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पाकिस्तानी सेना ने बिना जानकारी के ISI चीफ नियुक्त कर इमरान ख़ान को उनकी हैसियत याद दिला दी है?

इन दिनों पाकिस्तान में एक ड्रामा चल रहा है. मामला एक हाई-प्रोफ़ाइल नियुक्ति से जुड़ा है. 6 अक्टूबर 2021 को पाकिस्तान आर्मी ने खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज़ इंटेलीजेंस (ISI) के चीफ़ को बदल दिया. लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद की जगह पर लेफ़्टिनेंट जनरल नदीम अहमद अंज़ुम को ISI का नया चीफ़ बनाया गया है. सेना ने तो फेरबदल कर दिया. लेकिन सिविलियन सरकार इससे नाराज़ हो गई. सरकार ने अभी तक ऑफ़िशियल नोटिफ़िकेशन जारी नहीं किया है. यानी सेना ने तो अपनी तरफ़ से नियुक्ति कर दी. लेकिन सरकार इसे मानने के लिए तैयार नहीं है.

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की नाराज़गी का कारण भी वाजिब है. ISI चीफ़ की नियुक्ति का एक तय नियम है. सेना अपनी तरफ़ से तीन नामों की छंटनी करती है. फिर इन नामों को प्रधानमंत्री के पास भेजा जाता है. प्रधानमंत्री उनमें से बेस्ट कैंडिडेट को पद पर नियुक्त करते हैं. लेकिन इस दफा नियमों को किनारे कर दिया गया. सेना ने प्रधानमंत्री की सहमति की कोई ज़रूरत नहीं समझी.

पाक सरकार के प्रतिनिधि दावा कर रहे हैं कि सेना और प्रधानमंत्री के बीच सब चंगा चल रहा है. लेकिन पर्दे के पीछे हाई-प्रोफ़ाइल मीटिंग्स का दौर जारी है. इन मीटिंग्स में तनाव को कम करने की कोशिश की जा रही है.

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और सेना के बीच चल रही तकरार की पूरी कहानी क्या है? इस घटना की वजह से इमरान ख़ान की कुर्सी पर ख़तरा क्यों मंडरा रहा है? और बताएंगे, ISI का इतिहास क्या है?

Spying is an art of remaining unknown. जासूसी अज्ञात बने रहने की कला है.

आमतौर पर खुफिया एजेंसियां अपने काम को छिपाकर रखती हैं. उनका काम पर्दे के पीछे चलता है. वे अपने देश की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करतीं. आम जनता को इन एजेंसियों के बारे में बहुत कम जानकारी होती है. एक तरह से वे अदृश्य गेमचेंजर्स की भूमिका में होते हैं. लेकिन इनमें से कोई भी तथ्य पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI पर लागू नहीं होता.

भारत के विभाजन के समय खुफिया जानकारियां जुटाने का काम इंटेलीजेंस ब्यूरो (IB) का था. विभाजन के बाद दोनों मुल्क़ों में IB ने नए सिरे से काम शुरू किया. IB में पुलिसवालों को नियुक्त किया जाता था. इसका मुखिया एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी होता था. साल 1947-48 में कश्मीर के मसले पर भारत और पाकिस्तान के बीच पहला युद्ध हुआ. इसमें पाकिस्तानी IB ठीक अक्षम साबित हुई थी. इसलिए, तय हुआ कि एक ऐसी खुफिया एजेंसी बनाई जाए, जिसका फ़ोकस भारत पर हो. इसी मकसद को पूरा करने के लिए पाकिस्तान में ISI की स्थापना की गई. इसमें सेना के अलावा आम लोगों को भी शामिल किया गया. इसका पूरा ध्यान बाहरी ख़तरे से देश को बचाने पर था.

पाकिस्तान में 1958 तक सिविलियन सरकार चली. उस समय की सिविलियन सरकार ISI की बजाय IB पर अधिक भरोसा करती थी. फिर 27 अक्टूबर 1958 की रात आई. उस रोज़ जनरल अयूब ख़ान ने राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्ज़ा से ब्रेकअप कर लिया. जनरल साहब ने कहा, अब हम साथ काम नहीं कर सकते. आप यहां से कूच करिए.

