Submit your post

Follow Us

क्यों यूरोप और ऑस्ट्रेलिया कोरोना की वजह से तबाही के कगार पर खड़े हैं?

इंटरनैशनल मीडिया की सुर्खियों में कोरोना की धमाकेदार वापसी हो चुकी है. प्री-पैनडेमिक दुनिया में लौटने से लेकर कोरोना युग में लौटने तक. विकास तो हुआ है. लेकिन ग़लत दिशा में. कोरोना अपने सबसे विकराल रूप में वापस आया है.

यूरोप और ऑस्ट्रेलिया, दुनिया की सबसे विकसित इकाईयां है. इन देशों के पैसे की कोई कमी नहीं है. वे आसानी से वैक्सीन खरीद सकते हैं. उन्होंने खरीदा भी. कई देशों के पास इतनी मात्रा में वैक्सीन है कि पूरी आबादी को कई बार बूस्टर डोज़ दी जा सकती है.

इतनी संपन्नता के बावजूद यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तबाही के कगार पर खड़े हैं. जर्मनी के स्वास्थ्य मंत्री ने तो यहां तक कह दिया है कि या तो वैक्सीन लगेगी या फिर कफ़न. डॉक्टर्स और वैज्ञानिक सख़्त लॉकडाउन और कोरोना प्रोटोकॉल्स लागू करने की अपील कर रहे हैं. कुछ सरकारों ने इस अपील पर अमल किया भी है.

इस बीच क़यामत की चेतावनियों के बीच एक नया वर्ग तैयार हो गया है. ये वर्ग लापरवाह तो है ही, साथ में हिंसक भी. कोरोना को लेकर लाए गए सख़्त नियमों के बीच यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में दंगे हो रहे हैं. हज़ारों की संख्या में लोग जमा होकर प्रोटेस्ट कर रहे हैं. मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग के बिना.

कोरोना के बढ़ते ख़तरे को नज़रअंदाज वाले लोग कौन हैं? उनके तर्क क्या हैं? और, सरकारों को सख़्ती क्यों अपनानी पड़ रही है?

लेकिन सबसे पहले कुछ आंकड़ों की कहानी.

22 नवंबर को नीदरलैंड्स में कोरोना संक्रमण के 23 हज़ार से अधिक मामले सामने आए. 29 की मौत हुई.

सरकार ने क्या कदम उठाए हैं? तीन हफ़्तों के लिए आंशिक लॉकडाउन लगाया हुआ है. बार और रेस्टोरेंट्स बंद करने की डेडलाइन तय है. और, स्पोर्ट्स इवेंट्स में पब्लिक के आने पर पाबंदी लगा दी गई है.

नतीजा क्या निकला? नीदरलैंड्स में पिछले तीन दिनों से दंगे हो रहे हैं. हेग और रोटरडैम समेत कई बड़े शहरों में प्रदर्शनकारियों ने आगजनी की और पुलिस पर बम भी फेंके. इन घटनाओं में कई पुलिसवाले घायल भी हो गए. सौ से अधिक प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया गया है.

बेल्जियम में पिछले 24 घंटे में लगभग 14 हज़ार नए केस आए. 35 की मौत हुई.

बेल्जियम ने अक्टूबर 2021 में कोविड सेफ़ पास वाला नियम लागू किया था. ये पास वैक्सीनेशन या रिकवरी स्टेटस के आधार पर जारी किया जाता है. सावर्जनिक जगहों पर घुसने के लिए पास दिखाना ज़रूरी है.

पिछले कुछ दिनों से बेल्जियम में कोरोना संक्रमण तेज़ी से फैल रहा है. इससे निपटने के लिए सरकार ने नए प्रतिबंध लागू किए. मास्क को अनिवार्य कर दिया गया. वर्क फ़्रॉम होम वाला सिस्टम वापस लाया गया. साथ ही, कोविड पास को लेकर भी सख़्ती बढ़ा दी गई है.

इसको लेकर लोग भड़के हुए हैं. रविवार, 21 नवंबर को राजधानी ब्रुसेल्स में 35 हज़ार से अधिक लोग इकट्ठा हुए. इनमें से अधिकतर ने मास्क नहीं पहना हुआ था. सोशल डिस्टेंसिंग की बात तो भूल ही जाइए.

इन लोगों ने मास्क, वैक्सीन और सेफ़्टी पास के ख़िलाफ़ नारेबाजी की. प्रोटेस्ट में दक्षिणपंथी पार्टियां और कोरोना की कॉन्सपिरेसी थ्योरीज़ फैलाने वाले कई गुट शामिल थे.

