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कोरोना वायरस की जांच को लेकर क्यों तैयार हुआ चीन?

आज शुरुआत करते हैं एक बयान से. ये बयान दिया है चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने. 18 मई को उन्होंने कहा-

कोविड-19 के प्रति दुनियाभर के देशों का जो रुख रहा, इसके मद्देनज़र हमारी जो वैश्विक प्रतिक्रिया रही, उसकी मुकम्मल तरीके से समीक्षा किए जाने की योजना का समर्थन करता है चीन. मगर ये तब हो, जब हम कोविड-19 पर काबू पा लें. ये समीक्षा विज्ञान पर आधारिक हो, पूरे प्रफेशनलिज़म के साथ हो और इस समीक्षा का नेतृत्व WHO करे. इसे बिल्कुल वस्तुनिष्ठ और भेदभाव रहित तरीके से किया जाए.

कहां दिया ये बयान?
इस बयान का संदर्भ है 18 और 19 मई को आयोजित वर्ल्ड हेल्थ असेंबली. शॉर्ट में, WHA. ये विश्व स्वास्थ्य संगठन की सबसे अहम फैसले लेने वाली संस्था है. आमतौर पर WHO के 194 सदस्य देशों के प्रतिनिधि सशरीर इस सालाना बैठक के लिए जिनिवा पहुंचते हैं. मगर इस साल कोरोना के कारण ये जमघट विडियो क्रॉन्फ्रेंसिंग तक ही रहा. जुटान से पहले ही दो हाई-पॉइंट बन गए थे इस सम्मेलन के. एक, चीन. दूसरा, ख़ुद WHO. कोरोना के मामले में इन दोनों की भूमिकाओं पर सवाल है. अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया समेत कुछ देश इस मामले की जांच करवाए जाने की मांग भी कर चुके थे. जवाब में चीन की तरफ से उन्हें धमकी भी दे दी गई थी.

World Health Assembly
वर्ल्ड हेल्थ असेंबली (फोटो: एएफपी)

जांच के लिए तो नहीं माना, मगर…
ऐसे में 18 मई को जब WHA की स्क्रीन पर राष्ट्रपति शी चिनफिंग नज़र आए, तो लगा चीन भरपूर आक्रामकता दिखाएगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. फॉर अ चेंज, चीन कोरोना से निपटने की वैश्विक रणनीति का रिव्यू करवाए जाने के लिए राज़ी हो गया है. रिव्यू माने समीक्षा. कोरोना के सामने दुनिया की प्रतिक्रिया, उसके सामने अपनाई गई रणनीतियों का आलोचनात्मक लेखा-जोखा. अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की मांग के हिसाब से चीन ‘इन्वेस्टिगेशन’ के लिए तो नहीं माना. न ही उसने ख़ास अपनी जांच को मंज़ूरी दी है. हां, लेकिन जिस ‘रिव्यू ऑफ द ग्लोबल रेस्पॉन्स टू कोविड-19’ को उसने समर्थन दिया है, उसमें चीन के काम-काज की भी समीक्षा हो सकेगी.

कोरोना जांच पर और क्या हुआ WHA में?
WHA में चीन पर दबाव बनाने में बड़ी भूमिका रही उस प्रस्ताव की, जिसे ऑस्ट्रेलिया और यूरोपियन यूनियन समेत कई देशों ने मिलकर तैयार किया था. इन देशों में भारत भी शामिल है. इस ड्राफ़्ट रेजॉल्यूशन में भी कई जवाबदारियां तय हुईं. चीन का सीधे-सीधे ज़िक्र किए बिना इसमें WHO की भूमिका के मूल्यांकन की बात कही गई. ये भी कहा गया कि कोविड-19 से निपटने के लिए WHO की देखरेख में तैयार की गई वैश्विक प्रतिक्रिया से जो अनुभव और सबक मिले, उनका निष्पक्ष, स्वतंत्र और विस्तृत मूल्यांकन किया जाए. इस रेजॉल्यूशन में सबसे ज़रूरी ज़िक्र है निष्पक्ष और स्वतंत्र मूल्यांकन. इससे उम्मीद बंधती है कि मूल्यांकन की इस प्रक्रिया पर किसी तरह का प्रभाव या दबाव नहीं बना सकेगा. ये सीधे से चीन का नाम तो नहीं लेती, लेकिन जब कोरोना की क्रोनोलॉजी और इससे मिले सबक का मूल्यांकन होगा तो इसमें चीन से जुड़े सवाल भी आने चाहिए.

