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क्यों बड़ी कंपनियों के मालिक खुद अपनी कंपनी नहीं चलाते?

जैक डोर्सी, बिल गेट्स और स्टीव जॉब्स, ()बाएं से दाएं) तीनों क्रमशः ट्विटर,माइक्रोसॉफ्ट,और ऐपल में सीईओ रहे, और फिर हटाए गए. लेकिन क्या सीईओ न रहने से इनका अपनी कंपनियों से ताल्लुक ख़त्म हो गया? (फोटो सोर्स - इंडिया टुडे)

मान लीजिए आप एक कंपनी के मालिक हैं. और एक दिन आप अपने ऑफिस के गेट पर रोक लिए जाते हैं. आपको एक पिंक स्लिप थमा दी जाती है और कह दिया जाता है कि अब आपकी ज़रूरत नहीं है. क्या ऐसा संभव है?

स्टीव जॉब्स. नाम तो सुना ही होगा. Apple के Ex. CEO यानी चीफ़ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर और एक्स. प्रेसिडेंट ऑफ़ बोर्ड डायरेक्टर्स. ऐपल को कंप्यूटर की दुनिया में सबसे बड़ा और भरोसेमंद नाम बनाने वाले स्टीव को खुद ऐपल से इस्तीफ़ा देना पड़ा था. शुरुआत के दस साल में ही ऐपल 2 बिलियन डॉलर की कंपनी बन गई थी, यानी बिज़नेस ठीक-ठाक चल रहा था. लेकिन ऐपल की देखा-देखी दूसरी कंपनियों ने भी वैसे ही कंप्यूटर बाज़ार में उतारने शुरू कर दिए. और मार्केट में ऐपल की हालत बद से बदतर होने लगी. इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया स्टीव जॉब्स को. और जॉब्स को कंपनी से इस्तीफ़ा देना पड़ा. हालांकि, बाहर जाकर स्टीव ने एक और कंपनी खोली- नेक्स्ट नाम से. और जब ऐपल ने इस कंपनी को खरीदा तो स्टीव की भी वापसी ऐपल में हो गई. और अपनी इस दूसरी पारी में स्टीव ने कमाल कर दिया. इतना बड़ा कमाल कि आज स्टीव के न रहने के बाद भी ऐपल का मतलब स्टीव जॉब्स है.

स्टीव जॉब्स (फोटो सोर्स- आज तक)

इसी से मिलती-जुलती ताज़ा खबर ट्विटर (Twitter) की है. ट्विटर के CEO जैक डोर्सी (Jack Dorsy) ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है, और उनकी जगह नए CEO बने हैं- इंडिया के पराग अग्रवाल. हालांकि, ये सिर्फ़ मिलता-जुलता उदाहरण है, सेम नहीं. क्योंकि दोनों में ‘स्वेच्छा’ का अंतर है.

वैसे सिर्फ ट्विटर, ऐपल की ही बात नहीं. लिस्ट लंबी है उन तमाम बड़ी कंपनियों के मालिकों की, जो अपनी ही कंपनी के CEO नहीं रहे. जैसे माइक्रोसॉफ्ट, टेस्ला, एमेजॉन, अलीबाबा वगैरह.

साफ़ है कि कंपनी का मालिक भी कंपनी से बेदखल किया जा सकता है. और कई बार CEO खुद भी कंपनी से अलग होते हैं, या अपना पद छोड़ते हैं. अब कई सवाल खड़े होते हैं, जैसे – CEO का टर्मिनेशन किस आधार पर होता है, उसकी क्या प्रक्रिया है, मालिकाना हक़ किन तरीकों से खत्म होता है और बड़ी कंपनियों के CEO अपना पद कैसे छोड़ते हैं, आइए एक-एक करके समझते हैं.

पराग अग्रवाल और जैक डोर्सी (फोटो सोर्स – businesstoday.in)

बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स और उनकी ताकत

अगर कोई व्यक्ति कुछेक लोगों के मैन-पॉवर के साथ एक छोटी सी कंपनी चला रहा है, तो बात अलग है. यहां ज्यादा मन-मर्ज़ी चलाई जा सकती है, फिर लोग कहते हैं मेरा बॉस खडूस है वगैरह-वगैरह. और ऐसे बॉस का जॉब-टर्मिनेशन तो नहीं ही हो सकता. उल्टे आपने ऐसी डिमांड की तो पिंक स्लिप के लिए तैयार रहिए. बाहर का रास्ता उधर है टाइप, कुछ आपको सुनने को मिल सकता है.

