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व्लादिमीर पुतिन ने यूरोप के मुहाने पर बमवर्षक जेट क्यों भेजे?

इसी साल यानी 2021 में मई महीने की बात है. उस रोज़ ग्रीस की राजधानी एथंस से एक फ़्लाइट ने उड़ान भरी. इसमें 126 यात्री सवार थे. फ़्लाइट का डेस्टिनशन था, विलनियस लिथूनिया . दोपहर 12 बजकर 30 मिनट तक सब कुछ सही था. तब प्लेन लिथूनिया के बॉर्डर से सिर्फ़ 6 मील की दूरी पर था. और क्रू लैंडिंग की तैयारी कर रहा था. इसी बीच प्लेन के पायलट को अपने रेडियो सिग्नल पर कुछ हलचल सुनाई देती है. दूसरी तरफ़ से आवाज़ आती है, एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल, बेलारूस.

अगला संदेश आया, “प्लेन में एक बम लगा हुआ है जो लिथूनिया में एंटर होते ही एक्टिवेट होगा”. इससे पहले कि पायलट कुछ समझ पाता, प्लेन की दायीं तरफ़ उसे एक मिलिट्री जेट दिखाई दिया, जिस पर बेलारूस का झंडा छपा हुआ था. ये एक मिग-29 जेट था. पायलट को आदेश मिले कि वो मिंक्स की ओर लौटे. मिंक्स बेलारूस की राजधानी है. जबकि नज़दीकी एयरपोर्ट सिर्फ़ 6 मील की दूरी पर था. प्लेन के बाकी यात्रियों को कुछ समझ नहीं आ रहा था. लेकिन इसी प्लेन में दो लोग ऐसे भी बैठे थे, जिन्हें पता था कि बम असल में बम नहीं, बल्कि एक बहाना है.

ये दो लोग थे, रोमन प्रोटोसेविच और उनकी गर्लफ़्रेंड, सोफ़िया सपेगा. प्लेन जैसे ही मिंक्स में उतरा. इन दोनों लोगों को बेलारूस में आतंकी गतिविधियों के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया. प्लेन में बम बताकर हाइजैक किए जाने का ये खेल पूरी दुनिया की आंखों के सामने खेला गया था. और इस खेल के सूत्रधार थे, बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेनको.

रोमन प्रोटोसेविच की गलती सिर्फ़ इतनी थी कि वो अलेक्जेंडर लुकाशेनको के ख़िलाफ़ लिख रहे थे. और यूरोप के इस आख़िरी तानाशाह को ये हरगिज़ मंज़ूर नहीं था. इस घटना से ठीक एक साल पहले लुकाशेनको ने बेलारूस में ‘चुनाव’ करवाए थे. भारी मतों से जीते भी. और जीतते कैसे नहीं, 27 साल से जीत का महामंत्र उनकी जेब में है. वो महामंत्र, जो लुकाशेनको ने ब्लादिमिर पुतिन को दिया और अब चीन में फूंका जा रहा है.

ये महामंत्र है भी असरदार, बाहरी ताक़तों से बचाव के लिए फूंका जाता है. लोग ऐसे मंत्रमुग्ध होते हैं कि तांत्रिक सालों साल सत्ता की कुर्सी क़ब्ज़ाए रह सकता है.

लुकाशेनको का ये महामंत्र अब तेल और नैचुरल गैस की आहुति मांग रहा है. ताकि ज्वालाएं ऐसी भड़कें कि सालों-साल उसका तेज बरकरार रहे.
यज्ञकुंड की आंच पोलेंड और यूरोपियन यूनियन तक भी ज़ा पहुंची है. जिसमें आम लोग स्वाहा-स्वाहा हो रहे हैं. क्या है ये पूरा मामला. आइए जानते हैं.

