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अपर्णा के बीजेपी में जाने से क्यों खुश हैं सपाई?

चुनावी माहौल है तो सियासी हलकों में हलचल भी बहुत है.  अखिलेश यादव अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ने के पुख्ता संकेत दे दिए हैं. कहां से लड़ेंगे, कौन सी सीट होगी. बात इस पर भी करेंगे. यादव के परिवार में पड़ी फूट और अपर्णा बिष्ट यादव के बीजेपी में शामिल होने की चर्चा भी विस्तार से करेंगे. आगा-पीछा, फायदा-नुकसान भी बताएंगे. मगर हमें लगता है कि आज सबसे पहले बात उस जगह की करनी चाहिए, उस जिले की करनी चाहिए. जिसने अकेले ही पूरे उत्तर प्रदेश की सियासी तस्वीर बदल दी थी. यूं तो उत्तर प्रदेश बहुत बड़ा है, कुल 75 जिले हैं. मगर वो एक जिला इतना माद्दा रखता था कि उसने 2017 के चुनाव में पूरे प्रदेश की तस्वीर बदल दी. गन्ने की मिठास के लिए जाना जाता है और सांप्रदायिक खटास के लिए भी जाना गया. उसके दामन में दंगे का दाग लगा, जिस घटनाक्रम में मुस्लिम-जाट समीकरण बंटा और बंट गया भाईचारा.

हमें लगता है कि इतने इशारों से आप समझ गए होंगे कि हम बात पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले की कर रहे हैं. मुजफ्फरनगर का जिक्र आते है जहन में आता है दंगा, गन्ना, जाट और मुस्लिम आता है. इन चार शब्दों के इर्द-गिर्द राजनीतिक पंडित मुजफ्फरनगर की कहानी को बुनते हैं. मगर सवाल है कि आज हम मुजफ्फरनगर का जिक्र क्यों रहे हैं ? तो वो इसलिए क्योंकि मुजफ्फरनगर में अब टिकट बंटवारा हो चुका है पार्टियों ने अपने पत्ते खोल दिए हैं. बीजेपी का तो पता था, लेकिन आश्चर्य तब हुआ और खबर तब बनी जब समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के गठबंधन से भी एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा गया.

मुजफ्फरनगर जिले में विधानसभा की 6 सीटें हैं

बुढ़ाना, चरथावल, पुरकाजी, मुज़फ़्फ़रनगर, खतौली और मीरापुर

मुस्लिम बाहुल्य इलाका होने के बावजूद 2017 के चुनाव में सभी 6 सीटें बीजेपी ने जीत ली.

और जानकार कहते हैं कि इस नतीजे के पीछे 2013 का वो दंगा था, जिसने अकाट्य माने जाने वाले जाट-मुस्लिम गठजोड़ को तोड़ दिया. मुस्लिम और जाट वोट अलग हो गए. पारंपरिक तौर पर चौधरी अजीत सिंह यानि RLD के वोटर माने जाने वाली जाट बिरादरी ने पहले 2014 के लोकसभा चुनाव और फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में एकतरफा बीजेपी को वोट दिया, जिसका असर सिर्फ मुजफ्फरनगर ही नहीं बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में देखने को मिला.

मगर इस बार किसान आंदोलन ने समीकरण को फिर से बदला है. स्थानीय जानकार कहते हैं कि जाट बिरादरी का रुझान फिर से गठबंधन, खासकर RLD की तरफ झुकता हुआ नजर आ रहा है. और उसी वोट को बांधे रखने के लिए बड़ा-बड़ा फूंक-फूंक कर कदम गठबंधन की तरफ से रखा जा रहा है, लेकिन इस चक्कर में मुजफ्फरनगर हर सीट पर लगभग 1 लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटर होने के बावजूद भी, दमदार मुसलमान प्रत्याशियों को टिकट भी काट दिए गए.

मुजफ्फरनगर जिले में करीब 40% मुस्लिम वोटर हैं.

सपा और RLD ने 6 में 5 सीटों पर उम्मीदवार का ऐलान कर दिया.