अब आइए बड़े कॉर्पोरेट की तरफ़. कॉर्पोरेशन के नियमों के मुताबिक़ कंपनी का एक बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स होता है. फिल्मों में देखा होगा कुछ लोग बैठे हैं- सूट-बूट पहने और कंपनी की पॉलिसी या प्रोडक्ट लॉन्च पर बात चल रही है. बिल्कुल वैसा ही. सबसे ज़रूरी बात नोट कर लीजिए-

कंपनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स कंपनी के कर्मचारी, या सिर्फ़ कर्मचारी, नहीं होते. ये होते हैं कंपनी के शेयर होल्डर्स. मतलब अगर कंपनी में कुछ हिस्सेदारी कंपनी के फ़ाउंडर की है तो कुछ हिस्सेदारी इनकी भी होगी. तभी तो आपने कई बार सुना होगा कि कंपनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में कंपनी के मालिक की पत्नी, बेटा, बेटी वग़ैरह भी होते हैं. क्यों? क्योंकि उस कंपनी में उनकी भी हिस्सेदारी होती है.

अब देखिए बेशक कंपनी के मालिक या फ़ाउंडर के पास सबसे ज़्यादा शेयर हों. लेकिन बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के पास कुल मिलाकर तो कंपनी के मालिक से ज़्यादा ही शेयर होंगे न? (वेल ज़्यादातर केसेज़ में). इसे एक उदाहरण से भी समझिए-

आनंद महिंद्रा की बोर्ड मीटिंग (प्रतीकात्मक तस्वीर – इंडिया टुडे)

किसी स्टार्टअप की शुरुआत में कंपनी का फाउंडर यानी संस्थापक 100% इक्विटी का मालिक होता है. आसान भाषा में कहें तो ज़र्रे-ज़र्रे पर उसका मालिकाना हक़ होता है. अगर फाउंडर एक से ज्यादा हैं तो ये हक़ उसी अनुपात में बंट जाता है. कंपनी से जुड़े सारे निर्णय यही फाउंडर लोग लेते हैं. लेकिन जब कंपनी को बिज़नेस बढ़ाना होता है, या कंपनी को नेक्स्ट लेवल पर ले जाना होता है, तब ज़रूरत होती है फंड रेज करने की. ज्यादातर बड़ी कंपनियां हिस्सेदारी बेचकर ही फंड रेज़ करती हैं. अब कंपनी की इक्विटी या हिस्सेदारी बेचने का मतलब हुआ, मालिक ने कंपनी में अपना मालिकाना हक़ बेच दिया. और ऐसा जितनी बार होगा और जितना ज्यादा होगा, कंपनी में उन लोगों की तादात बढ़ती जायेगी जो कंपनी के डिसिजन लेते हैं.

CEO का टर्मिनेशन

तो साफ़ है कि कंपनी के अब ढेर सारे मालिक हैं. और अगर उन्हें लगेगा कि कंपनी में लगाया उनका पैसा डूब रहा है तो वो कंपनी के फ़ाउंडर को CEO के पद से हटा सकते हैं. ऑफ़ कोर्स वोटिंग करके. मानिए कंपनी के फ़ाउंडर के पास अब भी सबसे ज़्यादा, यानी 30% शेयर्स हैं. लेकिन अन्य सात लोगों के पास 10-10%. अब अगर बाकी सात, या ईवन छः लोग भी चाहते हैं कि कंपनी का फ़ाउंडर या कंपनी का मालिक, अब कंपनी का CEO न रहे, तो ये 30% मालिकाना हक बनाम 70% मालिकाना हक की लड़ाई हो जाएगी. ऐसे में वोटिंग में मालिक या फ़ाउंडर ही कंपनी से आउट हो जाएगा. बेशक उसके पास 30% शेयर्स अब भी होंगे. जैसा कुछ-कुछ जेफ़ बेजोस के केस में हुआ था.

