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एक गाने की लाइन से हिली क्यूबा की सरकार प्रदर्शन से निपटने के लिए क्या हथकंडे अपना रही है?

हाफ़िज जालंधरी साहब अपनी एक नज़्म में लिखते हैं-

इक नारा लगाकर मस्ताना, अब ख़ूब हंसेगा दीवाना

आज मैं भी आपको कुछ नारों का क़िस्सा सुनाती हूं. इस कथानक में दो स्लोगन्स हैं. पहला नारा असली था. और दूसरा नारा, उस ऑरिजनल स्लोगन की छीछालेदर करने के लिए उछाला गया. उस पहले नारे से दूसरे नारे तक का फ़ासला एक मुल्क के क्या से क्या हो जाने का सफ़र है. ये फ़ासला है कल और आज का. एक देश है, जो बीते कल में शोषण और दमन के खिलाफ़ एक सुपरपावर से भिड़ गया था. उसने क्रांति करके आज़ादी पाई. वही देश आज अपनी जनता का दमन कर रहा है. विरोध प्रदर्शनों और आलोचनाओं को दबाने के लिए अत्याचार का सहारा ले रहा है. क्या है ये पूरा मामला, विस्तार से बताते हैं.

शुरुआत करते हैं करीब सात दशक पुराने एक प्रकरण से. ये बात है 11 दिसंबर, 1964 की. जगह, अमेरिका का न्यू यॉर्क शहर. वेन्यू, संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय. यहां UN की जनरल असेंबली का सत्र चल रहा था. सदस्य देशों के प्रतिनिधि अपनी बारी आने पर मंच के ऊपर आते और अपनी बात सबके सामने रखते. इसी क्रम में 36 साल का एक शख्स अपनी कुर्सी से उठकर मंच पर पहुंचा. उसने अपनी स्पैनिश ज़ुबान में भाषण देना शुरू किया. ये स्पीच क्या थी, समझिए कि मुंह से उगले गए हथगोले थे. जो दागे गए थे, अमेरिका पर. उस रोज़ 36 बरस के आदमी ने अमेरिका की ही ज़मीन पर खड़े होकर अमेरिकी स्टेट के ग़ुनाहों की मुनादी कर दी. उसने कहा-

वो, जो ख़ुद अपने बच्चों को मारते हैं. वो, जो चमड़ी का रंग देखकर अपने ही लोगों के साथ रोज़ाना भेदभाव करते हैं. वो, जो अपनी ही ब्लैक आबादी के हत्यारों को आज़ाद घूमने देते हैं. वो, जो आज़ादी और बराबरी जैसे बुनियादी अधिकार मांगे जाने पर अपनी ही ब्लैक पॉपुलेशन को सज़ा देते हैं, ऐसे लोग ख़ुद को आज़ादी और मानवाधिकार का संरक्षक कैसे कहते हैं? अमेरिकी सरकार स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षक नहीं है. वो तो शोषक है. अत्याचारी है.

उस 36 साल के शख़्स ने अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर उसे आक्रांता कहा. ये भी ऐलान किया कि वो और उसके जैसे लोग अपने आख़िरी दम तक अमेरिकी साम्राज्यवाद से लड़ते रहेंगे. वो आक्रमणकारी अमेरिका के हथियार से भरे हाथों को पैरालाइज़ करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर संघर्ष करेंगे. आरोपों, बयानों और चेतावनियों से भरे इस ऐतिहासिक भाषण की आख़िरी पंक्ति थी-

पातरिया ओ मोएरते.

माने, मदरलैंड ऑर डेथ. मुल्क या मौत. अगर अपना देश आज़ाद नहीं, तो ज़िंदगी भी मंज़ूर नहीं. अगर देश के लिए जान भी देनी पड़ी, तो परवाह नहीं.

किसने उछाला था ये नारा? उस शख़्स का नाम था, अर्नेस्टो चे ग्वेरा. चे की पैदाइश अर्जेंटीना में हुई थी. मगर उनकी कर्मभूमि का सबसे ज़्यादा विस्तार था, क्यूबा में. वो क्यूबन क्रांति के नायकों में से एक थे. उनका दिया वो नारा, पातरिया ओ मोएरते, 1950 के दशक में उभरे कम्युनिस्ट लीडर फ़िदेल कास्त्रो और उनके नेतृत्व में हुए क्यूबन रेवॉल्यूशन का सबसे लोकप्रिय स्लोगन था.