बिना गूगल मैप के दुनिया का ये नक़्शा अधूरा है, इसलिए गौर फ़रमाइए. बेलारूस, पूर्वी यूरोप का एक छोटा सा देश है. अपनी लोकेशन के चलते ये उतनी ही अहमियत रखता है, जितनी एशिया में पाकिस्तान. इसके पूर्व में रशिया है. पश्चिम और उत्तर में पोलेंड, लातविया, लिथूनिया जैसे देश पड़ते हैं. जिनकी अपनी अहमियत बहुत सीमित है. लेकिन इनके साथ लगा NATO का ठप्पा इन्हें बहुत महत्वपूर्ण बना देता है.

बेलारूस की क्या अहमियत है

जैसा कि पहले बताया इसकी लोकेशन इसे स्ट्रटीजिकली बहुत इम्पोर्टेंट बना देती है. रूस और यूरोप का ‘प्रेम’ जग ज़ाहिर है. इसलिए इस शॉर्ट डिसटेंस रिलेशनशिप में बेलारूस कभी यूरोप से फ़्रेंडज़ोन हो जाता है, तो कभी रूस से.

2014 में जब रूस ने यूक्रेन में क्रीमिया पर हाथ डाला तो बेलारूस यूरोप की गोद में जाकर बैठ गया. लुकाशेनको ने रूस की आलोचना की, और EU यानी यूरोपियन यूनियन ने उसके पापों पर थेम्स नदी का जल छिड़क कर कहा, खूब फूलो फलो. यूरोप ने बेलारूस पर जो आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे, उनमें ढील दी गई. और लुकाशेनको चुनाव की तैयारी में लग गए. 2015 में हुए चुनावों में उन्हें भारी मतों से जीत मिली. अंदरखाने क्या हुआ, इस पर यूरोप आंख मूंदे रहा.

अब अगला दांव पुतिन को चलना था. पुतिन ने तेल और नेचुरल गैस के पाइपों पर अपना पैर रखा और लुकाशेनको की सांस फूलने लगी. रूस से बेलारूस को होने वाली तेल और गैस की आपूर्ति बंद कर दी गई. तब अमेरिका आया और उसने बेलारूस को मदद दी.

2020 में जब यूरोप में कोरोना ने पैर पसारे, तो लुकाशेनको ने कहा, ‘होल्ड माय वोदका’. जनता से कहा गया वोदका पियो और ट्रैक्टर चलाओ. कोरोना की वजह से पहले से ख़राब इकॉनमी और बदतर हो गई. उसी साल यानी 2020 में बेलारूस में दुबारा चुनाव हुए. जनता अब सड़कों पर थी. लुकाशेनको ने विरोधियों को ठोक-पीट कर जेल में डाल दिया. चुनाव पत्र में ‘विजयी भव’ का नारा छपा और लुकाशेनको ने अपना राज आगे बढ़ा दिया.

यूरोप जो अब तक लुकाशेनको के साथ ‘कभी नरम नरम, कभी सख़्त सख़्त’ का कैराओके गा रहा था. उसने चुनाव में धांधली देख अपने सुर बदले. स्टेट स्पॉन्सर्ड हाइजैकिंग का खेल सारी दुनिया के सामने हुआ था. इसलिए यूरोप के लिए ज़रूरी हो गया कि वो कुछ सख़्त कदम उठाए. बेलारूस पर आर्थिक प्रतिबंध दुबारा और ज़्यादा सख़्ती के साथ लगा दिए गए.

लुकाशेनको को एक बार फिर पुतिन का सहारा मिला. बताना ज़रूरी नहीं कि मई में प्लेन हाईजैकिंग की जो घटना हुई थी, उसका इन्सपिरेशन कौन था. अलेक्सी नवल्नी से निपटने के लिए जो स्क्रिप्ट पुतिन ने यूज़ की थी, वो ही प्लेन हाइजैक मामले में दोहराई गई. उस घटना के बाद दोनों नेता मिले और रूस ने बेलारूस के लिए 500 मिलियन डॉलर का लोन सैंक्शन कर दिया.

बदले में पुतिन को क्या मिला?

