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मोदी सरकार के DAP सब्सिडी बढ़ाने की असली बात क्या है?

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के प्रदर्शन की अब वैसी खबरें नहीं आ रही जो 3 महीने पहले तक आती थी. केंद्र की सरकार भी कुछ राहत महसूस कर रही होगी. लेकिन प्रदर्शनकारी किसानों की नाराज़गी पूरी तरह खत्म हो गई हो, ऐसा नहीं लगता. और जनता की नाराज़गी का डर सत्तारूढ़ दलों को चुनाव से पहले कुछ ज़्यादा होता है. किसानों के प्रदर्शन का सबसे ज्यादा असर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में था. यूपी और पंजाब में अगले साल चुनाव होना है. तो ऐसा लग रहा है कि मोदी सरकार किसानों की नाराज़गी कम करने में लगी है. हाल के कुछ बड़े फैसलों से ऐसा ही लग रहा है. सरकार ने पहले धान और कुछ दलहन पर एमएसपी में बढ़ोतरी की. अब फर्टिलाइज़र्स पर सब्सिडी में बहुत बड़ी बढ़ोतरी की है.

तो आइए फर्टिलाइज़र सब्सिडी का पूरा गणित समझते हैं

सबसे पहले बात सरकार के नए फैसले की. बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट ने कई फर्टिलाइज़र्स पर सब्सिडी में 140 फीसदी तक की बढ़ोतरी की है. एनपीके यानी नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटाश से बनने वाले फर्टिलाइज़र्स पर ये सब्सिडी लागू होगी. जैसे डीएपी खाद के एक बोरे पर पहले सरकार 500 रुपये सब्सिडी देती थी, उसे बढ़ाकर अब 1200 रुपये कर दिया गया है. सरकार ने कहा है कि कोरोना में लोगों की दुश्वारियां कम करने के लिए कई स्पेशल पैकेज दिए हैं, वैसे ही किसानों के लिए ये राहत दी है. और ये वन टाइम फैसला है, खरीफ की सीज़न के लिए. अगर अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में गिरावट आती है तो सरकार सब्सिडी के फैसले को रिव्यू करेगी. सरकार ने ये भी बताया कि अभी वो हर साल 80 हज़ार करोड़ की फर्टिलाइज़र सब्सिडी देती है, उसमें अब 14 हज़ार 775 रुपये की बढ़ोतरी हो जाएगी.

तो सीधी सीधी खबर तो ये ही है. अमूमन सरकार के ऐलान के अगले दिन इतनी भर ही खबरें अखबारों में छपती हैं. हमने आज सोचा कि आपको उर्वरक सब्सिडी की पूरी बारीकी समझाते हैं.

सबसे पहले तो ये समझते हैं कि फर्टिलाइज़र सब्सिडी होती क्या है?

सीधा मतलब ये है कि उर्वरक का जितना बाज़ार भाव होता है, किसानों को उससे सस्ता मिलता है, जितना सस्ता मिलता है वो सब्सिडी होती है और ये सब्सिडी सरकार देती है. सरकार जितनी सब्सिडी बढ़ाएगी किसानों को फर्टिलाइज़र बाज़ार भाव से उतना सस्ता मिलेगा.

अब सरकार ये सब्सिडी देती कैसे है, इसकी पॉलिसी क्या है. इसे समझने के लिए फर्टिलाइज़र्स को दो हिस्सों में बांट लेते हैं. पहला – यूरिया और दूसरा- गैर-यूरिया फर्टिलाइर्जर्स. जिसमें फॉस्फैटिक और पोटासिक फर्टिलाइज़र्स आते हैं. शॉर्ट में इसे कहते हैं P&K फर्टिलाइज़र्स. फॉस्फेट का रासायनिक चिन्ह P और पोटाश का रासायनिक चिन्ह K. अभी P&K फर्टिलाइज़र वाली कैटेगरी में 22 तरह के फर्टिलाइज़र पर सरकार सब्सिडी देती है. जैसे डीएपी औक अमोनियम सल्फेट जैसे उर्वरक.