Che Guvera
अर्नेस्टो चे ग्वेरा

ये तो हुआ पार्ट-1. अब आते हैं पार्ट-2 यानी वर्तमान पर. जिस क्यूबा ने सात दशक पहले ‘पातरिया ओ मोएरते’ यानी मुल्क या मौत का नारा दिया था, अब वहां एक अलग ही नारा गूंज रहा है. ये स्लोगन है- पातरिया य विदा. माने, होमलैंड ऐंड लाइफ़. देश भी चाहिए और ज़िंदगी भी चाहिए. देश के होने की कीमत ये नहीं हो सकती कि नागरिकों का कोई जीवन ही नहीं बचे. उनके जीवन में ख़ुशहाली आने की कोई उम्मीद ही न हो. बस दुख और संघर्ष में ही जीवन कटता रहे.

50 से ज्यादा शहरों में लोग सड़कों पर उतरे

क्या है इस बदले हुए नारे का संदर्भ? ये बात है 11 जुलाई, 2021 की. रविवार का दिन था. इस रोज़ क्यूबा के 50 से ज़्यादा शहरों में एकसाथ एक बड़ी घटना हुई. हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए. इस भीड़ में हर आयु वर्ग के लोग थे. इन लोगों ने एक-दूसरे के साथ कंधा मिलाकर रैलियां निकालीं. इन्हीं रैलियों में लोगों ने समवेत स्वर से नारा उछाला- पातरिया य विदा.

इस नारे के निशाने पर थी, क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार. इस सरकार के मौजूदा मुखिया हैं, मिगेल दिएज़ कनेल. जनता का आरोप है कि मिगेल गवर्नमेंट बदतर हो चुकी अर्थव्यवस्था को ठीक करने में बिल्कुल नाकाम साबित हुई है. देश की इकॉनमी पहले से बदहाल थी. अमेरिका ने दशकों से उसपर इकनॉमिक सैंक्शंस लगाए हुए थे. ओबामा कार्यकाल में प्रतिबंध कुछ ढीले हुए. मगर डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका ने क्यूबा पर फिर से आर्थिक प्रतिबंध लाद दिए.

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अपनी ही सरकार के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए हैं.

पहले से मौजूद इतनी परेशानियों के बीच 2020 में कोराना आया. इसके बाद से क्यूबा के आर्थिक हालात बद से बदतर होते चले गए. क्यूबन इकॉनमी का सबसे बड़ा सहारा था पर्यटन. कोविड के चलते टूरिज़म सेक्टर करीब-करीब पूरा ही ठप हो गया. लाखों लोगों की आमदनी बंद हो गई. सरकार के पास भी विदेशी मुद्रा की बेहद किल्लत हो गई. सरकारी खजाना इस कदर खाली हो गया कि सरकार विदेश से अनाज और बाकी राशन आयात करने तक में असमर्थ थी. इसके चलते क्यूबा में खाद्य सामग्रियों की बेहद कमी हो गई. राशन की दुकानों में सामान ही नहीं था कि लोग वहां से कुछ ख़रीद पाते. ऐसे में लोगों के लिए दो वक़्त का खाना जुटा पाना दूभर हो गया. सरकार के पास बिजली सप्लाई सुनिश्चित करने के भी संसाधन नहीं बचे. नतीजतन, क्यूबा में लंबे-लंबे पावर कट्स आम हो गए.

इन दुश्वारियों से निकलने के लिए क्यूबन्स के पास एक ही उम्मीद थी. कोविड कंट्रोल हो जाता, संक्रमण कम हो जाते, तो कामकाज वापस गति में आता. पर्यटकों के भी आने की आस बंधती. मगर इस मोर्चे पर भी लोगों को निराशा ही हाथ लगी. इसकी वजह है, वैक्सीन्स की कमी. पैसों की कमी और विदेशी वैक्सीन्स ख़रीदने में हिचक के चलते क्यूबा के पास वैक्सीन्स की बेहद कम डोज़ हैं.

