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नरेंद्र मोदी सरकार पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के बढ़ते दाम का पूरा सच क्यों नहीं बताती?

2015 में दिल्ली की एक चुनावी रैली में पीएम नरेंद्र मोदी कहते हैं कि उनके आने पर पेट्रोल-डीज़ल के दाम घटे हैं, वो नसीब वाले हैं. अब पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें बढ़ रही हैं तो लोग प्रधानमंत्री के पुराने वीडियो खोज खोजकर याद दिला रहे हैं. 2014 चुनाव से पहले के वो नारे याद दिलाए जा रहे हैं जब बीजेपी ने सत्ता में आकर महंगाई पर मार करने की बात कही थी. लेकिन 7 साल बाद ये चीज़ें अब उल्टी दिशा में जाती दिख रही हैं. हर चीज़ के भाव बढ़ रहे हैं. पेट्रोल, डीज़ल, रसोई गैस, दूध या फल-सब्ज़ियां, हर चीज़ महंगी हो रही है. आंकड़ों तौलें तो पिछले 3 महीने में रोज़ाना उपयोग की चीज़ों के भाव 3 से 42 फीसदी तक बढ़े हैं. सब्ज़ी बनाने का तेल महंगा हो गया है, पीने की चाय पत्ती महंगी हो गई है, नहाने का साबुन महंगा हो गया है. आप जिस भी चीज़ का नाम लेंगे उसके भाव पहले से बढ़ गए हैं और महंगाई पर मार करने वाले अब चुप्पी साध गए हैं.

कुछ नीतिगत फैसलों से ये महंगाई काबू हो सकती है. थोड़े से विश्लेषण से ही समझ आता है कि सरकार सिर्फ दूर खड़ी महंगाई को बढ़ते देख रही है, या उसमें योगदान कर रही है. और ये महंगाई सीधे गरीब की कमर तोड़ रही है.

रसोई गैस से महंगाई के मॉडल को समझते हैं

आपको इंटरनेट पर कितने ही पुराने वीडियो मिल जाएंगे जब प्रधानमंत्री ने गरीबों के लिए रसोई गैस की अहमियत समझाई हो. मई 2016 में केंद्र की सरकार ने उज्ज्वला गैस योजना शुरू की थी. गरीब परिवारों को फ्री गैस कनेक्शन देने की योजना. 8 करोड़ गरीब परिवारों को इस योजना में गैस कनेक्शन दिए जाने का श्रेय कितनी ही बार चुनावी मंचों से लिया गया. अच्छी बात है कि देश के गरीबों को रसोई गैस के चूल्हे मिले, कनेक्शन मिले. पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के दिए डेटा के हिसाब से देश में 95 फीसदी घरों में गैस का कनेक्शन है. यानी देश के लगभग हर घर में गैस का सिलेंडर है. और इसीलिए जब सिलेंडर के दाम बढ़ते हैं तो देश के हर घर पर उसका बोझ पड़ता है.Pause
1 जुलाई से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने रसोई गैस सिलेंडर पर 25 रुपये 50 पैसे बढ़ा दिए. दिल्ली में अब एलपीजी का 14.2 किलो वाला सिलेंडर 834 रुपये 50 पैसे का हो गया है. पहले बिना सब्सिडी वाले एक सिलेंडर के 809 रुपये लगते थे. पिछले 6 महीने में रसोई गैस के सिलेंडर पर 140 रुपये बढ़ गए हैं. और अगर 7 साल का हिसाब निकालें तो गैस के दाम दोगुने हो गए हैं. पिछले दिनों केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने संसद में बताया था कि मार्च 2014 में एलपीजी सिलेंडर की रेट 410 रुपये थी. अब सिलेंडर 834 रुपये का मिलता है, यानी दोगुने से भी ज़्यादा. सरकार इस महंगाई को अंतर्राष्ट्रीय कीमतों के जिम्मे डालकर बचने का रास्ता खोजती है. लेकिन बढ़ी कीमतों पर सब्सिडी वाली राहत देना भी तो सरकार का ही काम है. ये बात सही है कि एलपीजी गैस की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के हिसाब से तय होती हैं. देश में आधी से ज्यादा रसोई गैस बाहर से आयात होती है. गैस के भाव इम्पोर्ट पैरिटी प्राइस के फॉर्मूले से तय होते हैं. इस फॉर्मूले में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में एलपीजी के भाव के साथ ही समुद्री किराया, पोर्ट ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी ये सब मिलाकर डॉलर में रेट तय होती है. डॉलर वाली रेट को फिर भारतीय रुपयों में कंवर्ट कर रेट निकाली जाती है. इसके बाद ऑयल मार्केटिंग कंपनियां देश के अलग अलग हिस्सों में गैस पहुंचाने का किराया भाड़ा, सिलेंडर में भरने का खर्चा, डीलर का कमिशन, जीएसटी ये सब जोड़कर प्रति सिलेंडर की रेट निकालते हैं. तो अब इसमें अगर डॉलर के मुकालले रुपया कमज़ोर होता है या फिर अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में गैस के दाम बढ़ते हैं तो भारत में भी कंपनियां एलपीजी के दाम बढ़ाती हैं.

