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ये क्रिकेटर्स मैच के दौरान बॉल पर थूक क्यों लगाते हैं, इससे होता क्या है?

हममें से न जाने कितने ऐसे लोग हैं जिन्होंने बचपन में गलियों में, घर के आंगन में या फिर मैदान में क्रिकट खेला है. दीवानों की तरह इंडिया का हर मैच देखा है. अक्सर टीवी स्क्रीन पर हमें दिखता कि बोलर अपने थूक या पसीने से गेंद को रगड़ता. हम भी कॉपी करते. पर इसका लॉजिक समझ नहीं पाते कि ये ऐसा करते क्यों हैं? अब शायद स्क्रीन पर ये ऐक्शन कभी नहीं दिखेगा. वजह है कोरोना वायरस.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब मैच के दौरान सलाइवा यानी थूक या पसीने के इस्तेमाल पर रोक लगाई जा सकती है. ICC इसे लेकर विचार कर रहा है. वहीं, क्रिकेट गेंद बनाने वाली कंपनी कुकाबुरा ने एक बड़ी घोषणा कर दी है. कुकाबुरा ने कहा है कि वो एक ऐसा ‘वैक्स एप्लिकेटर’ तैयार कर रही है. जिससे खिलाड़ियों को गेंद को चमकाने के लिए पसीने या थूक की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी. यानी गेंद पूरे मैच में चमकदार बनी रहेगी.

#इस पर खिलाड़ियों का क्या कहना है

रिवर्स-स्विंग के सबसे माहिर गेंदबाज़ माने जाने वाले वकार यूनुस ने कहा,

”बतौर तेज़ गेंदबाज़ मैं आईसीसी की इस सोच का विरोध करता हूं, क्योंकि गेंद पर थूक या पसीने का इस्तेमाल एक नैचुरल प्रोसेस है. एक आदत, जिसे आप नहीं रोक सकते.”

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शोएब अख़्तर. फोटो: Shoaib FB

वहीं, शोएब अख़्तर का कहना है वो आईसीसी के इस कदम का स्वागत करेंगे. उन्होंने कहा,

”हम गेंदबाज़ हैं, हम गेंद को चमकाने के लिए थूक का इस्तेमाल करते हैं. गेंद मैदान पर हर किसी के हाथ में जाती है.आईसीसी अगर इस नियम को पास करता है तो मैं कोरोना वायरस को ध्यान में रखते हुए इसका स्वागत करूंगा.”

पाकिस्तानी पेसर्स के अलावा आशीष नेहरा ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी है. नेहरा ने कहा,

”अगर गेंद पर थूक या पसीना नहीं लगेगा तो फिर गेंद नहीं चमेकगी. गेंद को स्विंग कराने के लिए ये ज़रूरी है. लेकिन आईसीसी के इस बदलाव के बाद हो सकता है बॉल स्विंग ही न हो या बहुत ज्यादा स्विंग हो. ऐसे में खिलाड़ियों को पहले नेट्स पर इसे आजमाने के लिए एक महीना-बीस दिन का वक्त दिया जाना चाहिए.”

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तेज़ गेंदबाज़ आशीष नेहरा. फोटो: India Today

लेकिन बॉल को चमकाना क्यों जरूरी है? और थूक या पसीना इसमें कितनी मदद करते हैं?

क्रिकेट बॉल पर थूक क्यों लगाते हैं:

जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ता है गेंद पुरानी होने लगती है. पुरानी गेंद बल्लेबाजों के लिए मददगार होती है. स्विंग गेंदबाज़ी के लिए जरूरी है कि गेंद को नया बनाए रखा जाए. उसकी चमक बनाए रखी जाए. इसलिए बोलर्स उसे रगड़ककर चमकाते हैं. इसके लिए वो अपने थूक या फिर पसीने का इस्तेमाल करते हैं. ये तरीका सबसे पहले किसने और कब इस्तेमाल किया इसकी ठीक-ठीक जानकारी उपलब्ध नहीं है.

एक दम नई चमचमाती गेंद. कनवेंशनल स्विंग के लिए ये चमचमाना बहुत ज़रूरी है.(सोर्स - विकिमीडिया)
एक दम नई चमचमाती गेंद. कनवेंशनल स्विंग के लिए ये चमचमाना बहुत ज़रूरी है.(सोर्स – विकिमीडिया)

साल 1965 में आया थूक का अलग एक्सपेरिमेंट करने वाला गेंदबाज़:

साल 1965 में पाकिस्तान क्रिकेट में एक गेंदबाज़ हुए सरफराज़ नवाज़. नवाज़ को क्रिकेट जगत में रिवर्स-स्विंग गेंदों का जनक कहा जाता है. अब तक गेंदबाज़ थूक इस्तेमाल सिर्फ स्विंग कराने के लिए और गेंद को नया रखने के लिए करते थे. लेकिन गेंद पुरानी होने के बाद भी गेंदबाज़ों की मदद कर सकती है. ये सरफराज़ ने दिखाया. सरफराज़ ने थूक से ऐसी पिचों पर भी गेंद को रिवर्स-स्विंग कराया. जहां पर उनकी ही टीम के दूसरे गेंदबाज़ सरेंडर कर देते थे.