साफ़ है कि CEO या कंपनी का मालिक भी इस अपेक्षा के परे नहीं है कि उसे अपने काम में अच्छी परफॉरमेंस देनी होती है, बल्कि बाकी इम्प्लॉईज की तरह उसके सर पर भी जॉब जाने की तलवार लटकी रहती है. ख़ास तौर पर तब, जब वो अपनी कंपनी के शेयरहोल्डर्स या बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के एक्स्पेक्टेशन के मुताबिक़ परफॉर्म न कर रहा हो. कारण है ऊपर समझाई गई गणित.

एक बात और

अगर कंपनी का मालिक अच्छी परफ़ॉरमेंस भी दे रहा और सभी उससे प्रसन्न हैं तो भी कंपनी पर ज़्यादा शेयर्स का मालिकाना हक रखने वाले की ही चलेगी और वो ऑल्मोस्ट मन-मर्ज़ी से, ज़्यादा से ज़्यादा कोई लेम सा एक्सक्यूज़ देकर मालिक को निकाल सकते हैं.

आपने देखा ही होगा मूवीज़ में कि 51% शेयर का मालिक होने के बाद मूवी का नायक, खलनायक को कैसे कंपनी से बेदख़ल करता है. लेकिन आप गणित जानते हैं और समझते हैं कि कंपनी के CEO पद से बेशक खलनायक बेदख़ल हो गया. बेशक अब कंपनी के बड़े निर्णय वो नहीं ले सकता. लेकिन कंपनी के लॉस-प्रॉफ़िट में उसका अब भी उतना ही हक है जितना CEO के पद से निकाले जाने से पहले था.

पेटीएम ने हाल ही में अपना आईपीओ लांच किया है, यानी अब पेटीएम की हिस्सेदारी आम इन्वेस्टर्स के पास भी है (फोटो सोर्स – इंडिया टुडे)

पर इसमें एक और कैविएट या एक और कंडीशन भी है. मान लीजिए आपके पास कंपनी के 51% शेयर्स हैं. तो भी कई स्थितियों में बोर्ड एक सामूहिक निर्णय लेकर आपको कंपनी के CEO के पद से बर्ख़ास्त कर सकता है. लेकिन आमतौर पर नहीं, ख़ास परिस्थितियों में.

किंतु इस पिछले कैविएट में आप कहेंगे कि गणित कहां गई? तो ये जानिए कि 51 फीसदी वोट वैल्यू वाले शेयर्स का मालिक चाहें तो उस पूरे बोर्ड को ही हटा दे, जिस बोर्ड ने उसे CEO के पद से हटाया है, लेकिन सामान्य तौर पर ये  व्यावहारिक नहीं है. मतलब कुल मिलाकर मामला गणित पर जाकर ही अटकता है. फिर कोर्ट-कचहरी चाहे जितनी हो, लेकिन आसान भाषा में एक बात याद रखिए- जिसके पास नंबर्स होंगे, चलेगी उसी की.

बड़ी कंपनियों के मालिक पद क्यों छोड़ देते हैं?

अब ऐपल वाले उदाहरण को समझने के बाद ट्विटर और अलीबाबा वाले उदाहरण समझते हैं. ज्यादातर बड़ी कंपनियों के CEO खुद कंपनी नहीं चलाते या कुछ वक़्त बाद अपने CEO के पद से हट जाते हैं. कारण कई होते हैं:

# CEO का बुजुर्ग हो जाना

# CEO को ये डर कि उसे वोटिंग करके निकाला जाए, इससे अच्छा वो ख़ुद निकल जाए

# CEO चाहता है कि उसकी कंपनी के टॉप में कोई विशेषज्ञ आए. अभी तक तो कंपनी छोटी थी तो चल गई पर अब कोई मैनेजमेंट को समझने वाला अनुभवी व्यक्ति आए. 