एक गाना, प्रदर्शन का एंथम बना

वहां केवल 16 पर्सेंट लोगों को ही वैक्सीन लग सकी है. क्यूबा अपने यहां भी वैक्सीन्स बना रहा है. मगर ये स्वदेशी टीके अभी लगने शुरू नहीं हुए हैं. इन सबके चलते क्यूबा में लोगों के पास कोविड के खिलाफ़ कोई प्रॉटेक्शन नहीं है. वहां संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. इलाज़ के लिए अस्पतालों में बेड्स नहीं हैं. बाज़ार में एस्पीरिन जैसी सामान्य दवाएं तक उपलब्ध नहीं हैं. लोग उपचार और दवाओं की कमी से मर रहे हैं.

इन तमाम निराशाओं के चलते ही क्यूबन पब्लिक अपनी सरकार के खिलाफ़ सड़कों पर उतर आई है. अपने फ्रस्ट्रेशन का इज़हार करने के लिए उन्होंने क्रांति के ज़माने के पुराने नारे को बदलकर ‘पातरिया य विदा’ यानी ‘होमलैंड ऐंड लाइफ़’ को अपना ऐंथम बना लिया है. पता है, इस नए नारे के पीछे का आइडिया क्या है? ये नारा असल में एक गाने से ली गई पंक्ति है. ये गाना रिलीज़ हुआ था फरवरी 2021 में. इस गाने में क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार को निशाना बनाया गया था. स्पैनिश में लिखे गए इस गाने के बोलों का हिंदी अनुवाद कुछ यूं था-

अब और झूठ नहीं चलेगा. मेरे हमवतन अब आज़ादी चाहते हैं. उन्हें अब राजनैतिक उपदेश नहीं चाहिए. हम अब जन्मभूमि या मृत्यु का नारा नहीं लगाएंगे. हम चिल्लाकर कहेंगे, जन्मभूमि और जीवन.

पता है, ये गाना क्यूबा के पांच कलाकारों ने मिलकर तैयार किया था. रिलीज़ होते ही उनका ये गाना क्यूबा में सुपरहिट हो गया. गाना बनाने वाले आर्टिस्ट जानते थे कि अब वो सरकार के निशाने पर आ जाएंगे. इस आशंका के चलते गाना बनाने से जुड़े दो लोग अमेरिका चले गए. बाकी तीन क्यूबा में ही रह गए. इन तीनों ने कहा कि वो अपने ही देश में रहकर यहां की तानाशाही हुकूमत के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करते रहेंगे. चाहे इसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़े. गाना रिलीज़ होने के बाद क्यूबन अथॉरिटीज़ ने ग्रुप के एक कलाकार ओसोरबो को अरेस्ट कर लिया. उसपर अव्यवस्था फैलाने, क़ैदियों को रिहा करवाने की कोशिश करने और हमला करने के आरोप लगाए गए. ओसोरबो को 40 दिन तक डिटेन करके रखा गया.

Cuba Washington
एक गाना प्रदर्शन का एंथम बन गया है.

. क्यूबन्स के लिए अब ये गाना नहीं, एक आइडिया बन गया था. उनके देश में जो भी ग़लत हो रहा था, उन सबकी अभिव्यक्ति का ज़रिया बन गया ये गीत. सरकार इस गीत को कुचलने में जुट गई. सरकारी प्रॉपैगेंडा अख़बारों ने इस गाने की निंदा में लेख लिखे. इसे नफ़रती और देशविरोधी बताया. सरकारी तंत्र ने इस गाने के विरोध में एक और गाना जारी करवाया. मगर ये सारे हथकंडे नाकाम रहे. ये एक गीत मानो क्यूबन जनता के भीतर बरसों से जमा रोष को बाहर लाने का माध्यम बन गया. और यही वजह है कि अब क्यूबा में हो रहे सरकार विरोधी प्रदर्शनों में इस गीत की पंक्ति लोगों के लिए ऐंथम बन गया है.

