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पीएम मोदी को नोट छापने की सलाह क्यों दी जा रही है?

विस्तार से बात उस सुझाव पर कि सरकार खूब सारा पैसा क्यों नहीं छाप लेती. ये सुझाव इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खराब है. दो दिन पहले सरकार ने वित्त वर्ष 2020-21 की आखिरी तिमाही के आंकड़े जारी किए थे. जनवरी से मार्च के बीच अर्थव्यवस्था की विकास दर 1.6 फीसदी रही. पिछले पूरे साल की बात करें तो विकास दर माइनस में 7.3 फीसदी रही. देश की आर्थिक हालत पिछले 40 साल में सबसे खराब हालत में है. कोरोना और लॉकडाउन से बर्बाद हुई अर्थव्यवस्था पर सरकार कहती रही कि वी-शेप रिकवरी हो रही है. यानी अर्थव्यवस्था का ग्राफ नीचे जाकर तेज़ी से ऊपर आ रहा है. पिछले साल की 2 तिमाहियों में उम्मीद दिखी. लेकिन कोरोना को हरा देने के दावों के बीच जिस तरह महामारी ने मोदी सरकार को धप्पा किया, रिकवरी का ज़िक्र ही गायब हो गया. तमाम चेतावनियों के बावजूद सरकार के पास न अस्पताल थे, न ऑक्सीजन और न ही दवाएं. लोग फुटपाथ पर मरने लगे. आग लगने पर कुआं खोदते हुए सरकार को एक ही रास्ता नज़र आया – लॉकडाउन लगा दो.

पिछले पूरे साल की मुश्किलों के बाद बेहतरी की जो उम्मीद जगी थी, उस पर ताला पड़ गया. पहली लहर के वक्त लोगों का काम धंधा बंद हुआ तो उनके हाथ में चार पैसे थे भी. इस साल वो भी नहीं हैं. ये रॉकेट साइंस नहीं है कि बाज़ार बंद होने से गरीबी बढ़ती है. घर चलाना मुश्किल होता है. इसीलिए दुनिया कई देशों ने लॉकडाउन के दौरान लोगों को सीधी आर्थिक मदद दी. यही अपेक्षा भारत सरकार से भी थी, लेकिन सरकार के पास इतना पैसा है नहीं. पिछले साल आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन जैसे बड़े अर्थशास्त्रियों ने सरकार को सुझाव दिया था कि गरीब तबके के अकाउंट में सीधे पैसा भेजा जाना चाहिए. और इसके लिए सरकार को नए नोट छापने चाहिए. अब नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी ने प्रिंट मोर मनी वाली डिबेट फिर शुरू कर दी है. पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम और कोटक महिंद्रा बैंक के एमडी उदय कोटक जैसे कुछ बड़े भी पैसा छापने वाले सुझाव का समर्थन कर रहे हैं.

डिमांड और सप्लाई का संतुलन बिगड़ जाएगा?

तो पैसा छाप कर लोगों में बांटना चाहिए या नहीं, उस डिबेट पर आएंगे लेकिन पहले अर्थव्यवस्था के लिहाज से इसकी ज़रूरत समझते हैं. एक छोटा सा उदाहरण. मान लीजिए एक फैक्ट्री में नहाने के एक हज़ार साबुन महीने में बनते हैं. और इस काम में 10 लोगों को रोज़गार मिला है. फैक्ट्री से साबुन किसी शहर में बिकने के लिए जाते हैं. कोरोना से पहले पूरे साबुन बिक जाते थे. लेकिन कुछ लोगों की नौकरी चली गई तो उन्होंने साबुन का इस्तेमाल घटा दिया. यानी साबुन की खपत कम हो गई. साबुन की खपत कम हुई तो प्रोडक्शन भी घटाना पड़ेगा. प्रोडक्शन घटेगा तो फैक्ट्री में लोगों की ज़रूरत भी कम हो जाएगी. 10 में से कुछ लोगों को निकालना पड़ेगा या उनकी सैलरी घटाई जाएगी. ये अर्थव्यवस्था के लिए नुकसान है.