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इंटरनेशनल क्रिकेट में रिवर्स-स्विंग गेंद के जनक. फोटो: Getty

दरअसल जब गेंद के सिर्फ एक हिस्से को बार-बार थूक या पसीने से चमकाया जाए. और दूसरे हिस्से को पुराना होने के लिए छोड़ दिया जाए. तो फिर गेंद रिवर्स-स्विंग होना शुरू हो जाती है.

सरफराज़ नवाज़ की इस टेक्नीक को बाद में इमरान खान, वसीम अकरम और वकार यूनुस ने भी सीखा. इसके बाद क्रिकेट जगत में रिवर्स-स्विंग के लिए थूक और पसीने का इस्तेमाल किया जाने लगा. मॉर्डन डे क्रिकेट में ज्यादातर गेंदबाज़ रिवर्स-स्विंग के लिए ही थूक और पसीने का इस्तेमाल करते हैं.

अकसर द्रविड़ और सहवाग से गेंद चमकवाते थे गांगुली:

2000 के बाद इंडियन टीम की फील्डिंग के दौरान आपने देखा होगा कि राहुल द्रविड़, वीरेंद्र सहवाग जैसे फील्डर्स अक्सर गेंद को चमकाने का काम करते थे. क्योंकि उस दौर की टीम इंडिया में राहुल द्रविड़ को सबसे ज्यादा पसीना आता था. जिस खिलाड़ी को ज़्यादा पसीना आता है वो गेंद को चमकाने में ज़्यादा कारगर होता है. विदेशी टीमों में भी ऐसा ही होता है.

क्रिकेट बॉल को चमकाने वाले विवाद:

अब ये तो बात हुई कि थूक क्यों लगाया जाता है. क्रिकेट के नियम कहते हैं कि अगर खिलाड़ी गेंद को चमकाने के लिए थूक या पसीने की जगह किसी अप्राकृतिक चीज़ का इस्तेमाल करते हैं. तो वो बॉल टेम्परिंग के दायरे में आ जाता है.

चलते-चलते एक नज़र डालते हैं साल 2000 के बाद के बॉल टेम्परिंग विवादों परः

Sachin Ball

इस क्लिप की वजह से सचिन तेंडुलकर पर बॉल टेम्परिंग के आरोप लगे थे.

सचिन तेंडुलकर 2001:

साल 2001 में भारत दक्षिण अफ्रीका दौरे पर था. सीरीज़ का दूसरा टेस्ट पोर्ट एलीज़ाबेथ के सेंट जॉर्ज पार्क में खेला जाना था. फील्डिंग के वक्त मैच रेफरी माइक डेनिस ने कुछ ऐसा देखा कि सचिन को बॉल-टेम्परिंग के आरोप में आनन-फानन में एक मैच के लिए सस्पेंड कर दिया. उनकी 75% मैच फीस काटने की बात भी कही. कैमरे पर ये साफ-साफ दिखा कि सचिन गेंद से कुछ हटा रहे हैं. हालांकि, सचिन ने कहा कि वो गेंद से मिट्टी और घास हटा रहे थे. बाद में सचिन पर लगा कोई भी आरोप साबित नहीं हुआ और उन्हें क्लीनचिट दे दी गई.

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इस क्लिप के बाद राहुल द्रविड़ पर बॉल टैम्परिंग के आरोप लगे थे.

राहुल द्रविड़ 2004:

साल 2004 में ऑस्ट्रेलिया में एक ट्राई सीरीज़ खेली जा रही थी. ज़िम्बॉब्वे के खिलाफ भारत ब्रिस्बेन में वनडे मैच खेल रहा था. टीम इंडिया ये मैच तो जीत गई. लेकिन फुटेज में दिखा कि राहुल द्रविड़ गेंद को साफ करते वक्त उस पर कुछ रगड़ रहे थे. आरोप लगे कि द्रविड़ गेंद पर जैली जैसा कोई पदार्थ रगड़ रहे थे. जिसके बाद द्रविड़ की 50% मैच फीस काट ली गई.