बदलाव के लिए जनता सड़कों पर

लोगों का कहना है कि वो कब तक देश और देशभक्ति के नाम पर अभाव सहते रहेंगे. कब तक अपनी सरकारों के नकारेपन का ख़ामियाजा उठाते हुए इस भ्रम में जीते रहेंगे कि देश बचाना है, तो तिल-तिल कर मरना ही होगा. क्यूबन जनता का कहना है कि वो अब बदलाव चाहती है. देश की तरक्की और रोज़गार चाहती है. उन्हें अपने देश से प्यार है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि देश के सवाल पर पीढ़ियां बर्बाद होती रहें. ऐसी स्थिति ही क्यों हो कि देश या जनता की स्थिति बने. देश और जनता, दोनों साथ में को-एक्ज़िस्ट कर सकते हैं. वो साथ फल-फूल सकते हैं. बल्कि जब तक जनता ख़ुशहाल नहीं, तब तक देश भी ख़ुशहाल नहीं हो सकता.

ये तो हुई आवाम की बात. सरकार का क्या रुख है प्रदर्शनों पर? सरकार सख़्ती के सहारे जन विरोध को कुचलने की कोशिश कर रही है. 11 जुलाई से अब तक सैकड़ों प्रदर्शनकारी गिरफ़्तार किए जा चुके हैं. पुलिस घर-घर जाकर प्रदर्शनकारियों को राउंड-अप कर रही है. शहरों में हर तरफ़ पुलिस फ़ोर्स की तैनाती कर दी गई है. मास प्रोटेस्ट से जुड़ी ख़बरें बाहर न जाएं, इसके लिए देश में बड़े स्तर पर इंटरनेट बैन कर दिया गया है.

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क्यूबा में कोविड संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. इलाज़ के लिए अस्पतालों में बेड्स नहीं हैं. बाज़ार में एस्पीरिन जैसी सामान्य दवाएं तक उपलब्ध नहीं हैं. लोग इलाज और दवाओं की कमी से मर रहे हैं.

इनके अलावा क्यूबन सरकार प्रदर्शनों से निपटने के लिए प्रोपैंगेंडा का भी सहारा ले रही है. राष्ट्रपति मिगेल दिएज़ कनेल प्रदर्शनकारियों को देशद्रोही साबित करने का भरसक जतन कर रहे हैं. उन्होंने टेलिविज़न पर प्रसारित अपने संदेश में कहा कि क्यूबा क्रांतिकारियों का वतन है. जो लोग सड़कों पर उतरे हैं, वो उत्पाती हैं. मिगेल गवर्नमेंट अपने खिलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों को अमेरिकी साज़िश बता रही थी. ताकि विरोध की वैधता ख़त्म की जा सके. इसे विदेशी ताकतों द्वारा क्यूबा को तोड़ने की साज़िश ठहराकर दमन को जायज़ ठहराया जा सके.

इसके अलावा मिगेल सरकार ने एक और रणनीति अपनाई है. वो प्रदर्शनकारियों को काउंटर करने के लिए प्रो-गवर्नमेंट लोगों को आगे कर रही है. राष्ट्रपति ने अपील किया कि क्यूबा के सच्चे देशभक्त प्रदर्शनकारियों को काउंटर करने के लिए सड़कों पर उतरें. इसके बाद क्यूबा में प्रो-गवर्नमेंट भीड़ भी रैलियां करने लगी. ये लोग फिदेल कास्त्रो की तस्वीरें लेकर क्रांति के समय के नारे लगाते हैं. क्यूबा के झंडे लहराकर जनता से प्रदर्शनकारियों का साथ न देने की अपील करते हैं.

ख़बरों के मुताबिक, क्यूबा में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़ बड़े स्तर पर हिंसा हो रही है. 150 से ज़्यादा प्रदर्शनकारी लापता बताए जा रहे हैं. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई प्रदर्शनकारी युवाओं को जबरन सेना में भी भर्ती करवाया जा रहा है. मगर बड़े स्तर पर हो रहे इस दमन के बावजूद प्रदर्शनकारी पीछे नहीं हट रहे हैं.