मगर एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया गया

मुजफ्फरनगर सीट पर भी किसी हिंदू प्रत्याशी की ही उम्मीद है

मुस्लिम वोटों की दावेदारी करने के बावजूद एक भी टिकट किसी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट ना देना, कई सवालों को जन्म दे गया. पहला सवाल ये कि क्या गठबंधन को ऐसा लग रहा है कि मुस्लिम वोट तो उन्हें मिलेगा ही मिलेगा ? इसलिए हिंदू उम्मीदवार को टिकट दिया जाए, ताकि जाट-गुर्जर और बाकी हिंदू वोट अपपने पाले में लाए जाए और दूसरा ये कि जो प्रत्याशी करीबी मार्जिन से पिछला चुनाव हार गए थे क्या उनका भी टिकट सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से काट दिया गया ? बात सीट दर सीट करते हैं. कहानी समझने में आसानी होगी. पहली सीट है

मीरापुर. 2017 में इस सीट पर समाजवादी पार्टी ने हाजी लियाकत अली को अपना उम्मीदवार बनाया था. और तब बीजेपी के उम्मीदार रहे अवतार सिंह भड़ाना से मात्र 193 वोटों के करीबी अंतर से चुनाव हार गए.

मगर इस बार सपा ने उनको टिकट नहीं दिया, सपा ने यहां चंदन चौहान को मैदान में उतारा जो पिछला चुनाव खतौली विधानसभा 31 हजार वोटों से हारे थे

चुंकि यहां से जीते अवतार भड़ाना अब RLD में जा चुके हैं तो बीजेपी ने प्रशांत गुर्जर को टिकट दिया. लेकिन सपा से लियाकत अली के टिकट कटने से नाराजगी का पनपना तय था और करीबी मुकाबले में हारे लियाकत अली की तरफ से वो नाराजगी दिखनी लगी, उनकी तरफ से फेसबुक पर लिखा भी गया…

इज्जत और जिल्लत सिर्फ अल्लाह के हाथ में है. आपकी मेहनत कभी जाया नहीं जाएगी. इंशाअल्लाह

3 दिन पहले बाद एक और फेसबुक पोस्ट में लियाकत अली की तरफ से लिखा गया …

शुक्रिया मेरे सभी चाहने वालों का. आपका प्यार और आपका समर्थन जिस तरह से मिल रहा है,मैं आपका आभारी हूं. सब्र इंसान को और मजबूत बनाता है. आपके बीच इंशाअल्लाह कल मिलता हूं. आपका जो सुझाव होगा,फैसला लिया जाएगा

इन दोनों पोस्ट से लियाकत अली ने अपने बगावती तेवर दिखा दिए, इलाके के वो मजबूत मुस्लिम नेता माने जाते हैं, 5 बार मुजफ्फरनगर की मीरापुर सीट से मुस्लिम प्रत्याशी जीत चुके हैं,  विधानसभा में करीब 1 लाख 40 हजार मुस्लिम वोटर भी हैं. चर्चा उनके निर्दलीय चुनाव लड़ने की भी होने लगी तो इस पर अब लियाकत अली का बयान आ गया

5 साल मैंने अपनी विधानसभा क्षेत्र में काम किया. पता नहीं मेरा टिकट क्यों काट दिया गया. लेकिन मुझे फैसला मंज़ूर है.

लियाकत अली अब पार्टी के फैसले के साथ खड़े नजर आ रहे हैं और फेसबुक पर अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने की अपील भी कर रहे हैं. मगर नाराजगी की खबर कादिर राणा की भी है. कादिर राणा 2013 के दंगों के वक्त मुजफ्फरनगर के सांसद थे. बसपा छोड़ सपा में आए लेकिन टिकट उनको भी नहीं मिला.

ऐसे ही मुजफ्फरनगर की दूसरी है

चरथावल

करीब 1 लाख 25 हजार मुस्लिम वोट हैं.

जाट वोट करीब 30 हजार

बीजेपी ने यहां सपना कश्यप को मैदान में उतारा है

तो कांग्रेस आए पंकज मलिक को सपा ने टिकट दिया

यानि एक जाट प्रत्याशी को उतारा है. मुस्लिम वोटर की संख्या ज्यादा होने की वजह से नूर सलीम राणा यहां से चुनाव लड़ना चाहते थे. 2012 में वो बसपा के टिकट पर यहीं से विधायक रह चुके थे. मगर बसपा छोड़ RLD में आने के बावजूद उन्हें टिकट नहीं मिला. और जिले की बाकी सीटों पर भी ऐसा ही हुआ, मुस्लिम उम्मीदवार जीत वाले फॉर्मूले में किसी भी सीट पर फिट नहीं हुए.

और स्थानीय जानकर कहते हैं गठबंधन की तरफ से ऐसा ध्रूवीकरण को रोकने के लिए किया है. उन्हें लग रहा है कि सिर्फ मुस्लिम वोटों से चुनाव जीता नहीं जा सकता, मगर बीजेपी के विरोध में मुस्लिम वोट तो मिलेंगे ही, हिंदू प्रत्याशी होने से जाट, गुर्जर और बाकी जातियों का वोट मिलने की संभावना बढ़ जाएगी. जाट-मुस्लिम गठजोड़ मुजफ्फरनगर में ही टूटा और अगर मुजफ्फरनगर में ही जाट-मुस्लिम का पुराना गठजोड़ फिर बना तो ना सिर्फ सीटे निकल जाएगी. बल्कि संदेश आस-पास के जिलों में भी जाएगा.