तो इसको ठीक के लिए क्या ज़रूरी है? ज़रूरी ये है कि फैक्ट्री में जितना सामान बन रहा है, उसको खरीदने वाले मिलें. पर दिक्कत तो ये है कि खरीदने वालों के पास पैसा नहीं है. इसी मुश्किल की काट के लिए कहा जाता है कि लोगों को पैसा दिया जाए. और पैसा कौन दे- सरकार. हर देश की अर्थव्यवस्था डिमांड और सप्लाई के नियम पर चलती है. अगर डिमांड और सप्लाई का संतुलन बिगड़ जाए तो अर्थव्यवस्था में या तो गिरावट आएगी या बेहताशा महंगाई बढ़ जाएगी. अभी देश की अर्थव्यवस्था में ज़रूरत है डिमांड बढ़ाने की. डिमांड बढ़ेगी लोगों के पैसा होने से. तो घूम-फिरकर बात सरकार पर आ जाती है.

क्या सरकार को पैसा छापकर लोगों को देना चाहिए?

खूब सारा पैसा छापकर लोगों में बांटने वाली इकनॉमिक्स इतनी सीधी नहीं है. क्योंकि बात यहां CONTROL P से कहीं आगे तक जाती है. एक उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिए एक देश में सिर्फ 5 ही लोग रहते हैं. और हर आदमी की सालाना आमदनी 10 रुपये है. यानी 5 लोगों के पास कुल 50 रुपये. इस देश में साल के सिर्फ 5 किलो चावल ही होते हैं जो 10 किलो के भाव से मिलते हैं. अब मान लीजिए इस देश में ज़्यादा पैसे छापे जाते हैं. तो लोगों की आमदनी 10 रुपये के बजाय 20 रुपये हो जाती है. अब लोगों के पास ज़्यादा पैसा आ गया तो वो ज्यादा चावल खरीदना चाहते हैं. लेकिन चावल तो पहले जितना ही है. बस उसकी डिमांड बढ़ गई. इसलिए उसकी कीमत भी बढ़ जाएगी. यानी महंगाई बढ़ जाएगी. ज्यादा पैसा छापने का सबसे बड़ा खतरा इंफ्लेशन बढ़ना ही है.

कई देशों के उदाहरण हैं जहां ज़्यादा पैसे छाप लिए तो महंगाई हज़ारों गुना बढ़ गई. हालिया उदाहरण जिम्बाब्वे और वेनेजुएला के हैं. वहां अर्थव्यवस्था को खराब हालत से निकालने के लिए सरकारों ने मद्रा छपवाई. पैसा बढ़ा तो मांग भी बढ़ी. चीज़ों की कीमत बढ़ने लगी. जिम्बाब्वे में 2008 में महंगाई की वृद्धि दर करोड़ों में पहुंच गई थी. हालात ये हो गए कि छोटी सी चीज़ खरीदने के लिए भी बोरा भरकर पैसा लाना पड़ता था. जिम्बाब्वे में 1 अंडे की कीमत वहां की मुद्रा में 30 अरब से ज़्यादा हो गई थी. ऐसा ही हाल हमने कुछ बरस पहले वेनेजुएला में देखा. इस स्तर तक महंगाई बढ़ने को अर्थशास्त्र की शब्दावली में हाइपरइंफ्लेशन कहा जाता है. और किसी देश की अर्थव्यवस्था अगर एक बार हाइपरइंफ्लेशन में पहुंच जाए तो फिर वहां से निकलना मुश्किल होता है.

