोहल मिली होती है. दोनों ही चीज़ें इस्लाम में हराम मानी जाती हैं. लोगों को लगता है कि टीका लगाने से उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा.

– दूसरा कारण है भ्रष्ट हेल्थ सिस्टम. पोलियो अभियान के लिए पैसे पर्याप्त मिलते हैं. इसके बावजूद ज़रूरत के अनुसार हेल्थ स्टाफ़्स की नियुक्ति नहीं होती. स्टाफ़्स हैं भी तो उनमें प्रशिक्षण की कमी है. ड्यूटी में लापरवाही और वैक्सीन की स्मगलिंग की घटनाएं भी आम हैं.

– तीसरी वजह है टीके की पहुंच. पाकिस्तान के कई इलाके ऐसे हैं जहां कट्टरपंथी संगठनों का कब्ज़ा है. कई जगहों पर तालिबान का प्रभाव है. वहां वैक्सीन के ख़िलाफ़ फतवा जारी हो चुका है. उन इलाकों में टीका लगाना किसी वॉर-ज़ोन में काम करने जैसा है. चूंकि पोलियो के टीके की कई खुराक लगती है. इसलिए बार-बार वहां जाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा की ज़रूरत होती है.

Pakistan Polio Vaccination Seurity
पाकिस्तान में एक मिथ्या धारणा ये है कि पोलियो का टीका लगा तो बच्चा नपुंसक हो जाएगा. (तस्वीर: एएफपी)

– एक और बड़ी वजह है स्वच्छता और कुपोषण. खुले में शौच और गंदगी की समस्या पाकिस्तान में अभी भी है. यानी पोलियो वायरस के फैलने के लिए आसान रास्ता.

पाकिस्तान में बच्चों का कुपोषण बड़ी समस्या है. हेल्थ-एक्सपर्ट्स का मानना है कि अच्छा पोषण न होने की वजह से पोलियो वैक्सीन की प्रभाव-क्षमता कम होती है.

पोलियो अभियान में पाकिस्तान के पीछे रहने में एक बड़ी भूमिका ओसामा बिन लादेन की?

जब अमेरिका में 9/11 का हमला हुआ. उसमें नाम आया आतंकी संगठन अल-क़ायदा का. संगठन का मुखिया ओसामा बिन लादेन अमेरिका का नंबर वन दुश्मन बन गया. उसकी तलाश में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला भी किया.

दस बरस तक लादेन के ठिकाने का कोई पता नहीं चला. लेकिन अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने कोशिश नहीं छोड़ी. 2010 में सीआईए को सुराग मिला कि लादेन पाकिस्तान के शहर एबोटाबाद में छिपा है. विदेशी सीमा में घुसकर ऑपरेशन चलाने के लिए पुख़्ता सबूत चाहिए था. इसके लिए सीआईए ने एक फ़ेक वैक्सिनेशन प्रोग्राम लॉन्च किया. हेपेटाइटिस-बी का मुफ़्त टीका लगाने का ऐलान किया गया. इसके लिए एक पाकिस्तानी डॉक्टर शकील अफ़रीदी को चुना गया. उन्हें उम्मीद थी कि इसके जरिए लादेन के किसी भी सगे का डीएनए मिल जाए. ताकि उसकी जांच कर ऑपरेशन को हरी झंडी दिखाई जा सके.

Osama Bin Laden
9/11 हमलों के पीछे आतंकी संगठन अल-क़ायदा का मुखिया ओसामा बिन लादेन. (तस्वीर: एपी)

ये अभियान कितना सफ़ल हुआ, इसपर कभी स्पष्टीकरण नहीं जारी हुआ. हालांकि, वैक्सिनेशन प्रोग्राम के कुछ महीनों बाद ही एबोटाबाद में सर्जिकल स्ट्राइक हुई. दो मई, 2011 को अमेरिका के स्पेशल कमांडोज़ की टीम ने लादेन के कंपाउंड पर रेड किया और उसे मार दिया.

लादेन वाली रेड के बाद और क्या हुआ?