मौक़ा. यूरोपियन यूनियन से बदला लेने का. कुछ महीने पहले, इसी साल सितम्बर में यूरोपियन ह्यूमन राइट्स कोर्ट (ECHR) ने एक पुराने केस में फ़ैसला सुनाया था. ये केस था अलेक्जेंडर लिविएंको, एक पूर्व रूसी जासूस की हत्या का, जो ब्रिटेन में जा बसा था. (ECHR) ने फ़ैसला देते हुए बताया कि इसमें सीधे-सीधे रूस की सरकार का हाथ था.

ये घटना एक लम्बे ट्रेंड का लेटेस्ट चेप्टर थी. 2016 में ट्रम्प के आने के बाद से ही EU अलग-थलग पड़ने लगा था. और ब्रेक्जिट के चलते भी EU की ताक़त कम हुई थी. EU और रूस में पुरानी अदावत है. इसलिए पुतिन येन-केन प्रकरेण EU को नीचा दिखाने की कोशिश में जुटे थे. और लुकाशेनको उनके पाले में आया तो एक नया खेल शुरू हुआ.

कैरम का रूपक इस्तेमाल करें तो इस खेल को खेलने वाला दरअसल रशिया है. स्ट्राइकर है, लुकाशेनको और गोटी की तरह शरणार्थी यहां से वहां ठेले ज़ा रहे हैं.

लंबे समय से यूरोप शरणार्थियों की समस्या से जूझ रहा है. कर्मफल का सिद्धांत एक लम्बा चक्र पूरा कर उसके दरवाज़े पर पहुंचा है. सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान में दख़ल का परिणाम समस्या के रूप में सामने आ रहा है. युद्ध, ग़रीबी, भुखमरी से बचकर भागते हुए लोग यूरोप के देशों में जाना चाहते हैं. जाना तो अमेरिका भी चाहते हैं, लेकिन वहां ट्रम्प महोदय दीवार बनाकर गए हैं. काम वो भी नहीं आ रही, लेकिन अमेरिका पहुंचने से कहीं आसान है यूरोप में दाखिल होना.

2020 तक शरणार्थी बालकन और मेडीटरेनियन के रास्ते यूरोप में पहुंचते थे. ख़तरों से भरा नाव का लम्बा सफ़र करना होता था. 2021 में माइग्रेशन का एक नया रास्ता खुला. उस रोज़ बेलारूस के सोशल मीडिया में कुछ इश्तिहार दिखने शुरू हुए. ‘राजधानी मिंक्स आइए, और हम आपको टैक्सी से जर्मनी तक पहुंचा देंगे’. बेलारूस की वीज़ा प्रोसेस भी अचानक बहुत आसान कर दी गई.

ये लुकाशेनको की दरियादिली नहीं बल्कि एक नया दांव था. बेलारूस की जनता खुद त्रस्त है, इसलिए कोई शरणार्थी वहां रुकना नहीं चाहता. जो लोग मिंक्स पहुंचते, उन्हें टैक्सी आदि साधन आसानी से मुहैया किए जाते. और बेलारूस और पोलेंड के बॉर्डर तक पहुंचा दिया जाता.

शुरुआत में शरणार्थियों की संख्या कम थी. पोलिश बॉर्डर गार्ड उन्हें डिटेन कर डिटेंशन सेंटर पहुंचा देते. लेकिन धीरे-धीरे हज़ारों की संख्या में लोग बॉर्डर पर इकट्ठा होते गए. अगस्त से लेकर अब तक 30 हज़ार लोग पोलेंड बॉर्डर क्रॉस करने का प्रयास कर चुके हैं.

संख्या बढ़ी तो शरणार्थियों को बॉर्डर से वापस लौटने को कहा गया. लेकिन बेलारूसी अधिकारियों ने इस पर पाबंदी लगा दी. अब ये लोग ना इधर के रह गए थे, ना उधर के.

अफ़ग़ानिस्तान में हुए तख्तापलट के बाद वहां से आए कई शरणार्थी भी पोलेंड बॉर्डर पहुंचे. इसी साल 19 सितम्बर के दिन 4 अफ़ग़ान नागरिक पोलिश बॉर्डर के पास मृत मिले. इनकी मौत हाइपोथरमिया से हुई थी.