सार ये है कि किसी देश की सरकार अपनी मर्ज़ी से खूब सारा पैसा नहीं छाप सकती. हालांकि ऐसा भी नहीं है कि कोई देश मुद्रा छापकर अमीर नहीं हो सकता. मुद्रा छापना कई बार देश की अर्थव्यवस्था के लिए ज़रूरी और फायदेमंद रहता है. मिसाल के तौर पर मान लीजिए देश में 100 कारें बन रही हैं. लेकिन लोगों के पास खरीदने का पैसा नहीं है. बैंक से भी लोन नहीं मिल. अगर लोग कार नहीं खरीदेंगे तो कार बनाने का उद्योग ठप हो जाएगा. रोज़गार कम होगा. ऐसी स्थिति में सरकार पैसा छापकर बाजार में पैसा पहुंचाती है, ताकि कार की फैक्ट्री चलती रहे. लोगों को रोज़गार मिलता रहे. पैसा छापने का ये सिंपल सा अर्थशास्त्र है.

अब आते हैं भारत के अर्थशास्त्र पर

भारत में आरबीआई पैसा छापता है. आपने देखा होगा कि हर नोट पर लिखा होता है कि मैं धारक को इतने रुपये देने का वचन देता हूं. ये वचन आरबीआई के गवर्नर की तरफ से दिया जाता है. तो इसके बदले आरबीआई कुछ एसेट रखता है- जैसे सोना या विदेश मुद्रा या सरकारी बॉन्ड. अमूमन सरकार अपने फाइनेंशियल सिस्टम के हिसाब से आरबीआई से पैसा लेती है. लेकिन ज्यादा पैसा छपवाना हो तो उसे अर्थशास्त्र की भाषा में कहते हैं डायरेक्ट मोनेटाइजेशन. इसमें सरकार बॉन्ड गारंटी देकर आरबीआई से मुद्रा छपवा सकती है. अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी और रघुराम राजन इसी तरह की सलाह सरकार को दे रहे हैं.

अभिजीत बनर्जी का बीते रविवार को टाइम्स ऑफ इंडिया में इंटरव्यू छपा था. इसमें उनसे सवाल पूछा गया था कि क्या सरकार को ज्यादा मुद्रा छापना चाहिए. उनका जवाब था कि हां मैं इसके पक्ष में हूं. कोरोना की पहली लहर में भी मैं इसके पक्ष में था. मुझे लगता है कि हमें बिल्कुल ये करना चाहिए. गरीबों को सहारा देने के लिए और लोन डिफॉल्ट से निपटने के लिए संसाधन चाहिए. हमें पर्याप्त वैक्सीन खरीदने के लिए भी संसाधन चाहिए.

ये सुझाव पहले भी कई अर्थशास्त्री दे चुके हैं. तो अगर पैसा छापने से ही हमारी अर्थव्यवस्था की सारी दिक्कतें दूर हो सकती हैं, तो सरकार इस पर विचार क्यों नहीं कर रही.

पैसा ज्यादा छापने के साथ महंगाई बढ़ने का डर?

और जैसा हम पहले भी बात कर चुके हैं कि पैसा ज्यादा छापने के साथ महंगाई बढ़ने का डर होता है. ये सवाल अभिजीत बनर्जी से भी पूछा गया. इस पर उन्होंने कहा कि अभी हम ठीक से समझ नहीं रहे हैं कि महंगाई का इतना प्रेशर क्यों है. महंगाई आश्चर्यजनक रूप से ज्यादा है. ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि लॉकडाउन में सप्लाई की कमी है. शायद हमें इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि अर्थव्यवस्था में मॉबिलिटी हो, पैसा पर्याप्त हो.

यानी कुल मिलाकर अभिजीत बनर्जी कह रहे हैं कि सप्लाई की कमी से महंगाई है और इसकी वजह लॉकडाउन. लॉकडाउन हटने पर सप्लाई तो बढ़ सकती है लेकिन डिमांड कैसे बढ़ेगी.

तो नोट छापने वाले अर्थशास्त्र का हर पहलू हमने आपके सामने रखा. सरकार के पास भी बेहतरीन अर्थशास्त्रियों की टीम है. और सरकार को ये भी दिख रहा होगा कि देश की आर्थिक हालत खराब है. लोगों को पैसे की ज़रूरत है, आर्थिक मदद की ज़रूरत है. अब ये सरकार को तय करना है कि वो कैसे लोगों तक पहुंचती है.


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