प्रेशर में ही सही, चीन का इस रिव्यू के लिए राज़ी होना मामूली बात नहीं है. उसपर कोरोना से जुड़ी जानकारियां छुपाने, अपनी लापरवाहियों से इस आपदा को इतनी गंभीर स्थिति में पहुंचाने का आरोप है. उसके साथ-साथ WHO की भी भूमिका पर बेहद गंभीर आपत्तियां आई हैं. चीन इन आपत्तियों पर काफी झगड़ालुपना दिखाता आया है. कभी ऑस्ट्रेलिया, कभी अमेरिका, कभी नीदरलैंड्स जैसे देशों को धमका भी चुका है. उसने इन देशों के बहिष्कार की भी धमकी दी. उन्हें आर्थिक अंजाम भुगतने की चेतावनी भी दी. मगर एक वैश्विक मंच पर जब WHO के बहुसंख्यक देश एक साथ जुटे, तो उनके दबाव में चीन को कम-से-कम रिव्यू शब्द के लिए सहमति देनी पड़ी. ये गुड न्यूज़ है.

Director General Of The World Health Organization
WHO प्रमुख टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस (फोटो: एपी)

...लेकिन इस गुड न्यूज़ से जुड़ी शंकाएं भी हैं.
सबसे बड़ी शंका ये है कि इस जांच की कोई समयसीमा तय नहीं हुई है. चीन ने कहा, कोरोना पर काबू पाने के बाद करिएगा समीक्षा. मगर बड़ा सवाल है कि कोरोना पर काबू पाएंगे कब? इसकी कोई डेडलाइन तो है नहीं. कई जानकार कह रहे हैं कि अभी शायद एक-दो साल तक दुनिया ऐसे ही परेशान रहेगी. पिछले हफ़्ते WHO ने कहा कि कोरोना पर कब तक काबू पाया जा सकेगा, ये अभी नहीं बताया जा सकता है. ऐसे में जांच को अनिश्चितकालीन समय पर छोड़ देने के कई जोखिम हैं. ऊपर से जांच से जुड़े लोग कितने स्वतंत्र और निष्पक्ष रह पाएंगे, इसे लेकर कई शंकाएं हैं. ये अंतरराष्ट्रीय जांच कैसे होगी, इसका मकेनिज़म क्या होगा, ये ब्योरे भी बहुत ज़रूरी हैं. फिर इस जांच के नतीजे क्या ईमानदारी से सामने रखे जाएंगे? अगर चीन की तरफ से चूक मिलती है, अगर जांच में उसके ऊपर लग रहे इल्ज़ाम सही साबित होते हैं, तब भी क्या पेइचिंग की साफ़गोई बनी रहेगी? क्या उस स्थिति में भी वो जांच में अड़ंगा नहीं लगाएगा?

चीन से जुड़े क्या सवाल हैं?
इन शंकाओं में एक ज़रूरी पक्ष चीन की मंशा से भी जुड़ा हुआ है. क्या वो कोरोना रिसर्च में सहयोग करेगा? क्या वो इससे जुड़ी जानकारियां साझा करने में पारदर्शिता दिखाएगा? क्या कोरोना के सोर्स को तलाशने, इसकी शुरुआत से जुड़ी पहेली बूझने में हम पहले ही बहुत लेट नहीं हो चुके हैं? चीन पर उठ रहे इन सवालों की लंबी-चौड़ी ज़मीन है. सबसे पहले हम बात करेंगे कोरोना के शुरुआती सैंपल्स की.

Wuhan
वुहान में सैंपल्स लेते स्थानीय प्रशासन के लोग (फोटो: एपी)

कोरोना के शुरुआती सैंपल्स का क्या हुआ?
नवंबर-दिसंबर 2019 में जब कोरोना की ये बीमारी वुहान में फैलनी शुरू हुई, तो स्थानीय प्रशासन ने बीमार लोगों के सैंपल्स लेने शुरू किए. ये सैंपल वुहान स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ वायरोलॉज़ी की प्रयोगशाला में भेजे गए. इन सैंपल्स को लैब में भेजे जाने का मकसद था इनपर शोध करना. मगर इस रिसर्च का क्या हुआ, कोई नहीं जानता. इनका डेटा कभी किसी और देश के साथ साझा नहीं किया चीन ने. अब सामने आया कि ये सैंपल बचे ही नहीं हैं. इन्हें नष्ट कर दिया गया है.