इस्कंदर मिर्ज़ा इशारा समझ गए. उन्होंने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया. और, अपनी पत्नी के साथ चुपचाप राष्ट्रपति आवास से निकल गए. अयूब ख़ान को सिर पर चढ़ाने वाले इस्कंदर मिर्ज़ा ही थे. वजह थी, अयूब ख़ान की वफ़ा की कसमें और चिकनी-चुपड़ी बातें. लेकिन पाकिस्तान की राजनीति में वफ़ादारी तलाशना मंगल पर पानी खोजने से भी अधिक मुश्किल है. इस्कंदर मिर्ज़ा ये बात समझ नहीं पाए और एक घिसी-पिटी परंपरा का पहला शिकार बने. आने वाले दिनों में और भी सत्ताधीशों ने वैसी ही ग़लतियां दोहराईं और उसी तरह बेआबरू होकर रुख़सत हुए.

अयूब ख़ान मिलिटरी से थे. ISI का अनुशासन भी मिलिटरी वाला ही था. अयूब ख़ान को ये साथ रास आया. उन्होंने ISI का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना शुरू कर दिया. अयूब ख़ान ISI के जरिए अपने विरोधियों पर नज़र रखने लगे. उन्हें जिससे ख़तरा नज़र आता, उसे रास्ते से हटा दिया जाता था.

उसी दौर में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में स्वायत्तता की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुआ. पश्चिमी पाकिस्तान में बैठे सत्ताधीशों ने आंदोलन को कुचलने की योजना बनाई. उन्हें IB में काम कर रहे बंगाली अधिकारियों को पदमुक्त कर दिया. उनकी जगह पर ISI को मोर्चा संभालने के लिए कहा गया. इस तरह से ISI एक्सटर्नल एजेंसी के तौर पर काम करने की बजाय इंटरनल पॉलिटिक्स में शामिल हो गई. वो राजनेताओं, पत्रकारों, आलोचकों आदि पर नज़र रखने लगी.

1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान की करारी हार हुई. पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बन गया. इस युद्ध की हार का ठीकरा शराबी और अय्याश राष्ट्रपति याह्या ख़ान पर फूटा. उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी. फिर पाकिस्तान की सत्ता में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की एंट्री हुई. उन्होंने पाकिस्तान का संविधान बनाया. 1973 में भुट्टो प्रधानमंत्री बन गए. उन्होंने भी ISI का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया.

कहते हैं कि भुट्टो बड़े शौक से अपने करीबियों के फ़ोन टैप कराते थे. फिर ऐसे लोगों को मिलने के लिए बुलाया जाता था. उनके सामने ही टेप बजाया जाता और फिर उनसे इस्तीफ़ा ले लिया जाता था.

1977 के चुनाव में भुट्टो ने IB और ISI से इलेक्शन का काम करवाया था. ये एजेंसियां चुनाव में खड़े होने वाले कैंडिडेट्स का बायोडेटा बनातीं थी. साथ ही, उनके जीतने की संभावना का विश्लेषण भी करतीं थी.

भुट्टो चुनाव तो जीत गए, लेकिन अपनी कुर्सी नहीं बचा पाए. उनके भरोसेमंद जनरल ज़िया उल-हक़ ने उनकी कुर्सी खिसका दी. जनरल ज़िया ने संविधान को अस्थायी तौर पर भंग कर दिया. बाद में उन्होंने भुट्टो को फांसी पर चढ़वा दिया.

जनरल ज़िया ने भी पुरानी परंपरा का पालन किया. उन्होंने ISI के सहारे भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) को काबू में करने की कोशिश भी की. पिता के तख़्तापलट के बाद बेनज़ीर भुट्टो को जेल में बंद कर दिया था. 1984 में उन्हें रिहा किया गया. उसके बाद वो लंदन में निर्वासन में रहने लगीं थी. जनरल ज़िया के कहने पर ISI ने बेनज़ीर के घर के बाहर अपने जासूस बिठा रखे थे. फिर एक दिन बेनज़ीर को शक हुआ. उन्होंने स्कॉटलैंड यार्ड से इसकी शिकायत की. इसके बाद ही उनके घर के बाहर से ISI का पहरा हटा था.

बेनज़ीर 1986 में पाकिस्तान लौटीं. उन्होंने PPP की कमान संभाली और उसे पूरी तरह रिवाइव कर दिया. 1988 में आम चुनाव होने थे. जनरल ज़िया को डर था कि बेनज़ीर चुनाव जीत लेंगी. जनरल ज़िया ने उस समय ISI के डायरेक्टर जनरल हामिद गुल को मिलने के लिए बुलाया. इस मुलाक़ात के कुछ समय बाद ‘इस्लामी जम्हूरी इत्तेहाद’ (IJI) की स्थापना की गई. ये नौ पार्टियों का समूह था. जिसे ISI का फ़ुल सपोर्ट था. इस सपोर्ट के बावजूद PPP चुनाव जीत गई. बेनज़ीर भुट्टो किसी इस्लामिक राष्ट्र की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं.

