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लॉटरी के इनाम में राष्ट्रपति ने 1600 करोड़ का प्लेन क्यों रखा?

आज हम आपको एक हवाई जहाज की अद्भुत कहानी सुनाएंगे. ये प्लेन एक राष्ट्रपति की सवारी थी. ये इतना आलीशान प्लेन था कि अमेरिकी राष्ट्रपति का एयरफोर्स वन भी इसके आगे फीका था. इतना महंगा था कि सरकार 15 सालों तक इसकी किस्त भरने वाली थी. एक तरफ राष्ट्रपति इतने महंगे प्लेन से सफर कर रहे थे, दूसरी तरफ जनता के लिए दो वक़्त की रोटी जुटाना मुश्किल था. ऐसे में विपक्ष के एक नेता बोले- गरीब जनता की सरकार अमीर नहीं हो सकती. फिर इन्हीं नेता जी ने वादा किया. कहा, मैं चुनाव जीता तो ये प्लेन बेच दूंगा. यही नेता जी देश के अगले राष्ट्रपति बन गए. वादे के मुताबिक, उन्होंने प्लेन बेचने का फैसला किया. ये फैसला एक अंतरराष्ट्रीय चुटकुला बन गया. ये क्या मामला है, विस्तार से बताते हैं आपको.

ये कहानी है उत्तरी अमेरिका में बसे देश मेक्सिको की

Mexico
लाल घेरे में मेक्सिको. (गूगल मैप्स)

2012 का साल था. तब यहां के राष्ट्रपति थे फेलिपे कालदेरॉन. वो 2006 से देश के राष्ट्रपति थे. नवंबर 2012 में उनका कार्यकाल ख़त्म होने वाला था. बतौर राष्ट्रपति अपने आख़िरी दिनों में कालदेरॉन ने एक सपना देखा. सोचा कि मेक्सिको के राष्ट्रपति के लिए इतना मॉडर्न विमान खरीदा जाए, जैसा दुनिया के किसी लीडर के पास न हो. इस तरह का एक ही विमान था तब- बोइंग 787-8. नवंबर 2012 में कालदेरॉन और बोइंग के बीच 787-8 विमान खरीद का सौदा हो गया. इस विमान की कीमत थी करीब 935 करोड़ रुपए.

Felipe Calderón
2012 के मेक्सिको के राष्ट्रपति फेलिपे कालदेरॉन. (एपी)

इस डील के बाद 30 नवंबर, 2012 को कालदेरॉन की प्रेसिडेंसी समाप्त हुई. उनके बाद राष्ट्रपति बने एनरिके पेन्या नियतो. 2016 में इन्हीं के कार्यकाल में बोइंग ने उस 787-8 ड्रीमलाइनर की डिलिवरी दी मेक्सिको को. बोइंग ने राष्ट्रपति की ज़रूरतों के मुताबिक इस विमान के इंटीरियर में बदलाव किए थे. इस मोडिफ़िकेशन में लगभग 670 करोड़ रुपए का ख़र्च बैठा. विमान की शुरुआती लागत थी 935 करोड़ रुपए. वो जोड़ दीजिए, तो प्लेन की फाइनल लागत आई करीब 1,600 करोड़ रुपए. मेक्सिको के एक मशहूर फ्रीडम फाइटर के नाम पर इस प्लेन का नाम रखा गया- होसे मारिया मोरलॉस पावोन.

Enrique Peña Nieto
कालदेरॉन के बाद मेक्सिको के राष्ट्रपति बने एनरिके पेन्या नियतो. (एपी)

इस विमान से पहले दुनिया में सबसे पावरफुल प्रेज़िडेंशल सवारी थी- एयरफोर्स वन. अमेरिकी राष्ट्रपति का आधिकारिक विमान. अभी जो एयरफोर्स वन इस्तेमाल में है, वो तीन दशक पुराना है. इससे थोड़ा जवान ही था मैक्सिन राष्ट्रपति का पिछला विमान. उसकी कीमत थी लगभग 317 करोड़ रुपए. दिसंबर 1988 से ड्यूटी में लगे पिछले प्लेन ने करीब ढाई हज़ार बार उड़ान भरी थी. मेक्सिको के पांच राष्ट्रपतियों ने उसमें सफर किया था. अब भी अच्छा-ख़ासा काम कर रहा था. तब क्यों नया विमान खरीदा गया? सरकार का कहना था कि पुराना विमान लैंडिंग के वक़्त बहुत शोर करता था. इसी वजह से नया प्लेन लेना ज़रूरी था.

