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देश के डॉक्टर्स का ये सच जानते हैं आप?

1 जुलाई को देश में नेशनल डॉक्टर्स डे मनाया गया. जैसा कि किसी भी डे के साथ होता है, इस दिन डॉक्टर्स के लिए अच्छी अच्छी चीज़ें लिखी जाती हैं, कोट्स लगाए जाते हैं. सरकारी कार्यक्रमों में नेता आकर डॉक्टर्स के योगदान पर लंबा भाषण दे जाते हैं. हर साल एक दिन के लिए ये रस्म होती है. लेकिन बाकी दिन डॉक्टर्स को लेकर किस तरह की खबरें आती हैं. अलग अलग राज्यों से डॉक्टर्स की हड़ताल की खबरें आती हैं. सरकार मांग नहीं मानती तो डॉक्टर्स के इस्तीफे वाली खबरें आती हैं. या फिर वो वीडियो आते हैं जिसमें डॉक्टर्स को मरीज के परिजन पीट जाते हैं. या वो खबरें आती हैं जब किसी अस्पताल का डॉक्टर खुदकुशी कर लेता है, या मेडिसिन की पढ़ाई वाले संस्थान में कोई छात्र सुसाइड करता है.

हमारे देश में डॉक्टर पेशा बहुत अच्छा माना जाता है. सम्मान और कमाई वाले पैमानों पर डॉक्टरी के ऊंचे अंक हैं. लेकिन फिर हमें वो स्टडी मिलती हैं जिसमें 30 फीसदी डॉक्टर्स के डिप्रेशन से गुज़रने की बात आती है. 17 फीसदी डॉक्टर्स ऐसे होते हैं जिनके मन में जिंदगी खत्म करने का विचार आता है, यानी सुसाइड वाली टेंडेंसी होती है. 80 फीसदी डॉक्टर्स ऐसे होते हैं जो पढ़ाई के दौरान या करियर की शुरुआत के दौरान अपने भविष्य को लेकर नकारात्मकता से घिरे रहते हैं. इस तरह के तथ्य, द इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री ने दो साल पहले अपनी स्टडी में दिए थे. तो डॉक्टर्स मानसिक परेशानी में क्यों रहते हैं, क्यों उनको हर दो महीने में हड़ताल करनी पड़ती है, सड़क पर बैठना पड़ता है?

डॉक्टर्स डे मनाया क्यों जाता है?

1 जुलाई को डॉक्टर्स डे मनाने की शुरुआत भारत सरकार ने 1991 में की थी. डॉ बीसी रॉय की याद में उनके जन्मदिन पर 1 जुलाई को डॉक्टर्स डे मनाया जाता है. बीसी रॉय का पूरा नाम बिधानचंद्र रॉय. राजनीति के छात्र बीसी रॉय को पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री के रूप में जानते हैं. मुख्यमंत्री के अलावा डॉ बीसी रॉय को एक महान चिकित्सक के तौर पर भी जाना जाता है. साइंस बेस्ड मेडिकल केयर को बढ़ावा देने में उनका योगदान अहम माना जाता है. उन्होंने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में पढ़ाया. इसके अलावा कई अस्पतालों की नींव रखी. जिनमें जाधवपुर का टीबी अस्पताल, कमला नेहरू मेमोरियल अस्पताल, चितरंजन कैंसर अस्पताल जैसे नामल हैं. वो महात्मा गांधी के भी फिजिशियन रहे थे. और इन सब बातों के आलोक में 1991 में उनके जन्मदिन पर 1 जुलाई को डॉक्टर्स डे मनाने की शुरुआत हुई. संयोग की बात है कि डॉ राय ने दुनिया भी 1 जुलाई को ही छोड़ी थी.