बेनज़ीर भुट्टो के पास सत्ता आई थी, शक्ति नहीं. उन्हें मिलिटरी लीडरशिप की कई शर्तें भी माननीं पड़ी. इनमें से एक शर्त ये थी कि ISI चीफ़ के पद से हामिद गुल को नहीं हटाया जाएगा.

1989 में बेनज़ीर भुट्टो का हामिद गुल के साथ टकराव हुआ. बेनज़ीर ने गुल को बर्खास्त कर दिया. ISI चीफ़ की कुर्सी पर वो अपने विश्वासपात्र को ले आईं. इससे पहले कि नए चीफ़ ऑफ़िस में दाखिल होते, सारे अहम कागज़ात ISI के हेडक़्वार्टर से उठाकर सेना मुख्यालय में पहुंचा दिए गए.

बेनज़ीर ने दो सालों तक शासन किया. हालांकि, उनकी कुर्सी कभी सलामत नहीं रही. ISI ने उनका फ़ोन टैप कराना जारी रखा. इसी टैपिंग के दम पर विपक्षियों को साथ मिलाया गया. और, दूसरी कोशिश में उनकी सरकार गिरा दी गई.

2012 में हामिद गुल ने एक इंटरव्यू में IJI को बनाने की ज़िम्मेदारी ली थी. उन्होंने कहा था कि इसके लिए वो कोई भी मुकदमा झेलने के लिए तैयार हैं. हामिद गुल ने ये भी कहा था कि नेता सेना को कंट्रोल नहीं कर सकते, सेना ने ख़ुद अपने ऊपर नियंत्रण लगाया हुआ है.

पाकिस्तान की राजनीति में ISI का दखल बढ़ा ही है. अब वो सेना के इशारे पर सिविलियन सरकार की जासूसी करती है. ये तो हुई डोमेस्टिक ऐक्शन की बात.

ISI का पड़ोसी देशों की अस्थिरता में भी बड़ी भूमिका रही है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण पाकिस्तान है. पूर्व ISI चीफ़ हामिद गुल ने कुछ बरस पहले एक टीवी प्रोग्राम में कहा था,

‘जब इतिहास लिखा जाएगा. तब कहेंगे कि ISI ने अमेरिका की मदद से सोवियत यूनियन को शिकस्त दे दी. फिर एक जुमला होगा. ISI ने अमेरिका की मदद से अमेरिका को शिकस्त दे दी.’

ये कैसे हुआ?

1979 में सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया. वो कोल्ड वॉर का दौर था. अमेरिका और ब्रिटेन मुजाहिदीनों को मदद करना चाहते थे. लेकिन वे सीधे तौर पर इसमें शामिल नहीं होना चाहते थे. इसलिए, CIA और MI-6 ने ISI को पुल बनाया. विदेशी मदद सीधे मुजाहिदीनों तक नहीं पहुंचती थी. मदद पहले ISI के पास आती थी. उसके बाद ISI अपने हिसाब से बंटवारा करती थी. इसी सपोर्ट के सहारे मुजाहिदीनों ने सोवियत संघ को हरा दिया.

1994 में कंधार में तालिबान की स्थापना हुई. इसके पीछे भी ISI का हाथ था. 9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में वॉर ऑन टेरर शुरू किया. उस समय पाकिस्तान में जनरल मुशर्रफ़ सरकार चला रहे थे. उन्होंने अमेरिका का साथ दिया. इससे ISI नाराज़ हो गई. ISI हमेशा से तालिबान को अपना मानती रही थी.

उसने टॉप लीडर्स को पाकिस्तान में सुरक्षित पनाह दी. एक तरफ़ अमेरिका, पाकिस्तान के भरोसे तालिबान और अल-क़ायदा को खत्म करने के ख़्वाब देख रही थी. दूसरी तरफ़, ISI तालिबान, हक़्क़ानी नेटवर्क और अल-क़ायदा की टॉप लीडरशिप को सुरक्षा दे रही थी. पाकिस्तान के भीतर तालिबानियों के लिए कैंप बनाए गए. वैसे मदरसे स्थापित किए गए, जहां से जिहादियों को ट्रेनिंग दी जा सके. जब इन आतंकी संगठनों ने अमेरिका के ख़िलाफ़ कैंपेन शुरू किया, ISI ने उन्हें भी बैकडोर से मदद पहुंचाई.

