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किस गलती के लिए 27 साल बाद रवांडा से माफ़ी मांग रहा फ़्रांस?

‘मैं यहां विनम्रता और आदर के साथ अपनी ज़िम्मेदारियां स्वीकारने आया हूं. जिन लोगों ने वो क़यामत के दौर का सामना किया है, वही हमें माफ़ कर सकते हैं और हमें माफ़ी का उपहार दे सकते हैं.’

ये शब्द थे, फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के. जगह, रवांडा की राजधानी किगाली का ‘नरसंहार स्मारक’. 27 मई को मैक्रों रवांडा की यात्रा पर पहुंचे थे. मकसद था, दोनों देशों के रिश्तों में सुधार. हालांकि, उनके दौरे की शुरुआत एक क्षमायाचना से हुई.

फ़्रांस के राष्ट्रपति रवांडा के लोगों से माफ़ी क्यों मांग रहे थे? उनका अपराध क्या था? और, क्या इस माफ़ी से उसके पाप धुल पाएंगे? सब विस्तार से बताएंगे.

रवांडा की कहानी से पहले थोड़ा सा बैकग्राउंड समझ लेते हैं

रवांडा अफ़्रीका में है. चारों तरफ़ से ज़मीन से घिरा हुआ. इसके पड़ोसी देश हैं- बुरूण्डी, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो, तंज़ानिया और युगांडा.

Rawanda
लाल घेरे में रवांडा. (फोटो: गूगल मैप्स)

रवांडा में दो मुख्य जातियों की बसाहट है. बहुसंख्यक हुटू और अल्पसंख्यक टुत्सी. जब तक रवांडा में औपनिवेशिक शासन चला, टुत्सियों का दबदबा रहा. टुत्सी मुख्यतौर पर मवेशीपालन के काम से जुड़े थे. रवांडा के समाज में मवेशी संपन्नता की निशानी हैं. वहां उपहार में गाय देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. किसी को शुभकामना देनी हो, तो कहते हैं, ‘ईश्वर करे आपको हज़ार गायें नसीब हों’.

ऐसे समाज में टुत्सियों का प्रभावशाली होना स्वाभाविक था. जब बेल्जियम का राज हुआ, उसने टुत्सियों को अपना मैनेजर बनाया. वे हुटू लोगों से ज़बरदस्ती काम लेते. बेहिसाब शोषण करते. मेहनत हुटू करते, फायदा टुत्सी और बेल्जियम कमाते थे. ये सब उनके मन-मस्तिष्क में उबलता रहा. दूसरे विश्व युद्ध के बाद पलटवार की छिटपुट घटनाएं शुरू हो चुकीं थी. हुटू लोगों ने शोषण का बदला लेना शुरू कर दिया था.

1962 के साल में रवांडा को आज़ादी मिल गई. सत्ता अब बहुसंख्यक आबादी के पास आई. यानी हुटू के पास. इसके बाद तो खुलेआम टुत्सियों को मारा जाने लगा. इस क़त्लेआम में सरकार का भी समर्थन होता था. इसको लेकर टुत्सियों के विद्रोही गुट बने. वे हमला करने के बाद सीमा पार कर छिप जाते. इसका खामियाजा आम टुत्सी नागरिकों को झेलना पड़ता था. ये सब 1980 के दशक तक चला.

फिर आया साल 1987 का

इस साल एक और विद्रोही गुट की स्थापना हुई. रवांडा पैट्रिओटिक फ़्रंट (RPF). इसको बनाया था, फ़्रेड गिजा विगयेमा नाम के एक टुत्सी मिलिटरी अफ़सर ने. अक्टूबर 1990 में विगयेमा के नेतृत्व में RPF ने रवांडा पर हमला कर दिया. मकसद था, सत्ता हासिल करना.

Rpf Vs Rwandan Gov
रवांडा सरकार और RPF में जंग जारी रही और लोग मरते रहे. (फोटो: एएफपी)

उस वक़्त रवांडा के राष्ट्रपति थे, जुवेनाल हाबियारिमाना. जाति से हुटू थे. वो 1973 से सरकार चला रहे थे. एकछत्र राज. रवांडा में सबकुछ उनके इशारे पर होता था. निरंकुशता ऐसी कि उन्हें एक उपाधि दे दी गई. किनानी. हिंदी में मतलब होता है – अजेय. जिसे कोई ना जीत सके.

जब RPF का हमला हुआ, तब इस उपाधि पर संकट दिखने लगा. हाबियारिमाना की सेना RPF से मुकाबले के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थी. ऐसे में उन्होंने मदद मांगी फ़्रांस से. फ़्रांस लंबे समय से उनकी सरकार को आर्थिक मदद मुहैया करा रहा था. अबकी बार उसने सीधा सैन्य मदद भेजने की तैयारी कर ली. लेकिन वो सीधा युद्ध में कूद नहीं सकता था. हाबियारिमाना पर तानाशाही के आरोप भी थे. ऐसे में सीधे तौर पर मदद पहुंचाना भी जायज नहीं होता.

फ़्रांस ने लड़ाकों को तैयार किया?

