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अमेरिका, चीन पर परमाणु बम क्यों गिराना चाहता था?

बात होगी, एक खुफिया दस्तावेज के कुछ पन्नों की. जो अब सावर्जनिक हो गए हैं. बिना किसी कांट-छांट के. बतौर दस्तावेज, आज से 63 बरस पहले चीन पर परमाणु हमले का खतरा मंडरा रहा था. इस खतरे के पीछे अमेरिका का हाथ था. अमेरिका ये प्लान बना क्यों रहा था? और, वो ऐन मौके पर हमले से पीछे क्यों हट गया?

पॉइंट नंबर वन. चीन पर परमाणु हमला.

साल 1958. अगस्त के महीने में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (चीन) और रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (ताइवान) की सेनाओं ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. चीन में कम्युनिस्ट पार्टी यानी माओ त्से-तुंग का शासन था. ताइवान पर नेशनलिस्ट कुओमितांग पार्टी यानी च्यांग काई-शेक का. दूसरे विश्व युद्ध में दोनों ने जापान के ख़िलाफ़ मिलकर लड़ाई की थी.

1945 में जापान हारकर बाहर चला गया. उसे ताइवान पर से भी अपना दावा छोड़ना पड़ा. जापान के जाने के तुरंत बाद दोनों पार्टियों के बीच सिविल वॉर शुरू हो गया. चीन पर कब्ज़े को लेकर. इस लड़ाई में कम्युनिस्ट जीत गए. उन्होंने कुओमितांग को ताइवान में समेट दिया. लेकिन माओ की इच्छा पूरी नहीं हुई थी. वो ताइवान को भी कम्युनिस्ट बनाना चाहता था. इसको लेकर समय-समय पर लड़ाई चलती रही. लेकिन चीन अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया. वजह, ताइवान के पीछे अमेरिका खड़ा था.

Chiang Kai Shek And Mao Zedong
च्यांग काई-शेक और माओ त्से-तुंग (फोटो: एएफपी)

क्यों? कोरिया वॉर के दौरान अमेरिका ने ताइवान को न्यूट्रल इलाका घोषित कर दिया. उसने एक नौसैनिक बेड़ा भी ताइवान में तैनात किया था. ये इलाका चीन को रोकने के लिए बेहद अहम था. इसके अलावा, वो ताइवान को आर्थिक मदद भी दे रहा था. 1953 में कोरिया वॉर खत्म हो गया. अमेरिका ने बेड़ा वापस बुला लिया.

चीन इस मौके की ताक में था. उसने ताइवान पर हमला कर दिया. ताइवान की हार निश्चित थी. ऐसे में एंट्री हुई अमेरिका की. उसने ताइवान के साथ सुरक्षा संधि की. अमेरिका ने वादा किया कि अगर चीन ने हमला किया तो वो मदद करने आएगा.

पहली बार मौका आया 1954-55 में

सात महीने तक चली लड़ाई में चीन हावी रहा. उसने कुछ विवादित द्वीपों पर कब्ज़ा भी जमाया. लेकिन ताइवान को पूरी तरह जीतने में नाकाम रहा.

दूसरा हमला चार बरस बाद हुआ. अगस्त 1958 में. इस बार आक्रमण ज़्यादा असरदार था. चीन ने ताइवान की राजधानी ताइपे के सुरक्षा-चक्र को भेदना शुरू कर दिया था. अमेरिका को डर हुआ कि कहीं चीन इस बार अपने मंसूबे में कामयाब न हो जाए.

तब अमेरिकी वायुसेना के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ नैथन ट्विनिंग ने एटम बम गिराने का सुझाव दिया था. उन्होंने कहा था कि शुरुआत में कम क्षमता वाले बम गिराए जाएं. ताकि चीनी एयरफ़ील्ड्स को तबाह किया जा सके. अगर चीन फिर भी हमले बंद नहीं करता, तब हमें भीतर घुसकर शहरों पर परमाणु हमला करना होगा.

