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पीएम मोदी को अगला 'मन की बात' इस मुद्दे पर करना चाहिए

यह लेख डेली ओ से लिया गया है, जिसे माधुरी दांतला ने लिखा है.  
दी लल्लनटॉप के लिए हिंदी में यहां प्रस्तुत कर रही हैं शिप्रा किरण.


विराट कोहली और अनुष्का शर्मा ने कूड़ा फेंकते एक आदमी का वीडियो बनाकर खींचकर उसे सार्वजनिक कर दिया. इस बात पर बहस है कि ये कितना सही था. और इस बहस ने हिंदुस्तान में निजता (माने प्राइवेसी) और पर्सनल स्पेस जैसे मुद्दों की ओर ध्यान दिला दिया है. भारत ऐसा मुल्क है जहां पर्सनल स्पेस को लेकर लोग न सजग हैं, न ज़िम्मेदार.

हिंदुस्तान की पीढ़ियां बसों और ट्रेनों में भीड़ के बीच धक्कामुक्की करती आई हैं. इसीलिए निजी स्पेस को लेकर ज़्यादातर भारतीयों की समझ वैसी नहीं है जैसी कि हम उम्मीद करते हैं. पर्सनल स्पेस हमारे आस-पास फुट और इंच में नापी जानी वाली जगह भर नहीं होती. हमारे मानस को भी अपना एक अलहदा कोना चाहिए होता है. भारतीय आमतौर पर दूसरों की पर्सनल स्पेस में अतिक्रमण से नहीं हिचकते.

हम भले ही इस बात को मजाक में उड़ा दें या ये कहकर टाल दें कि ‘हम भारतीय ऐसे ही होते हैं.’ लेकिन इस गैरज़िम्मेदाराना रवैया के दूरगामी असर हो सकते हैं. हम एक दूसरे की निजता का सम्मान बिल्कुल भी नहीं करते. ऐसे ही माहौल में पूरे के पूरे समाज एक इकाई के तौर पर बुलिंग करने लगते हैं. ये बहुतों की ज़िंदगी पर बुरा असर डाल सकता है. खासकर उन बच्चों का जीवन इससे अधिक प्रभावित होता है जो इस बदलते हुए समय में युवावस्था की तरफ बढ़ रहे हैं.


हमारे यहां लगभग हर परिवार में एक न एक ऐसा व्यक्ति होता ही है जिसमें अपने बच्चों को लेकर ‘सुरक्षाबोध’ कुछ ज्यादा ही होता है. लड़कियों के मामले में ये कुछ और अधिक ही बढ़ जाता है. उनके फोन की छानबीन की जाती है कि कहीं वो ‘भटक’ तो नहीं गईं. उनके सामान्य व्यवहार को भी शक की निगाह से देखा जाता है. सही रास्ते की सीख के बजाय उन्हें मां-बाप की डांट और अपमान सहना पड़ता है. ये सब उनके आत्मसम्मान पर हमेशा के लिए एक ज़ख्म बना देता है.

भारतीय समाज एक परिवार-प्रधान समाज है. इसीलिए यहां कोई किसी के पारिवारिक मसलों में हस्तक्षेप नहीं करता. माता-पिता को ये समझाना होगा कि उनकी अपनी निजता की ही तरह बच्चों की निजता भी उतनी ही जरूरी है, लेकिन माता-पिता को ये बात समझाना यहां लगभग असंभव सा है.

एक दूसरे के लिए पर्याप्त सम्मान की कमी के कारण ही ‘पीछा करने’ जैसी समस्याएं या अपराधों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है. हममें से बहुत लोग बुरे मेसेज या परेशान करने वाले मेसेज भेजने को भी गलत नहीं समझते. ये सामान्य सी बात समझ ली जाती है. एक दूसरे की भावनाओं की कोई कद्र ना करना या किसी के भले-बुरे से कोई फर्क न पड़ने लगना, एक असामाजिक और संवेदनाशून्य समाज की पहचान है. इससे ज़्यादा और कुछ नहीं.