15 अगस्त 2021 को तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया. अमेरिका को 20 साल बाद हारकर बाहर जाना पड़ा. इस नतीजे में ISI ने सेंट्रल रोल अदा किया था. तालिबान की जीत और दोहा में अमेरिका के साथ चली बातचीत में ISI चीफ़ फ़ैज़ हमीद की अहम भूमिका रही है. उन्हें ‘काबुल सुपरस्टार’ कहा जा रहा है. छह सितंबर को हमीद ने काबुल का दौरा किया. तालिबान के भीतर चल रहे झगड़े को सुलझाने में उन्हीं का हाथ बताया जाता है. रिपोर्ट्स हैं कि पहले भी ISI चीफ़ तालिबान की बड़ी बैठकों में शामिल होते रहे हैं.

इसके अलावा, ISI, पीओके में आतंकियों के लिए ट्रेनिंग कैंप चलाने और आतंकियों को शह देने के घटिया खेल में भी शामिल रहा है.

आज इन सबकी चर्चा की वजह क्या है?

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी में अहम भूमिका निभाने वाले ISI चीफ़ फ़ैज़ हमीद को बदल दिया गया है. उन्हें पेशावर कोर का कमांडर बना दिया गया है. आर्मी की तरफ़ से ये ऐलान 6 अक्टूबर को ही कर दिया गया था. लेकिन सरकार ने इस पर चुप्पी साध ली.

कहा जा रहा था कि फ़ैज हमीद अगले साल अप्रैल तक ISI चीफ़ बने रहेंगे. अभी अफ़ग़ानिस्तान का मामला पूरी तरह से सुलझा नहीं है. इसलिए, प्रधानमंत्री इमरान ख़ान चाहते थे कि फ़ैज़ हमीद अपने पद पर काम करते रहें.

लेकिन उन्हें गज़ब का सरप्राइज़ मिला. बिना उनकी जानकारी के नए ISI चीफ़ की नियुक्ति कर दी गई. इसलिए, प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस नियुक्ति पर चुप्पी साध ली. उन्होंने नियुक्ति की मंज़ूरी ही नहीं दी.

कयास लगने लगे कि सेना ने इमरान ख़ान को उनकी हैसियत याद दिला दी है. ये भी कहा गया कि सेना जल्दी ही तख़्तापलट कर सकती है.

होते-होते 11 अक्टूबर आ गया. उस रोज़ इमरान ख़ान की चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ जनरल कमर जावेद बाजवा से लंबी मीटिंग हुई. इस मीटिंग के बारे में कोई बताने के लिए तैयार नहीं था. जब सरकार पर दबाव बढ़ा, तब सूचना मंत्री फ़वाद चौधरी सामने आए. उन्होंने मीटिंग की बात स्वीकारी.

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री और सेना के बीच सब ठीक चल रहा है. दोनों के रिश्ते मधुर हैं. कोई भी एक-दूसरे की गरिमा को नीचे नहीं गिराएगा. ISI चीफ़ की नियुक्ति नियमों के हिसाब से ही होगी.

13 अक्टूबर को चौधरी ने ट्वीट किया कि चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ और प्रधानमंत्री के बीच बातचीत का दौर पूरा हो गया है. जल्दी ही नई नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी.

हालांकि, अभी ये तय नहीं है कि पीछे कौन हटेगा. प्रधानमंत्री नदीम अंज़ुम की नियुक्ति को मंज़ूरी देते हैं या सेना प्रधानमंत्री के हिसाब से नई नियुक्ति करती है, ये देखना दिलचस्प होगा.

जानकारों का कहना है कि इमरान ख़ान को ये गुमान हो गया था कि वो जनता के द्वारा चुनकर आए हैं. उनकी सलामती के पीछे सेना की कोई भूमिका नहीं है.

सेना ने इस ऐपिसोड के जरिए इमरान ख़ान को सच्चाई से रूबरू करा दिया है.

पाकिस्तान में प्रधानमंत्री का कार्यकाल पांच वर्षों का होता है. पाकिस्तान के इतिहास में किसी भी प्रधानमंत्री ने ये मुकाम हासिल नहीं किया है. या तो कुर्सी पर रहते ही उनकी हत्या हो गई या किसी सैन्य तानाशाह ने उनका तख़्तापलट कर दिया. इमरान ख़ान के कार्यकाल का ये चौथा साल है. अगर वो अपना कार्यकाल पूरा करने में कामयाब रहे तो ये ‘ऐतिहासिक’ होगा. लिटरली.


जम्मू-कश्मीर में पकड़े गया आतंकी पाकिस्तान की सेना और ISI पर बड़ा खुलासा कर गया

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