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ओमिक्रॉन के ख़तरे के बीच नाइजीरिया लाखों वैक्सीन नष्ट क्यों कर रहा है?

एक तरफ़ दुनियाभर में कोरोना का ओमिक्रॉन वेरिएंट तहलका मचा रहा है. डॉक्टर्स और वैज्ञानिक लोगों को वैक्सीन लगवाने की सलाह दे रहे हैं. कई देशों ने बूस्टर डोज़ लगाना भी शुरू कर दिया है. इस हलचल के बीच नाइजीरिया लाखों वैक्सीन नष्ट क्यों कर रहा है? आज जानेंगे, इसकी वजह क्या है और इस समस्या का दायरा कहां तक फैला है? साथ में दुनिया के सबसे भीषण हवाई हादसों की कहानी भी जानेगें.

नाइजीरिया अफ़्रीकी महाद्वीप का सबसे बड़ा देश है. जनसंख्या के नज़रिए से. जिस दौर में यूरोप और अमेरिका बूस्टर डोज़ लगा रहे हैं, उस वक़्त में नाइजीरिया सिर्फ़ चार फीसदी आबादी को कोरोना का टीका लगा पाया है. दो फीसदी से भी कम को दोनों डोज लगी है. ये आंकड़े हैरान करते हैं. लेकिन इनका दायरा सिर्फ़ नाइजीरिया तक सीमित नहीं है. दुनियाभर के अल्प-विकसित देशों में यही हो रहा है. ये आंकड़े वैक्सीन समानता की बात करने वाले देशों और संस्थाओं के मुंह पर तमाचे की तरह हैं.

ग़रीब देशों का संघर्ष वैक्सीन हासिल करने तक सीमित नहीं है. इसके बाद भी उन्हें कई मोर्चों पर जूझना पड़ता है. जिसके चलते कई वैक्सीन की बर्बादी होती है.

07 दिसंबर को न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने एक रिपोर्ट पब्लिश की. रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2021 में नाइजीरिया में कोरोना वैक्सीन के दस लाख से अधिक डोज़ बर्बाद हुए. इनकी वैधता ख़त्म हो चुकी थी. उनका इस्तेमाल नहीं किया जा सका. सरकार ने ख़राब वैक्सीन्स को ठिकाने लगाने के आदेश दे दिए हैं.

नाइजीरिया का आंकड़ा बड़ा है. लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. जून 2021 में मलावी और साउथ सूडान ने लगभग 70 हज़ार डोज नष्ट किए थे. नवंबर में साउथ सूडान और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो ने भारी संख्या में वैक्सीन वापस लौटा दी थी. जबकि नामीबिया ने कहा था कि उसे भी वैक्सीन फेंकनी पड़ सकती है.

इसके पीछे की वजह क्या है?

ये जानने के लिए हमें समझना होगा कि, नाइजीरिया में क्या हुआ?

हमने दुनियादारी में कई बार ज़िक्र किया है कि अफ़्रीकी देशों के पास वैक्सीन की भारी कमी है. अधिकतर देशों की उम्मीद कोवैक्स और बाहरी डोनेशन पर टिकी है. विकसित देशों के पास आबादी से कई गुणा अधिक वैक्सीन का स्टॉक है. ये देश समय-समय पर अहसान थोपने की कोशिश करते हैं. वैक्सीन डोनेट करने का दिखावा करके.

हमने ‘दिखावा’ शब्द का इस्तेमाल किया. इसकी एक वाजिब वजह है. नाइजीरिया की जो वैक्सीन बर्बाद हुई है, वो यूरोप से आई थी. इसे एस्ट्राज़ेनेका ने बनाया था. एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन की शेल्फ़-लाइफ़ नौ महीने की होती है. अगर इसे -2 से -8 डिग्री सेल्सियस पर स्टोर किया जाए.