Air Force One
एयरफोर्स वन अमेरिकी राष्ट्रपति का आधिकारिक विमान है. (एपी)

मगर सवाल था कि क्या इतना महंगा प्लेन लेने की ज़रूरत थी?

वो भी तब, जब देश की माली हालत ख़राब हो. ड्रग्स कार्टल्स के साथ लगातार होने वाली हिंसा के कारण देश के ज़्यादातर हिस्सों में बुनियादी ढांचा भी मुकम्मल न हो. देश में प्रति व्यक्ति सालाना आय 80 हज़ार रुपये से भी कम हो.

ऐसी ही तर्कों से विपक्ष ने इस विमान खरीद पर सरकार को घेरना शुरू किया. ये आलोचना फेलिपे कालदेरॉन के समय से ही शुरू हो गई थी. फिर जब एनरिके पेन्या नियतो राष्ट्रपति बने, तो उनसे ये डील रद्द करने की अपील की गई. विपक्ष की इस मुहिम में सबसे आगे थे- आंद्रेस मैनवेल लोपेज़ ओब्रादोर. ये ‘नैशनल रिजेनरेशन मूवमेंट’ पार्टी के लीडर थे. आंद्रेस ने प्लेन की डिलिवरी से पहले ही ये कहना शुरू किया कि सरकार को नया प्लेन बेच देना चाहिए. इसके जवाब में सरकार ने एक सर्वे करवाया. इसके मुताबिक, अगर सरकार विमान बेचती है तो भी असल लागत वसूल नहीं हो सकेगी. करीब 42 पर्सेंट से ज़्यादा का घाटा होगा. मगर ओब्रादोर अड़े रहे. 2018 में देश का अगला संसदीय चुनाव होना था. ओब्रादोर ने कहा कि अगर वो जीत जाते हैं, तो प्लेन को बेचकर मेक्सिको की जनता का पैसा वापस लाएंगे.

Boeing 787 8
बोइंग 787-8 . (एपी)

चुनाव के बाद क्या हुआ?

चुनाव हुए. इसमें दो बड़े मुद्दे थे विपक्ष के. एक, ड्रग कार्टेल्स के हाथों होने वाली हिंसा. दूसरा, भ्रष्टाचार. इस करप्शन वाले मुद्दे का सबसे बड़ा प्रतीक था प्रेज़िडेंशल प्लेन. चुनाव में ओब्रादोर को जीत मिली. 1 दिसंबर, 2018 से उन्होंने राष्ट्रपति का पदभार संभाला. पद संभालने के तुरंत बाद उनकी सरकार प्लेन बेचने की तैयारियों में जुट गई. प्लेन बेचने के लिए ज़रूरत थी खरीदार की. मगर 1,600 करोड़ रुपए का एक सेकेंड हैंड, स्पेशली मोडिफ़ाइड प्लेन खरीदेगा कौन? एक संभावना थी कि कोई कर्मशल एयरलाइन्स इसे खरीद ले. मगर कर्मशल यात्रा के लिहाज से इसे रीडिज़ाइन करने में भी करोड़ों रुपये ख़र्च होते. ऐसे में एयरलाइन्स के लिए ये प्लेन घाटे का सौदा था. या तो ये होता कि सरकार मोलभाव करके इसकी कीमत घटाती. मगर ओब्रादोर ऑरिजनल लागत से एक पैसे कम पर भी विमान बेचने को राज़ी नहीं थे. नतीजा ये हुआ कि कोई खरीदार नहीं मिला.

इस तरह एक साल बीत गया और 2020 आया. राष्ट्रपति ओब्रादोर का प्लेन बेचने वाला आइडिया फ्लॉप निकला था. ऐसे में वो एक नया प्लान लेकर आए- लॉटरी. सरकार ने जनता से कहा कि लॉटरी खरीदो. अगर तुम्हारे नाम की लॉटरी निकली, तो बोइंग 787-8 प्रेज़िडेंशल प्लेन तुम्हारा.