अमेरिका का बदला पूरा हो चुका था. लेकिन इससे एक बड़ा नुकसान हुआ. वो जो अफ़वाह चल रही थी ना कि पोलियो वैक्सीन के जरिए अमेरिकी जासूसी कर रहा है, वो लोगों के जेहन में बैठ गई. कट्टरपंथी नेताओं ने वैक्सीन का खुलकर विरोध किया. कई जगहों पर वैक्सिनेशन पर पूरी तरह बैन लगा दिया गया. इसके अलावा, तालिबान ने पोलियो वैक्सीन के ख़िलाफ़ फतवा भी जारी किया. तालिबान के आतंकी आज भी वैक्सीन टीम या उनकी सुरक्षा में गए पुलिसवालों पर हमले करते रहे हैं. 9 जून वाले हमले की ज़िम्मेदारी किसी संगठन ने नहीं ली है. हालांकि, शक तालिबान पर ही है. 2012 से अभी तक टीककरण में शामिल सौ से अधिक लोगों की हत्या हो चुकी है.

लादेन वाली रेड के बाद और क्या हुआ? जब टीका लगाने के लिए हेल्थ स्टाफ़्स जाते, उन्हें दुत्कार कर भगा दिया जाता. कई बार तो उनपर हिंसक हमला भी होता था. टीकाकरण अभियान में शामिल अधिकतर स्टाफ़ महिलाएं हैं. विरोध की एक बड़ी वजह ये भी है. लोगों को लगता है कि महिलाओं को ये काम देकर इस्लाम को भ्रष्ट करने की साज़िश रची जा रही है. इसलिए, ऐसे इलाकों में पोलियो टीम के साथ पुलिसवालों की ड्यूटी लगती है. ताकि किसी तरह की हिंसा की स्थिति से निपटा जा सके.

Shakil Afridi
शकील अफ़रीदी पाकिस्तान की जेल में 33 साल की सजा काट रहे हैं. (तस्वीर: एएफपी)

डॉ. शकील अफ़रीदी का क्या हुआ?

अमेरिका की रेड के बाद पाकिस्तानी एजेंसियों की नींद उड़ गई. उनकी नाक के नीचे से लादेन को मार दिया गया और उन्हें ख़बर तक नहीं हुई. लेकिन वो सीधे अमेरिका पर गुस्सा तो निकाल नहीं सकते थे. ऐसे में उन्होंने उन लोगों को निशाना बनाना शुरू किया, जिन्होंने सीआईए की मदद की थी. शकील अफ़रीदी को गिरफ़्तार किया गया. वो अमेरिका के लिए हीरो थे, लेकिन पाकिस्तान में उन्हें गद्दार कहा गया.

2013 में निचली अदालत ने उन्हें 33 साल जेल की सज़ा सुनाई. किसी अलग ही मामले में. बाद में दूसरी अदालत ने फ़ैसले को पलट दिया. अफ़रीदी पर लादेन वाले मामले में कभी दोष साबित नहीं हुआ. हालांकि, पुराने मामले खंगाल उनके ऊपर मुकदमा चलाया गया. वो आज भी पेशावर की जेल में बंद हैं.

सीआईए के फ़ेक वैक्सिनेशन प्रोग्राम का भारी विरोध हुआ. सिर्फ़ पाकिस्तान में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में. मेडिकल जगत में कहा गया कि इससे पूरी मानवता ख़तरे में आ सकती है. अगर लोगों का भरोसा उठ गया तो उसे वापस नहीं लाया जा सकता. भारी दबाव के बाद सीआईए ने 2013 में कहा कि वो किसी भी ऑपरेशन के लिए इस तरह के प्रोग्राम का इस्तेमाल नहीं करेंगे.

पोलियो वाली सीख कोरोना महामारी पर भी लागू होती है. इससे निपटने का रास्ता भी वैक्सीन से होकर जाता है. इसका भी फ़ार्म्यूला सेम ही है. कोई भी छूटने न पाए. यानी, हर किसी को वैक्सीन लगे तो कोरोना को खत्म किया जा सकता है. लेकिन शुरुआती चरण में ही कोरोना वैक्सीन का भारी विरोध हो रहा है. कारण वही हैं. जो पोलियो टीकाकरण में सामने आए थे. सोशल मीडिया ने अफ़वाहों को आग लगाने का जरिया दे दिया है. इसलिए, इस बार चुनौती कहीं ज़्यादा बड़ी है. ये सिर्फ़ पाकिस्तान नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चिंता का सबब बन सकता है.


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