डॉक्टर्स डे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देश के डॉक्टर्स को संबोधित किया. प्रधानमंत्री ने थोड़ी डॉक्टर्स की तारीफ की और थोड़ी अपनी सरकार की. प्रधानमंत्री ने कोरोना से लाखों लोगों की जान बचाने के लिए डॉक्टर्स का आभार जताया. लेकिन ये नहीं बताया कि कोरोना के दौरान जिन डॉक्टर्स की मौत हुई उनके लिए सरकार ने क्या किया. इंडियन मेडिकल एसोसिशन के मुताबिक सिर्फ दूसरी लहर के दौरान 798 डॉक्टर्स की कोरोना से मौत हुई है. सरकार ये आंकड़ा मानती भी है या नहीं, इस पर संदेह है. हमने पिछले साल देखा कि डॉक्टर्स को पीपीई किट तक पर्याप्त नहीं मिल रहे थे. वीडियो वायरल कर डॉक्टर्स को अपनी मांगें उठानी पड़ रही थी. जब सरकार कोरोना वॉरियर्स कहकर डॉक्टर्स पर फूल बरसाने का इंतजाम कर रही थी, तब भी डॉक्टर्स को अपनी मांगों के लिए हड़ताल करनी पड़ रही थी. हड़तालों वाला ये सिलसिला देश के किसी ना किसी राज्य में पूरे साल चलता है.

अगर हम देश में डॉक्टर्स की हड़ताल की बड़ी वजहें गिनें तो 2-3 कारणों को प्रमुख माना जा सकता है. जैसे वेतन बढ़ाने की मांग. या डॉक्टर्स के साथ मारपीट के विरोध में हड़ताल. एक जनरल पब्लिक परसेप्शन ये होता है कि डॉक्टर्स को बहुत अच्छा पैसा मिलता होगा. लेकिन अच्छा कमाने वालों में डॉक्टर्स का थोड़ा हिस्सा ही है. रेजिडेंट डॉक्टर्स का स्टापेंड या एमबीबीएस इंटर्नस का स्टाइपेंड बहुत कम होता है.

उत्तराखंड का उदाहरण लेते हैं

उत्तराखंड के MBBS इंटर्न्स को 2011 में 250 रुपए रोज के हिसाब से स्टाइपेंड मिलता था. यानी कि महीने का 7 हज़ार 500 रुपया. 10 साल बीत चुके हैं. 2021 आ गया है. दुनिया बदल गई है. लेकिन MBBS इंटर्न्स का स्टाइपेंड ज्यों का त्यों है. दस साल पहले जितना मिलता था, आज भी वही मिलता है. यही वजह है कि उत्तराखंड के तीनों मेडिकल कॉलेजों के इंटर्न डॉक्टर स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर प्रोटेस्ट कर रहे हैं. MBBS की साढ़े चार साल की पढ़ाई के बाद एक साल इंटर्नशिप जरूरी होती है. उत्तराखंड में तीन मेडिकल कॉलेज हैं. दून मेडिकल कॉलेज देहरादून, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी और गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज श्रीनगर. तीनों कॉलेजों के सभी 340 MBBS इंटर्न स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर प्रोटेस्ट कर रहे हैं. MBBS इंटर्न्स का कहना है कि जो मेडिकल कॉलेज केंद्र सरकार के अंतर्गत आते हैं, वहां के इंटर्न्स को 23 हज़ार 500 रुपए स्टाइपेंड मिलता है. एम्स में 28 हजार रुपए मिलता है. हिमाचल प्रदेश जो उत्तराखंड की तरह पहाड़ी राज्य है, वहां भी 17 हजार रुपए MBBS इंटर्न्स को मिलता है. लेकिन उत्तराखंड में केवल 7500 रुपए मिलते हैं.

इसी तरह का प्रदर्शन पिछले दिनों मध्य प्रदेश में हुआ था. जहां रेजिडेंट डॉक्टर्स ने अपना स्टाइपेंड बढ़वाने के लिए लंबा प्रदर्शन किया था. MBBS से आगे की पढ़ाई कर रहे रेजिडेंट डॉक्टर्स से अस्पतालों में 12 – 12 घंटे काम लिया जाता है, पर उनका मेहताना रेग्यूलर डॉक्टर्स से बहुत कम होता है.

डॉक्टर्स के साथ मारपीट

आईएमए के सर्वे के मुताबिक 75 फीसदी डॉक्टरों ने कभी न कभी प्रैक्टिस के दौरान हिंसा का सामना किया है. फिर वह चाहे गाली-गलौज हो धक्का-मुक्की या फिर मानसिक प्रताड़ना. सर्वे यह भी कहते हैं कि 62.8 फीसदी डॉक्टर ऐसे हैं अपने मरीजों को अटेंड करने में हिंसा होने का डर महसूस करते हैं. 57.7 फीसदी ऐसे हैं जो प्राइवेट सिक्योरिटी हायर करने के बारे में सोचते हैं. इन सर्वे वाले आंकड़ों के अलावा भी हमारे पास डॉक्टर्स की पिटाई वाले वीडियो आते रहते हैं.

