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हवाई जहाज का तेल मेरी गाड़ी में पड़ने वाले पेट्रोल से सस्ता क्यों? ये पढ़ लो फिर नहीं पूछोगे

पेट्रोल-डीजल के दामों को लेकर एक गजब का चलन देखने को मिला है. ये इतनी तेजी से और इतने ज्यादा बढ़ने लगे हैं कि खबर ही नहीं रह गए. हां अगर किसी दिन दाम न बढ़ें तो जरूर खबर बन जाती है. पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों के बीच हाल ही में एक खबर आई जिससे लोग चौंके. खबर थी कि पेट्रोल-डीजल के दाम जेट फ्यूल (Jet Fuel) यानी हवाई जहाज के तेल से भी ज्यादा बढ़ गए हैं. क्या वाकई में ऐसा है? हां, तो क्यों जिस ऑयल से हवाई जहाज चलते हैं वो कार-मोटरसाइकिल में पड़ने वाले तेल से भी सस्ता बिक रहा है?

क्या होता है ATF?

हवाई जहाज हो या कार-बाइक इनमें एक बात कॉमन है. सभी को चलाने के लिए जरूरत होती है इंजन की. ये इंजन चलता है किसी ईंधन से. इंजन ज्यादातर तेल से ही चलते हैं. इस तेल को साइंस की भाषा में फॉसिल फ्यूल भी कहते हैं. जमीन के नीचे इनके भंडार हैं. जहां से इन्हें निकाला जाता है. मिडिल-ईस्ट और अफ्रीका के कई देशों की इकॉनमी इसके दम पर ही चांदी काट रही है.

इन देशों में मौजूद तेल के भंडारों से कच्चा तेल निकलता है. वही कच्चा तेल जिसे हम आमतौर पर ‘मिट्टी का तेल’ या ‘केरोसिन’ भी बोलते हैं. ये जमीन से निकले तेल का सबसे बेसिक रूप होता है, जिसमें हाइड्रोजन और कार्बन से जुड़े कई कंपाउंड होते हैं. थोड़ा बहुत नाइट्रोजन और सल्फर भी होते हैं. आसान भाषा में कहें तो कच्चे तेल में कई तरह की अशुद्धियां होती हैं. इस वजह से इनके जलने से काफी धुआं भी पैदा होता है, जो हमारे और पर्यावरण के लिए नुकसानदायक होता है.

कच्चे तेल के इन खराब गुणों को कम करने के लिए ही इसे रिफाइन किया जाता है. यहीं पर तेल कंपनियों का रोल शुरू होता है. जैसे अपने यहां IOC, BP और रिलायंस आदि हैं. ये रिफाइनरी अंतरराष्ट्रीय मार्केट से कच्चा तेल खरीदती हैं और रिफाइन करके मार्केट में उपलब्ध कराती हैं. कच्चे तेल को रिफाइन करते समय ही जेट फ्यूल और पेट्रोल को अलग-अलग किया जाता है.

दरअसल, जेट फ्यूल यानी एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) और गैसोलीन (Gasoline) दोनों एक ही चीज है. तकनीकी भाषा में पेट्रोल को गैसोलीन कहा जाता है. अमेरिका और यूरोप के देशों में पेट्रोल को गैसोलीन के नाम से जाना जाता है. अमेरिका में अमूमन लोग जब गाड़ी में पेट्रोल भरते हैं तो उसे गैस भराना कहते हैं. पेट्रोल पंप को भी गैस स्टेशन ही बोला जाता है.

ATF कच्चे तेल का एक सबसे बेसिक बाइप्रॉडक्ट होता है. हवाई जहाज में पड़ने वाला ऑयल मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं. जेट ए और जेट बी. इनकी गुणवत्ता और फ्रीजिंग प्वाइंट के हिसाब से इनको दो कैटेगिरी में बांटा गया है. जेट बी फ्यूल को खास मौकों के लिए जैसे मिलिट्री या बेहद खराब मौसम में इस्तेमाल किया जाता है. जेट बी फ्यूल, जेट ए फ्यूल की तुलना में कम परिष्कृत (शुद्ध) होता है.

कच्चे तेल की खरीदारी के सिस्टम को हमारे साथी दर्पण ने बहुत आसान तरीके से समझाया है. इसे समझने के लिए नीचे दिया गया लेख पढ़ जाइए.

इसे भी पढ़ेंः क्या ऑयल के निगेटिव प्राइस के चलते, उल्टा हमें तेल खरीदने के पैसे मिलेंगे?

पेट्रोल-डीजल ATF के मुकाबले इतने महंगे क्यों हैं?

आपको लग रहा होगा जब सब कुछ लगभग एक जैसा है तो पेट्रोल-डीजल इतने महंगे क्यों हैं. इसका कारण है इन पर लगने वाला टैक्स. कीमत के मामले में हवाई जहाज के ऑयल और पेट्रोल-डीजल के दाम लगभग एक जैसे ही हैं. लेकिन इन पर लगने वाला भारी टैक्स अंतर पैदा कर देता है. ऐसा नहीं है कि हवाई जहाज वाले ऑयल पर टैक्स नहीं लगता. लेकिन सोच कर देखिए ज्यादा इस्तेमाल किसका है. आपने सही समझा, पेट्रोल और डीजल से लाखों गाड़ियां चल रही हैं. ऐसे में कमाई का यही असली जरिया है. इन पर भारी टैक्स लगाकर सरकार और ऑयल कंपनियां मोटी कमाई करती हैं.