Andrés Manuel López Obrador
फेलिपे कालदेरॉन को हटाकर आंद्रेस मैनवेल लोपेज़ ओब्रादोर राष्ट्रपति में. (एपी)

लॉटरी प्लान का क्या हुआ?

पहली बार में ये ऑफ़र सुनकर शायद आपके मुंह से निकले- वाह. मगर एक मिनट रुककर सोचिए. यहां एक 55 फुट ऊंचे, 186 फुट लंबे बोइंग विमान की बात हो रही है. बमुश्किल दो-तीन कमरों के घर में रहने वाला आम इंसान इतने बड़े विमान को रखेगा कहां? वो क्या करेगा इस प्लेन का? कहां उड़ाकर ले जाएगा इसे? उड़ाएगा कैसे इसको? ख़ुद सीखेगा कि पायलट रखेगा? इसमें फ्यूल कहां से भरवाएगा, इसकी मेंटेनेंस कैसे करेगा?

ये ही सवाल मेक्सिको की जनता ने भी पूछे सरकार से. लॉटरी की स्कीम निकालते हुए राष्ट्रपति ने कॉमन सेंस की ये बात तो सोची ही नहीं थी. अब सवाल उठे, तो ओब्रादोर नया प्लान लेकर आए. बोले, लॉटरी जीतने वाले की तरफ से हम एक या दो साल तक मेंटेनेंस का ख़र्च उठाएंगे. मेंटेनेंस का ये ख़र्च कितना आएगा, पता है? करीब 12 करोड़ रुपए सालाना. मतलब कहां तो सरकार पहले एक रुपया भी घटाए बिना विमान बेचना चाहती थी. और कहां अब मेंटेनेंस का ये ख़र्च भी एक-दो साल तक उठाने को तैयार थी. मगर इसके बावजूद पुराने सवाल अब भी जस-के-तस थे.

इफ़ आई वन द प्लेन…

मेक्सिको की जनता खीझ गई. उन्होंने कहा, गजब तमाशा लगा रखा है. लोगों ने ‘इफ़ आई वन द प्लेन’ के हैशटैग से इतने चुटकुले बनाए कि पूछिए मत. अपनी इतनी किरकिरी करवाने के बाद अब ओब्रादोर ने एक नई योजना बनाई. बोले, लॉटरी तो होगी. मगर जीतने वाले को विमान नहीं मिलेगा. उसकी जगह लॉटरी से 100 विजेता चुने जाएंगे. इनमें से हर एक को करीब साढ़े सात करोड़ रुपये की इनामी राशि मिलेगी. यानी सरकार इनाम में कुल 750 करोड़ रुपये बांटती.

Boeing 787 8 Lottery Report
ओब्रादोर का लॉटरी प्लान.

इनाम की ये राशि आती लॉटरी बेचकर आए पैसों से. एक लॉटरी की कीमत थी तकरीबन 1,900 रुपया. सरकार का टारगेट था 60 लाख लॉटरी टिकट बेचना. इस हिसाब से लॉटरी बेचकर सरकार को तकरीबन 1,100 करोड़ रुपये मिलते. यानी उस प्रेज़िडेंशल प्लेन की जो ऑरिजनल लागत थी, वो वसूल हो जाती. इन पैसों में से करीब 750 करोड़ तो इनाम बांटने में जाते. बाकी बचे करीब 350 करोड़ रुपए. सरकार का कहना था कि ये बचा हुआ पैसा हेल्थ सर्विसेज़ को दिया जाएगा. ताकि वो अपना ढांचा सुधार सकें.

कोरोना ने लॉटरी प्लान बर्बाद कर दिया?