यूरिया और P&K फर्टिलाइज़र्स पर सब्सिडी की नीति अलग अलग है. यूरिया एकमात्र फर्टिलाइज़र है जिसकी MRP आज भी सरकार नियंत्रित करती है. यानी किस रेट में किसानों को यूरिया मिलेगा ये यूरिया बनाने वाली कंपनियां तय नहीं कर सकती, सरकार ही तय करती है. लेकिन कंपनियां सरकार को ये ज़रूर बताती हैं कि उनकी लागत कितनी है और कम कीमत में किसानों को बेचने पर उनका घाटा कितना है. इस घाटे की भरपाई सरकार सब्सिडी से करती है. मिसाल के तौर पर- नीम कोटेड यूरिया खाद पर सब्सिडी की बात करते हैं. नीम कोटेड यूरिया यानी नीम के तेल की कोटिंग के बाद तैयार यूरिया खाद. नीम कोटेड यूरिया तैयार करने वाली कंपनियां इसकी लागत और मुनाफा जोड़कर एक टन की कीमत 17 हज़ार रुपये रखती हैं. लेकिन केंद्र सरकार ने एक टन नीम कोटेड यूरिया खाद की MRP या अधिकतम खुदरा मूल्य 5 हज़ार 922 रुपये तय कर रखा है. अब अगर 17 हज़ार प्रति टन वाला खाद 5,922 में बेचा जाता है तो जाहिर है बेचने वाले को घाटा होगा. और इस घाटे की भरपाई केंद्र सरकार करती है. तो ये हो गया यूरिया पर सब्सिडी देने का तरीका. अभी यूरिया के 50 किलो के बोरे की एमआरपी 268 रुपये है. 45 किलो के यूरिया बोरे की एमआरपी 242 रुपये है. हालांकि हर राज्य में ये रेट एक जैसी नहीं है. यूपी में 50 किलो यूरिया के बैग की एमआरपी 298 रुपये है. यूरिया बनाने के लिए इस्तेमाल नेचुरल गैस पर लगे वैट की वजह से राज्यों में रेट का फर्क आता है.

अब डीएपी के जैसे फॉस्फैटिक और पोटासिक फर्टिलाइज़र्स की बात करते हैं

इसमें सरकार ने 2010 में न्यूट्रिएंट्स बेस्ड सब्सिडी की योजना शुरू की थी. इसमें यूरिया की तरह कीमतें सरकार नियंत्रित नहीं करती है. खाद बनाने वाली कंपनियां ही अपनी लागत और मुनाफे के हिसाब से MRP बढ़ा या घटा सकती हैं. सरकार ने बस सब्सिडी की एक रेट तय कर रखी है. जैसे कल वाले कैबिनेट के फैसले से पहले डीएपी के 50 किलो के बोरे पर 500 रुपये सब्सिडी थी. इसका मतलब ये है कि कंपनियां जितनी रेट तय करती हैं, किसानों को उससे 500 रुपये कम में डीएपी का बैग मिल रहा था. लेकिन जैसे जैसे कंपनियां रेट बढ़ाती हैं किसानों के खाद महंगा होता जाता है. हालिया उदाहरण की बात करते हैं. डीएपी का भाव कुछ महीने पहले 1200 रुपये प्रति बैग था. तब किसानों को 700 रुपये में डीएपी मिलता था. फिर कंपनी ने बढ़ाकर इसकी रेट 2400 रुपये तक कर दी, तो किसानों को 500 रुपये की सब्सिडी के बाद 1900 रुपये में 50 किलो डीएपी पड़ने लगा. इसलिए सरकार ने डीएपी पर सब्सिडी 500 रुपये से बढ़ाकर 1200 रुपये की. ताकि किसानों को पिछले साल वाली रेट पर ही फर्टिलाइज़र मिले.