कुछ देर तक तो प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा. लेकिन बाद में हिंसा शुरू हो गई. लोगों ने पुलिस पर पेट्रोल बम फेंके और सड़क पर आगजनी की. पुलिस को वॉटर कैनन और टीयर गैस का इस्तेमाल करना पड़ा. लगभग पचास लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया है.

बेल्जियम के बाद ऑस्ट्रिया.

यहां पिछले 24 घंटों में लगभग 14 हज़ार लोग कोरोना से संक्रमित हुए.

सरकार ने पिछले हफ़्ते अनवैक्सीनेटेड लोगों के लिए लॉकडाउन का ऐलान किया था. 22 नवंबर से इसका दायरा बढ़ा दिया गया है. अब पूरी आबादी को लॉकडाउन के नियमों का पालन करना होगा. सरकार ने कोरोना वैक्सीन को भी अनिवार्य कर दिया है. ये कानून 1 फ़रवरी 2022 से लागू हो जाएगा. जो लोग वैक्सीन लगाने से मना करेंगे, उन्हें ज़ुर्माना भरना होगा. ज़ुर्माना नहीं देने की स्थिति में जेल भेजा जा सकता है. ऑस्ट्रिया ऐसा कानून लाने वाला यूरोप का पहला देश बन गया है.

इसके ख़िलाफ़ राजधानी वियना में हज़ारों लोगों ने प्रोटेस्ट किया. उन्होंने आज़ादी के नारे लगाए. कई जगहों पर पुलिस को ट्रोल भी किया गया.

इन प्रदर्शनों के बावजूद सरकार पीछे हटने के मूड में नहीं है. ऑस्ट्रिया के चांसलर अलेक्ज़ेंडर सेलेनबर्ग ने कहा,

‘लंबे समय तक इस देश में इस बात पर सहमति रही कि वैक्सीन को लेकर कानून बनाने की कोई ज़रूरत नहीं है. महीनों तक समझाने के बाद भी हम बहुत सारे लोगों को समझाने में कामयाब नहीं हो सके. हम कोरोना की पांचवी लहर नहीं चाहते.’

ऑस्ट्रिया में अभी तक 66 फीसदी आबादी को ही वैक्सीन लग पाई है. यूरोप के बाकी देशों की तुलना में ये आंकड़ा बेहद कम है.

फ़्रांस, इटली, डेनमार्क और क्रोएशिया में भी कोरोना प्रोटोकॉल्स के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट की ख़बर है. 21 नवंबर को जर्मनी में दो टेस्ट सेंटर्स में आग लगा दी गई. ब्रिटेन में रोज़ाना 40 हज़ार से अधिक मामले सामने आ रहे हैं. ब्रिटेन सरकार भी मामले पर नज़र बनाए हुए है. उसने अभी लॉकडाउन या वैक्सीन की अनिवार्यता को लेकर कोई नियम जारी नहीं किया है. लेकिन जिस तेज़ी से हालात बदल रहे हैं, कुछ भी संभव है.

यूरोप के बाद अब ऑस्ट्रेलिया की बात.

ऑस्ट्रेलिया का विक्टोरिया स्टेट अगले महीने एक नया बिल लाने की तैयारी में है. कंटेन्शियस पैनडेमिक पावर्स बिल. विक्टोरिया में 15 दिसंबर को आपातकाल समाप्त हो जाएगा. अगर प्रस्तावित बिल ने कानून की शक्ल ली, तो अधिकारियों को लॉकडाउन लगाने, मास्क और वैक्सीन की अनिवार्यता का नियम लागू करने का अधिकार मिल जाएगा.

ऑस्ट्रेलिया में वैक्सीन की अनिवार्यता को लेकर कोई कॉमन नियम नहीं है. अलग-अलग राज्यों ने अपने हिसाब से नियम बना रखे हैं. मसलन, विक्टोरिया में अनवैक्सीनेटेड लोगों को रेस्टोरेंट में बैठकर खाने या कम-जरूरी काम से शॉपिंग मॉल में जाने की इजाज़त नहीं है. कुछ राज्यों में हेल्थकेयर और कंस्ट्रक्शन वर्कर्स के लिए वैक्सीन लगाना अनिवार्य है.

विक्टोरिया की राजधानी है, मेलबर्न. वहां वैक्सीन के समर्थकों और विरोधियों, दोनों ने एक साथ प्रोटेस्ट में हिस्सा लिया. दोनों गुटों को अलग कराने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी.

इसके अलावा, ब्रिसबेन, एडिलेड और सिडनी में एंटी-वैक्सीन प्रोटेस्टर्स ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया.

