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मेमोरियल इंटरनेशनल को अब प्रतिबंधित क्यों किया गया है?

किसी ज्ञानी शख़्स ने एक दफे कहा था,

अगर इंसान को बर्बाद करना है तो उसके इतिहास को नकार दो या इतिहास को लेकर उसकी समझ का नामोनिशान मिटा दो.

आधुनिक दौर में इस पंक्ति को अगर किसी ने सबसे अधिक आत्मसात किया है तो वो रूस है. विघटन से पहले रूस सोवियत संघ की शक्ति का केंद्र था. सोवियत संघ के अंतिम शासक थे, मिख़ाइल गोर्बाचोव. उन्हें ग्लासनोस्त यानी खुलेपन और पेत्रेस्त्रोइका यानी पार्टी के अंदर बदलाव की नीति लाने के लिए जाना जाता है.

उसी दौर में एक संस्था की नींव रखी गई थी. जिसका मकसद सोवियत संघ के उस सच को बाहर लाना था, जो बरसों तक दुनिया से छिपाकर रखा गया. इस संस्था का नाम था, मेमोरियल इंटरनैशनल.

आज जानेंगे, मेमोरियल इंटरनैशनल की पूरी कहानी क्या है? इसने रूस का कौन सा सच उघाड़ दिया था? और, मेमोरियल इंटरनैशनल पर अब ताला क्यों लगा दिया गया?

सबसे पहले इतिहास की बात.

साल 1917 तक रूस में ज़ारशाही चल रही थी. कम्युनिस्ट क्रांति में ज़ार निकोलस द्वितीय को गद्दी से उतार दिया गया. व्लादिमीर लेनिन इस क्रांति के अगुआ थे. वो बाद में सोवियत संघ के संस्थापक भी बने. अप्रैल 1919 में लेनिन ने लेबर कैंप वाले सिस्टम की नींव रखी. इन कैंप्स में विरोधियों और दुश्मनों को कै़द करके रखा जाता था. वहां उनसे ज़बरदस्ती मज़दूरी करवाई जाती. घंटों तक. उन्हें भरपेट खाना तक नहीं दिया जाता था. आने वाले समय में लेबर कैंप्स बर्बरता की सीमाएं पार करने वाले थे.

जनवरी 1924 में लेनिन की मौत हो गई. लेनिन के मरने के बाद जोसेफ़ स्टालिन सोवियत संघ का सर्वेसर्वा बना. स्टालिन ने ये पद चालाकी से हासिल किया था. लेनिन का असली उत्तराधिकारी लियोन ट्रॉस्की था. ट्रॉस्की ने सिविल वॉर के दौरान रेड आर्मी की कमान संभाली थी. वो पढ़ा-लिखा था. लेनिन का चहेता भी था. उसकी तुलना में स्टालिन का बचपन तंगहाली में गुज़रा था. स्कूल में भी उसने हमेशा अपमान झेला. स्टालिन एक समय तक पार्टी के लिए लठैती करता था. इस वजह से पार्टी के भीतर भी उसकी छवि दागदार बनी हुई थी.

इन सब खामियों के बावजूद उसने ट्रॉस्की को किनारे लगाया और ख़ुद सोवियत संघ की सत्ता की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठ गया. ट्रॉस्की सोवियत संघ में ही रहा. उसने स्टालिन की नीतियों की आलोचना जारी रखी. नाराज़ स्टालिन अड़ गया. उसने ट्रॉस्की को ज़बरदस्ती ट्रेन में बिठाया और उसे निर्वासन में कज़ाख़िस्तान भेज दिया. एक साल बाद उसने उसे सोवियत संघ से निकल जाने का हुक्म सुनाया. अंत में ट्रॉस्की को मेक्सिको में शरण मिली.

ट्रॉस्की को निकालने के बाद स्टालिन की मुखर चुनौती खत्म हो चुकी थी. 1920 के दशक के आख़िरी सालों में स्टालिन सामूहिक खेती का प्लान लेकर आया. इसके तहत ज़मींदारों और अमीर किसानों की ज़मीनें छीनी गई. जिन ज़मींदारों और किसानों ने ज़मीन छीने जाने का विरोध किया, उन्हें या तो जान से मार दिया गया या फिर लेबर कैंप्स में ज़मा करा दिया गया.

सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी का एक मुखपत्र था, प्रावदा. हिंदी में इसका मतलब होता है, सत्य. प्रावदा में जो छपता था, वो स्टालिन का सत्य होता था. उसका पूरा लेना-देना वास्तविकता की बजाय प्रोपेगैंडा से था. प्रावदा में ज़मींदारों के अत्याचारों की कहानियां बढ़ा-चढ़ाकर सुनाई जाने लगी.

उनमें से कुछ कहानियां सत्य होतीं थी तो कई मनगढंत भी थीं. प्रावदा पढ़ने के बाद जनता ज़मींदारों के ख़िलाफ़ हो गई. जब पुलिस ज़मींदारों को गिरफ़्तार करने या उनकी संपत्ति ज़ब्त करने जाती, तब लोग बहुत खुश होते. उन्हें लगता कि शोषकों को सज़ा मिल रही है. लेकिन ये तो बस शुरुआत भर थी. इस ख़ब्त की जद में पूरा सोवियत संघ आने वाला था.

छीनी हुई ज़मीन के टुकड़ों को मिलाकर बड़े-बड़े खेत बनाए गए. किसान बस मज़दूर बनकर रह गए. उन्हें फसल उपजाने का टारगेट दिया जाता था. जो टारगेट पूरा नहीं कर पाते, उन्हें भूखों मरने के लिए छोड़ दिया जाता या फिर उन्हें लेबर कैंप्स में भेज दिया जाता.

लेबर कैंप्स के इस समूह को चलाने वाली एजेंसी को गुलग कहा गया. ऐसे लेबर कैंप्स की संख्या सैकड़ों में थी. एक कैंप में दो से दस हज़ार लोगों को रखा जाता था. गुलग के कै़दियों से लकड़ी काटने, सड़क और पुल बनाने के अलावा दूसरे काम भी करवाए जाते थे. 1930 में गुलग को सोवियत संघ की सीक्रेट पुलिस के नियंत्रण में रख दिया गया. अगले दो दशक से भी लंबे समय तक सीक्रेट पुलिस ने अत्याचार की इंतेहा पार कर दी. गुलग में क़ैदियों की संख्या लगातार बढ़ने लगी. इतिहासकारों की मानें तो इस वृद्धि के तीन चरण थे.

– पहले चरण में सामूहिक खेती के विरोधियों को गुलग में भरा गया. इसमें ज़मींदार और दूसरे अमीर लोग शामिल थे.

– दूसरा चरण 1936 से 1938 तक चला. 1936 में स्टालिन ने शुद्धिकरण अभियान शुरू किया था. सर्गेई किरोव की हत्या के बाद. किरोव और स्टालिन अच्छे दोस्त थे. कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ नेताओं के उकसावे पर उसने स्टालिन की नीतियों की आलोचना कर दी. इसके कुछ दिनों के बाद ही किरोव की हत्या हो गई.

किरोव का हत्यारा सीक्रेट पुलिस का एक एजेंट था. स्टालिन ने उसे परिवार सहित मरवा दिया. ये साबित करने के लिए किरोव की हत्या से उसे बड़ा सदमा पहुंचा है. असलियत में ये एक बहाना था. स्टालिन, किरोव की हत्या की आड़ में पार्टी के भीतर अपने दुश्मनों को ठिकाने लगाना चाहता था.

उसने अपने राजनैतिक विरोधियों को गिरफ़्तार करवाना शुरू किया. उनके ख़िलाफ़ दिखावटी ट्रायल्स चलाए गए. सज़ा और नियति पहले से तय होती थी. अधिकतर विरोधियों को गुलग की तरफ़ रवाना कर दिया जाता था.

– गुलग में भर्ती का तीसरा चरण सेकंड वर्ल्ड वॉर के ठीक बाद शुरू हुआ. इस चरण में दुश्मन देश के सैनिकों, जर्मन क़ैद में रहे सोवियत सैनिकों और आम लोगों, युद्ध के आलोचकों और बेगुनाह आम लोगों को निशाना बनाया गया.

अनुमान के अनुसार, स्टालिन की मौत तक गुलग में चार से पांच करोड़ लोगों को रखा गया. इनमें से लाखों लोग वहीं मर गए. भूख से. टॉर्चर से. काम की अधिकता से. मौसम की बेदिली से.

