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ये प्याज़ हमें इतना रुलाती क्यों है?

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देश में प्याज़ के दाम बहुत तेज़ी पकड़े हुए हैं. सब लोगों को प्याज़ रुलाए पड़ी है (पन इंटेंडेड). लेकिन प्याज़ हमें सच्ची-मुच्ची में रुलाती है. जब-जब प्याज़ कटी है, तब-तब हमें रोना आया है. जुगाड़ू प्राणियों ने ये प्रवाह रोकने के लिए न जाने क्या-क्या जुगाड़ किए हैं.

प्याज़ के खौफ में सड़कों पर हेल्मेट न पहनने वाले लोग घरों में हेल्मेट पहनने लगते हैं. (सोर्स - सोशल मीडिया)
प्याज़ के खौफ में सड़कों पर हेल्मेट न पहनने वाले लोग घरों में हेल्मेट पहनने लगते हैं. (सोर्स – सोशल मीडिया)

लेकिन मेन सवाल तो अब भी यही है – प्याज़ हमें रुलाती क्यों है?

एक शब्द का जवाब है साफ-सफाई. कैसी साफ-सफाई? प्याज़ से आंखों में कौन सा कचरा चला जाता है? कचरा नहीं आता, एक केमिकल आता है. और इस केमिकल के पीछे थोड़ी सी केमिस्ट्री है.

प्याज़ की केमिस्ट्री 

ऐसा है, प्याज़ मिट्टी में धंसी होती है. और इस मिट्टी से प्याज़ खूब सारा सल्फर खींचती है. ये प्याज़ की मजबूरी है. प्याज़ को अपने अंदर कुछ अमीनो एसिड्स बनाने के लिए सल्फर की ज़रूरत होती है.

प्याज़ विटामिन सी एक स्त्रोत होती है. लेकिन खाने के बाद मुंह बहुत महकता है. (सोर्स - विकिमीडिया)
प्याज़ विटामिन सी एक स्त्रोत होती है. लेकिन खाने के बाद मुंह बहुत महकता है. (सोर्स – विकिमीडिया)

प्याज़ के सेल्स (कोशिकाएं) में ये एसिड्स व्यवस्थित होते हैं. लेकिन जैसे ही प्याज़ को काटा जाता है, कई सारे सेल्स टूट जाते हैं. सेल्स के टूटने से उनका सारा मटेरियल मिक्स हो जाता है. जब अमीनो एसिड में आकर दूसरी चीज़ें मिक्स होती हैं तो केमिकल रिएक्शन होता है. और कई केमिकल रिएक्शन के बाद बनता है syn-propanethial-S-oxide(सिन-प्रोपेंथियल-एस-ऑक्साइड). बहुत अजीब सा नाम है. नाम छोड़िए, इसके कारनामे सुनिए.

सिन-प्रोपेंथियल-एस-ऑक्साइड तुरंत गैस बनकर हवा में उड़ने लगता है. उड़ते-उड़ते ये अपनी आंखों में पहुंचता है और वहां जलन मचाने लगता है. आंखों को डैमेज होने से बचाने के लिए अंदर सफाई अभियान चालू हो जाता है. आंसू आते हैं, जो इस केमिकल को बहाकर बाहर निकाल देते हैं.

कई बार ये सलाह दी जाती है कि ठंडी करके प्याज़ काटने से कम आंसू आते हैं. क्योंकि ठंडी होने से कम गैस निकलती है. (सोर्स - विकिमीडिया)
कई बार ये सलाह दी जाती है कि ठंडी करके प्याज़ काटने से कम आंसू आते हैं. क्योंकि ठंडी होने से कम गैस निकलती है. (सोर्स – विकिमीडिया)

एक बात क्लियर रहे – हर आंसू एक जैसा नहीं होता. प्याज़ वाले आंसू अलग होते हैं और दुख-दर्द वाले आंसू अलग. इनके प्रोटीन की मात्रा में फर्क होता है. दुख-दर्द वाले आंसू में ज़्यादा प्रोटीन होता है. प्याज़ वाले आंसू में ज़्यादातर पानी ही होता है.

