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इस वजह से हमें 'भक्त' और 'सिकुलर' जैसे नामों से बुलाया जाता है

ये आर्टिकल डेली ओ के लिए करण सिंघल और निशा वेर्नेकर ने लिखा था. हम इसे वेबसाइट की इज़ाज़त से ट्रांसलेट कर आपको पढ़वा रहे हैं.


आज के सच्चे युग में, जहां तर्क, तर्कों के बजाय विश्वासों पर ज्यादा आधारित है, मौन कतई प्रासंगिक नहीं हो सकता.

मार्टिन स्कोर्सिज की ‘साइलेंस’ एक ऐसी फिल्म है जिसकी गूंज लम्बे समय तक सुनाई देगी. ये फिल्म ऐसे वक़्त पर आई है जब हम भावनात्मक और विश्वास की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहें हैं. ये एक चौंका देने वाली फिल्म है- जो जापानी सरकार द्वारा ईसाई मिशनरियों के पतन की कहानी बयां करती है. ये ईसाईकरण पर एक बहुत बड़ा हमला था.

दो जेसुइट पुजारी एक ऐसे गुरु की खोज में जापान जाने का फैसला करते हैं, जिसके बारे में ये प्रचलित है कि वो मर चुके हैं. फिल्म के बैकग्राउंड में चलते जबरदस्त म्यूजिक और पुजारी की आंखों में अपने धर्म से जुड़ा अंतर्द्वंद्व उसके अनुभव को बेहद सलीके से बयां करता है.

एक सीन में आप देखेंगे कि फिल्म का हीरो किस तरह अपने धर्म को ही सही ठहराने और उसको यूनिवर्सल साबित करने की हरसंभव कोशिश करता है. इसको देखते वक़्त आप कई बार संघर्ष भी करेंगे क्योंकि ये ‘आस्तिक’ और ‘नास्तिक’ के संघर्ष को प्रमाणित करने के बेहद करीब पहुंचता है. और यही इस फिल्म की ताकत है. ये आपको अपने धर्म के बारे में प्रश्नों से भर देगी. चाहे आप किसी धर्म को मानते हो या नहीं. यह उस संघर्ष का बेहद सटीक चित्रण हैं जिसका सामना हम सभी को ज़िन्दगी के किसी न किसी मोड़ पर जरुर करना पड़ता है- चाहे वो किसी धर्म की दिशा में हो, एक तर्कहीन विश्वास हो या एक ऐसा विचार हो जिसके विरोधाभासी तथ्य जानने के बावजूद भी हम छोड़ना नहीं चाहते हों.

 

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फिल्म साइलेंस का एक सीन

ये फिल्म हमसे हमारे विश्वास और धर्म के बारे में कुछ बड़े सवाल पूछती है. जैसे, इसका होना क्यों जरुरी है? क्या हम इसे समझ सकते हैं? और जब आपका ये धर्म अन्य लोगों के लिए अत्याचार, उपेक्षित या पीड़ित होने की स्तिथि पैदा कर दे तो फिर उसके बारे में बात करने या सवाल पूछने का कोई मतलब नहीं रह जाता.

वो जापानी जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर इसाई धर्म अपना लिया था. उनके लिए वो पुजारी भगवान का रूप होता था. वो उससे स्वीकृति और मंजूरी लेते थे कि इस धर्म का पालन कैसे करना है.

हम उन लोगों को भी देखते हैं जो अपने ‘धर्म या विचारधारा’ को लेकर बेहद दृढ विश्वासी होते हैं. जो भगवान के नाम पर अपनी जान देने को भी तैयार रहते हैं. वो रोजमर्रा की ज़िन्दगी में जो संघर्ष करते है, हम उसी पर प्रकाश डाल रहे हैं.

दुनिया भर के नेता शक्ति प्रदर्शन करते हैं और वोट पाने के लिए हमारे अन्दर संकीर्ण मानसिकता और उत्तेजना पैदा कर हमें बांट देते हैं. विश्व का सबसे बड़ा सुपरपावर सेक्सिस्ट, रेसिस्ट, कट्टर, क्लाइमेट चेंज को नज़रअंदाज़ करने वाला और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र मे असहिष्णुता फैलाने वाले नेता को अपना राष्ट्रपति चुनता है. और हम सब ये अपनी आंखों के सामने होता हुआ देख रहे हैं.

 

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साइलेंस फिल्म के एक सीन में एंड्रू गारफील्ड

नेताओं और मंत्रियों ने आज के दौर में ‘चर्च’ की जगह ले ली है. क्योंकि लोगों को अब धर्म के अलावा सत्ताधारियों पर भी अंधविश्वास होने लगा है. ये तब और खतरनाक जाता है जब ये चीज़ें उनके कामों और बातों में झलकने लगती हैं. ये लोग उन्हें गरिमा, समानता और आशा का एकमात्र स्रोत मानने लगते हैं.

आजकल के ज़माने में हमें अपने नेताओं पर अंधविश्वास होना एक नियमित चीज़ हो चुकी है, जिसके हम अभ्यस्त हो चुके हैं. चाहे वो नरेन्द्र मोदी की भक्ति हो या अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की भक्ति. अंधविश्वास चाहे कहीं से भी उठे वो खतरनाक ही होता है. इस तरह के व्यवहार को बढ़ावा देने में नेताओं की क्या भूमिका है? अगर मोदी या उनके किसी मंत्री ने मान लिया की उनका ये कदम या उसको लागू करने का तरीका सही नहीं था, तो क्या उसको ख़त्म करने या रोकने के लिए कोई बहस होगी?