Nathon Twining
तत्कालीन अमेरिकी वायुसेना के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ नैथन ट्विनिंग. (तस्वीर: एएफपी)

उन्होंने स्वीकारा था कि इसके जवाब में अमेरिका के मिलिटरी बेस पर परमाणु हमले हो सकते हैं. लेकिन वो एक बात में स्पष्ट थे. वो ये कि अगर अमेरिका की नीति ताइवान को बचाने की है तो उसका पालन करने के लिए हमें हर नतीजे के लिए तैयार रहना चाहिए.

चूंकि उस वक़्त चीन के पास परमाणु हथियार नहीं थे. ऐसे में उसकी तरफ से सोवियत संघ के आने की आशंका थी. अमेरिका को ये डर भी था कि सोवियत संघ कहीं पर भी हमला कर सकता है. ऐसी स्थिति में तीसरा विश्व युद्ध शुरू हो सकता था.

अंतिम फ़ैसला राष्ट्रपति डी. आइज़नहॉवर का था. उन्होंने इस प्लान पर आगे बढ़ने से मना कर दिया. उन्होंने आदेश दिया कि पारंपरिक तरीकों से ही युद्ध लड़ा जाए. आख़िरकार, 06 अक्टूबर 1958 को दोनों देशों के बीच युद्धविराम हो गया.

न्युक्लियर अटैक के प्लान पर विचार एक टॉप सीक्रेट मीटिंग में हुआ था. ये क्लासिफ़ाइड था. जब सरकार ने इसे पब्लिक के लिए रिलीज़ किया, तब कई अहम जानकारियां छिपा ली गईं थी. अब वो छिपी जानकारी बाहर आ गई है.

Dwight Eisenhower
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डी. आइज़नहॉवर. (तस्वीर: एएफपी)

ये जानकारी बाहर कैसे आई?

इसे बाहर लाने वाले हैं, डेनियल एल्सबर्ग. उन्हें पेंटागन पेपर्स को लीक करने के लिए जाना जाता है. पेंटागन पेपर्स उन क्लासीफ़ाइड डॉक्यूमेंट्स का नाम था, जिसमें वियतनाम वॉर की सच्चाई छिपी थी. जिसके मुताबिक, अमेरिकी सरकार बदनामी से बचने के लिए वियतनाम का युद्ध खींचती जा रही थी. उन्हें युद्ध का परिणाम पहले से ही पता था. जब ये पेपर्स अख़बारों में छपे तो हंगामा मच गया था. वहीं से वियतनाम वॉर के खात्मे की शुरुआत हुई थी.

Daniel Ellsberg
डेनियल एल्सबर्ग. (तस्वीर: एएफपी)

एल्सबर्ग ने न्यू यॉर्क टाइम्स को बताया कि उन्होंने ताइवान वाले डॉक्यूमेंट्स और पेंटागन पेपर्स साथ में कॉपी किए थे. लेकिन उसे तब साझा नहीं किया था. अब उन्होंने उन डॉक्यूमेंट्स को अपनी वेबसाइट पर पब्लिश कर दिया है.

क्यों? हाल के दिनों में ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन के बीच तनाव बढ़ा है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ताइवान को हर क़ीमत पर हासिल करने का वादा कर चुके हैं. जबकि अमेरिका, ताइवान के साथ हथियारों की डील कर रहा है. इसपर चीन की नज़रें टेढ़ीं हो रखीं है. दोनों तरफ से धमकियां जारी होती रहतीं है.

Nyt Report
न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट देखिए.

एल्सबर्ग ने कहा कि उन्हें दोनों देशों के बीच युद्ध की आशंका है. अमेरिका और चीन परमाणु-शक्ति से संपन्न हैं. दोनों को धैर्य रखने की ज़रूरत है.

डेनियल एल्सबर्ग 90 वर्ष के हो चुके हैं. उन्होंने अपने राष्ट्रपति जो बाइडन को सुझाव देते हुए कहा,

‘अपने गुप्त इतिहास से सीखिए, और न्युक्लियर वॉर के पागलपन से दूर रहिए.’


विडियो- अमेरिका ने चीन पर परमाणु हमले की तैयारी कर ली, फिर पीछे क्यों हटा?

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