भांत-भांत के आंसू 

अब बात छिड़ ही गई है तो बता दें कि आंसू को अंग्रेज़ी में टियर कहते हैं. और टियर्स तीन टाइप के होते हैं.

1. बेसल टियर (आंखों की नमी, हां तेरी मेहरबानी है) – हमारी आंखों से लगातार थोड़े-थोड़े आंसू निकलते रहते हैं. ये वाले आंसू हमारी आंखों में हल्की नमी बनाए रखते हैं. ताकि धूल के छोटे-मोटे कण साफ होते रहें. इन्हीं आंसूओं की बदौलत हमें साफ-साफ दिखता है.

आंखों का ये लिक्विड कॉर्निया को सुरक्षित रखता है. (सोर्स - विकिमीडिया)
आंखों का ये लिक्विड कॉर्निया को सुरक्षित रखता है. (सोर्स – विकिमीडिया)

2. रिफ्लेक्स टियर (प्याज़ ने गिराए) – ये वाले आंसू तब निकलते हैं जब आंख में कोई डेंजरस चीज़ चली जाती है. जब कोई चीज़ हमारी आंखों में जलन मचाती है तो ये आंसू निकलते हैं. जैसे कि प्याज़ कटने पर, आंसू गैस के छोड़े जाने पर.

कश्मीर में भीड़ को संभालने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल. सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली आंसू गैस हैं - ω-chloroacetophenone, और o-chlorobenzylidenemalononitrile. (सोर्स - विकिमीडिया)
कश्मीर में भीड़ को संभालने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल. सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली आंसू गैस हैं – ω-chloroacetophenone, और o-chlorobenzylidenemalononitrile. (सोर्स – विकिमीडिया)

3. इमोशनल टियर (भावनाओं में बहे) – इंसान भावुक होने पर क्यों रोता है? चार्ल्स डार्विन ने दुनिया को इवॉल्यूशन(क्रमिक विकास) का सिद्धांत बताया. इवॉल्यूशन का एक मतलब है कि शरीर का विकास ज़रूरतों के हिसाब होता है. जैसे कि इंसानों में पूंछ की ज़रूरत खत्म हो गई तो पूंछ गायब हो गई.

आडवाणी जी द्वारा कृपा शब्द का इस्तेमाल किए जाने पर 2014 में प्रधानमंत्री मोदी संसद में भावुक हो गए थे.
आडवाणी जी द्वारा कृपा शब्द का इस्तेमाल किए जाने पर 2014 में प्रधानमंत्री मोदी संसद में भावुक हो गए थे.

डार्विन ने इंसान की इस भावुक होकर रोने वाली हरकत पर बहुत माथा भुना. एक किताब भी लिखी. डार्विन ने कहा था कि इंसान का सेंटी होकर रोना गैरज़रूरी है. तब उन्हें इसके पीछे कोई कारण नहीं दिखा. लेकिन आज हमारे पास कुछ थ्योरीज़ हैं जो इसका कारण समझाने की कोशिश करती हैं.

दूसरे जानवरों के बच्चे पैदा होने के कुछ दिनों बाद दौड़ लगाने लगते हैं. और हमें चलने में महीने लग जाते हैं. हम एक हैं तभी बचे हैं. (सोर्स - विकिमीडिया )
बहुत सारी चीज़ें हैं जो हमें ताकतवर बनाती हैं, सबसे टॉप की चीज़ है सामूहिक शक्ति. (सोर्स – विकिमीडिया )

इमोशनल रोना क्यों?

एक थ्योरी के मुताबिक ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इंसान एक सामाजिक प्राणी है. इंसान बहुत कमज़ोर प्राणी होता है. अकेले-अकेले की लड़ाई में इंसान को कई जानवर चीरकर रख देंगे. लेकिन समूह में इंसान बहुत ताकतवर होता है. इंसान सामूहिक ताकत के बूते ही इस धरती पर राज कर रहा है.

