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क्यों हो रहा यूरोपियन रीज़न में कोरोना विस्फ़ोट?

यूरोप में लोग वैक्सीन पर भरोसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं ?

यूरोप एक बार फिर से उसी जगह पर खड़ा है, जहां वो एक साल पहले था. यानी कोरोना महामारी के केंद्र में. पिछले हफ़्ते यूरोपियन रीज़न में कोरोना से लगभग 24 हज़ार लोगों की जान गई. जबकि 18 लाख से अधिक संक्रमण के नए मामले दर्ज किए गए. ये दुनियाभर में दर्ज़ कुल आंकड़े का आधे से अधिक है.

WHO ने इस पर चिंता जताई है. WHO का कहना है कि अगर ये रफ़्तार बरकरार रही तो, फ़रवरी 2022 तक इस क्षेत्र में कोरोना से पांच लाख और लोगों की जान जा सकती है. WHO यूरोप के अलावा सेंट्रल एशिया के कुुछ देशों को यूरोपियन रीज़न में गिनता है. इसमें लगभग 53 देश शामिल हैं.

यूरोपियन रीज़न में कोरोना विस्फ़ोट की वजह क्या है?

पहली वजह है, लापरवाही. जिस समय कोरोना का ग्राफ़ नीचे जा रहा था, उस समय लोग निश्चिंत हो रहे थे. कई देशों ने मास्क और सोशल डिस्टैंसिंग की अनिवार्यता भी खत्म कर दी है. इस वजह से भी लोग महामारी को ख़त्म मान चुुके हैं.

WHO ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर अगले 95 प्रतिशत लोगों ने मास्क पहनना शुरू कर दिया तो लगभग दो लाख मौतों को रोका जा सकता है.

दूसरी वजह है, वैक्सीनेशन में असमानता. WHO के रीजनल डायरेक्टर हेंस क्लूज के अनुसार, वैक्सीनेशन में असमानता कोरोना विस्फ़ोट की सबसे बड़ी वजह है. इस इलाके में आठ देशों ने 70 प्रतिशत से अधिक आबादी को वैक्सीन लगा दी है. जबकि दो देश ऐसे हैं, जो अपनी 10 प्रतिशत जनसंख्या को भी वैक्सीनेट नहीं कर पाए हैं. पिछले हफ़्ते यूरोप में 65 साल से ऊपर के जितने भी लोगों की कोरोना से मौत हुई, उनमें से 75 फीसदी लोगों को कोरोना वैक्सीन की सिर्फ़ एक डोज लगी थी.

तीसरी वजह है, वैक्सीनेशन को लेकर झिझक. कोरोना की वैक्सीन को बाज़ार में आए लगभग एक साल हो चुका है. वैक्सीन को लेकर अभी भी लोगों की झिझक खत्म नहीं हुई. एक धड़ा वैक्सीन की अनिवार्यता से नाराज़ चल रहा है. इस जगहों पर वैक्सीन पास के विरोध में प्रोटेस्ट हो रहे हैं.

अक्टूबर 2021 में इटली ने अपने यहां हेल्थ पास वाला कानून लागू किया था. इसके तहत, प्राइवेट या पब्लिक सेक्टर में काम करने वाले हर एक कर्मचारी के लिए ग्रीन पास लेना अनिवार्य कर दिया था. यानी अगर आपको नौकरी करनी है तो कोरोना की वैक्सीन लेनी होगी, या नेगेटिव कोविड टेस्ट रिपोर्ट दिखानी होगी या फिर कोविड से रिकवर होने का सबूत देना होगा.

इन्हीं तीनों स्थिति में सरकार संबंधित व्यक्ति के लिए ग्रीन पास जारी करती है. जिसके पास ग्रीन पास नहीं होगा, उनपर डेढ़ लाख रुपये तक का ज़ुर्माना लग सकता है. इस कानून के विरोध में इटली के ट्रिएस्ते शहर में जमकर प्रोटेस्ट हुआ. इसमें हज़ारों की संख्या में लोग इकट्ठा हुए. प्रोटेस्ट के दो हफ़्ते बाद ट्रिएस्ते एक कोविड हॉटस्पॉट बन चुका है. इटली 12 साल से ऊपर के 80 प्रतिशत से अधिक लोगों को वैक्सीनेट कर चुका है. बाकी बचे 38 लाख लोगों के लिए इटली ने ग्रीन पास का सिस्टम लागू किया है. हालांकि, इसको लेकर जनता एकमत नहीं दिख रही है.

