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BSF सीमा से 50 KM के दायरे में गिरफ्तारी का हक क्यों चाहती है?

सीमा सुरक्षा बल. माने BSF. वो फोर्स, जो भारत की सीमाओं की पहरेदार है. जिसका सामना दुश्मन से कभी भी हो सकता है. लेकिन उसे अपने बर्ताव में हमेशा अंतरराष्ट्रीय नियम, कायदों और परंपरा का ध्यान रखना पड़ता है. और दुश्मन भी सिर्फ एक तरीके का नहीं. कोई अपराधी, कोई तस्कर तो कोई आक्रांता. ज़ाहिर है, ये फोर्स एक बड़ी ज़िम्मेदारी निभाती है. आज सीमा सुरक्षा बल का 57 वां स्थापना दिवस है. और दी लल्लनटॉप परिवार इस मौके पर BSF परिवार को ढेरों शुभकामनाएं भेजता है.

लेकिन आज BSF की चर्चा सिर्फ इसलिए नहीं होगी, क्योंकि उसका जन्मदिन है. BSF के सबसे बड़े अधिकारी का एक बयान आया है. जिसमें उन्होंने कहा कि सीमावर्ती इलाकों में डेमोग्राफिक चेंज हो रही है. और इसीलिए फोर्स को 50 किलोमीटर तक पूछताछ और गिरफ्तारी के अधिकार दिए गए हैं.

50 किलोमीटर वाली बात पर पहले ही बहुत विवाद हैं. पंजाब और पश्चिम बंगाल खुलकर कह चुके हैं कि वो इस नियम से खुश नहीं हैं  तो आज हम इस बात पर चर्चा करेंगे कि BSF को सीमा से 50 किलोमीटर तक काम करने के अधिकार दिए गए हैं, तो आधार क्या है? और इस आधार में दम कितना है? और पंजाब-बंगाल जैसे राज्यों की चिंताओं को कितनी गंभीरता से लेने की आवश्यकता है.

साल 2012 के अप्रैल महीने की बात है. नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. और प्रधानमंत्री थे मनमोहन सिंह. मोदी ने मनमोहन सिंह सरकार को नाराज़गी भरी एक चिट्ठी लिखी थी. कहा था कि केंद्र की सरकार स्टेट विदइन स्टेट यानी राज्य के भीतर राज्य बनाने की कोशिश में लगी है.

संघीय ढांचे को कमज़ोर करने जैसे कई और भी आरोप चिट्ठी में थे. और चेतावनी दी थी कि जो फैसला लेने जा रहे हैं वो टाल दिया जाए. किस बात पर नाराज़ थे मोदी. सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ को लेकर यूपीए सरकार के फैसले के खिलाफ.

तब मनमोहन सिंह सरकार बीएसएफ का अधिकार क्षेत्र बढ़ाने को लेकर एक बिल लाई थी. बिल में ये था कि बीएसएफ जहां भी पोस्टेड हो, वहां पूरे इलाके में सर्च करने, गिरफ्तारी और सामान जब़्त करने का अधिकार बीएसएफ को हो. तब पी चिदंबरम गृह मंत्री थे और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिदंबरम ने बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र को बढ़ाना ज़रूरी माना था. हालांकि तब कई गैर-यूपीए राज्य सरकारों के विरोध की वजह से बिल संसद में नहीं आ पाया था.

अब फास्ट फॉर्वर्ड करके 2021 में आते हैं. मोदी सरकार ने बीएसएफ को लेकर नियम में बदलाव किया और विपक्षी पार्टियां विरोध में आ गईं. अब कांग्रेस और टीएमसी जैसी विपक्षी पार्टियां कह रही हैं कि संघीय ढांचे को कमज़ोर करने की कोशिश हो रही है, जबकि सरकार कह रही है कि फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़रूरी है.