पांच मार्च 1953 को जोसेफ़ स्टालिन की मौत हो गई. इसके तुरंत बाद क़ैदियों को क्षमादान देने की शुरुआत हुई. 1960 के दशक की शुरुआत तक गुलग को भंग किया जा चुका था. हालांकि, इसका स्थान गुटिक नाम की दूसरी एजेंसी ने ले लिया था.

गुलग के बारे में लंबे समय तक दुनिया को कुछ पता नहीं था. सोवियत सरकार ने इस इतिहास को चुपके से छिपा दिया था. लेकिन ये राज़ एक न एक दिन तो खुलना ही था. खुला भी. साल था 1973 का.

फ़्रांस की राजधानी पैरिस में ‘द गुलग आर्किपिलेगो’ नामक किताब का पहला वॉल्यूम छपा. इस किताब के लेखक थे, अलेक्ज़ेंडर सोनित्सीन. उन्हें 1970 में साहित्य का नोबेल मिल चुका था.

अलेक्ज़ेंडर वर्ल्ड वॉर 2 में सोवियत संघ की तरफ़ से मोर्चे पर तैनात थे. युद्ध खत्म होने के बाद उन्होंने एक चिट्ठी लिखी. इसमें उन्होंने स्टालिन की आलोचना की थी. इस चिट्ठी के चलते उन्हें आठ बरस तक लेबर कैंप में बंद करके रखा गया. अलेक्ज़ेंडर ने किताब में उसी अनुभव को साझा किया था.

उन्होंने गुलग का पूरा तिया-पांचा दुनिया के सामने जाहिर कर दिया था. किताब छपने के बाद सोवियत प्रेस ने उनकी ज़बरदस्त आलोचना की. उन्हें पागल और झूठा साबित करने की कोशिश की गई. 1974 में उन्हें सोवियत संघ से निर्वासित कर दिया गया. उनकी किताब को ज़ब्त करके जला दिया गया. हालांकि, तब तक बाकी दुनिया सोवियत संघ का ये छिपा अध्याय जान चुकी थी.

1980 का दशक आते-आते सोवियत संघ अपने अवसान पर पहुंच चुका था. 1985 में मिखाइल गोर्बाचोव सत्ता में आए. उन्हें भविष्य साफ़ दिख रहा था. गोर्बाचोव अंतिम संस्कार की रस्म निभाने आए थे.

इसी के तहत उन्होंने राजनैतिक क़ैदियों को रिहा करने का प्रोसेस शुरू किया. 15 दिसंबर 1986 की बात है. रूस के एक सुदूर गांव गोर्की में टेलीफ़ोन एक्सचेंज़ के कुछ कर्मचारी एक घर में घुसे. उन्होंने उस घर में एक टेलीफ़ोन लगाया और लौट गए. अगले दिन उस फ़ोन की घंटी बजी. दूसरी तरफ़ मिखाइल गोर्बाचोव थे. उन्होंने कहा, मिस्टर सखारोव, आपका निर्वासन ख़त्म किया जाता है.

वो आंद्रे सखारोव थे. सखारोव को सोवियत संघ के थर्मोन्युक्लियर बॉम्ब का जनक माना जाता है. परमाणु बम के परीक्षण के कुछ समय बाद सखारोव को ज्ञान प्राप्त हुआ. उन्हें लगा, अगर परमाणु हथियारों की सनक कायम रही तो अनर्थ हो जाएगा. इसके बाद वो न्युक्लियर टेस्टिंग के ख़िलाफ़ हो गए. 1961 में उन्होंने सोवियत लीडर निकिता ख्रुश्चेव के प्लान को जगजाहिर कर दिया. वो परमाणु बम के ख़िलाफ़ अभियान चलाते रहे. सोवियत सरकार सतर्क हो चुकी थी. उसने सखारोव को किनारे लगा दिया.

1975 में सखारोव को नोबेल पीस प्राइज़ मिला. नोबेल कमिटी ने सखारोव के लिए लिखा,

सखारोव ने सत्ता के दुरुपयोग और मानवीय गरिमा के हनन के ख़िलाफ़ निडर होकर लड़ा है. उन्होंने बड़ी हिम्मत से रूल ऑफ़ लॉ पर आधारित सरकार के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया. सखारोव शांति की उम्मीद रखने वालों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं.