छह दशकों में कभी नहीं हुआ

क्यूबा में अभी जो हो रहा है, वैसा पिछले छह दशकों में कभी नहीं हुआ. 1959 में हुई क्यूबन क्रांति के बाद से इतने बड़े स्तर पर वहां प्रोटेस्ट नहीं हुए. वहां के घटनाक्रम पर कई देशों की प्रतिक्रिया आई है. इनमें सबसे मुख्य है, अमेरिका का रेस्पॉन्स. अमेरिका क्यूबा का पड़ोसी है. अमेरिका ने क्यूबा को अपने शिकंजे में रखने की बहुत कोशिश की. यहां अपने मुताबिक सरकार बनवाई. मगर 1959 में फिदेल कास्त्रो ने अमेरिका परस्त सरकार को हटाकर क्यूबा को कम्युनिस्ट देश बना दिया. अमेरिकी ख़ुफिया एजेंसी CIA ने क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार को गिराने की बहुत कोशिश की. CIA ने फिदेल कास्त्रो को भी मरवाने के कई नाकाम प्रयास किए. इस बैकग्राउंड के चलते क्यूबा और अमेरिका के बीच रिश्ते कभी सामान्य नहीं हो पाए. उनके बीच हमेशा अविश्वास बना रहा.

बराक ओबामा ने क्यूबा से रिश्ते सुधारने की कोशिश की. मार्च 2016 में वो तीन दिन के दौरे पर क्यूबा पहुंचे. एक सदी में ये पहली बार था, जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति क्यूबा की यात्रा पर गया हो. इस यात्रा को बर्लिन वॉल के गिरने जैसा ऐतिहासिक क्षण माना गया. उम्मीद बंधी कि क्यूबा और अमेरिका के रिश्ते सुधरेंगे. दोनों के रिश्तों में कुछ रौनक आई भी. लेकिन फिर डॉनल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने और मोमेंटम रुक गया. ट्रंप सरकार ने क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंधों का शिकंजा और बढ़ा दिया. इसके बाद तो दोनों देशों में स्थितियां सुधरने की कोई उम्मीद नहीं बची.

अमेरिका ने क्या कहा?

अब अमेरिका में जो बाइडन की सरकार है. उन्होंने क्यूबन मास प्रोटेस्ट पर क्या प्रतिक्रिया दी है? 12 जुलाई को इस मुद्दे पर बाइडन प्रशासन ने एक सार्वजनिक बयान जारी किया. इसमें क्यूबा के प्रदर्शनकारियों के साथ सॉलिडैरिटी जताई गई थी. इस बयान को ट्विटर पर शेयर करते हुए बाइडन ने लिखा-

हम क्यूबन जनता के साथ खड़े हैं. क्यूबन जनता अपने बुनियादी और मौलिक अधिकारों को मांगने के लिए बहादुरी के साथ आगे आई है. वहां जनता कोरोना महामारी के चलते पैदा हुई पीड़ाओं से राहत चाहती है. वो दशकों से चले आ रहे दमन और आर्थिक परेशानियों से आज़ादी मांग रहे हैं.

इस सॉलिडैरिटी वाले संदेश के अलावा बाइडन ने क्यूबन सरकार को चेतावनी भी दी. कहा कि वो क्यूबन जनता की आवाज़ को जबरन कुचलने की कोशिश न करें.

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अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडन ने चेतावनी दी है कि क्यूबा जनता की आवाज को कूचलने की कोशिश ना करे.

बाइडन की इस सख़्त प्रतिक्रिया से कई लोग हैरान हुए. इसकी वजह ये है कि क्यूबा पर डेमोक्रैटिक पार्टी का रवैया थोड़ा नरम है. अपने पूर्ववर्ती ओबामा की तरह बाइडन ने भी क्यूबा से रिश्ते सुधारने, उसे एंगेज़ करने का वादा किया था. ऐसे में कई जानकारों को लगा कि शायद बाइडन क्यूबा के इस हालिया घटनाक्रम पर शुरुआती टिप्पणी से बचेंगे. मगर बाइडन ने इन अनुमानों को ग़लत साबित किया.