डीएपी की तरह ही सरकार नाइट्रोजन, पोटाश, सल्फर जैसे न्यूट्रिएंट्स पर सब्सिडी तय करती है. जैसे एक किलो फॉस्फोरस पर पिछले साल 14 रुपये 88 पैसे सब्सिडी थी, उसे बढ़ाकर 45 रुपये 32 पैसे कर दिया है.

सरकार कंपनियों को सब्सिडी वाला पैसा देती किस आधार पर है?

यानी कैसे पता चलता है कि किस जगह पर किसानों ने कितना और कौनसा खाद लिया है. 2018 से पहले इसका तरीका ये था कि ज़िले में जितना खाद कंपनी पहुंचा देती थी, वहीं गोदाम में उसकी गिनती कर सरकार सब्सिडी का पैसा देती थी. अब तरीका बदल गया है. अब किसान के खाद खरीदने पर ही रिटेलर को पैसा दिया जाता है. पॉइंट ऑफ सेलिंग यानी PoS के हिसाब से सब्सिडी ट्रांसफर होती है. देशभर के 3 लाख 20 हज़ार खाद बेचने वाले रिटेलर रसायन और उर्वरक मंत्रालय से जुड़े हैं. वो जैसे ही आधार कार्ड या किसान क्रेडिट कार्ड की जानकारी दर्ज कर किसान को खाद बेचते हैं, उसके आधार पर उन्हें एक हफ्ते में सब्सिडी मिल जाती है.

इस तरीके में भी अब बदलाव की बात हो रही है. अब सरकार सीधे किसान के खाते में सब्सिडी का पैसा डीबीटी के तरीके से भेजने पर विचार कर रही है. इस बारे में नीति आयोग और पीएमओ में चर्चाएं हुई हैं. केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक सरकार ने कैबिनट सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी भी बनाई है. इस कमेटी की आखिरी बैठक पिछले साल जनवरी में हुई थी. डिपार्टमेंट ऑफ फर्टिलाइज़र ने भी डीबीटी पर चर्चा के लिए एक वर्किंग ग्रुप बनाया है.

अब ये तो हुआ सब्सिडी का हिसाब. किसान को अच्छी पैदावार के लिए पानी और ज़मीन के बाद अच्छे बीज और अच्छे फर्टिलाइज़र की ज़रूरत पड़ती है. इसका कितना असर होता है, ये देश ने 1960 और 70 के दशक में हरित क्रांति के बाद से देखा है. इसलिए फर्टिलाइज़र्स पर सब्सिडी की शुरुआत हुई. किसानों को फर्टिलाइज़र्स सस्ते मिलेंगे तो कुल आय बढ़ेगी, ये हमें समझ में आता है. किसान भी सस्ते फर्टिलाइज़र्स की मांग करते हैं. लेकिन इसको लेकर एक चिंता भी है. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान जैसे राज्यों में खेतों में ज़रूरत से ज़्यादा यूरिया दिया जा रहा है. पंजाब में 1970 के दशक में एक हेक्टेयर में 25 किलो यूरिया डाला जाता था, अब ये आंकड़ा बढ़कर 2019 में 137 किलो हो गया है. ज़मीन में नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटाश का अनुपात 4:2:1 आदर्श माना जाता है. लेकिन पंजाब और हरियाणा में ये 25:5:1 हो गया है. इसका असर ज़मीन की सेहत पर पढ़ रहा है, ज़मीन से पैदा हुए अनाज को खाने वालों की सेहत पर पड़ रहा है. तो जब हम सस्ते फर्टिलाइज़र्स की बात करते हैं तो ये भी तय होना चाहिए उनका इस्तेमाल विवकपूर्ण हो.


विडियो- राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव समेत कई किसान टोहना में थाने के बाहर क्यों प्रदर्शन कर रहे?

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