राष्ट्रीय सुरक्षा. देश की हर राजनीतिक पार्टी आपको ये कहती मिल जाएगी की राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए. लेकिन ये सिर्फ कहने भर की बात है. राजनीति खूब होती है. जैसे और मुद्दों पर हमें दिखता है,  वैसे ही राष्ट्रीय सुरक्षा के किसी नियम-कानून पर भी कोई पार्टी सरकार में रहती है तो उसका स्टैंड कुछ होता है,  विपक्ष में आती है तो कुछ और होता है.

लेकिन पक्ष और विपक्ष वाली राजनीति के आगे राष्ट्र के लिए क्या ज़रूरी है? राष्ट्र की सुरक्षा के लिए क्या ज़रूरी है? क्या बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र पर जिस तरह से केंद्र और राज्य सरकारें अभी भिड़ रही हैं, वो विशुद्ध राजनीति है, या उसमें कुछ जायज़ चिंताएं हैं? इस पर तथ्यों और तर्कों के साथ आज विस्तार से बात करते हैं.

पहले तो बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र का मतलब समझिए. आप जानते ही हैं कि बीएसएफ हमारी स्थलीय सीमा की प्रहरी है. जम्मू कश्मीर से लेकर गुजरात तक पाकिस्तान की बॉर्डर पर. फिर बंगाल से लेकर मिज़ोरम तक बांग्लादेश बॉर्डर पर.

आगे मिज़ोरम से मणिपुर और नागालैंड तक भारत – म्यांमार सीमा पर बीएसएफ की तैनाती है. लेकिन यहां ये भी समझिए कि तैनाती का मतलब ये नहीं है कि सिर्फ सीमा पर खड़े होती हैं. सीमा से अंदर की तरफ भी कुछ किलोमीटर का अधिकार क्षेत्र मिलता है.

अंग्रेज़ी में कहते हैं ज्यूरिस्डिक्शन एरिया. अपने ज्यूरिस्डिक्शन एरिया में बीएसएफ संदिग्ध व्यक्ति या जगह की तलाशी ले सकती है, कोई सामान ज़ब्त कर सकती है. और गिरफ्तारी भी कर सकती है. किसी के गैरकानूनी तरीके से भारत में घुसने या हथियारों और ड्रग्स जैसी चीज़ों की तस्करी रोकने के लिए बीएसएफ तलाशी, गिरफ्तारी जैसे काम करती है. और जब बीएसएफ को बनाया गया था, तब से ये अधिकार बीएसएफ के पास हैं.

देश में कई कानून हैं जिनके तहत बीएसएफ को ये पावर दिए गए हैं. जैसे अगर कोई गैरकानूनी तरीके से भारत में घुसता है तो पासपोर्ट (एंट्री इनटू इंडिया) एक्ट 1920,  पासपोर्ट एक्ट 1967 के तहत बीएसएफ कार्रवाई करती है. इसके अलावा आर्म्स एक्ट, या ड्रग्स के मामले में NDPS एक्ट, या कस्टम एक्ट् या इस तरह के और कानूनों के हिसाब से बाकी मामलों में बीएसएफ कार्रवाई करती है.

हालांकि बीएसएफ की ताकत का दायरा सर्च, अरेस्ट और सीज़ तक ही है. बीएसएफ FIR दर्ज नहीं करती है. इन्वेस्टिगेशन की पावर भी नहीं. ये काम स्थानीय पुलिस का होता है. किसी अपराध या गिरफ्तारी की सूचना बीएसएफ स्थानीय पुलिस को देती है, बाकी काम फिर स्थानीय पुलिस का होता है.

अरेस्ट या सर्च भी बीएसएफ एक सीमित दायरे में कर सकती है. ये ही बीएसएफ का ज्यूरिस्डिक्शन एरिया होता है. इसके आगे बीएसएफ वाले किसी को गिरफ्तार करने जाएंगे तो लोकल पुलिस को साथ लेना पड़ेगा.

ज्यूरिस्डिक्शन एरिया किस राज्य के लिए कितना होगा, इस पर केंद्र सरकार समय समय पर नियम बनाती रहती है. इस बारे में 2014 के जुलाई महीने में केंद्र सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी किया था. इसमें कहा था कि मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय का पूरा इलाका बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र में आएगा.