# इकनॉमिक्स के पहले ही कुछ पाठों में पढ़ा दिया जाता है कि दुकान और दुकानदार दोनों अलग है. तो ज़रूरी नहीं कि कंपनी का मालिक या कंपनी का सबसे बड़ा स्टेकहोल्डर या कंपनी का फ़ाउंडर ही ख़ुद को टॉप पोस्ट पर रखे और निर्णय ले. आख़िर वो भी तो चाहेगा न कि जितने अच्छे से मैं कंपनी चला रहा हूं, उससे ज्यादा अच्छे से कोई और कंपनी चलाए.    

# कई बार बड़े कॉर्पोरेट अपने बिज़नेस को डाईवर्सीफ़ाई करने की सोचते हैं. उदाहरण के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को ले लीजिए. उनकी कई अलग-अलग कंपनियां हैं.

लास्ट में कुछ और केस स्टडीज़ जो अभी तक के लिखे के बाद और अच्छे से समझ आएगी-

बिल गेट्स बीस साल माइक्रोसॉफ्ट के CEO रहे, Vanityfair नाम की एक न्यूज़ वेबसाइट के मुताबिक, बीस साल तक माइक्रोसॉफ्ट के CEO रहने वाले बिल गेट्स , माइक्रोसॉफ्ट की ही एक एम्पलॉई के साथ रिलेशनशिप में थे, जिसकी इन्वेस्टीगेशन हुई. जब मामले ने तूल पकड़ा तो गेट्स को CEO के पद से रिजाइन करना पड़ा, हालांकि वो बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में बने रहे. इसी तरह इवान विलियम्स को जब जैक डोर्सी ने ट्विटर के CEO की पोस्ट से पुश आउट किया था, तब वो भी 10 साल तक बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की पोस्ट पर बने रहे. और जैक डोर्सी तो इस मामले में जैक स्पैरो हैं, ट्विटर के कर्मचारी कहते हैं कि वो हर बार वापसी का कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते हैं. तो जब तक वो पूरी तरह कंपनी से बाहर नहीं किये जाते, उनका CEO रहना या न रहना एक ही बात है.

हालांकि कई बार CEO का डिमोशन भी होता है, वो उसी उदाहरण के हिसाब से जो हमने आपको पहले बताया है. कंपनी कई बार सीधे CEO को बाहर का रास्ता नहीं दिखाती. बल्कि किसी और पोस्ट पर ले आती है. जैसे CIO यानी चीफ़ इनफार्मेशन ऑफिसर या CTO – चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर. ये दोनों CEO को ही रिपोर्ट करते हैं. कई बार CEO खुद ही अपना पद छोडकर इन पदों पर आ जाते हैं.

गणित का चक्कर

तो अब आपको समझ आ गया होगा कि किसी कंपनी के CEO को उसके पद से हटाया जाना और किसी का मालिकाना हक खत्म होना दरअसल दो अलग बातें हैं. हां, ये दोनों घटनाएं एक साथ भी हो सकती हैं, ये अलग बात है. कब? जब CEO अपने सारे शेयर्स बेच डाले. अब न वो कंपनी का मालिक, न CEO.

और पूरी गणित जांनने के बाद आपको समझ में आ गया होगा कि जितनी बड़ी कंपनी उतना ही ज्यादा पिंक स्लिप का ख़तरा. क्योंकि उसके उतने ज़्यादा हिस्सेदार. और इसलिए ही रिलायंस के 50% शेयर्स के मालिक मुकेश अंबानी हैं. अब आप कहेंगे 51% के क्यों नहीं? चिंता न कीजिए. 50% शेयर्स क्या, रिलायंस और ऐमज़ॉन जैसी बड़ी कंपनियों के 20-30% शेयर्स के मलिक होने पर भी आपका कंपनी में सबसे बड़ा शेयर रहता है. क्योंकि कंपनी इतनी बड़ी है कि उसके 51% शेयर्स आपको एशिया का सबसे अमीर इंसान बना देते हैं. आपको पता है न, जेफ़ बेजोस के पास सिर्फ़ 15% से भी कम शेयर हैं ऐमज़ॉन के. पर जब तक वो स्वेच्छा से नहीं हटे, कोई उनको टस से मस करने वाला न था.

पिछला वीडियो देखें: ट्विटर CEO पराग अग्रवाल, बॉलीवुड सिंगर श्रेया घोषाल की फोटो पर कमेंट क्यों कर रहे थे?

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