मगर यहां समाजवादी गठबंधन की राह इतनी भी आसान नहीं है, मायावती की बसपा ने मुजफ्फरनगर की 4 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतार दिए हैं. ओवैसी भी मुस्लिम वोटों की दावेदारी कर रहे हैं. एक सच्चाई ये भी है कि 2012 के चुनाव में मुजफ्फरनगर के 6 में से 3 विधायक मुस्लिम थे. 2 सीटें सपा ने, एक आरएलडी ने और 3 बसपा ने जीती थी

बीजेपी का तब खाता भी नहीं खुला था, लेकिन 2013 के दंगों ने सारे समीकरण बदल दिए और 6 के 6 बीजेपी के हिंदू प्रत्याशी विधायक बने. इस बार भी सीधा मुकाबला बीजेपी और सपा गठबंधन के बीच माना जा रहा है और अगर बसपा या AIMIM का कोई प्रत्याशी नहीं जीता तो मुजफ्फरनगर के 6 के 6 विधायक हिंदू होंगे. क्योंकि समीकरण ही कुछ ऐसे बन रहे हैं.

मगर इससे मुस्लिमों का एक तबका नाराज है, लेकिन कुलमिलाकर यूपी का चुनाव जीतने के लिए अखिलेश यादव की बड़ी कोशिश सिर्फ मुस्लिम और यादव परस्त होने का ठप्पा मिठाने की है, जाट-गुर्जर वोट साथ लाने की है. सारे दांव सरकार बनाने के लिए चले जा रहे हैं. और ऐसा ही एक दांव अखिलेश यादव ने चुनाव लड़ने का ऐलान कर भी चल दिया. पहली बार समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद विधानसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं. आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बात पर मुहर भी लगा दी

यानी एक बात तो साफ है कि अखिलेश यादव आजमगढ़ जिले की किसी सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे,योगी आदित्यनाथ और केशव मौर्य के चुनाव में उतरने के ऐलान के बाद से ही अखिलेश यादव पर भी सीधा चुनाव में उतरने का दबाव था. ट्वीट के जरिए केशव प्रसाद मौर्या चुनाव लड़ने के लिए ललकार भी रहे थे. तो अब तक एक भी विधानसभा चुनाव ना लड़ने वाले अखिलेश ने भी विधानसभा के मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया.

अब तक वो अपने पिता की लकीर से थोड़ा हटकर राजनीति करते थे, 2012 में मुख्यमंत्री बने तो विधानपरिषद के सदस्य थे. जबकि मुलायम सिंह यादव लगातार विधानसभा चुनाव लड़ा करते थे. मुलायम सिंह यादव 8 बार विधायक रह चुके हैं.

1967 में पहली बार युवा मुलायम सिंह यादव संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से विधायक बन गए थे, 1992 में समाजवादी पार्टी बनाई तो मुलायम सिंह यादव ने 1993 में 3 सीटों से चुनाव लड़ा, जसवंत नगर, शिकोहाबाद, निधौली कलां..तीनों सीटों से ही जीते. चाचा शिवपाल यादव भी 6 बार इटावा ही जसवंत नगर सीट से विधायक रह चुके हैं और अब पिता और चाचा की तरह ही अखिलेश भी विधानसभा चुनाव लड़ेंगे

यादव परिवार से चुनाव लड़ने वाले चौथे व्यक्ति हैं अखिलेश

मुलायम सिंह यादव

शिवपाल यादव

अपर्णा यादव

और अब अखिलेश यादव

मगर इत्तेफाक देखिए कि जब आज अखिलेश यादव ने चुनाव लड़ने की घोषणा की उससे ठीक कुछ वक्त पहले उन्हीं के परिवार की सदस्य और मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा बिष्ट यादव, पूरा नाम अपर्णा बिष्ट यादव ने सपा छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गईं. यही कोई सुबह के साढ़े दस बज रहे होंगे. दिल्ली में बीजेपी हेडक्वार्टर के स्टेज यूपी बीजेपी अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के पीछे क्रीम कलर की जैकेट पहने एक महिला साथ स्टेज पर चढ़ रही थीं, चेहरा मास्क से ढंका था. मगर नाम सबको पता चल चुका था. मुलायम की छोटी बहू अपर्णा यादव.