गुजरात में सीमा से 80 किलोमीटर अंदर, राजस्थान में 50 किलोमीटर तक. इसके अलावा पंजाब, पश्चिम बंगाल और असम में सीमा से 15 किलोमीटर तक बीएसएफ का अधिकारक्षेत्र रहेगा. यानी इतने इलाके में बीएसएफ वाले अरेस्ट, सर्च और सीज़ कर सकते हैं.

यहां तक तो सब ठीक था. लेकिन झगड़ा शुरू हुआ पिछले महीने निकाले गए नए आदेश के बाद. 11 अक्टूबर को मोदी सरकार ने नया नोटिफिकेशन निकाला. इसमें सभी राज्यों के लिए बीएसएफ का अधिकार क्षेत्र 50 किलोमीटर तय कर दिया. माने गुजरात में जो पहले 80 किलोमीटर था, वो घटकर 50 हो गया.

राजस्थान में पहले 50 था ही. पंजाब, असम और पश्चिम बंगाल में 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 50 किलोमीटर कर दिया. और यहीं से झगड़ा शुरू हो गया.

असम में बीजेपी की सरकार है,  वहां से तो कोई आपत्ति नहीं आई. लेकिन पंजाब और पश्चिम बंगाल की सरकारें लगातार केंद्र के फैसले का विरोध कर रही हैं. पंजाब विधानसभा में केंद्र के फैसले के खिलाफ प्रस्ताव भी पास कर दिया गया.

दोनों राज्यों का आरोप है कि ये सीधा सीधा राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में दखल है. माने, पुलिस का काम राज्य की चुनी हुई सरकार के हाथ में होना चाहिए, लेकिन अब ये काम बीएसएफ के ज़रिए केंद्र के हाथ में आ गया है.

राज्यों का दूसरा तर्क ये है कि अगर केंद्र को ये फैसला लेना ही था तो मुख्यमंत्रियों की सलाह क्यों नहीं ली गई. उनकी चिंताएं भी सुननी चाहिए थी. संसद में भी सरकार से सवाल पूछा गया कि क्या मुख्यमंत्रियों से पूछा गया था.

इस पर सरकार ने जवाब दिया है कि – बीएसएफ एक्ट 1968 के सेक्शन 139 (1) के केंद्र सरकार को ये ताकत देता है कि वो कोई भी सेंट्रल एक्ट उन पर लागू कर सकते हैं. यानी मोदी सरकार ने जताया कि बिना सलाह मशवरे के भी नोटिफिकेशन निकालने का हक उनके पास है.

अब ये सही बात है कि नए नियम से पंजाब और बंगाल के कई शहर बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र में आ जाएंगे. गुरुदासपुर, अमृतसर, तरन तारण साहिब, फरीदकोट, मुख्तसर साहिब. ये सारे शहर सीमा से 50 किलोमीटर से कम के दायरे में हैं.

इसी तरह पश्चिम बंगाल में अलीपुर द्वार, कूच बिहार, इस्लामपुर, मालदा जैसे इलाके सीमा से 50 किलोमीटर वाले दायरे में आते हैं. लेकिन क्या बीएसएफ का अधिकार क्षेत्र इन शहरों तक होने का मतलब ये होगा कि यहां राज्य की पुलिस के बजाय बीएसएफ का ज्यादा पावर रहेगा?

बीएसएफ को बढ़े हुए ज्यूरिस्डिक्शन में सिर्फ पासपोर्ट एंट्री टू इंडिया के एक सेक्शन और पासपोर्ट एक्ट के दो सेक्शन के तहत ही काम करने की छूट दी गई है. यानी ज्यादा गैरकानूनी घुसपैठ रोकने का काम ज्यादा होगा. अब भी आर्म्स एक्ट या ड्रग्स से संबंधित एनडीपीएस एक्ट के तहत बीएसएफ का अधिकार क्षेत्र 15 किलोमीटर तक ही है,

पंजाब, बंगाल और असम में. मतलब ये कि बीएसएफ को फुल छूट नहीं दी गई है. बीएसएफ के डीजी पंकज कुमार सिंह ने भी कहा है कि हम राज्यों की पुलिस के साथ मिलकर काम करते हैं, उनके अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं कर करते हैं.