वैक्सीन की ख़बर को यहीं पर विराम देते हैं. अब चलते हैं कोरोना की दवा की तरफ़.

ब्रिटेन ने कोरोना के पहले एंटी-वायरल ड्रग को मंज़ूरी दे दी है. इस दवा का नाम है, मोलनुुपिएर. इसे अमेरिकन कंपनी मर्क एंड रिज़बैक बायोथेरेपेटिक्स ने डेवलप किया है. ब्रिटेन कोरोना की किसी दवा को अप्रूव करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है. ये दवा कोरोना पीड़ित लोगों को दिन में दो बार दी जाती है. क्लिनिकल ट्रायल्स से मिले आंकड़ों के अनुसार, ये हॉस्पिटलाइज़ेशन और मौत की आशंका को पचास फीसदी तक घटाने में कारगर है.

ब्रिटेन में चार नवंबर को 41 हज़ार से अधिक मामले दर्ज किए गए, जबकि दो सौ से अधिक लोगों की मौत हुई.

यूरोप की इस खबर के बाद अब एक नज़र डालते हैं इथियोपिया में चल रही सिविल वॉर की तरफ

इथियोपिया में सिविल वॉर की उम्र एक साल हो चुकी है. पिछले साल 04 नवंबर को इथियोपिया के प्रधानमंत्री एबी अहमद अली ने टिग्रे पर हमले का आदेश दिया था.
अफ़्रीकी महाद्वीप में हिंसा, तानाशाही और सैन्य तख़्तापलट की लंबी परंपरा रही है. इथियोपिया भी इससे कतई अछूता नहीं रहा है. हालांकि, एक मामले में ये देश अलग रहा. इथियोपिया कभी किसी का उपनिवेश नहीं बना. यहां पर 1936 से 1941 तक बस इटली का क़ब्ज़ा रहा था. इटली भी पहले मिली हार का बदला लेने के इरादे से आया था.

इटली ने सम्राट हेली सलासी को गद्दी से उतारा था. इटली ने सलासी को निर्वासन में भेज दिया. जब इटली बाहर निकला, तब सलासी वापस लौटे. वो 1974 तक कुर्सी पर रहे. उसी साल उनका तख़्तापलट हो गया. एक तरफ़ सलासी जेल में गए, दूसरी तरफ़, इथियोपिया जंग की आग में. सिविल वॉर और अकाल, यहां के रूटीन में शामिल हो गए. नया शासन सोवियत संघ के इशारों पर चलता था. प्रोपेगैंडा और ‘लाल आतंक’ का ख़ूनी खेल चलने लगा. इसमें आम नागरिक पिस रहे थे.

इससे निपटने के लिए विपक्षी दलों ने एक गठबंधन बनाया. नाम रखा, इथियोपियन पीपुल्स रिवॉल्युशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट. EPRDF. इसमें चार पार्टियां शामिल हुईं – टिग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट (TPLF), अम्हारा डेमोक्रेटिक पार्टी (ADP), ओरोमो डेमोक्रेटिक पार्टी (ODP) और साउदर्न इथियोपियन पीपुल्स डेमोक्रेटिक मूवमेंट (SEPDM). इस गठबंधन में TPLF का दबदबा था. ये पार्टी टिग्रे प्रांत में बनी थी.

