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अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने फ़ोन करके रूसी राष्ट्रपति पुतिन को धमका क्यों दिया?

आज जानेंगे, अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने फ़ोन करके रूसी राष्ट्रपति पुतिन को धमका क्यों दिया? धमकी सुनने के बाद पुतिन अब क्या करेंगे? और, क्या तीसरा विश्व युद्ध नजदीक आ चुका है?

सब विस्तार से बताएंगे.

वर्तमान से पहले इतिहास की बात. ताकि सब आसानी से समझ आ जाए.

सोवियत संघ के दौर की बात है. 1964 के सितंबर महीने में एक लड़के का जन्म हुआ. मॉस्को से सैकड़ों किलोमीटर दूर. ये दूरी सिर्फ़ सांकेतिक नहीं थी. मॉस्को पहले सोवियत संघ और विघटन के बाद रूस की सत्ता का केंद्र बना. उस लड़के और मॉस्को का भविष्य आपस में नत्थी था. दोनों एक-दूसरे का भविष्य तय करने वाले थे. लेकिन ये मिलन इतना आसान नहीं था. लड़का पहले आर्मी में गया.

फिर फ़ैक्टी में मज़दूरी की. 1991 के साल में सोवियत संघ का विघटन हो गया. सोवियत संघ की आत्मा रूस के पास आई. बोरिस येल्तसिन इस रूस के पहले राष्ट्रपति बने. उस दौर में एक नया कुलीन वर्ग तैयार हो रहा था. इस वर्ग के पास पैसा था. कुलीनों ने येल्तसिन को चुनाव लड़ने और निजी खर्च के लिए बेहिसाब पैसा दिया. बदले में उन्हें तेल और गैस के खदान मिले.

ऐसे ही एक कुलीन थे, मिख़ाइल ख़ोदोकोस्की. उन्होंने औने-पौने दाम में युुकोस नाम की तेल कंपनी खरीदी. जल्दी ही मिखाइल रूस के सबसे अमीर और सबसे ताक़तवर लोगों की लिस्ट में शामिल हो गए.

90 के दशक में लोग किस्मत आजमाने राजधानी पहुंच रहे थे. इन लोगों में से एक व्लादिमीर पुतिन भी थे. लेकिन अभी वाली कहानी का फ़ोकस उस लड़के पर है, जिसकी मां ने अकेले दम पर उसकी परवरिश की थी. वो सोवियत आर्मी का हिस्सा बना, फ़ैक्ट्री में मज़दूरी की और बाद में मॉस्को आ गया. उसका नाम था व्लादिस्लाव सरकोव.

सरकोव ने मॉस्को में मिखाइल ख़ोदोकोस्की के यहां नौकरी शुरू की. बतौर बॉडीगार्ड. लेकिन उसकी असली प्रतिभा कहीं और ही छिपी थी. मिखाइल ने इसे पहचान लिया. फिर सरकोव को पीआर के काम में लगाया गया.

2003 आते-आते मिखाइल रूस के सबसे अमीर आदमी बन चुके थे. लेकिन सत्ता के गलियारे में उनकी पूछ कम होने लगी थी. उनकी पुतिन से अनबन हुई. नतीजतन, मिखाइल को टैक्स चोरी के मामले में जेल भेज दिया गया. उनकी कंपनी की नीलामी कर दी गई. कई बरस बाद उन्हें जेल से छोड़ा गया. फिलहाल, वो ब्रिटेन में रहकर पुतिन की आलोचना करते रहते हैं.

सरकोव ने मिखाइल का सितारा डूबने से बहुत पहले अपनी राह अलग कर ली थी. वो क्रेमलिन चले गए. उन्हें बोरिस येल्तसिन के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ का असिस्टेंट बना दिया गया. येल्तसिन के बाद पुतिन सत्ता में आए. उन्होंने सरकोव को अपना डिप्टी चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ बनाया.

ये सरकोव के लिए ‘ड्रीम कम ट्रू’ वाला मोमेंट था. उन्होंने इस काम में ख़ुद को लीन कर लिया. सरकोव की तपस्या सफ़ल रही या नहीं, इसकी गणना तो बहुत सालों बाद हो पाएगी. हालांकि, शुरुआती रुझान दिखने लगे हैं.