फ़्रांस ने इसका रास्ता निकाला. उसने रवांडा में मौजूद फ़्रेंच नागरिकों की सुरक्षा के लिए 600 सैनिकों की टुकड़ी भेजी. मीडिया रिपोर्ट्स बताते हैं कि उस वक़्त रवांडा में कुछ सौ नागरिक ही रह रहे थे. और तो और, सिविल वॉर से उन्हें सीधा कोई ख़तरा नहीं था. फ़्रांस ने 06 सौ सैनिकों को उतारने की बात ही मानी. असलियत में वहां 11 सौ से अधिक फ़्रेंच सैनिक तैनात थे. बाकी के पांच सौ गुप्त तरीके से रवांडा की सेना को ट्रेन कर रहे थे. फ़्रेंच आर्मी से प्रशिक्षित हुए सैनिकों ने बाद में चरमपंथी संगठन ‘इंटराहामवे’ और ‘इमुज़ामुगाम्बी’ के लड़ाकों को तैयार किया. ये दोनों चरमपंथी गुट हाबियारिमाना सरकार के चट्टे-बट्टे थे.

फ़्रांस के सहयोग से रवांडा की सेना ने RPF को कड़ी टक्कर दी. लंबे समय तक हिंसा जारी रही. लड़ाई का कोई नतीजा नहीं निकल रहा था. फिर दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई. और, अगस्त 1993 में आरुषा अकॉर्ड्स अस्तित्व में आया. तीन सालों से चला आ रहा सिविल वॉर रुक गया. RPF को सरकार और सेना में बराबर की हिस्सेदारी की मांग पर भी सहमति मिल गई. तय हुआ कि अगले 22 महीने के भीतर रवांडा में निष्पक्ष आम चुनाव कराए जाएंगे.

रवांडा स्थिरता की तरफ कदम बढ़ा रहा था. उम्मीद की किरण दिखने लगी थी. सदियों से अदल-बदल कर शोषक और शोषित की भूमिका निभाने वाले हुटू और टुत्सी एक साथ मिलकर काम करने वाले थे. वो दिन आता, उससे पहले एक बड़ा हादसा हो गया.

 रवांडा और बुरूण्डी के राष्ट्रपति की मौत

06 अप्रैल, 1994 की तारीख़ थी. रवांडा एयरफ़ोर्स का एक विमान तंज़ानिया से वापस लौट रहा था. किगाली एयरपोर्ट पर उतरने से ठीक पहले इसपर रॉकेट से हमला हुआ. प्लेन हवा में ही क्रैश हो गया. इस विमान में सवार थे, रवांडा के राष्ट्रपति जुवेनाल हाबियारिमाना और बुरूण्डी के राष्ट्रपति साइप्रियन नेटरियामरा. दोनों मौके पर ही मारे गए. ये हमला किसने किया, ये आज तक पता नहीं चल सका है. ये दुनिया के सबसे बड़े रहस्यों की लिस्ट में शामिल होकर रह गया.

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जुवेनाल हाबियारिमाना और प्लेन का मलवा. (फोटो: एएफपी)

लेकिन हमले के बाद बहुत कुछ होना बाकी था. उधर राष्ट्रपति पर हमला हुआ, इधर राजधानी में सेना ने बैरिकेड लगाना शुरू कर दिया. हुटू लोगों को कहा गया, टुत्सियों को मारो, ये तुम्हारा कर्तव्य है. प्रशासन ने खुली छूट दे दी. ये सबकुछ पूरी तरह योजनाबद्ध लग रहा था. राष्ट्रपति की मौत के कुछ घंटों बाद ही पूरे रवांडा में तांडव शुरू हो गया.

लोग आदमख़ोर बन चुके थे. सब रिश्ते-नाते खत्म हो गए थे. वहां सिर्फ़ लोगों की जाति का महत्व था. हुटू शिकारी, टुत्सियों को अपना शिकार बनाने लगे. रेडियो चैनल ‘रेडिया रवांडा’ सरकार के नियंत्रण में था. वहां से झूठी ख़बरें चलाई जातीं. हुटू लोगों पर हमले की फ़र्ज़ी रिपोर्ट्स सुनाई जातीं. ताकि टुत्सियों के ख़िलाफ़ माहौल तैयार किया जा सके. रेडियो की वजह से इसका दायरा शहर से निकलकर गांवों तक फैल गया. 1990 से 1993 के बीच इसने नफ़रत की ज़मीन तैयार कर दी थी. नरसंहार के दौरान इसका भी असर देखने को मिला.

मर्डर और रेप की अनगिनत कहानियां रवांडा की सड़कों और नदियों में बिखरने लगीं थी. इस घटना को नाम मिला, ‘रवांडा का नरसंहार’. ये नरसंहार अगले 100 दिनों तक चला. अनुमान है कि इस दौरान लगभग आठ से दस लाख लोगों का क़त्ल हुआ. रवांडा के नरसंहार को एक लाइन में समझना हो, तो ह्यूमन राइट्स वॉच की तरफ़ से प्रकाशित किताब का रुख करना होगा. इसी नरसंहार पर लिखी गई थी. किताब का टाइटल है-

Leave None to Tell the Story

कोई कहानी बयां करनेवाला भी नहीं बचना चाहिए

यही इस नरसंहार का मकसद था.