EPRDF गठबंधन ने मिलकर तानाशाही सरकार गिरा दी. नया संविधान बनाया गया. 1993 में एरिट्रिया को आज़ाद कर दिया गया. लेकिन ज़मीन के एक टुकड़े को लेकर विवाद बना रहा. इस टुकड़े के लिए 1999 में फिर से लड़ाई शुरू हो गई. इस लड़ाई में टिग्रे फ्रंट पर था. और, वहां की TPLF इसकी सबसे बड़ी हिस्सेदार. TPLF के लड़ाके एरिट्रिया वाले युद्ध में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे. इसलिए आगे जब शांति समझौता हुआ, तब उनको झटका लगा था.

ये झटका तब लगा, जब एरिट्रिया के साथ ज़मीन का विवाद सुलझा जुलाई 2018 में. इथियोपिया ने विवादित ज़मीन पर से दावा छोड़ दिया था. इसके पीछे दिमाग था नए प्रधानमंत्री एबी अहमद अली का. अली आर्मी में रह चुके थे. वो ओरोमो डेमोक्रेटिक पार्टी के मेंबर थे. और, सरकार में साइंस एंड टेक्नॉलजी मिनिस्ट्री संभाल चुके थे. इस सीमा विवाद को सुलझाने के लिए एबी अहमद की खूब वाहवाही हुई. उन्हें 2019 में इसके लिए नोबेल पीस प्राइज़ मिला.

एबी अहमद बाहरवालों के लिए तो शांति के दूत थे. लेकिन उनके घर के भीतर फूट पड़ गई. ऐसा क्यों हुआ? दरअसल, प्रधानमंत्री एबी अहमद ने नवंबर, 2019 में EPRDF गठबंधन को भंग कर दिया. इसकी जगह एक नई पार्टी बनाने का ऐलान किया. उसका नाम रखा, द प्रोस्पैरिटी पार्टी. TPLF, जो अभी तक गठबंधन में चौधरी बनी हुई थी, उसने नई पार्टी में शामिल होने से मना कर दिया.

इसके बाद वही हुआ, जो होना था. केंद्र और TPLF के बीच ठन गई. इस तकरार में घी डालने का काम किया, कोरोना संक्रमण ने. कैसे? इथियोपिया में अगस्त, 2020 में आम चुनाव होने थे. लेकिन, केंद्र सरकार ने कोरोना का हवाला देकर चुनावों को 2021 तक के लिए टाल दिया.

इस पर TPLF ने विद्रोह कर दिया. कहा कि हम तो चुनाव करवाएंगे. वही हुआ भी. सिंतबर के महीने में TPLF ने टिग्रे में चुनाव करवाए. प्रधानमंत्री एबी अहमद ने इस चुनाव को अवैध घोषित कर दिया. TPLF ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री राज्यों को कमज़ोर करने की साज़िश कर रहे हैं. साथ ही धमकी भी दी कि टिग्रे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का मतलब ‘युद्ध’ होगा.

उसी समय आशंका जताई जा रही थी कि ये तकरार बातचीत के जरिए शांत नहीं होगी. ये आशंका 04 नवंबर को सच साबित हो गई. उस दिन एबी अहमद ने ट्वीट कर कहा कि ‘TPLF ने सेना के एक बेस पर हमला कर हथियार लूट लिए हैं. उन्होंने सारी सीमाएं पार कर दी हैं. अब सेना TPLF के ख़िलाफ़ मोर्चा संभालेगी’. TPLF ने आर्मी बेस पर हमले के आरोप को नकार दिया.

लेकिन एबी अहमद ने इस सफाई को सुनने से इंकार कर दिया. 04 नवंबर 2020 को टिग्रे में आपातकाल लगा दिया गया. सप्लाई लाइन बंद कर दी गई. टेलीफ़ोन और इंटरनेट कनेक्शन काट दिए गए. पूरे देश में तैनात आर्मी को टिग्रे की तरफ कूच करने का आदेश मिला. 28 नवंबर को एबी अहमद ने TPLF के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर दिया.