ये रुझान क्या हैं? ये समझने के लिए पहले ये जानना होगा कि सरकोव ने किया क्या?

सरकोव ने दो बड़े काम किए.

पहला, पुतिन की छवि गढ़ी. पुतिन के बारे में जितनी किंवदंतियां फैली हैं, उनमें से अधिकतर के पीछे सरकोव का दिमाग रहा है. इसके अलावा, उन्होंने रूस को विपक्ष-विहीन बना दिया. रूस में कथित तौर पर लोकतंत्र है. सरकार यही दावा करती है. बाहर से देखने पर ऐसा दिखता भी है. ये तिलिस्म सरकोव का गढ़ा हुआ है.

लोकतंत्र के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है, मज़बूत विपक्ष. अगर सत्ता को कोई चुनौती ना मिले तो वो निरंकुश हो जाती है. ऐसी स्थिति में लोक की आवाज़ मौन हो जाती है.

सरकोव ने विपक्ष को दो हिस्सों में बांटा. एक जो सिस्टम का पालन करता है. दूसरा वो जो सिस्टम से खार खाता है.

सरकोव ने पहले टाइप के विपक्ष को बढ़ावा दिया. उन्होंने पुतिन की यूनाइटेड रशिया पार्टी बनाने में तो मदद की ही, साथ में विपक्ष की कई पार्टियों की रुपरेखा भी तैयार की.

समझिए कि सत्ता पक्ष का आदमी विपक्ष भी तैयार कर रहा था. ये लोकतंत्र की अवधारणा का मज़ाक ही है.

सरकोव की एक मशहूर उक्ति है,

An Overdose of freedom is lethal to a state

बहुत ज़्यादा आज़ादी किसी भी देश के लिए ख़तरनाक होती है.

हालांकि, वो इस बात को भूल गए कि जनता की आज़ादी में सेंध तानाशाही का ईंधन है. ये ट्रेंड आपको अपने आस-पड़ोस में भी दिख जाएगा.

ये थी सरकोव की पहली देन.

अब ‘काम नंबर – दो’ की बारी.

व्लादिस्लाव सरकोव ने पड़ोसी यूक्रेन को लेकर रूस की नीति निर्धारित की. जिस दौर में वो मिखाइल ख़ोदोकोस्की के यहां काम कर रहे थे, उन्होंने क्रेमलिन में एक चिट्ठी भेजी थी. इसमें उन्होंने लिखा था कि रूस यूक्रेन पर क़ब्ज़ा कर ले. उस समय रूस के पास संसाधन नहीं थे. इसलिए, उस प्लान पर अमल नहीं किया गया.

जब सरकोव पुतिन के करीबी बने, तब उन्होंने प्लान बाहर निकाला. सरकोव कहते रहे हैं कि यूक्रेन नाम का कोई देश है ही नहीं. वो रूस का एक प्रांत मात्र है. जो ग़लती से अलग हो गया. इसलिए, यूक्रेन को रूस में मिला लेना चाहिए. सरकोव की बातों को पुतिन भी दोहराते रहे हैं.

जैसे-जैसे रूस में पुतिन का कद बढ़ा, सरकोव का रुतबा भी बढ़ता गया. 2011 में उन्हें डिप्टी प्राइम-मिनिस्टर बनाया गया. फिर आया 2013 का साल. मई महीने में अचानक सरकोव को सरकार से बर्ख़ास्त कर दिया गया.

चर्चा चली कि ये अंत है. सरकोव के सितारे डूब गए हैं.

लेकिन ये इतनी ज़ल्दी नहीं होने वाला था. चार महीने बाद सरकोव की वापसी हुई. पुतिन के सलाहकार के तौर पर. वापसी के पांच महीने बाद रूसी आर्मी क्रीमिया में घुस गई. 1950 के दशक में सोवियत संघ ने यूक्रेन को क्रीमिया गिफ़्ट में दिया था. 60 बरस बाद रशियन आर्मी ने वो गिफ़्ट छीन लिया. अमेरिका और यूरोप इसकी आलोचना करते रह गए. लेकिन पुतिन पीछे नहीं हटे. उन्होंने क्रीमिया में जनमत-संग्रह कराया. जिसमें 90 फीसदी से अधिक लोगों ने रूस के पक्ष में वोटिंग की. यूनाइटेड नेशंस ने इस जनमत-संग्रह को मान्यता नहीं दी है.