जैसा कि आप जानते हैं, तापमान में कमी, डेल्टा वैरिएंट और वैक्सीनेशन के प्रति उदासीनता की वजह से कोरोना हाथ से बाहर निकल रहा है. हमने पहले के शो में भी बताया था कि यूरोप के पास वैक्सीन की कमी नहीं है. जो लोग सजग थे, उन्होंने वैक्सीन लगा ली है. जो लोग बच गए हैं, उनमें से अधिकतर वैक्सीन के विरोधी हैं.

अब समझते हैं कि वैक्सीन और लॉकडाउन को लेकर लाए गए नियमों का विरोध क्यों कर रहे हैं?

इसके तीन बड़े कारण हैं.

पहला कारण स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा है. एंटी-वैक्सीन प्रोटेस्टर्स का तर्क ये है कि सरकार कानून बनाकर उनकी निजता को भंग कर रही है. उनका कहना है वैक्सीन व्यक्तिगत पसंद की बात है. इसे थोपा नहीं जा सकता. हमें कोरोना के साथ रहना है. इसलिए सरकार को चाहिए कि वो लॉकडाउन लगाने की बजाय हेल्थकेयर में निवेश करे.

जानकारों का मानना है कि ये संभव नहीं है. पहली बात तो ये कि कोरोना का दायरा सीमित नहीं है. ये कितने लोगों को अपनी जकड़ में लेगा, कहा नहीं जा सकता. और दूसरी बात, हेल्थकेयर सिर्फ़ इमारतें खड़ी कर देने से नहीं तैयार होता. उसके लिए प्रशिक्षित लोग चाहिए. डॉक्टर्स, नर्स, हेल्पर्स, टेक्नीशियन्स आदि. इस ज़रूरत को रातोंरात पूरा नहीं किया जा सकता. इसके लिए समय चाहिए.

फिलहाल, वैक्सीन ही महामारी को काबू में करने का एकमात्र उपलब्ध उपाय है. ये समझने की ज़रूरत है.

WHO यूरोप के रीजनल डायरेक्टर हेंस क्लूज ने एक मार्के की बात कही थी. उन्होंने फ़रवरी 2022 तक यूरोप में पांच लाख मौतों की आशंका जताई थी. उसी मौके पर हेंस ने कहा था,

वैक्सीन की अनिवार्यता पर बहस का समय खत्म हो चुका है. ये आख़िरी उपाय है. इन नियमों को स्वतंत्रता पर पाबंदी की बजाय, आज़ादी को कायम रखने के उपाय की तरह देखना चाहिए.

दूसरा कारण डर से है. डर, नॉर्मल लाइफ़ से बेदखल किए जाने का. यूरोप चौथी लहर से ठीक पहले प्री-पैनडेमिक दौर में जाने की बात कर रहा था. कई देशों ने कोरोना प्रोटोकॉल्स भी हटा दिए थे. इस खुलेपन की वजह से बिजनेस वापस पटरी पर आ रहे थे. जॉब्स के नए अवसर पैदा हो रहे थे.

लोग आसानी से एक जगह से दूसरी जगह तक ट्रैवल कर पा रहे थे. लोगों को ये सब फिर से खोने का डर सता रहा है. जिस तरह से सरकार प्रतिबंध बढ़ा रही है, ये तय नहीं है कि ये दौर कब तक चलेगा. लोग इस आशंका के चलते भी विरोध कर रहे हैं.

तीसरा कारण कॉन्सपिरेसी थ्योरीज़ से जुड़ा है. कोरोना की शुरुआत को दो साल बीतने वाले हैं. लेकिन अफ़वाहों का अंत आज तक नहीं हुआ है. अभी भी एक बड़ा वर्ग कोरोना को एक साज़िश मानता है. राजनीतिक पार्टियां अपने फायदे के लिए इन अफ़वाहों को बढ़ावा देती हैं.

यूरोप के कई इलाकों में लोग आज भी वैक्सीन की बजाय टोने-टोटके पर अधिक भरोसा करते हैं. इन्ही कारणों से लोग वैक्सीन मैनडेट के ख़िलाफ़ हिंसक प्रदर्शन से भी पीछे नहीं हट रहे हैं.

कोरोना के सफ़र पर हमारी नज़र बनी रहेगी. इस मामले में जो भी अपडेट्स होंगे, उन्हें हम आप तक पहुंचाते रहेंगे.

अब बात करते हैं साउथ कोरिया की.

