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"निर्भय" भारत की मिसाइल ताकत की एक बड़ी दिक्कत को दूर कर देगी

”भारत ने परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम निर्भय मिसाइल का सफल परीक्षण किया. मिसाइल को चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज से दागा गया था.”

आप इंटरनेट पर ”निर्भय” और ”मिसाइल” डालकर सर्च करेंगे तो ऊपर लिखे दो वाक्य आपको साल दर साल छपी कई खबरों में मिलेंगे. ऐसी ही एक खबर की तारीख होगी 24 जून 2021. ये निर्भय मिसाइल क्या है? और भारत बार-बार इसका परीक्षण क्यों करता है? आइए इसे समझें.

“निर्भय” की खास बातें

> > दो चरण- पहले लॉन्च के लिए सॉलिड रॉकेट बूस्टर. 90 डिग्री पर शुरुआती उड़ान के बाद ज़मीन/समुद्र के समानांतर उड़ान. दूसरे चरण के लिए टर्बोफैन इंजन.
>> लंबाई- 6 मीटर.
>> वज़न- 1.5 टन.
>> हथियार क्षमता- 300 किलो तक का परमाणु/पारंपरिक वॉरहेड साथ ले जा सकती है.

निर्भय मिसाइल भारत की पहली स्वदेशी ”लॉन्ग रेंज सब-सॉनिक क्रूज़ मिसाइल” है. तोड़कर पढ़ेंगे तो मिसाइल का परिचय पूरा हो जाएगा-

लॉन्ग रेंज- लंबी दूरी तक मार करने वाली.
सब-सॉनिक- आवाज़ से कम रफ्तार पर चलने वाली.
क्रूज़ मिसाइल- क्रूज़ बाइक की तरह ही ये भी एक रफ्तार बनाकर चलती है. मिसाइल ज़मीन के बहुत करीब उड़ान भरने में सक्षम है और उड़ान के बीच अपनी दिशा बदल सकती है.

अब हम थोड़ा वक्त मिसाइल के प्रकार को समझने में लगाएं तो हम निर्भय की क्षमता और ज़रूरत को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे.

मिसाइल कई तरह की होती हैं. लेकिन दो सबसे चर्चित प्रकार हैं- बलिस्टिक और क्रूज़. साधारण समझ ये कहती है कि मिसाइल दगने पर आकाश को चीरती हुई जाती है और फिर वहां से सीधे दुश्मन के ठिकाने पर गिरती है. बलिस्टिक मिसाइल इसी तरह काम करती हैं. क्रूज़ मिसाइल इस ऊंच-नीच में विश्वास नहीं रखती. वो आसमान में जाने के बाद किसी हवाई जहाज़ की तरह चलती है- धरती के समानांतर. क्रूज़ मिसाइल उड़ान के दौरान दिखती भी कुछ-कुछ हवाई जहाज़ की तरह हैं. बीच में दो पंख – जिन्हें हम ‘विंग’ कहेंगे और एक पूंछ होगी जहां छोटे-छोटे पंख होंगे. इन्हें हम ‘फिन’ कह सकते हैं. ज़रा ये वीडियो देखिए –

क्यों घातक है क्रूज मिसाइल?

बलिस्टिक मिसाइल की ऊंची उड़ान के चलते रडार उसे अपेक्षाकृत आसानी से पकड़ लेते हैं. लेकिन आधुनिक क्रूज़ मिसाइल ज़रूरत पड़ने पर ज़मीन के बेहद करीब भी उड़ सकती हैं- 50 मीटर या उससे भी नीचे. इस कारण दुश्मन के रडार के लिए उसे पकड़ना बहुत मुश्किल होता है. क्रूज़ मिसाइल ज़मीन (या समंदर) के सहारे आसमान में छुपकर चलती है और अचानक वार करती है.

बलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों में एक और फर्क है. बलिस्टिक मिसाइल का फंडा साफ है. उसे आसमान में पहुंचने के लिए एक तगड़े लॉन्च की जरूरत होती है. ऊपर पहुंचकर वो दुश्मन पर गिरती चली आएगी. बिल्कुल किसी बल्लेबाज के शॉट की तरह, जो एक ही बार में बॉल को सारी ऊर्जा दे देता है. उस एनर्जी से पैदा हुए मोमेंटम या आवेग के सहारे गेंद अपनी यात्रा पूरी करती है.

लेकिन क्रूज़ मिसाइल ने कबीर को पढ़ा है – ‘धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय’. उसे सारी ऊर्जा एक बार में नहीं चाहिए. उसका इंजन लगभग पूरी उड़ान के दौरान उसे गति देता रहता है – किसी हवाई जहाज़ की ही तरह. फिर क्रूज़ मिसाइल जड़मति नहीं होती. सुधार की गुंजाइश रखती है, ज़रूरत पड़ने पर रास्ता बदल लेती है. यही बात उसे घातक बनाती है.