पीछे से डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या आते हैं. मंच पर लगे माइक में एंबियंस के तौर पर सुनाई देता है…अपर्णा जी इधर..स्वतंत्र देव सिंह बीच की कुर्सी की ओर इशारा करते हैं.

सब सीट पर बैठ जाते हैं, केशव प्रसाद मौर्या के चेहरे पर मुस्कान थी और अपर्णा की निगाहों में कुछ सवाल. मास्क के भीतर वो तो आपस में कुछ बातें करते हैं. अपर्णा मोबाइल की तरफ देखने लगती हैं और ध्यान से सुनने पर पता चला है कि वो भाषण क्या बोलेंगी इसके बारे में स्वतंत्र देव सिंह से पूछ रहीं थी. पूछ रहीं कि राष्ट्र प्रथम वाली लाइन बोलनी है या कुछ और

अब तक बीजेपी के मंच पर पहली बार आईं अपर्णा ने क्या बाइट देनी है, इसकी ट्रेनिंग ले ली थी. फिर थोड़ी देर में केशव प्रसाद मौर्या ने बीजेपी का पटुका पहनाकर आधिकारिक तौर पर पार्टी में शामिल कर लिया. स्वागत किया, गुलदस्ता दिया और इसके बाद सीधे अखिलेश यादव को निशाने पर लिया, कह दिया, उनसे तो अपना परिवार नहीं संभला

निशाने पर अखिलेश थे और निगाहें अपर्णा यादव पर अब देखना ये था कि वो क्या बोलेंगी, तो बोला वही जो स्वतंत्र देव सिंह के कान में कहा था

राष्ट्र प्रथम है, मोदी और योगी जी के विचार प्रभावित करते हैं और इन्हीं शब्दों के साथ अपर्णा भाजपाई हो गईं. निष्ठा बदलते ही बयान भी बदल गए. वरना यही अपर्णा यादव अभी मात्र 9 दिनों पहले एजेंडा आजतक पर समाजवादी पार्टी को सबसे अच्छी पार्टी बता रही थीं, महिलाओं के लिए काम करने वाली पार्टी का तमगा दे रही थीं

मगर जब अपर्णा ने सपा के पक्ष में जब ये बात कही तब तारीख थी 10 जनवरी 2022 और आज है 19 जनवरी. 9 दिन के भीतर पार्टी और प्रतिष्ठा दोनों बदल चुकी है. और जब अखिलेश यादव से अपर्णा के बीजेपी में जाने पर सवाल हुआ तो अखिलेश ने बधाई दी और भाव ऐसा दिखाया जैसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता.

मगर बीजेपी ने तो अपर्णा का पूरे लावलश्कर के  साथ स्वागत किया. सीएम योगी ने पहले ट्वीट कर बधाई दी और फिर मुलाकात भी की. पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ भी तस्वीर सामने आईं. अपर्णा के बीजेपी में शामिल होने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि इसके संकेत वो पहले से देती रही हैं. मगर  अब सवाल ये है कि अपर्णा यादव इतनी बड़ी नेता हैं, जिनकी ज्वाइनिंग को इतनी तवज्जो दी गई ? वो बीजेपी के लिए कितना बड़ा कैच हैं और कितना फायदा पहुंचाएंगी ? क्या उनका राजनीतिक रसूख इतना है कि वो यादव वोटों को बीजेपी के पाले में ला सकें ?

तो जवाब है कि अपने OBC नेताओं की टूट के बाद  बीजेपी के लिए लाभ के तौर पर ये परसेप्शन की लड़ाई जीतने जैसा ही है. अपर्णा यादव के अलावा मुलायम सिंह के साडु प्रमोद गुप्ता भी बीजेपी आ गए. यानि संदेश यही देने की कोशिश है कि यादव परिवार एक नहीं है.

लेकिन रहा सवाल कि क्या अपर्णा के बीजेपी में आने से उसको कोई सियासी फायदा होगा ? तो अपर्णा मुलायम सिंह के दूसरे बेटे प्रतीक यादव की पत्नी है .प्रतीक यादव सियासत से दूर है और अपना बिजनेस संभालते हैं. ऐसे में मुलायम सिंह की सियासी विरासत सिर्फ अखिलेश यादव के पास इसलिए अपर्णा यादव के आने से बीजेपी को परसेप्शन की जीत के अलावा कोई और बड़ा राजनीतिक फायदा होता नजर नहीं आ रहा. यादव वोटों के तौर पर तो कतई नहीं. बल्कि वो खुद लखनऊ कैंट सीट चाहती हैं, जो ऑलरेडी बीजेपी की विनिंग सीट है.


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