अब आते हैं कि इस सवाल पर कि बीएसएफ को ज्यादा अधिकार क्षेत्र क्यों दिया गया है, या बीएसएफ की तरफ से क्यों ऐसी मांगें होती हैं. हमने बांग्लादेश सीमा पर तैनात अधिकारियों से बात करके दिक्कतें समझने की कोशिश की. तीन चार चीज़ें हमें मालूम पड़ीं.

पहली ये कि बीएसएफ का दायरा कम होने का फायदा तस्कर उठाते हैं. वो बॉर्डर से 15-20 किलोमीटर दूर लाकर गायों को इकट्ठा कर लेते हैं. फिर रात में एक साथ बॉर्डर की तरफ दौड़ाते हैं. और इस तरीके से तस्करी को रोकना मुश्किल हो जाता है. अगर बीएसएफ का दायरा बढ़ा होगा तो ऐसे तस्करों को पहले ही रोका जा सकता है.

दूसरी दिक्कत- किसी तस्कर या घुसपैठिए को 15 किलोमीटर के दायरे के बाद चेज करना मुश्किल होता है. क्योंकि उसके बाद बीएसएफ को स्थानीय पुलिस की मदद लेनी पड़ती है. और स्थानीय पुलिस बाकी कामों में उलझी रहती है, उनको लगता है कि तस्करी रोकना तो बीएसएफ का काम है, हम क्यों इस तरफ उलझें.

बीएसएफ के अधिकारी ने तीसरी वजह ये बताई कि तस्करी के बड़े अपराधी सीमावर्ती इलाके के बाहर बीएसएफ के दायरे के बाहर रहते हैं, स्थानीय पुलिस से उनकी शिकायत भी करें तो कभी राजनैतिक कारणों से या कभी किसी और कारण से उन पर कार्रवाई नहीं हो पाती है. और फिर बीएसएफ को तस्करी का नेटवर्क तोड़ने में मुश्किलें आती हैं.

ये तो बांग्लादेश बॉर्डर की बात. पंजाब में दिक्कतें दूसरी हैं. अब पाकिस्तान की तरफ से ड्रोन से हथियार या ड्रग्स की सप्लाई होती है. और ये बात सामने आई है कि सरहद से करीब 20 किलोमीटर दूर ड्रोन्स से पैकेट्स ड्रॉप होते हैं. तो बीएसएफ वाले कह रहे हैं कि दायरा बढ़ेगा तो ड्रोन्स वालों पर नज़र रख पाएंगे.

इसके अलावा बीएसएफ के डीजी पंकज सिंह ने कहा है कि सीमावर्ती इलाकों में डेमोग्राफिक चेंज हो रहा है. इस बात से उनका क्या मतलब है, प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनसे पूछा गया, उन्होंने कहा कि मेरे पास ये साबित करने के लिए डेटा है. क्या धर्मों की आबादी में बदलाव पर बात कर रहे थे, या कुछ औऱ ये तय नहीं है.

बीएसएफ कह रही है कि उन्हें ज्यादा अधिकार क्षेत्र चाहिए, सरकार कह रही है कि ये ही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है. लेकिन बंगाल और पंजाब इस नियम के विरोध में अड़े हैं. राज्यों की चिंता पर लोकसभा में भी सरकार ने जवाब दिया. लोकसभा में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने सवाल के लिखित जवाब में कहा कि पंजाब और बंगाल की चिंता आधारहीन है. बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने से सरहद पार वाले अपराधों को कंट्रोल करना बेहतर होगा और बीएसएफ राज्य की पुलिस के साथ ही मिलकर काम करेगी.

तो हमने दोनों तरफ के तर्क आपको बताए. अब आप तय करिए कि कौन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज्यादा चिंतित है.


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