शेल्फ़-लाइफ़ खत्म होने के बाद वैक्सीन फायदेमंद नहीं रहती. उसे एक्सपायर्ड मान लिया जाता है. फिर उसे सुरक्षित तरीके से डिस्कार्ड करना होता है. नाइजीरिया को जब वैक्सीन मिली, तब उनके पास चार से छह हफ़्ते का समय बचा हुआ था. नाइजीरिया ने डेडलाइन के भीतर इनको यूज करने की कोशिश की, लेकिन वे सफ़ल नहीं हो पाए. ये संभव भी नहीं है.

विकसित देशों के पास इतनी अधिक वैक्सीन है कि वे इसका इस्तेमाल तक नहीं कर पा रहे हैं. धीरे-धीरे ये बेकार हो रहीं है. वैक्सीन के जिस लॉट की डेडलाइन नजदीक आती है, उसे दान कर दिया जाता है. विकसित देशों पर लंबे समय से दबाव है कि वे एक्स्ट्रा डोज़ेज को ग़रीब देशों को भेजें. वैक्सीन पर कुंडली जमाकर ना बैठें.

ये देश ख़राब हो रही वैक्सीन के स्टॉक को दान करके अपना क़ोटा पूरा करते हैं. ताकि कोई उनकी कथित महानता पर सवाल ना उठा सके.

एक मशहूर लोकोक्ति है – दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते.

दान लेने वाले देशों के पास ना-नुकूर का विकल्प नहीं होता. उन्हें गेम का नियम पता होता है. फिर भी वे धोखे का शिकार होते हैं. इसका पूरा दारोमदार विकसित देशों पर होना चाहिए. ज़िम्मेदार संस्थाओं को आगे आकर इन देशों का खोखलापन भी बाहर लाना चाहिए.

ये तो हुआ पहला कारण. कोरोना वैक्सीन की बर्बादी का दूसरा बड़ा कारण है – आधारभूत संरचना की कमी.

अल्प-विकसित या विकासशील देशों के पास संसाधनों की कमी है. नाइजीरिया के पास कॉटन स्वैब तक की कमी है.

इन देशों में प्रशिक्षित लोगों की भी कमी है. जो डॉक्टर्स और नर्सेज़ हैं, वे पहले से भारी दबाव का सामना कर रहे हैं.

कई इलाकों में बिजली की सप्लाई तक नहीं पहुंची है. ऐसे इलाकों में कोरोना वैक्सीन को स्टोर नहीं किया जा सकता.

अफ़्रीका के कई देश सिविल वॉर का सामना कर रहे हैं. कई देशों में इस्लामिक आतंकवाद की समस्या भी कायम है. उन इलाकों में मेडिकल टीम का जाना नामुमकिन है.

आधारभूत संरचना की कमी से हुए नुकसान का एक बड़ा उदाहरण साउथ अफ़्रीका है. साउथ अफ़्रीका के बायोवैक इंस्टिट्यूट ने जुलाई 2021 में फ़ाइज़र-बायोटेक के साथ डील की थी. डील के तहत, फ़ाइज़र के फ़ार्म्यूले पर बायोवैक को वैक्सीन बनानी थी. मामला सेट था.

फिर इसमें पेच फंस गया. साउथ अफ़्रीका पानी की कमी से जूझ रहा है. केप टाउन सबसे प्रभावित शहरों में से एक है. इसके चलते वैक्सीन का प्रोडक्शन शुरू नहीं हो पाया. अब रिपोर्ट आई है कि बायोवैक जनवरी 2022 से प्रोडक्शन शुरू कर सकता है.

इन सबके अलावा, वैक्सीन को लेकर चल रही अफ़वाहों ने भी अपना अधिकार कायम रखा है. लोग अभी भी कोरोना वैक्सीन लगाने से हिचक रहे हैं. यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में तो वैक्सीन मेनडेट के ख़िलाफ़ दंगे भी हो रहे हैं.