अब आते हैं डॉक्टर्स की कमी पर

देश में कितने डॉक्टर्स हैं, इसके बारे में फरवरी 2020 में सरकार ने लोकसभा में जानकारी दी थी. अपने जवाब में सरकार ने सितंबर 2019 तक के आंकड़े बताए. सरकार ने बताया था कि देश में 12 लाख 1 हज़ार 354 एलोपैथिक डॉक्टर्स हैं. अगर इनमें से 80 फीसदी की उपलब्धता माने तो देश में 9 लाख 61 हज़ार डॉक्टर्स हैं. और देश की आबादी 135 करोड़ मान लें तो 1 हज़ार 404 लोगों पर एक एलोपैथिक डॉक्टर है. जबकि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के पैमानों के हिसाब से एक हज़ार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए. यानी देश में डॉक्टर्स की कमी तो है. इसमें राज्यों की स्थिति भी अलग अलग है. दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में स्थित बेहतर है तो यूपी बिहार में डॉक्टर्स की भारी कमी है. छोटे से राज्य केरल में 60 हज़ार डॉक्टर्स हैं, लेकिन बिहार में सिर्फ 44 हज़ार डॉक्टर्स है. एक्सपर्ट डॉक्टर्स की तो और भी कमी है. हाल में स्वास्थ्य मंत्रालय ने गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की रिपोर्ट जारी की थी. इसके मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकों में कुल 5 हज़ार 183 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. और इनमें स्पेशियलिस्ट डॉक्टर्स की 76 फीसदी कमी है. पूरे देश में ग्रामीण इलाकों में अगर 100 महिला रोग विशेषज्ञों की ज़रूरत है तो 30 ही उपलब्ध हैं, 70 फीसदी सीटें खाली हैं. तो ग्रामीण इलाकों में काम कर रहे डॉक्टर्स के लिए चुनौती बढ़ जाती है. कम संसाधनों में उन्हें ज़्यादा डिलिवर करना पड़ता है.

डॉक्टर दिवस के साथ-साथ आज CA दिवस भी है

CA यानी चार्टड अकाउंटेंट. हमारे-आपके तमाम वित्तीय समस्याओं को चुटकी में हल करने वाले लोग. दरअसल आज ही के दिन 1 जुलाई, 1949 को संसद ने कानून बनाकर इंस्टिट्यूट ऑफ चार्टड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आईसीएआई) की स्थापना की थी. ICAI में करीब 2.5 लाख सदस्य रजिस्टर्ड हैं. ICAI ही CA का कोर्स कराता है और इसके लिए कई परीक्षाएं भी आयोजित करता है. परीक्षा पास कर लेने वाले अभ्यर्थियों को चार्टर्ड अकाउंटेंट्स का लाइसेंस भी ICAI ही देता है.

अभी 5 जुलाई से 30 जुलाई तक CA की अलग-अलग परीक्षाएं आयोजित होनी हैं. कोरोना महामारी को देखते हुए काफी अभ्यर्थियों ने एग्जाम स्थगित कराने की मांग भी की थी. अभ्यर्थियों का एक धड़ा एग्जाम कराने के पक्ष में भी था. मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया तो कोर्ट ने परीक्षा स्थगित करने से मना कर दिया. कोर्ट ने कहा कि ऐसे अभ्यर्थी जो कोरोना संक्रमित हैं या उनके परिजन इस बीमारी से जूझ रहे हैं वो एग्जाम से ऑप्ट आउट कर सकते हैं. उन्हें नवंबर में होने वाली परीक्षा में शामिल होने का मौका दिया जाएगा. इसे अटेम्प्ट नहीं माना जाएगा और अगली परीक्षा में बैठने का मौका मिलेगा. तो CA बंधु बांधवों – अब तो एक ही रास्ता है कि परीक्षा दे दी जाए. आपको परीक्षा के लिए शुभकामनाएं और जो सीए बन गए हैं, उन्हें आज के दिन की बधाई.


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