साल 1979. तारीख़, 26 अक्टूबर. ‘ब्लू हाउस’ साउथ कोरिया के राष्ट्रपति का आधिकारिक आवास है. उस रोज़ ब्लू हाउस की एक इमारत में चार खास लोग बैठे हुए थे. इस इमारत में कोरियन सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी (KCIA) का हेडक़्वार्टर था.

चार लोग कौन थे? डायरेक्टर किम जे-क्यू, राष्ट्रपति के चीफ़ बॉडीगार्ड चा जी-चुल, ब्लू हाउस के चीफ़ सेक्रेटरी किम जी-वान और साउथ कोरिया के तत्कालीन राष्ट्रपति पार्क चोंग-ही. डिनर का वक़्त हो चला था. परंपरा के अनुसार, राष्ट्रपति के सम्मान में गायन और नृत्य का भी प्रबंध था.

डिनर के बीच में ही राष्ट्रपति खफ़ा हो गए. वो खुफिया एजेंसी के डायरेक्टर से नाराज़ थे. राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ साउथ कोरिया में प्रोटेस्ट हो रहे थे. राष्ट्रपति का गुस्सा इस बात पर था कि खुफिया एजेंसी इन प्रदर्शनों का अनुमान लगाने में नाकाम रही थी.

इसको लेकर दोनों में कहासुनी हो गई. चीफ़ बॉडीगार्ड ने बीच में आकर कुछ बोलने की कोशिश की. तभी किम जे-क्यू ने अपनी बंदूक निकाल ली. जब राष्ट्रपति ने बीच में आकर उन्हें रोकने की कोशिश की, किम ने गोली चला दी.

गोली सीधी राष्ट्रपति को लगी. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया. वहां डॉक्टर्स ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. किम की गोली से चीफ़ बॉडीगार्ड की भी मौत हो चुकी थी. घटना के बाद किम ने ब्लू हाउस के बाहर से एक कैब पकड़ी और आराम से निकल गया. लेकिन चार घंटे बाद उसे गिरफ़्तार कर लिया गया.

राष्ट्रपति की हत्या पर हंगामा होना तय था. वो हुआ भी. लेकिन वो हुआ सत्ता के शीर्ष ज़ोन में. आम लोगों की सरकार से विरक्ति थी. जनता शांत बैठी रही.

उधर रूलिंग क्लास में कई तरह की अफ़वाहें तैर रहीं थी. मसलन, ये विदेशी साज़िश है या तख़्तापलट. हालांकि, ये सारे अनुमान बाद में ग़लत साबित हुए. जांच में ये बात सामने आई कि हत्या का कारण क्षणिक गुस्सा था. इसके पीछे कोई साज़िश नहीं थी.

पार्क चोंग-ही की हत्या की जांच करने वाले अफ़सर का नाम था, चोन डु-ह्वान. चोन और पार्क का रिश्ता 18 साल पुराना था. 1961 में पार्क तख़्तापलट के जरिए सत्ता में आए थे. उस समय चोन ने भी उनकी मदद की थी. इस मदद के बदले चोन को पार्क के करीबियों में जगह मिल गई थी.

जब चोन को राष्ट्रपति की हत्या की जांच का ज़िम्मा मिला, उनके मन में एक कुटील प्लान बना. जांच के दौरान उन्होंने अपनी गोटी सेट की. उन्होंने अपने चहेते अफ़सरों को अपने साथ मिला लिया. और फिर, दिसंबर 1979 में मार्शल लॉ कमांडर जनरल जोंग सोंग-ह्वा को अरेस्ट कर लिया गया. सोंग-ह्वा को पानी में तब तक डुबोकर रखा गया, जब तक कि उन्होंने राष्ट्रपति की हत्या में शामिल होने का आरोप स्वीकार नहीं कर लिया.

इसके बाद सेना की टुकड़ी राजधानी सियोल की तरफ़ बढ़ गई. और, उसने आसानी से तख़्तापलट कर दिया. चोन डु-ह्वान ने साउथ कोरिया में मार्शल लॉ लगाने का आदेश दिया. संसद और यूनिवर्सिटीज़ पर ताला लगा दिया गया और विपक्षी नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया.

लेकिन इस बार जनता चुप नहीं बैठी. लोगों के मन में लंबे समय से विरोध कुलबुला रहा था. मई 1980 में ग्वांगजू में लोग सड़कों पर उतर आए. उनके हाथों में ‘डु-ह्वान कुर्सी छोड़ो’ और ‘तानाशाही मुर्दाबाद’ की तख़्तियां थी. लोग सैन्य तानाशाही से आजिज आ चुके थे.