सरकार LPG में टैक्स बढ़ाकर नहीं कमा सकती तो सब्सिडी घटाकर पैसा बचा रही?

दाम बढ़ने पर भी जनता को कम कीमत में रसोई गैस मिले, इसके लिए सब्सिडी सरकार देती थी. जो अब लगभग बंद हो गई है. नियम के मुताबिक तो सिर्फ 10 लाख से ज्यादा कमाई वाले कर दाता या जिन्होंने सब्सिडी स्वेच्छा से छोड़ी उन्हें ही नहीं मिलनी चाहिए. बाकी सब सब्सिडी के हकदार हैं. लेकिन सरकार ने चुपके से लगभग सबके लिए ही सब्सिडी बंद कर दी. पेट्रोलियम मंत्री कहते हैं कि सब्सिडी बंद नहीं हुई है. टेक्निकली ये बात भी सही है. सब्सिडी पूरी तरह से बंद नहीं हुई, लेकिन ज्यादातर लोगों को नहीं मिल रही है. आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं. वित्त वर्ष 2020-21 के लिए सरकार ने बजट में रसोई गैस और केरोसिन पर 40 हज़ार 915 करोड़ रुपये सब्सिडी के लिए रखे थे. पूरे साल में सरकार ने करीब 39 हज़ार करोड़ खर्च किए. लेकिन इस बजट में सरकार ने रसोई गैस और केरोसिन पर सब्सिडी को घटाकर एक तिहाई कर दिया है. इस साल 14 हज़ार करोड़ ही रसोई गैस और केरोसिन पर सब्सिडी के लिए रखा गया है. यानी सरकार एलपीजी में टैक्स बढ़ाकर नहीं कमा सकती तो सब्सिडी घटा कर पैसा बचा रही है. इसीलिए जब कंपनियां गैस पर दाम बढ़ाती हैं तो सीधे आम लोगों की जेब से निकलता है. रसोई गैस का मामला भी लगभग डीज़ल और पेट्रोल की तरफ बाज़ार के हवाले हो गया.

अब पेट्रोल- डीज़ल की बात करते हैं

लगभग हर रोज़ पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ रहे हैं. 10 से ज़्यादा राज्यों में पेट्रोल का भाव 100 रुपये के पार जा चुका है. सत्ता पक्ष के नेता इसे सही ठहराने वाले तर्क देते हैं. कोई नेता कहता है कि तेल महंगा हो गया तो साइकिल से चलना चाहिए, कोई तेल के दाम बढ़ने को पिछली यूपीए सरकार की गलती बताता है. आज वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन से भी ये सवाल पूछा गया. उन्होंने जिम्मा राज्यों पर डाल दिया, कहा कि केंद्र का टैक्स तो फिक्स है, राज्य बढ़ाते रहते हैं.