इसी तरह जब कोई आपत्ति के नाम पर हिंसक या अमानवीय काम करता है तो क्या एक नेता के होने के नाते उसकी निंदा करना आपकी जिम्मेदारी नहीं है? या उसका क्या नतीजा हो सकता है ये आपको समझ नहीं आता?

फिर हमारे सामने एक और बात आती है कि किन जानकारियों के आधार पर हमने उनके प्रति अपनी राय या विश्वास को विकसित किया है. बड़ी संख्या में लोगों को न्यूज़ फेसबुक या किसी अन्य सोशल साइटों के माध्यम से मिलती है, जो आमतौर पर बिना किसी सबूत या अफवाहों के होती है. जिसके साथ पूरी तरह से सही न होने का खतरा भी जुड़ा होता है.

 

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साइलेंस फिल्म का  एक सीन

लेकिन हमारा ध्यान उन्हीं ख़बरों पर जाता है जो हमें चैलेंज या परेशान करती हैं. उस खबर को सही या गलत समझने के लिए हमारे पास बहुत कम समय होता है. अनगिनत प्रयोगों, अध्ययनों और मनोवैज्ञानिक चर्चाओं के बाद इस नतीजे पर पहुंचा गया कि ‘पहले से बना हुआ इम्प्रेशन’ इसमें बहुत बड़ा रोल अदा करता है.

हमारे बीच राजनीतिक मतभेद पहले से ज्यादा बढ़ चुके हैं. जिसके कारण हमने ‘हाइपरनेशनलिस्म’ (अति-राष्ट्रवाद) नाम की लहर को जन्म दिया है, जो आने वाले समय में हमारे लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.

‘व्याख्यात्मक गहराई का भ्रम'(illusion of explainatory death), एक बेहद ही सोचा-समझा और अध्ययन किया हुआ विषय है, जो ये बताता है कि लोग किसी की भी बातों पर जो राय बना लेते है. आमतौर पर वो बातें कहने वाले की गहरी सोच-समझ का नतीजा होती हैं.

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फिल्म के एक सीन में लियाम नीसन

संभवतः इन्टरनेट पर जो सामग्रियां शेयर की जाती हैं उनके हम आदी हो गए हैं. और जब एक ही बात हमारी नज़रों के सामने बार-बार आती है तो शायद हम कमजोर पड़ जाते हैं. और उनपर विश्वास करने के लिए मजबूर हो जाते हैं. उसके बाद हम ख़बरों को उसके विषय से हटकर उसकी संख्या के आधार पर जज करने लगते हैं. अगर इसको ज्यादा लोगों ने पढ़ा या देखा है इसका मतलब ये सही ही होगी. हमारे पास विकल्पों की कमी होना भी शायद ऐसे भ्रम के शिकार होने की एक वजह हो सकती है.

इसलिए हमें और हमारे नेताओं दोनों को अंधविश्वासी ना होकर खुद से बार-बार सवाल करने चाहिए. हमें अपने आप को वैकल्पिक विचारों से परिचित कराते रहना चाहिए. और उन लोगों के साथ मेलजोल बढ़ाना चाहिए जो हमसे अलग हैं. ये हमारी खुद से और उनसे प्रश्न करने की क्षमता है जिन्होंने हमारे विचारों को समय के साथ विकसित करने में मदद की है. बदलाव एक नियमित प्रक्रिया है और उसमें हमें ये विकास नज़र आनी चाहिए–कम से कम अब हम अपनी विधवाओं को अपने पति के चिता पर लेटने को तो नहीं कहते.

Hindu and Muslim school children offer prayers for peace inside their school in the western Indian city of Ahmedabad September 23, 2010. The Supreme Court on Thursday ordered the Allahabad High Court to delay a potentially explosive verdict on whether Hindus or Muslims own land around the demolished Babri mosque in Ayodhya. REUTERS/Amit Dave
Hindu and Muslim school children offer prayers for peace inside their school in the western Indian city of Ahmedabad September 23, 2010. The Supreme Court on Thursday ordered the Allahabad High Court to delay a potentially explosive verdict on whether Hindus or Muslims own land around the demolished Babri mosque in Ayodhya. REUTERS/Amit Dave

वापस ‘साइलेंस’ की बात पर आते हैं, फिल्म में एक ऐसा सीन है जिसमें जापानियों को ईसा मसीह की फोटो को पैर से कुचलने को कहा जाता है. जिससे यह साबित होगा कि वो इसाई धर्म का पालन नहीं करते. और ऐसा न करने वालों के लिए मौत की सजा तय की गई है. असल संघर्ष आपको इस सीन में देखने को मिलेगा. हालांकि ये बात साफ कर दी गई थी कि उनको ये करने पर ज़िन्दगी बख्श दी जाएगी, फिर भी लोगों ने वो तब तक नहीं किया तब तक पुजारी ने ऐसा करने की मंजूरी उनको नहीं दी.

धर्म पालन संबंधी बातें बेहद निजी होती हैं. और सबके सामने उनको ये मानने पर मजबूर करना बेहद हास्यास्पद था. अगर आपका धर्म और विश्वास इतना कमजोर है, जिसको साबित करने के लिए आपको गुंडागर्दी, हिंसा, अत्याचार या दूसरों की जिंदगी खतरे में डालनी पड़े, या उनके अधिकारों का हनन करना पड़े , तो दोस्त, ये धर्म या विश्वास आपके लिए नहीं है.


 

इस आर्टिकल का ट्रांसलेशन श्वेतांक शेखर ने किया है.

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