जब कोई रोता है तो आसपास वालों को मदद करने का सिग्नल मिलता है. एक स्टडी में दुखी लोगों की फोटो से फोटोशॉप करके उनके आंसू हटा दिए गए थे. उन फोटोज़ में दिखने वाले लोग कम दुखी लगने लगे. इससे पता चला कि आंसू देखकर हमें ज़्यादा दया आती है.

इमोशनल आंसुओं में ज़्यादा प्रोटीन वाली बात इस थ्योरी को सपोर्ट भी करती है. ज़्यादा प्रोटीन होने से ये वाले आंसू ज़्यादा देर तक हमारे गालों से चिपके रहते हैं. ताकि दूसरे लोग इन आंसुओं को देख सकें. इंसान का बच्चा बहुत ही कमज़ोर पैदा होता है. पैदा होते ही वो इसलिए ज़ोर से रोता है क्योंकि उसे मदद की ज़रूरत होती है.

दूसरे जानवरों के बच्चे पैदा होने के कुछ दिनों बाद दौड़ लगाने लगते हैं. और हमें चलने में महीने लग जाते हैं. हम एक हैं तभी बचे हैं. (सोर्स - विकिमीडिया )
दूसरे जानवरों के बच्चे पैदा होने के कुछ दिनों बाद दौड़ लगाने लगते हैं. और हमें चलने में महीने लग जाते हैं. हम एक हैं तभी बचे हैं. (सोर्स – विकिमीडिया )

एक दूसरी थ्योरी कहती है कि दुख-दर्द में स्ट्रेस (तनाव) बहुत होता है. और रोने से स्ट्रेस कम होता है. ये तो हर कोई कहेगा कि रो लेने से हल्का महसूस होता है. तो इस थ्योरी के मुताबिक, रोना हमारे शरीर का स्ट्रेस से निबटने का तरीका है. स्ट्रेस वगैरह तो ठीक है लेकिन रोते समय नाक क्यों बहने लगती है?

नाक क्यों बहती है?

रोते तो हम आंख से हैं फिर हमारी नाक क्यों बहने लगती है? इसका जवाब है हमारे अंदर की नालियों वाली व्यवस्था.
आंसू हमारी आंख के ऊपर एक थैली में भरे होते हैं. इस थैली का नाम है – लैक्रिमल ग्लैंड. यहां से नलियों से हमारी आंखों में आंसू आते हैं. आने का रास्ता है तो जाने का रास्ता भी होगा?

abcdefg छोड़िए, a वो थैली है जहां आंसू भरे होते हैं. और g वो नली है जहां से आंसू नांक में जाते हैं. (सोर्स - विकिमीडिया)
abcdefg छोड़िए, a वो थैली है जहां आंसू भरे होते हैं. और g वो नली है जहां से आंसू नांक में जाते हैं. (सोर्स – विकिमीडिया)

जैसे बाथरूम में पानी निकलने के लिए पाइप (ड्रेन) लगी होती है, आंख से आंसुओं के निकलने का भी एक रास्ता होता है. उस रास्ते का नाम है लेक्रिमल कैनाल. और गेस कीजिए ये कैनाल कहां जाता है? ये जाता है हमारी नाक में. इस रास्ते से नमकीन आंसू हमारी नाक में पहुंचते हैं और हमारी नाक अपना मटेरियल बाहर निकाल देती है.

रोना एक स्वस्थ इंसान की निशानी है. किसी को छोटी बात पर रोना आता है, किसी को बड़ी बात पर. लेकिन रोना सबको आता है. कम से कम पैदा होते वक्त तो सभी रोते ही हैं.


वीडियो – निर्मला सीतारमण के प्याज ना खाने वाले वीडियो की पूरी बात जानें

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