पाकिस्तान क्रिकेट टीम 2006:

2006 में पाकिस्तान और इंग्लैंड के बीच ओवल में टेस्ट मैच खेला जा रहा था. चौथे दिन चाय से एक घंटा पहले का खेल. इंग्लैंड की पारी का 56वां ओवर. अंपायर डेरल हेयर और बिली डॉक्ट्रॉव ने गेंद बदलने के लिए पूछा. लेकिन ये बल्लेबाज़ों से पूछा गया. जबकि नियम कहता है कि साधारण स्थिति में गेंद गेंदबाज़ से पूछकर बदली जाती है. उन्होंने इंग्लैंड को पांच पेनल्टी रन भी दिए. इससे साफ था कि उन्होंने पाकिस्तान को बॉल टेम्परिंग का दोषी माना था. विरोध में चाय ब्रेक के बाद पाकिस्तानी टीम मैदान पर नहीं उतरी. अंपायर पाकिस्तान टीम के ड्रेसिंग रूम में गए. कुछ देर बाद फिर लौटे और बेल्स हटा दिए. बाद में पाकिस्तानी टीम आई लेकिन अंपायर ने मैच इंग्लैंड को दे दिया गया.

2006 ball-tampering controversy

हालांकि बॉल टेम्परिंग का कोई सबूत नहीं मिलने की सूरत में पाकिस्तान पर से बॉल टेम्परिंग के चार्ज हटा लिए गए. लेकिन इंज़माम को चार वनडे मैचों के लिए सस्पेंड किया गया. जबकि अंपायर डेरल हेयर को इंटरनेशनल ड्यूटी से हटा दिया गया. इस घटना के दो साल बाद आईसीसी ने इस मैच का नतीजा बदलकर इसे ड्रॉ घोषित किया. लेकिन क्रिकेट के नियमों वाली संस्था एमसीसी ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया.

शाहिद अफरीदी 2010:

साल 2010 में पाकिस्तान टीम के कप्तान शाहिद अफरीदी पर बॉल टेम्परिंग के आरोप लगे. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मुकाबले में उन्हें कैमरे ने बॉल को चबाते हुए पकड़ा. अफरीदी अपने दांतों से बॉल की सीम को कुरेदने की कोशिश करते दिख रहे थे. जिसके बाद उनपर दो टी20 मैचों का बैन लगाया गया. हालांकि बाद में हिन्दुस्तान टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में शाहिद ने कहा था कि वो गेंद को चबा नहीं रहे थे, बल्कि सूंघ रहे थे.

कैमरून बैनक्रॉफ्ट 2018:
साल 2018 में साउथ अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के बीच केपटाउन टेस्ट खेला जा रहा था. इस मैच में गेंद से छेड़छाड़ के आरोप में ऑस्ट्रेलिया के स्टीव स्मिथ, डेविड वॉर्नर और कैमरून बैनक्रॉफ्ट को सस्पेंड किया गया. बैनक्रॉफ्ट को बॉल खुरचते हुए कैमरों ने कैद कर लिया था और टीवी पर उसकी फ़ुटेज साफ़ दिखाई दे रही थी. ड्रेसिंग रूम में बैठे कोच डैरन लीमेन ने तुरंत 12वें खिलाड़ी को मैदान में भेजा और बैनक्रॉफ्ट को आगाह करने को कहा. बैनक्रॉफ्ट को जैसे ही मालूम चला कि टीवी कैमरों ने उन्हें पकड़ लिया है, उन्होंने वो ‘सैंडपेपर’ अपनी अंडरवियर में छिपा लिया. ये एक्शन भी कैमरे में कैद हो गया. बाद में मालूम चला कि बैनक्रॉफ्ट को ये टेक्नीक डेविड वॉर्नर ने सिखाई थी. कप्तान स्टीव स्मिथ को इस पूरे प्लान के बारे में मालूम था. कोच डैरन को जांच में निर्दोष पाया गया.

australia ball tempering bancroft

क्रिकेट के मैदान पर गेंद से छेड़छाड़ करना अपराध है. लेकिन क्रिकेट के असली रूप को ज़िंदा रखने के लिए गेंद को चमकाना ज़रूरी है. गेंद चमकाने के लिए सालों से गेंदबाज़ अपने पसीने और थूक का इस्तेमाल कर रहे हैं. अब अगर क्रिकेट की संस्था आईसीसी इस नियम को बदलती है तो क्रिकेट पर तो इसका असर ज़रूर दिखेगा.


वेस्टइंडीज़ के महान बल्लेबाज़ विवियन रिचर्ड्स के साथ बैटिंग डेब्यू करने वाले बल्लेबाज की कहानी 

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