प्रदर्शनकारियों ने पुलिस स्टेशन से हथियार भी लूटे. एक हफ़्ते तक मुठभेड़ चलती रही. लेकिन सरकार उनके मन की बात सुनने के लिए तैयार नहीं हुई. उसने बात करने की बजाय सेना उतार दी. सेना को सीधा आदेश था, विरोध को कुचल दो.

सेना ने वही किया. जब प्रोटेस्ट खत्म हुआ तो सैकड़ों की संख्या में लोग मारे जा चुके थे. सरकारी रिपोर्ट्स में ये आंकड़ा दो सौ के करीब था. स्वतंत्र रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है कि सेना की कार्यवाही में तीन हज़ार से अधिक लोग मारे गए. इस घटना को ‘ग्वांगजू नरसंहार’ के नाम से जाना जाता है.

चोन की मिलिटरी हुंटा ने एक और कांड किया. उन्होंने विपक्षी नेता किम डि-जोंग को मौत की सज़ा सुना दी. डि-जोंग पर प्रदर्शनकारियों को भड़काने का झूठा आरोप लगाया गया था. हालांकि, बाद में उनकी सज़ा कम कर दी गई.

चोन का कार्यकाल दमन तक सीमित नहीं था. उनके शासन में साउथ कोरिया ग़रीब मुल्क़ से एशियन टाइगर तक पहुंच गया. साउथ कोरिया सबसे तेज़ी से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्थाओं की लिस्ट में भी आया. उनकी सरकार में सियोल को ओलंपिक गेम्स की मेजबानी भी मिली.

लेकिन उनके गुनाह उनकी उपलब्धियों पर भारी पड़े. 1987 में उनके ख़िलाफ़ छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ. और, अंतत: उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी. हालांकि, जाते-जाते उन्होंने अपने दोस्त और करीबी को उत्तराधिकारी चुन लिया.

1993 में उनके करीबी रो तो-वू सत्ता से हट गए. इसके बाद चोन और रो पर अदालती कार्रवाई शुरू हुई. 1996 में उन्हें तख़्तापलट और ग्वांगजू नरसंहार के लिए सज़ा सुनाई गई. चोन को मौत की और रो को 22 साल जेल की. ट्रायल के दौरान चोन ने कभी माफ़ी नहीं मांगी. उन्होंने कहा कि अगर ज़रूरत पड़ी तो आज भी वो वही उपाय अपनाएंगे.

1998 में साउथ कोरिया में सरकार बदली. चोन के पुराने विरोधी किम डि-जोंग राष्ट्रपति बदले. उन्हें ग्वांगजू प्रोटेस्ट में लोगों को उकसाने के लिए मौत की सज़ा दी गई थी. लेकिन बाद में उनकी सज़ा कम कर दी गई थी.

डि-जोंग ने राष्ट्रपति बनते ही चोन को माफ़ी दे दी. उनका कहना था कि ये राष्ट्र की शांति और एकता के लिए ज़रूरी था.

चोन ने बाकी की ज़िंदगी गुमनामी में गुजारी. बीच-बीच में उनकी संपत्ति और छोटे-मोटे बयान को लेकर हंगामा भी हुआ. 22 नवंबर 2021 को चोन अपने बाथरूम में फिसल गए. उन्हे अस्पताल ले जाया गया. जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.

चोन की मौत के साथ ही उनकी विरासत की यादें भी ताज़ा हो गईं है. उन्हें किस तरह याद रखा जाए, इसको लेकर बहस भी शुरू हो गई है. न्यायोचित यही होगा कि ये तय करने की ज़िम्मेदारी चोन के आतंक से पीड़ित लोगों और उनके परिवारों पर भी छोड़ दिया जाए.


अमेरिका को ताइवान में फंसा कर चीन ने किस नए गढ़ में सेंध लगा दी है?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

पहले स्पाइडरमैन टोबी मैग्वायर की कहानी, जिनका सबसे हिट रोल उनके लिए शाप बन गया

शुद्ध और असली स्पाइडरमैन टोबी मैग्वायर करियर ग्राफ़ बाद में गिरता ही चला गया.

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

जगह थी मुंबई एयरपोर्ट. अब दस साल बाद फिर से दोनों का नाम एक साथ सुर्ख़ियों में है.

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

अली का रोल करने वाले इंडियन एक्टर अनुपम त्रिपाठी का सलमान-शाहरुख़ कनेक्शन क्या है?

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

ईमानदारी से स्कोर भी बताते जाना. हम इंतज़ार करेंगे.

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

अलवारो मोर्टे ने वेटर तक का काम किया हुआ है. और एक वक्त तो ऐसा था कि बकौल उनके कैंसर से जान जाने वाली थी.

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.