क्रूज़ मिसाइलों के अलग-अलग प्रकार हो सकते हैं, जिन्हें लगभग हर तरह से दागा जा सकता है –

>> सतह से सतह पर – माने ज़मीन से ज़मीन, ज़मीन से समुद्र (में तैनात जहाज़ पर), समुद्र से ज़मीन और समुद्र से समुद्र में किसी निशाने पर,

>> हवा से सतह पर – लड़ाकू विमान से ज़मीन या समुद्र में किसी निशाने पर,

>> सतह के भीतर से सतह पर – किसी पनडुब्बी से ज़मीन या समुद्र में किसी निशाने पर

Agm 86 क्रूज़ मिसाइल. हवा से सतह पर मार करने वाली इस क्रूज़ मिसाइल को अमेरिका की वायुसेना इस्तेमाल करती है (फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स)
Agm 86 क्रूज़ मिसाइल. हवा से सतह पर मार करने वाली इस क्रूज़ मिसाइल को अमेरिका की वायुसेना इस्तेमाल करती है. इसे B-52 H स्ट्रैटोफोर्ट्रेस बमवर्षक विमान से दागा जाता है (फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स).

देश की मिसाइल ताकत की बड़ी दिक्कत को दूर करेगी

अब आप समझ गए होंगे कि क्रूज़ मिसाइल कितनी जटिल तकनीक पर काम करती हैं. और क्यों “निर्भय” का सफल परीक्षण हमारे मिसाइल प्रोग्राम के लिए इतनी बड़ी बात है. ये भी ध्यान देने वाली बात है कि इस मिसाइल के आने से देश की मिसाइल ताकत की एक बड़ी दिक्कत दूर हो सकती है.

ऐसा नहीं है कि निर्भय भारत की इकलौती क्रूज़ मिसाइल है. भारत ने रूस के साथ मिलकर एक धांसू क्रूज़ मिसाइल बनाकर 2006 में ही सेना को दे दी थी – ब्रोह्मोस. ये आज भी दुनिया की सबसे तेज़ क्रूज़ मिसाइल मानी जाती है. लेकिन इसकी रेंज सीमित है. वजह है मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजीम (MTCR). ये देशों के बीच बनी एक अनौपचारिक राजनैतिक सहमति का नाम है, जो कहती है कि कोई देश एक सीमा के तहत ही मिसाइलें और मिसाइल तकनीक दूसरे को देगा.

MTCR के चलते 300 किलोमीटर या उससे ज़्यादा रेंज वाली मिसाइल की तकनीक के लेन-देन पर रोक लगी हुई है. इसीलिए रूस के साथ मिलकर बनाई गई ब्रोह्मोस की आधिकारिक रेंज 295 किलोमीटर है. इसे बढ़ाने पर काम चल रहा है, लेकिन जब तक MTCR है, तब तक भारत के पास और लंबी दूरी की क्रूज़ मिसाइल बनाने के लिए एक ही मंत्र था- अप्प दीपो भव.

तो भारत ने 2005-06 के आसपास ही “निर्भय” कार्यक्रम शुरू कर दिया. शुरुआत में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO ने इस कार्यक्रम के बारे में कोई जानकारी बाहर आने नहीं दी. हम बस ये जानते थे कि DRDO की एडवांस सिस्टम लैबोरेट्री (ASL) और अनुसंधान केंद्र इमारत (RCI) जैसी प्रयोगशालाओं को भारत की ”टॉमाहॉक क्रूज़ मिसाइल” बनाने का काम दिया गया है.

DRDO ने ”निर्भय” की शुरुआत ”लक्ष्य” से की. हमने बताया था कि क्रूज़ मिसाइल कुछ-कुछ हवाई जहाज़ की तरह होती है. तो ”लक्ष्य” भी एक प्रकार का हवाई जहाज़ ही है. लेकिन बिना पायलट वाला- माने ड्रोन. इसे DRDO के एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (ADE) ने टार्गेट प्रैक्टिस के लिए बनाया था. लेकिन जो तकनीक दुनिया में कोई भारत को देने नहीं वाला था, वो एक ड्रोन बनाने से कहीं ज़्यादा जटिल थी. इसीलिए निर्भय को कई परीक्षणों से गुज़रना पड़ा. ताकि ज़रूरी तकनीक और प्रणालियों को मिसाइल में शामिल किया जा सके.