बाइडन के अलावा कई अमेरिकी नेताओं ने भी क्यूबन प्रोटेस्ट पर प्रतिक्रिया दी है. इनमें सबसे तल्ख़ बयान हैं रिपब्लिकन लीडर्स के. कई रिपब्लिकन लीडर्स तो क्यूबा पर बम तक गिराने की बात कर रहे हैं. मसलन, मयामी के मेयर फ्रैंसिस सुआरेज़. 12 जुलाई को उन्होंने फॉक्स न्यूज़ को एक इंटरव्यू दिया. इसमें फ्रैंसिस ने कहा कि अमेरिका को क्यूबा पर बम गिराने के विकल्प पर विचार करना चाहिए. फ़्लोरिडा के रिपब्लिकन गवर्नर रॉन डेसैंटिस ने कहा कि वो क्यूबन जनता तक वाई-फ़ाई पहुंचाने के इंतज़ाम देख रहे हैं.

अमेरिका से आ रही प्रतिक्रियाओं के बाद बाकी वर्ल्ड प्लेयर्स भी ख़ेमेबाज़ी में जुट गए हैं. क्यूबा के रूस से अच्छे रिश्ते हैं. अमेरिका द्वारा आलोचना किए जाने के बाद रूस ने क्यूबन सरकार को सपोर्ट किया. 12 जुलाई को रूस के उप विदेश मंत्री सेरगी याबकोव ने रूस में तैनात क्यूबन राजदूत से मुलाकात की. उन्होंने क्यूबा की सरकार के प्रति समर्थन जताया. ये भी भरोसा दिलाया कि हालात सामान्य करने में रूस क्यूबा की हर मुमकिन मदद करेगा.

चीन ने अमेरिका को जिम्मेदार बताया

इसके बाद चीन का भी बयान आया. उसने कहा कि क्यूबा में जो हो रहा है, उसका जिम्मेदार अमेरिका है. चीन ने कहा कि अमेरिका के लगाए प्रतिबंधों के चलते क्यूबा में दवा, ईंधन और बाकी ज़रूरी चीजों की किल्लत हो गई है. चीन ने ये भी कहा कि वो क्यूबा के आंतरिक मामलों में किसी भी तरह की विदेशी दखलंदाज़ी का विरोध करेगा. ख़बरों के मुताबिक, रूस, चीन और ईरान, इन तीनों ने अमेरिका को चेतावनी दी है. कहा है कि वो किसी हाल में क्यूबा के भीतर हस्तक्षेप न करे.

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दुनिया के कई देशों ने क्यूबा के मुद्दे पर बोलना शुरू किया है.

हस्तक्षेप न करने की हिदायत सही है. अमेरिका ने मानवाधिकार और लोकतंत्र की दुहाई देकर दशकों तक दूसरे देशों में टांग अड़ाई. अपने हितों को ग्रेटर गुड का नाम देकर सैन्य गतिविधियों और हमलों को जस्टिफ़ाई किया. मगर चीन, रूस और ईरान भी क्यूबन सरकार का साथ देकर कोई भला काम नहीं कर रहे हैं. वो भी इस मुद्दे को अपने हिसाब से कैश करने की कोशिश कर रहे हैं.

इस आरोप-प्रत्यारोप में एक ज़रूरी पॉइंट मिस हो रहा है. यहां मसला किसी और का नहीं, क्यूबा के आम लोगों का है. वो भुक्तभोगी हैं. वो अपनी सरकार के कामकाज़ से निराश हैं और बदलाव चाहते हैं. वो अपना अधिकार मांगने के लिए सड़कों पर उतरे हैं. क्यूबन सरकार उन्हें देशद्रोही और असामाजिक तत्व साबित करके असली मुद्दे से लोगों का ध्यान भटकाना चाहती है. वो ज़ोर-ज़ुल्म से लोगों की आवाज़ दबाना चाहती है. ये ग़लत है. क्यूबन सरकार अब किस मुंह से दशकों पहले अपने देश में हुई क्रांति की दुहाई देगी? आम जनता का दमन करने वाली सत्ता शोषक होती है, क्रांतिकारी नहीं होती. क्यूबन सरकार को समझना होगा कि दीवारों पर चे ग्वेरा की तस्वीरें बनाने और चौराहों पर उनकी मूर्तियां लगाने से वो रेवॉल्यूशनरी नहीं माने जाएंगे. उन्हें रेवॉल्यूशन के वादे को जीना होगा.


दुनियादारी: क्यूबा की सरकार प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए क्या हथकंडे अपना रही है?

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