पोलिश सरकार पर इस समस्या से निपटने का प्रेशर बढ़ रहा था. नतीजतन उन्होंने बॉर्डर पर इमरजेंसी लगा दी. NGO’s जो अभी तक खाने और कपड़ों से मदद पहुंचा रहे थे. उनके बॉर्डर पहुंचने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. जिसकी वजह से एक बड़ा ह्यूमनेटेरियन क्राइसिस उत्पन्न हुआ. और आज तक बना हुआ है. पोलेंड बॉर्डर पर शरणार्थियों को कोई मदद भी नहीं मिल पा रही है.

वैसे तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही पोलेंड एक अंतरराष्ट्रीय संधि का भागी है. जिसके तहत राजनैतिक असायलम मांगने आए लोगों को वो लौटा नहीं सकता. लेकिन पोलेंड सरकार का कहना है, ये लोग इकनॉमिक माइग्रेंट्स हैं. ऐसे में संधि की शर्तें लागू नहीं होती.

वर्तमान हालात ये हैं कि पोलिश संसद ने एक नया क़ानून पास किया है. जिसके तहत बॉर्डर पर बाड़ लगाने का काम शुरू कर दिया गया है. EU ने भी पोलेंड के कदम को जायज़ ठहराते हुए समर्थन में बयान जारी किया है. यूरोपियन काउन्सिल के अध्यक्ष चार्ल्स मिकेल ने पहली बार यूरोप को सीमाबद्ध करने की बात कही है. उन्होंने इशारों-इशारों में कहा कि हम यूरोप की पूरी सीमा पर ‘फ़िज़िकल इंफ़्रास्ट्रक्चर’ खड़ा करने के लिए फ़ाइनैन्सिंग की संभावनाएं तलाश रहे हैं.

यूरोप को डर है कि अगर उसने शरणार्थियों को अंदर आने दिया, तो इससे लुकाशेनको के इरादे मज़बूत होंगे. पुतिन के लिए ये एक बड़ी जीत साबित होगी, और आगे आने वाले दिनों में शरणार्थियों की समस्या और विकराल रूप लेगी.

इस पूरे मसले पर अब सैन्य दख़ल की आहटें भी सुनाई देने लगी हैं. पड़ोसी देश यूक्रेन ने पोलेंड और बेलारूस के बॉर्डर पर मिलिटरी ड्रिल शुरू कर दी है. उसे डर है कि पुतिन लुकाशेनको का इस्तेमाल कर उसके दरवाज़े पर भी माइग्रेंट क्राइसिस खड़ा कर सकता है.

यूरोप के बयान पर पुतिन भी सैन्य शक्ति की धमकी दे रहे हैं. कल यानी 11 नवंबर को बेलारूस के आसमान में दो रशियन टुपोलेव सूपरसॉनिक बॉम्बर विमानों ने उड़ान भरी. साथ ही बेलारूस और रूस की सेना संयुक्त रूप से सैन्य अभ्यास भी कर रही है.

सैन्य शक्ति के लिए लुकाशेनको रूस पर निर्भर है. लेकिन बात सैन्य बल तक पहुंचे, इससे पहले वो अपना आख़िरी दांव आज़मा लेना चाहते हैं.

आर्थिक प्रतिबंधों के जवाब में लुकाशेनको ने EU को एक नई चेतावनी जारी की है. लुकाशेनको ने कहा कि आगे और प्रतिबंध लगाए गए तो बेलारूस भी उसका जवाब देगा. आगे कहा,

“यूरोप को गर्मी हम देते हैं और वो बॉर्डर बंद करने की धमकी दे रहे हैं!