कहा जा रहा था कि आर्मी TPLF को कुछ ही हफ़्तों में नेस्तनाबूद कर देगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. TPLF के साथ जंग के कई आयाम हैं. मसलन, टिग्रे में लाखों की संख्या में लोगों ने पलायन किया. अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, रेप, हत्या, शोषण की हज़ारों दास्तानें टिग्रे में बिखरी हुईं है. इस अपराध में हर पक्ष शामिल है.
शुरुआती चरण में, इथियोपिया की सेना ने पहले तो TPLF को घुटने टेकने पर मज़बूर कर दिया. लेकिन TPLF ने बाद में वापसी की.

एक साल बाद हाल ये है कि TPLF और OLA मिलकर राजधानी आदिस अबाबा की तरफ कूच कर रही है. दोनों को सरकार ने ‘आतंकी संगठन’ घोषित किया हुआ है. TPLF और OLA एक समय एक-दूजे के दुश्मन हुआ करते थे. 02 नवंबर को प्रधानमंत्री एबी अहमद ने छह महीने का आपातकाल लगा दिया. लोगों से अपील की गई है कि वो राजधानी की सुरक्षा करें.

अमेरिका ने इथियोपिया को लेकर अपने नागरिकों के लिए ट्रैवल एडवायज़री जारी की है.

आने वाले दिनों में इथियोपिया को लेकर निर्णायक ख़बर आ सकती है. हम आप तक इथियोपिया से जुड़ी अपडेट्स पहुंचाते रहेंगे.

आपने इथियोपिया के मानवीय संकट की कहानी सुनी. अब दूसरे बड़े संकट की तरफ़ चलते हैं. ये है जलवायु परिवर्तन.

स्कॉटलैंड के ग्लासगो में इन दिनों कॉप-26 चल रहा है. इस बैठक को धरती बचाने के अंतिम मौके के तौर पर देखा जा रहा है.

चार नवंबर को इंडोनेशिया, पोलैंड, वियतनाम समेत 20 से अधिक देशों ने कोयले का इस्तेमाल बंद करने पर सहमति दे दी है. कोयले को सबसे दूषित ईंधन माना जाता है.

हालांकि, चीन, भारत, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका ने इस प्रस्ताव को लेकर कोई पहल नहीं की.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में चीन ने कोयले की कुल खपत का 54 प्रतिशत, भारत ने 11 प्रतिशत, जबकि अमेरिका ने लगभग 06 प्रतिशत इस्तेमाल किया.

जानकारों का मानना है कि ये शुरुआत अच्छी है. हालांकि, इस दिशा में अभी और आगे जाने की ज़रूरत है.

कॉप-26 की पहली बड़ी पहल जंगलों की कटाई को लेकर हुई थी. 127 देशों ने शपथ ली थी कि वे 2030 तक अपने यहां जंगलों की कटाई बंद कर देंगे. इसमें इंडोनेशिया भी शामिल था. इंडोनेशिया में दुनिया के कुल वर्षावनों का एक-तिहाई हिस्सा मौजूद है.

डील साइन करने के दो दिन बाद ही इंडोनेशिया अपनी बात से मुकर गया है. देश की पर्यावरण मंत्री ने ट्वीट कर कहा कि इंडोनेशिया पर ये शर्त थोपना अनुचित और पक्षपाती है. इससे इंडोनेशिया के विकास में रुकावट आ सकती है.

इसके बाद उप विदेश मंत्री का बयान आया. उन्होंने कहा कि शपथ लेने का ये मतलब नहीं है कि इंडोनेशिया पूरी तरह से जंगलों की कटाई रोक देगा. हालांकि, उन्होंने कहा कि जंगल की ज़मीन का दूसरे कामों में इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा.

इंडोनेशिया कॉप-26 के सामने मौजूद चुनौतियों का एक सटीक उदाहरण है. कॉप-26 में भले ही बड़े-बड़े दावे कर लिए जाएं, उन्हें धरातल पर उतारने की ज़िम्मेदारी देशों की है. इसके लिए उन्हें अपने यहां की बाधाओं से पार पाना होगा. तभी दुनिया को बचाने की मुहिम सफ़ल हो सकती है.

तारीख़: अगर 1761 में मराठा ना हारते तो क्या भारत पर कब्ज़ा कर पाते अंग्रेज ?

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