इससे सोवियत सरकार चिढ़ गई. उसने सखारोव के ओस्लो जाकर प्राइज़ लेने पर पाबंदी लगा दी. उनके स्थान पर उनकी पत्नी ने समारोह में हिस्सा लिया और भाषण भी दिया. सखारोव ने सोवियत संघ में सरकार के ख़िलाफ़ बोलना जारी रखा. नतीजतन, सरकारी पाबंदियां बढ़तीं रही. जनवरी 1980 में उनको मिले सभी सम्मान छीन लिए गए और उन्हें गोर्की में आंतरिक निर्वासन में भेज दिया गया. इस दौरान उन्हें बाहर किसी से भी बात करने की इजाज़त नहीं थी.

गोर्बाचोव के आने के बाद सखारोव निर्वासन खत्म हुआ. हालांकि, सरकार को लेकर उनका नज़रिया तब भी नहीं बदला. 1987 में उनके प्रयासों से मेमोरियल इंटरनैशनल की नींव रखी गई. इस संस्था का मकसद सरकारी दमन के शिकार हुए लोगों के बारे में पता लगाना था. गुलग में गायब हुए लाखों लोगों को पहचान देना था.

लेकिन सत्ता का चरित्र बदलता ही कब है.

सोवियत संघ के विघटन के बाद भी आलोचकों को ठिकाने लगाए जाने का क्रम बना रहा. इसके चलते मेमोरियल इंटरनैशनल को भी अपना चरित्र बदलना पड़ा. उसने अतीत के साथ-साथ वर्तमान के राजनैतिक बंदियों के परिवारों को कानूनी मदद देना भी शुरू किया. पिछले तीन दशक से मेमोरियल रूस में मानवाधिकारों की बची-खुची उम्मीद का झंडाबरदार बना हुआ था. अब से ऐसा नहीं होगा.

ऐसा क्यों?

दरअसल, रूस की सर्वोच्च अदालत ने मेमोरियल के ऊपर ताला लगाने का आदेश दिया है. ये पहले से तय माना जा रहा था. 28 दिसंबर 2021 को इस पर मुहर लगा दी गई.

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संस्था फ़ॉरेन एजेंट्स कानून का उल्लंघन कर रही थी. मेमोरियल लंबे समय से सोवियत संघ के इतिहास का ग़लत चित्रण कर रहा है. इससे सोवियत संघ की आतंकी राज्य की छवि बन रही थी.

जानकारों का मानना है कि अदालत का फ़ैसला रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सोच में बिल्कुल मेल खाता है. वो सोवियत संघ के दौर को ऐतिहासिक बताते रहे हैं. वो स्टालिन को वर्ल्ड वॉर 2 के विजेता के तौर पर स्थापित करना चाहते हैं. इसके लिए ज़रूरी है कि स्टालिन के अपराधों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया जाए. मेमोरियल इंटरनैशनल स्टालिन के उन्हीं अपराधों की पोल खोल रही थी.

जिस कानून के तहत मेमोरियल इंटरनैशनल को बैन किया गया है, वो आख़िर है क्या?

मेमोरियल इंटरनैशनल के काम से सरकार को कभी खुशी नहीं हुई. बीच-बीच में उसे दबाने की कोशिश भी चलती रही. 2012 में रूस की संसद में फ़ॉरेन एजेंट्स लॉ पास हुआ. इसके तहत विदेश से फ़ंड लेने वाली संस्थाओं या व्यक्तियों को फ़ॉरेन एजेंट्स के तौर पर रजिस्टर कराना अनिवार्य करा दिया गया.

2014 में सरकार ने मेमोरियल को फ़ॉरेन एजेंट्स की लिस्ट में डाल दिया. अदालत ने आदेश में कहा कि संस्था सोशल मीडिया पोस्ट्स में फ़ॉरेन एजेंट का डिसक्लेमर नहीं लगा रही थी. मेमोरियन का कहना है कि उन्होंने अपने हर ब्लॉग या सोशल मीडिया पोस्ट में डिसक्लेमर लगाया है. जिसमें उनसे ग़लती हुई, उसके लिए उन्होंने ज़ुर्माना भी भरा. लेकिन उनकी दलील नकार दी गई.

जानकारों का कहना है कि ये तो सरकार का बहाना भर है. उन्होंने बहुत पहले से मेमोरियल को रास्ते से हटाने की साज़िश तैयार कर ली थी. उन्हें असहज करने वाले सच से परहेज है. सरकार अपनी साज़िश में सफ़ल रही. हारने वाले वे आम लोग हैं, जो दशकों से एक अदद पहचान का इंतज़ार कर रहे थे.


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