क्या हो अगर हम उनकी गैस सप्लाई बंद कर दें. इसलिए मैं पोलेंड, लिथूनिया और बाकी यूरोप के मंदबुद्धि नेताओं को ये सलाह देता हूं कि वो कुछ भी बोलने से पहले दस बार सोचें. हम किसी भी हालत में अपनी संप्रभुता और आजादी से समझौता नहीं करेंगे”

लुकाशेनको सिर्फ़ कोरी धमकी नहीं दे रहे. कुछ दिन पहले हमने आपको ब्रिटेन में तेल और गैस की क़िल्लत के बारे में बताया था. पूरे यूरोप में इस साल तेल और गैस के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई है. यूरोप में गर्मी के बारे में समझिए कि जिसे हम कुनकुनी धूप कहते हैं, वो यूरोप की गर्मी है. और इसी बात से अंदाज़ा लगाइए कि वहां जाड़ों में क्या हाल होता होगा.

घरों को गर्म रखने के लिए गैस और तेल की ज़रूरत होती है. जिसकी आपूर्ति करते हैं, यूएस, कतर, ऑस्ट्रेलिया और रूस. रूस से सीधे पाइपलाइन यूरोप तक जाती है. इसलिए यूरोप की 40 % गैस की आपूर्ति रशिया से होती है. इस पाइपलाइन का एक चौथाई हिस्सा बेलारूस से होकर गुजरता है. इसलिए लुकाशेनको की धमकी को लेकर EU बहुत सावधानी से आगे बढ़ना चाहता है. उसने अभी तक लुकाशेनको की बात का कोई जवाब नहीं दिया है.

रशिया के इसमें क्या सटेक्स हैं?

रशिया की सबसे बड़ी गैस कंपनी का नाम है गैज़प्रॉम. वो बाल्टिक सागर से एक नई पाइपलाइन बनाने की फ़िराक में है. ये नई पाइपलाइन बिना EU की मंज़ूरी के नहीं बन सकती.

इसलिए लुकाशेनको तेल और गैस की आपूर्ति रोकेंगे या नहीं, इस सवाल की कुंजी पुतिन के हाथ में है. अगर लुकाशेनको तेल की आपूर्ति रोकते हैं, तो सम्भव है EU नई पाइपलाइन के काम में दिक़्क़तें पैदा करे. साथ ही पुतिन EU से बदला भी लेना चाहते हैं. इसलिए इस खेल में जीत-हार का निर्णय इस बात से होगा कि पहले कौन आंख झपकाता है.

अगर EU ने माइग्रेंट्स को अंदर आने दिया तो पुतिन की जीत होगी. लेकिन ऐसा होने की ज़्यादा सम्भावना है नहीं. जर्मनी से मर्केल विदा हो चुकी हैं. माइग्रेंट क्राइसिस को लेकर दक्षिणपंथी जनता का समर्थन जुटाते जा रहे हैं. और EU नए शरणार्थी बुलाकर और संकट मोल लेने का रिस्क नहीं उठाना चाहता.

यूरोप कितनी भी कोशिश करे, शरणार्थी संकट आने वाले दिनों में और गहराने वाला है. सीरिया, हेती, इथीयोपिया में गृह युद्ध की कई खबरें पिछले दिनों हमने आपके साथ साझा की हैं. इन सबमें कहीं ना कहीं यूरोप और अमेरिका का रोल रहा है. प्लेन से लटक कर अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलते लोगों की तस्वीरें जहन में अभी भी ताज़ा हैं. सोचिए, जो लोग जान देकर इन देशों से बाहर निकलना चाहते हैं, उन्हें कोई दीवार या तार-बाड़ कब तक रोक पाएगी.

उसपे तुर्रा ये कि ग्लोबल वॉर्मिंग और क्लाइमेट चेंज अभी से अपना असर दिखाने लगे हैं. दुनिया के कई हिस्सों में फसलों का उगना बंद हो गया है. जलवायु परिवर्तन से उपजा खाद्य संकट लोगों को नए इलाक़ों में जाने के लिए मजबूर कर रहा है. EU और पश्चिम के नेता ग्लासगो में कॉप-कॉप खेल रहे हैं. और आने वाली तबाही पर अलग-अलग जस्टिफिकेशन दे रहे हैं. अंत में अपन तो कहेंगे कि इन देशों को राहत इंदौरी साहब का वो शेर पढ़ना-सुनना चाहिए,

लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में,
यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है


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