24 नवंबर को साउथ अफ़्रीका में कोरोना का नया वेरिएंट सामने आया. WHO ने इसे चिंतित करने वाले कोरोना वेरिएंट्स की लिस्ट में रखा है. वैज्ञानिक अभी इसके ख़तरे को मापने में जुटे हैं. ओमिक्रॉन को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है. हालांकि, ये दावा ज़रूर किया जा रहा है कि उपलब्ध वैक्सीन से राहत की उम्मीद है. फ़ाइज़र ने कहा है कि वैक्सीन की तीन डोज़ ओमिक्रॉन वेरिएंट से लड़ने में कारगर है. विकसित देश बूस्टर डोज़ लगाना शुरू भी कर चुके हैं.

वहीं, नाइजीरिया जैसे देश अभी भी पहली सीढ़ी पार करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उसमें भी उन्हें खींचकर नीचे उतार दिया जाता है. कोरोना महामारी ने इस दुनिया की तमाम विडंबनाओं को सामने लाकर रख दिया है.

नाइजीरिया के चैप्टर को यहीं पर विराम देते हैं. हम अब भारत लौटते हैं.

08 दिसंबर को तमिलनाडु के कुन्नूर में भारतीय वायु सेना का एक हेलिकॉप्टर क्रैश हो गया. इस दुर्घटना में भारत के चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ (CDS) जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी मधुलिका रावत समेत 13 लोगों की मौत हो गई. एक घायल का इलाज चल रहा है. जनरल रावत वेलिंगटन स्थित सेना के स्टाफ़ कॉलेज में लेक्चर देने जा रहे थे.

इस हेलिकॉप्टर हादसे के चलते भारत को बड़ा झटका लगा है. दुनिया के कई बड़े नेताओं और सैन्य अफ़सरों ने इस हादसे को लेकर शोक व्यक्त किया.

आज हम बताएंगे, दुनिया की कुछ सबसे ख़तरनाक हवाई हादसों के बारे में. वैसी दुर्घटनाएं, जिनमें किसी मुल्क़ के दिग्गज नेता या सैन्य अफ़सर की जान चली गई.

पहला वाकया पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान का है.

साल 1988. तारीख़ 17 अगस्त. पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ियाउल हक तामेवाली फ़ायरिंग रेंज के दौरे पर गए जनरल ज़िया उस समय पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ की भूमिका भी निभा रहे थे. उनके साथ अमेरिकी राजदूत अर्नोल्ड राफ़ेल भी थे. इन दोनों के अलावा, पाकिस्तान के टॉप रैंक के मिलिटरी अफ़सर भी उसी विमान में सवार थे.

निरीक्षण के बाद ज़िया के प्लेन ने इस्लामाबाद के लिए उड़ान भरी. लेकिन 10 मिनट बाद ही प्लेन नीचे गिर गया. प्लेन में सवार कोई भी शख़्स ज़िंदा नहीं बच सका. जनरल ज़िया की लाश पहचान में भी नहीं आ रही थी.

ये दुर्घटना पाकिस्तान के इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य बन गई. अमेरिकी अधिकारियों ने जांच के बाद कहा कि ये महज एक दुर्घटना थी. इसके पीछे कोई साज़िश नहीं थी. लेकिन समय-समय पर नए खुलासे होते रहते हैं. जो दावा करते हैं कि ज़िया को साज़िश के तहत मारा गया. हालांकि, इन दावों की कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई.

दूसरी घटना रवांडा की है.

06 अप्रैल, 1994 को राजधानी किगाली के बाहर सेना का एक जहाज हवा में फट गया. इसपर रॉकेट से हमला किया गया था. विमान के अंदर दो देशों के सर्वोच्च नेता सफ़र कर रहे थे. एक थे, रवांडा के राष्ट्रपति जुवेनाल हाबियारिमाना. दूसरी सीट पर बैठे थे, बुरुण्डी के राष्ट्रपति साइप्रियन नटेरियामरा. इस हमले में दोनों राष्ट्रपति मारे गए.

उस दौर के रवांडा में हुटू और टुत्सी जातियों के बीच तनाव चरम पर था. रवांडा की हुटू बहुसंख्यक सरकार को डर था कि कहीं टुत्सी सत्ता न हथिया लें. हमले के बाद अफ़वाह फैलाई गई कि राष्ट्रपति को टुत्सी विरोधियों ने मारा है. इसके बाद रवांडा में टुत्सियों का नरसंहार शुरू हुआ. अगले सौ दिनों के भीतर रवांडा में दस लाख से अधिक लोगों की हत्या हुई.