सरकार हवाई जहाज में इस्तेमाल होने वाले ATF पर ज्यादा टैक्स इसलिए भी नहीं लगातीं कि इनसे कमाई तो खास होती नहीं, दूसरे हवाई यातायात का किराया बढ़ जाता है. इससे एयरलाइंस इंडस्ट्री में हल्ला मच जाता है. ATF की कीमतें इधर से उधर होती हैं कि एविएशन मिनिस्ट्री भी हरकत में आ जाती है. अगस्त में ही एविएशन मिनिस्टर ने 22 राज्यों से गुहार लगाई थी कि वो अपने यहां ATF पर वैट (Value Added Tax या VAT) कम करें जिससे हवाई यातायत की कीमतें न बढ़ें. इस सिलसिले में उन्होंने केरल, आंध्र प्रदेश, मेघालय, नगालैंड, सिक्किम और तेलंगाना की तारीफ भी की थी, जिन्होंने अपने यहां ATF पर लगने वाले VAT को एक फीसदी या उससे भी कम कर दिया था. मिसाल के लिए केरल की सरकार ने हवाई जहाज के फ्यूल पर लगने वाले 25 फीसदी टैक्स को कम करके 1 फीसदी कर दिया था.

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हवाई जहाज में पड़ने वाले फ्यूल का सस्ते होने का सबसे बड़ा कारण ये भी है कि उन पर टैक्स की मार कम पड़ती है.

अब दाम का खेल समझ लीजिए

फ्यूल प्राइस की बात की जाए तो ATF पर सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी 11 फीसदी लगती है. इसके अलावा राज्य अपने हिसाब से VAT लगाते हैं. यानी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग वैट है. मिसाल के तौर पर गुजरात में ATF पर सबसे ज्यादा 30 फीसदी VAT लगता है. तमिलनाडु और बिहार में 29 फीसदी और कर्नाटक में 28 फीसदी VAT वसूला जा रहा है. इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन की वेबसाइट पर ATF के जो दाम दिए हैं उनमें भी राज्यों में फर्क साफ देखा जा सकता है.

ATF को लीटर में नहीं बल्कि किलोलीटर में नापते हैं. 1 किलोलीटर मतलब 1 हजार लीटर. इस हिसाब से दिल्ली में एविएशन टर्बाइन फ्यूल का भाव 79,020 रुपये प्रति हजार लीटर यानी तकरीबन 79 रुपये प्रति लीटर है. कोलकाता में ये 83 रुपए प्रति लीटर से कुछ ज्यादा है.

Jet Fuel

पेट्रोल और डीजल के दाम इंटरनेशनल मार्केट के हिसाब से रोज सुबह 6 बजे तय होते हैं. यहीं से तेल कंपनियां और सरकार अपनी कमाई करती हैं. पेट्रोल और डीजल पर चार तरह के खर्चे और टैक्स जोड़ कर हमें उपलब्ध कराया जाता हैं. ये इस प्रकार हैं,

# कच्चे तेल को ढोने से लेकर डीलर तक पहुंचाने का प्रोसेसिंग चार्ज
# केंद्र सरकार की एक्साइज़ ड्यूटी
# पेट्रोल-डीजल का पंप चलाने वाले डीलर का कमीशन
# राज्य सरकारों का लगाया गया वैट

हम तक जो पेट्रोल-डीजल पहुंच रहा है उस पर केंद्र और राज्य सरकारें तकरीबन 54-60 फीसदी टैक्स वसूल रही हैं. केंद्र सरकार पेट्रोल पर 32.80 रुपए और 31.80 रुपए एक्साइज़ ड्यूटी वसूलती है. राज्य सरकारें अपने हिसाब से वैट  लेती हैं. मिसाल के तौर पर दिल्ली सरकार प्रति लीटर पेट्रोल पर 23 रुपए और डीजल पर 13 रुपए अपनी जेब में डालती है.

सरकार हमेशा कीमत बढ़ाने का एक ही तर्क देती है, कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें बाजार के हवाले है और वो कुछ नहीं कर सकती. यानी अंतरराष्ट्रीय दाम के मुताबिक तेल कंपनियां खुद ही दाम तय करती हैं. लेकिन सच ये भी है कि पेट्रोल-डीजल की कीमत में 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा टैक्सेज का होता है, जिसे केंद्र या राज्य सरकारें कम करने का नाम नहीं ले रहीं. तो इस बार जब तेल के दाम बढ़ें तो समझ जाइए कि तेल कंपनियों के साथ ही सरकारें भी जमकर कमाई कर रही हैं.


वीडियो – पेट्रोलियम मंत्री ने संसद में ‘राम के देश में तेल महंगा’ वाले सवाल पर क्या कहा?

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