रूस क्रीमिया को हथियाने पर नहीं रुका. उसने यूक्रेन के पूर्वी बॉर्डर पर अलगाववादियों को हथियार और पैसे की मदद देनी शुरू की. यूक्रेन को लड़ने आना पड़ा. इस लड़ाई में अब तक 14 हज़ार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है.

सशस्त्र संघर्ष के बीच सितंबर 2014 और फ़रवरी 2015 में दो समझौते हुए. बेलारूस की राजधानी मिंस्क में. इस समझौते में विद्रोही गुटों और यूक्रेन के अलावा रूस और यूरोप के कई देश भी शामिल हुए थे.

फ़रवरी 2015 के समझौते में 13 बातों पर सहमति बनी. इसमें से एक ये था कि दोनों पक्ष युद्ध के ख़तरनाक हथियारों को हटा लेंगे. यूक्रेन आरोप लगाता है कि रूस ने ना तो हथियार हटाए हैं और ना ही उसने अलगाववादियों को मदद देना बंद किया है. रूस कहता है कि हम तो वहां कभी गए ही नहीं. आरोप झूठे हैं.

इन सबके बीच झगड़ा चल रहा है. बड़ी संख्या में बेगुनाह लोग मारे जा रहे हैं. नेता अपनी-अपनी वाहवाही में व्यस्त हैं.

आज हम ये कहानी क्यों सुना रहे हैं?

दरअसल, रूस ने एक बार फिर से यूक्रेन सीमा पर तनाव बढ़ा दिया है. उसने पौने दो लाख सैनिकों को तैनात किया है. अमेरिकी एजेंसियों का दावा है कि अगले साल की शुरुआत तक रूस यूक्रेन पर हमला कर सकता है. अमेरिका कहता है कि अगर यूक्रेन को कुछ हुआ तो हम भी आएंगे. अमेरिका आया तो नाटो को भी आना पड़ेगगा. ऐसे में ये झगड़ा विश्वयुद्ध में बदल सकता है. जानकारों का कहना है कि इस आशंका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

तनाव कम करने को लेकर सात दिसंबर को बड़ी पहल हुई. जो बाइडन ने पुुतिन से पूरे मसले पर बात की. वीडियो कॉल पर. ये बातचीत दो घंटे तक चली. इस मीटिंग में यूक्रेन का मसला छाया रहा. बाइडन ने कहा कि अगर रूस ने हमला किया तो अमेरिका उसके ऊपर आर्थिक प्रतिबंध लगा देगा और यूक्रेन को हथियारों की मदद भी करेगा.

इसपर पुतिन ने कहा कि हम हमला नहीं करेंगे. बशर्ते यूक्रेन हमें उकसाना बंद करे. वो नाटो से करीबी ना बढ़ाए और हमारी सीमा के पास से हथियार हटाए.

हालांकि, इन मांगों पर कोई सहमति नहीं बनी. बाइडन ने पुतिन की कॉल के बाद यूरोप के बड़े नेताओं से भी बात की. पुतिन और बाइडन की बातचीत सफ़ल हुई या नहीं, ये आने वाले दिनों में पता चल जाएगा.

अभी हम ये समझते हैं कि पुुतिन यूक्रेन पर क़ब्ज़ा क्यों करना चाहते हैं?

इसकी दो बड़ी वजहें हैं.

पहली, यूक्रेन, रूस और पश्चिमी देशों के बीच फंसा हुआ है. यूक्रेन पिछले कुछ समय से नाटो का हिस्सा बनने की कोशिश कर रहा है. नाटो की स्थापना कोल्ड वॉर के दौर में हुई थी. अमेरिका इसका बॉस बना. नाटो के एक देश पर हमले का मतलब है, सभी सदस्यों पर हमला. ऐसे में बाकी सदस्य देश मदद के लिए आते हैं.