इस नरसंहार में फ़्रांस की क्या भूमिका थी?

– पहली, फ़्रेंच आर्मी से प्रशिक्षण पाए हुटू सैनिकों ने ‘इंटराहामवे’ और ‘इमुज़ामुगाम्बी’ के हत्यारों को तैयार किया था. नरसंहार के दौरान इन दो गुटों ने सबसे ज़्यादा तबाही मचाई थी. उन्होंने न सिर्फ़ लोगों को हिंसा के लिए भड़काया, बल्कि आम लोगों को हथियार भी बांटे.

– दूसरी, फ़्रांस को पहले से पता था कि रवांडा में नरसंहार का माहौल तैयार किया जा रहा है. इसके बावजूद उसने इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया. वो बिना किसी पूछताछ के रवांडा सरकार को मदद पहुंचाता रहा.

– तीसरी, जून 1994 में यूएन ने रवांडा में पीसकीपिंग फ़ोर्स उतारी. फ़्रांस के नेतृत्व में ‘ऑपरेशन टरक्व़ाइज’ चला. इसका मुख्य मकसद था, सताए लोगों को सुरक्षित माहौल देना. टुत्सी लोगों को सेफ़ रखना. बजाय इसके, फ़्रांस ने हुटू हत्यारों को बच निकलने के लिए रास्ता दिया.

फ़्रांस लंबे समय तक इन आरोपों से इनकार करता रहा. उसने कभी खुलकर स्वीकार नहीं किया कि रवांडा नरसंहार को ईंधन उसी ने दिया था.

रवांडा सरकार लगातार फ़्रांस की भूमिका पर सवाल उठाती रही?

रवांडा नरसंहार के बाद RPF अपने लोगों के बचाव में आया था. उसने सिविल वॉर में जीत हासिल की. तब से सत्ता उन्हीं के हाथों में है. RPF के दिग्गज कमांडर्स में से एक पॉल कगामी पिछले 21 सालों से रवांडा के राष्ट्रपति हैं. कगामी लगातार नरसंहार में फ़्रांस की भूमिका पर सवाल उठाते रहे हैं.

Paul Kagame
रवांडा के मौजूदा राष्ट्रपति पॉल केगैमी. (फोटो: एपी)

आख़िरकार, अप्रैल 2019 में फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रवांडा नरसंहार में फ़्रांस की भूमिका की जांच के आदेश दे दिए. मैक्रों कमीशन की रिपोर्ट आई 26 मार्च 2021 को. 1200 पन्नों की रिपोर्ट में कहा गया कि फ़्रांस नरसंहार करने वाली सरकार का मददगार रहा, उसने अपनी आंखें भी मूंदे रखीं, लेकिन ये कहना ग़लत होगा कि फ़्रांस, नरसंहार में भागीदार था. कहने का मतलब ये कि हमने आग लगाने के लिए पेट्रोल और माचिस तो दी, लेकिन हम इसमें शामिल नहीं थे.

इस रिपोर्ट के बाद बात चली कि मैक्रों रवांडा के साथ रिश्तों में सुधार ला सकते हैं. इसी सिलसिले में वो किगाली के स्मारक पर पहुंचे थे. और, वहां फ्रांस की भूमिका के लिए रवांडा के लोगों से माफ़ी भी मांगी.

Kigali Genocide Memorial
किगाली का ‘नरसंहार स्मारक’. (तस्वीर: एएफपी)

इस माफ़ी ने इमैनुएल मैक्रों का फायदा है?

राष्ट्रपति मैक्रों की माफ़ी में उन्हीं का हित छिपा है. फ़्रांस अफ़्रीका में एक स्थायी पार्टनर की तलाश में है. कगामी पिछले 21 सालों से सत्ता में हैं. रवांडा अफ़्रीका के उन गिने-चुने देशों में से है, जहां आतंकवाद या सिविल वॉर की समस्या नहीं है. रवांडा को साधने के लिए कगामी को साधना ज़रूरी है. चूंकि कगामी टुत्सी हैं और रवांडा नरसंहार के भुक्तभोगी भी, इसलिए उनकी हां में हां मिलाकर बात आगे बढ़ाई जा सकती है.

जानकारों की मानें तो रवांडा में बहुत से लोग मैक्रों से खुश नहीं हैं. उन्होंने फ़्रेंच सरकार से ‘आधिकारिक माफ़ी’ की मांग की है. अगले बरस फ़्रांस में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं. अगर मैक्रों ऑफ़िशियल माफ़ी मांगते तो दक्षिणपंथी गुट उनसे नाराज़ हो सकता था.

फिलहाल, मैक्रों ने एक तीर से दो मंज़िलों पर निशाना साधा है. उन्होंने रवांडा सरकार को खुश भी कर दिया और अपने देश में विरोधी धड़े को नाराज़ होने का मौका भी नहीं दिया.


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