7 नवंबर 2017 को हुए निर्भय के परीक्षण का वीडियो –

साबित की मिसाइल क्षमता

12 मार्च 2013 को निर्भय मिसाइल का पहला परीक्षण हुआ. ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्टिंग रेंज से इसे दागा गया. लॉन्च सफल रहा. लेकिन 20 मिनट और तकरीबन 250 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद मिसाइल रास्ता भटकने लगी और तट की तरफ आने लगी. तटीय इलाकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए DRDO के वैज्ञानिकों ने मिसाइल का इंजन बंद कर दिया और इसे ज़मीन पर गिरकर नष्ट हो जाने दिया.

एक साल बाद 17 अक्टूबर 2014 को मिसाइल को दूसरी बार लॉन्च किया गया. इस बार परीक्षण सफल रहा. लेकिन तीसरा और चौथा परीक्षण फिर असफल रहा. DRDO के वैज्ञानिक इन असफलताओं से सीखते रहे. उनके प्रयासों से मिसाइल का पांचवा परीक्षण सफल रहा और छठा परीक्षण सूपरहिट. 15 अप्रैल 2019 को हुए इस परीक्षण के वीडियो भी सार्वजनिक किए गए. पूरी दुनिया ने निर्भय को सी-स्किमिंग करते हुए देखा. वायुसेना के लड़ाकू विमान के कॉकपिट से बने वीडियो में मिसाइल बंगाल की खाड़ी से बमुश्किल कुछ मीटर की ऊंचाई पर उड़ती नज़र आ रही थी. भारत दुनिया को बता रहा था कि वो अपने बूते आधुनिक लॉन्ग रेंज क्रूज़ मिसाइल बना सकता है, जो रडार को मात देने के लिए ज़मीन के बिल्कुल करीब उड़ सकती है- भारत की टॉमाहॉक.

अमेरिकी नौसेना की न्यूक्लियर अटैक सबमरीन यूएसएस सैंटा फे. पनडुब्बी के अगले हिस्से पर टॉमाहॉक मिसाइलों के लिए लॉन्चर नज़र आ रहे हैं (विकीमीडिया कॉमन्स)..
अमेरिकी नौसेना की न्यूक्लियर अटैक सबमरीन यूएसएस सैंटा फे. पनडुब्बी के अगले हिस्से पर टॉमाहॉक मिसाइलों के लिए लॉन्चर नज़र आ रहे हैं (विकीमीडिया कॉमन्स).

छठे परीक्षण के साथ निर्भय के डेवलेपमेंट फेज़ ट्रायल पूरे हो गए. DRDO ने अपने लक्ष्यों को पा लिया था. माने मिसाइल के लिए ज़रूरी तकनीक हासिल हो गई थी. इसके बाद DRDO ने फौज की ज़रूरतों के मुताबिक मिसाइल को ढालना शुरू कर दिया. मिसाइल को एक नया नाम भी मिला- इंडीजीनियस टेक्नोलॉजी क्रूज़ मिसाइल (ITCM).

इसी आत्मविश्वास का नतीजा था कि 2020 में जब चीन ने लद्दाख में घुसपैठ की तो भारत ने कुछ निर्भय मिसाइलों को लद्दाख में भी तैनात कर दिया. इस सबके बीच DRDO अपने काम में लगा रहा. अक्टूबर 2020 में मिसाइल में एक नया देसी इंजन लगाकर इसका परीक्षण किया गया. इसे DRDO के गैस टर्बाइन रीसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) ने बनाया था. इस इंजन के साथ मिसाइल के पहले परीक्षण को आठ मिनट बाद रोक देना पड़ा था. लेकिन बीती 24 जून का परीक्षण सफल रहा. अब कहा जा रहा है कि DRDO इस स्थिति में है कि कुछ और परीक्षणों के बाद मिसाइल को पूरी तरह सेना के हवाले कर सकता है.


* टॉमाहॉक मिसाइल – अमेरिकी सब-सॉनिक क्रूज़ मिसाइल. क्रूज़ मिसाइलों का सबसे सफल और चर्चित उदाहरण. मध्यपूर्व में इराक और सीरिया के ठिकानों पर अमेरिकी नौसेना के पोतों से मिसाइलें दागने के वीडियो आपने देखे होंगे. इनमें से ज़्यादातर टॉमाहॉक मिसाइलें ही थीं.

** भारत के पड़ोसियों के पास भी क्रूज़ मिसाइलें हैं. चीन के पास CJ-10 तथा अन्य लॉन्ग रेंज क्रूज़ मिसाइलें हैं और पाकिस्तान के पास बाबर (हत्फ-7) मीडियम रेंज क्रूज़ मिसाइल है.


 वीडियो: अमेरिका की धमकी के बावजूद भारत रूस से S-400 मिसाइल क्यों खरीद रहा है?

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