चारों ओर फैली नफरत हिंसा या अपराध, दूसरों के लिए सम्मान न होने का ही नतीजा है. यहीं से निजता के लिए सम्मान कम होता है. और दुःख की बात है कि ये सम्मान न तो माता-पिता अपने बच्चों को सिखा पाते हैं, ना ही उनके स्कूल उन्हें ये सिखाते हैं. बल्कि होता इसके विपरीत ही है. अधिकांश मां-बाप और शिक्षक बच्चों के सामने गलत उदहारण रखते हैं. वो खुद ही बड़े हो रहे या व्यस्क हो रहे है अपने बच्चों की निजता का हनन कर रहे होते हैं उनके जीवन में कुछ ज्यादा ही दखल दे रहे होते हैं. अगर हमें आसपास हो रहे अपराधों की रोकथाम करनी है तो सबसे पहले हमें इस बात के लिए सचेत रहना होगा कि माता-पिता और स्कूल बच्चों को कैसे शिक्षित कर रहे हैं. उन्हें बच्चों के मार्गदर्शन के लिए हमेशा चौकस रहना होगा.

anushka

ये दुखद है कि इन अपराधों की रोकथाम के लिए सरकारें बाहरी उपायों पर ज़्यादा ध्यान दे रही हैं. वो इन अपराधों की जड़ तक नहीं पहुंच पा रही. वो ये नहीं समझ पा रही कि इंसान के आत्मविश्वास और सामाजिक प्रगति का व्यक्ति की निजता के साथ गहरा सम्बन्ध है. महिलाओं के साथ हो रहे जघन्य अपराधों के लिए हम कभी महिला के कपड़ों को तो कभी उनके मोबाइल फोन को दोषी ठहरा देते हैं. सारा दोष उन्हीं पर मढ़ के हम अपनी जिम्मेवारियों से मुंह मोड़ लेते है. अपराध की तह तक जाने के लिए हम कोई प्रयास नहीं करते.

स्वच्छ भारत अभियान की तरह ही आज हमें एक ऐसे अभियान की जरूरत है जो भारतीय संस्कृति के नाम पर चल रही तमाम रूढ़ियों और गलत आदतों को पूरी तरह समाप्त कर दे या कम से कम उनमें सुधार ही कर दे. वह समाज कभी तरक्की नहीं कर सकता जहां लोगों की निजता का सम्मान नहीं किया जाता हो. निजता के खतरे और उसके उल्लंघन के भय में जी रहे समाज में हम चाहे जितनी भी मशक्कत कर लें उसकी तरक्की नहीं हो पाएगी.

बदलते समय के साथ आज ये जरूरी हो गया है कि सरकारें भारतीय माता-पिता को बच्चों के सही मार्गदर्शन के लिए उन्हें काउंसलिंग मुहैया कराएं. सलाहकार के तौर पर कुछ समाज-वैज्ञानिकों को नियुक्त करें. इसके लिए ये जरूरी है कि सरकारें खुद भी बेवजह लोगों के निजी जीवन में ताक-झांक करने की आदत से बाज आएं. यही बात भारतीय मीडिया के साथ भी लागू होती है. बल्कि मीडिया की जिम्मेवारी तो और भी बढ़ जाती है. उन्हें तो इन मुद्दों पर बहस का प्लेटफॉर्म बनना है. ताकि लोगों में जागरूकता बढ़ सके. निजता, मनुष्य की स्वतंत्रता या आज़ादी का एक बेहद जरूरी पहलू है. ये व्यक्ति के, समाज के जीवन स्तर को सुधारता है. बहुत नहीं तो कम से कम इस दिशा में इतना तो किया ही जा सकता है प्रधानमंती मन की बात के अगले भाग में इस मुद्दे को उठाएं और इस पर बात करें. प्रधानमंत्री इसी बहाने जानेंगे कि लोगों के इनबॉक्स उनकी मन की बात से भरना भी एक तरह से पर्सनल स्पेस पर हमला ही है.


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