जहां तक प्लेन दुर्घटना की बात है. आज तक ये पता नहीं चल सका है कि वो रॉकेट किसने दागा था.

तीसरी घटना दूसरे विश्व युद्ध के दौरान की है.

एडमिरल इसोरोकू यामामोटू जापान की इम्पीरियल नेवी के कमांडर-इन-चीफ़ थे. दिसंबर 1941 में पर्ल हार्बर पर हमला उन्हीं के दिमाग की उपज थी. दिलचस्प बात ये है कि यामामोटू ने एक समय अमेरिका पर हमले का विरोध किया था. पर्ल हार्बर हमले के बाद ही अमेरिका विश्वयुद्ध में शामिल हुआ.

18 अप्रैल 1943 को यामामोटू एक लड़ाकू विमान में सवार हुए. उन्हें सोलोमन आईलैंड्स में जापानी सैन्य अभियान का निरीक्षण करना था. इसी दौरान अमेरिकी फ़ाइटर जेट्स ने उनके प्लेन पर हमला किया. हमले में यामामोटू मारे गए. नौसेना के सबसे बड़े अफ़सर की हत्या ने जापान का मनोबल तोड़ दिया. यहां से उसके पतन की शुरुआत हो चुकी थी. अंतत:, 1945 में जापान को आत्मसमर्पण करना पड़ा.

चौथी घटना फ़िलिपींस की है. मैग्सेसे पुरस्कार को एशिया का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार माना जाता है. इसकी शुरुआत अप्रैल 1957 में हुई थी. फ़िलिपींस के पूर्व राष्ट्रपति रेमन एफ़ मैग्सेसे के नाम पर.

17 मार्च 1957 की बात है. रेमन मैग्सेसे सिबु से मनीला वापस लौट रहे थे. इसी दौरान प्रेसिडेंशियल प्लेन एक पेड़ से टकरा गया. इस दुर्घटना में मैग्सेसे समेत 25 लोगों की मौत हुई. सिर्फ़ एक व्यक्ति ज़िंदा बच सका. वो थे, हेराल्ड अख़बार के रिपोर्टर नेस्टर मेटा. क्रैश के वक़्त वो सो रहे थे. जैसे ही प्लेन ज़मीन से टकराया, उनका शरीर दूर छिटक गया. आश्चर्यजनक रूप से वो ज़िंदा बच गए.

दुर्घटना के वक़्त मलेशिया के उप-राष्ट्रपति कार्लोस गार्सिया ऑस्ट्रेलिया दौरे पर थे. मैग्सेसे की जगह पर उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया था.

पांचवीं घटना पोलैंड की है.

तारीख़ थी, 10 अप्रैल 2010. वेस्टर्न रशिया का स्मोलेन्स्क. पोलिश एयरफ़ोर्स की फ़्लाइट संख्या 101 एयरपोर्ट पर उतरने की तैयारी में थी. रनवे पर घना कोहरा था. इसी गफ़लत में प्लेन उतारने में गड़बड़ हो गई. और, प्लेन दुर्घटनाग्रस्त हो गया.

इस प्लेन में पोलैंड के राष्ट्रपति, उनकी पत्नी, तीनों सेनाओं के कमांडर, नेशनल बैंक के मुखिया के अलावा 18 सांसद भी सवार थे. उनमें से कोई भी ज़िंदा नहीं बचा. इस दुर्घटना में कुल 96 लोगों की मौत हुई. एक तरह से पोलैंड की सत्ता का शीर्ष साफ़ हो चुका था.

जांच के बाद दावा किया गया कि दुर्घटना का कारण खराब मौसम था. पायलट उसका आकलन नहीं कर पाए थे. हालांकि, पोलैंड में कई लोग इस स्पष्टीकरण पर भरोसा नहीं करते.


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