मार्च 2020 में सरकार ने टिकट बाज़ार में उतार दिया. ओब्रादोर ने सोचा, लोग टिकट खरीदने के लिए टूट पड़ेंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 1,900 रुपये की लॉटरी खरीदना सबके बस की बात नहीं थी. पहले ही तंगहाली थी. ऊपर से टिकट लॉन्च होने के साथ ही कोरोना भी आ गया. 23 मार्च से सरकार को स्कूल, दुकान, सरकारी ऑफ़िस सब बंद करवाने पड़े. कामकाज ठप हो गया. मगर कोरोना और उसका असर बना रहा. लैटिन अमेरिकी देशों में कोरोना से प्रभावित देशों में ब्राजील के बाद मेक्सिको ही था. वहां कोरोना के कारण 71 हज़ार से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं.

ख़ैर, 70 दिनों के बाद 2 जून को लॉकडाउन ख़त्म हुआ. लॉकडाउन ख़त्म होते ही राष्ट्रपति ओब्रादोर एक फिर ज़ोर-शोर से लॉटरी बेचने में जुट गए. लोगों को लॉटरी खरीदने की प्रेरणा देने के लिए ओब्रादोर ने अब इस मुहिम को कोरोना से जोड़ दिया. बोले कि लॉटरी बेचकर जो भी अतिरिक्त पैसा आएगा, उसे कोरोना से लड़ने में ख़र्च किया जाएगा. इसके साथ सरकार ने एक और काम किया. उसने सरकारी पैसों से लॉटरी खरीदकर सरकारी अस्पतालों को बांटा. कुल 941 अस्पतालों को लॉटरी दी गई. हर एक अस्पताल को करीब 1,000 लॉटरी की टिकटें मिलीं. अस्पतालों को लॉटरी बांटने में सरकार ने लगभग 184 करोड़ रुपये ख़र्च कर दिए.

ओब्रादोर ने ये लॉटरियां देकर अस्पतालों से कहा कि जीत जाओ, तो इन्हीं पैसों से मेडिकल उपकरण खरीदना. ये लॉजिक भी समझ से परे था. लोगों ने कहा कि लॉटरी बांटने में इतना पैसा ख़र्च करने से बेहतर होता कि सरकार सीधे ही अस्पतालों को पैसा दे देती. इस तरह हर अस्पताल के हिस्से में कुछ पैसा तो आता. लोगों का कहना है कि क्या मेक्सिको के अस्पताल मरीज़ों के इलाज के लिए लॉटरी निकलने का इंतज़ार करेंगे? वो भी तब, जब पूरी महामारी के दौरान सरकार ने किसी भी अस्पताल को दवा, मास्क और पीपीई किट के लिए पर्याप्त फंड न दिया हो.

कितने टिकट बिके?

ख़ैर, ये सब करते-करते 15 सितंबर की तारीख़ आई. ये लॉटरी बेचे जाने का आख़िरी दिन था. ओब्रादोर ने जनता से अपील की कि वो जमकर लॉटरी खरीदें. ऐसी भी ख़बरें आईं कि सरकारी कर्मचारियों पर 15-15 टिकटें खरीदने का प्रेशर बनाया गया. लाख कोशिश करने के बावजूद पूरे टिकट नहीं बिके. सरकार के मुताबिक, इतना पैसा आ गया है कि इनाम वाले 750 करोड़ रुपये बंट जाएंगे. मगर अतिरिक्त पैसे से अस्पतालों का ढांचा सुधारने की जो प्लानिंग थी, वो पूरी नहीं हो पाएगी.

16 सितंबर को मेक्सिको का स्वतंत्रता दिवस था. इस दिन मेक्सिको की नैशनल लॉटरी बिल्डिंग में 16 बच्चों को बुलाया गया. इन बच्चों का काम था बंपर ड्रॉ में जीतने वाली 100 लॉटरियां उठाना. करीब ढाई घंटे तक ये प्रक्रिया चली. विजेताओं के टिकट चुन लिए गए. आने वाले दिनों में जीतने वालों के नाम का ऐलान होगा. और जिस प्लेन से ये पूरी कहानी शुरू हुई, वो सरकार के पास था और अभी वहीं रहेगा. बल्कि अभी तो सरकार को उसकी किस्तें भी पूरी करनी हैं.

अब इसपर क्या ही कहें. समझ ही नहीं आ रहा कि इस पूरी प्रक्रिया को क्या नाम दिया जाए? मैक्सिन लीडरशिप पर अफ़सोस किया जाए या उनकी समझदारी पर तरस खाया जाए.


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