अगर यूक्रेन नाटो में शामिल हो गया तो ये रूस के लिए ख़तरे वाली बात होगी. अमेरिका, यूक्रेन में अपना मिलिटरी बेस बना सकता है. पुतिन इस ख़तरे को टालना चाहते हैं. उनका प्लान है कि, यूक्रेन नाटो में जाए, उससे पहले यूक्रेन को अपने में मिला लो.

दूसरी वजह ऐतिहासिक है.

दसवीं सदी की बात है. किएव में एक राजवंश चर्चा में आया. उसने बेज़ेंटाइन साम्राज्य के साथ हाथ मिला लिया. वे अजेय थे. इस राजवंश ने वर्तमान के रूस, पोलैंड, यूक्रेन और बेलारूस पर शासन किया. रूस और यूक्रेन, दोनों ही किएव राजवंश को अपनी बुनियाद बताते हैं.

कालांतर में किएव साम्राज्य के इलाकों पर मंगोल, ऑटोमन और ज़ारशाही वाले रूस का शासन चला. 1654 में पेरिस्लाव शहर में एक संधि हुई. इसके तहत यूक्रेन का बड़ा हिस्सा रूस के पास आ गया. ये अगले 263 साल तक चला. 1917 में रूस में ज़ारशाही का पतन हो गया. यूक्रेन ने इसका फायदा उठाया. उसने अपनी आज़ादी का ऐलान कर दिया. हालांकि, ये आज़ादी बहुत दिनों तक टिकी नहीं. 1921 में रेड आर्मी ने यूक्रेन पर हमला कर दिया. और, उसे सोवियत संघ का हिस्सा बनना पड़ा.

ये डोर टूटी 1991 में. सोवियत विघटन के बाद यूक्रेन को आज़ादी मिल गई. पुतिन मानते हैं कि यूक्रेन का अलग होना क्षणिक है. वो इतिहास में रूसी साम्राज्य का हिस्सा रहा और भविष्य में भी वैसा ही होगा. वो सोवियत संघ के दौर का गौरव लौटाना चाहते हैं.

इसके अलावा, पुतिन यूरोप में अपनी बादशाहत साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. यूक्रेन उनके लिए वेस्ट से बारगेनिंग का बड़ा हथियार है.

अगर पुतिन का इतना मन है तो वो हमले से हिचक क्यों रहे हैं?

इस हिचक के कई कारण हैं.

पहला कारण है, अमेरिका का मुखर होकर सामने आना. जब रूस ने क्रीमिया पर हमला किया था, तब अमेरिका धमकी देता रह गया. अबकी बार वो सामने आकर खड़ा हो गया है. उसकी चेतावनी में दम दिख रहा है. भले ही रूस ने मिलिटरी के क्षेत्र में काफी विकास किया है. फिर भी वो अमेरिका के मुकाबले में उन्नीस ही है.

दूसरा कारण, यूक्रेन की सैन्य क्षमता से जुड़ा है. यूक्रेन लंबे समय से घरेलू मोर्चे पर जंग झेल रहा है. उसने अपनी सैन्य ताक़त काफी मज़बूत की है. यूक्रेन को बाहर से सपोर्ट भी मिल रहा है. उसके पास अत्याधुनिक हथियारों की कमी नहीं है. अगर रूस से उसकी लड़ाई होती है तो वो टक्कर देने की क्षमता रखता है.

पुतिन के हिचकने का तीसरा कारण है, आर्थिक नुकसान का डर. अमेरिका ने रशियन रूबल को विदेशी मुद्रा में बदलने वाले बैंकों पर बैन लगाने की भी धमकी दी है. अगर ऐसा हुआ तो विदेशी व्यापार ख़तरे में पड़ जाएगा. ब्रिटेन और बाकी यूरोपीय देश भी इसी लीक पर चल रहे हैं.

इन वजहों से पुतिन कोई निर्णायक कदम नहीं उठा रहे हैं. शांति और क़यामत के बीच एक महीन रेखा खिंची है. अगर किसी ने वो रेखा पार की तो उसका नुकसान अकल्पनीय होगा. सबके लिए.


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