पूछने को वित्त मंत्री से ये भी पूछा जा सकता है कि ज्यादातर राज्यों तो एनडीए की ही सरकार है. उन राज्यों से वैट कम करवा मिसाल क्यों नहीं देते. दूसरी तरफ, ये सही बात है कि कई राज्यों ने वैट बढ़ाया है, लेकिन केंद्र सरकार ने भी तो एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ाई है. केंद्र की सरकार अभी 32 रुपये 90 पैसे पेट्रोल पर एक्साइज़ ड्यूटी लेती है. डीज़ल पर 31 रुपये 80 पैसे एक्साइज़ ड्यूटी है. ये टैक्स कितना बढ़ा है, तीन साल पुराने आकड़ों की तुलना से समझ आएगा. 2018 में पेट्रोल पर 17 रुपये 98 पैसे एक्साइज़ ड्यूटी थी. डीज़ल पर 13 रुपये 83 पैसे थी. अब डीज़ल पर भी ढाई गुना ज्यादा एक्साइज़ ड्यूटी ली जाती है. और इसका असर केंद्र सरकार की कमाई में भी दिखता है. पेट्रोलियम मंत्री ने संसद को बताया था कि 2013 में पेट्रोल-डीज़ल पर टैक्स से सरकार की कमाई 52 हज़ार 573 करोड़ थी. 2019-20 में ये बढ़कर 2 लाख 13 हज़ार करोड़ रुपये हो गई. और 2020-21 के सिर्फ 11 महीने में कमाई बढ़कर 2 लाख 94 हज़ार करोड़ हो गई. यानी सरकार ने 7 साल में पेट्रोल-डीज़ल से अपनी कमाई 5 गुना से भी ज्यादा बढ़ा ली है.

कोरोना आने से सरकार को टैक्स बढ़ाने की नई वजह मिल गई?

दो साल पहले जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतें कम थी तो सरकार ने टैक्स बढ़ाए ताकि लोगों को फायदा मिलने के बजाय टैक्स से सरकार की तिजौरी भरे. तब उम्मीद ये लगाई गई थी कि तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बढ़ेंगी तो सरकार टैक्स घटा देगी. ताकि जनता पर बोझ ना आए. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. सरकार को तेल से कमाई का चस्का लग गया. कोरोना आने से सरकार को टैक्स बढ़ाने की नई वजह मिल गई. अब केंद्र और राज्य दोनों की सरकारें कोरोना से नुकसान का तर्क देकर तेल पर जनता की जेब से पैसा निकाल रही हैं.
अब सवाल उठता है कि क्या सरकार के पास अपना घाटा पाटने का ये ही एक ज़रिया है. कोरोना से अर्थव्यवस्था को नुकसान दुनिया के और भी देशों में हुआ है. लेकिन वहां जनता पर बोझ डालने के बजाय आर्थिक मदद दी गई. हमारे पास अमेरिका का उदाहरण है. कैपटलिस्ट इकनॉमी का दुनिया के लिए मॉडल. वहां कॉरपोरेट टैक्स बढ़ाए जा रहे है. यानी गरीबों के बजाय वसूली अमीरों से हो रही है. बाइडन सरकार ने अगले 15 साल में कॉरपोरेट टैक्स से कमाई ढाई अरब डॉलर बढ़ाने की प्लान तैयार किया है. भारत में उल्टा है. कॉरपोरेट टैक्स में ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस के नाम पर छूट दी गई थी. और इसके बजाय पेट्रोल-डीज़ल जैसे चीज़ों पर टैक्स बढ़ाकर गरीब की जेब से पैसा निकाला जा रहा है. अगर सरकार अपना खर्चा काबू नहीं कर पा रही है, तो इसमें दोष सरकार की आर्थिक नीतियों का माना जाएगा. पेट्रोल-डीज़ल को सरकार सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकती कि जब मन हुआ टैक्स बढ़ा दिया. उम्मीद है केंद्र और राज्यों की सरकारें उस गरीब जनता पर तरस खाएंगी, जिनकी कमाई, नौकरियां पहले ही कोरोना और लॉकडाउन ने छीन ली है. और अब महंगाई ने उनका जीना मुश्किल कर दिया है.


विडियो- OPEC देशों की बैठक का भारत में पेट्रोल की कीमतों पर क्या असर होगा?

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