सैंपल्स मिटाने की बात कहां से आई?
ये जानकारी यूं सामने आई कि 6 मई को अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट माइक पॉम्पिओ मीडिया से बात कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने चीन पर इल्ज़ाम लगाया. कहा कि चीन की सरकार ने तो 3 जनवरी को ही अपने लैब्स से कहकर कोरोना के शुरुआती सैंपल नष्ट करवा दिए. माइक पॉम्पिओ के इस बयान की पुष्टि हुई 15 मई को. इस दिन चीन के नैशनल हेल्थ कमीशन (NHC) के एक अधिकारी लियू देंगफेंग अपनी प्रेस ब्रीफिंग दे रहे थे. इस दौरान उनसे माइक पॉम्पिओ वाली बात भी पूछी गई. इसपर लियू ने हामी भरी. उन्होंने कहा कि NHC ने जनवरी 2020 में एक गाइडलाइन जारी की थी. इसमें कोरोना वायरस के सैंपल नष्ट करने को भी कहा गया था. लियू का दावा है कि महामारी को रोकने की मंशा से ये निर्देश जारी किए गए थे. लियू का कहना था कि अगर लैब के पास बीमारी के सैंपल सुरक्षित रखने की सुविधा न हो, तो उन सैंपल्स को तत्काल वहीं नष्ट कर देने का नियम है.

Liu Dengfeng
चीन के नैशनल हेल्थ कमीशन के अधिकारी लियू देंगफेंग (फोटो: ट्विटर)

लियू सही कह रहे हैं…
जिन बायोसेफ़्टी लैब्स में सुरक्षा मानक कम होते हैं, वहां कोरोना जैसे संक्रामक विषाणुओं को या तो तत्काल नष्ट कर दिया जाता है. या फिर उन्हें किसी सुरक्षित जगह पर ट्रांसफर कर दिया जाता है. कोरोना के शुरुआती मरीज़ों से लिए गए सैंपल वुहान इंस्टिट्यूट ऑफ वायरोलॉज़ी स्थित नैशनल बायोसेफ़्टी लैबोरेट्री में भी रखे गए थे. ये लेवल-4 सुरक्षा मानकों वाली प्रयोगशाला है. इस तरह की प्रयोगशालाएं ख़ास ऐसी ही बीमारियों पर शोध के लिए बनाई जाती हैं. यहां कई तरह की संक्रामक बीमारियों से जुड़े विषाणुओं को स्टोर करने की ख़ास सुविधा होती है.

क्या बायोसेफ़्टी लेवल-4 की लैब भी सुरक्षित नहीं?
NHC अधिकारी लियू के बयान से तो यही समझ आता है कि वुहान स्थित ये लेवल-4 बायोसेफ़्टी प्रयोगशाला भी कोरोना सैंपल्स सुरक्षित नहीं रख सकती थी. ऐसे में तो इस लैब में रखे बाकी नमूनों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़ा होता है. यहां कोरोना फैमिली के विषाणुओं समेत कई तरह की महामारियों पर शोध हो रहे थे. अगर NHC ख़ुद मान रहा है कि लैब में वायरस को सुरक्षित रखने की सुविधा नहीं थी और किसी तरह की दुर्घटना को फैलने से रोकने के लिए कोरोना सैंपल नष्ट किए गए, तो फिर चीन उस लैब से कोरोना के लीक होने की थिअरी को कैसे खारिज़ कर सकेगा?

सैंपल्स पर पारदर्शिता नहीं
चीन पर कोरोना की जांच में सहयोग न करने का आरोप यूं ही नहीं लग रहा. वुहान स्थित जिस हुन्ना सीफ़ूड मार्केट से ये महामारी शुरू हुई, उसे 1 जनवरी को बंद करवा दिया गया था. दुकानदारों से कहा गया कि वो सारे जानवर, समूची खाने-पीने की चीजें वहीं छोड़कर चले जाएं. इसके एक रोज़ पहले 31 दिसंबर से ही यहां के सैंपल जमा करने का काम शुरू कर दिया गया था. यहां मौज़ूद जानवरों, दुकानों के स्टॉल, सीवर, कूड़े के ट्रक और बाकी सामानों से नमूने जमा किए गए थे.

Wuhan Seafood Market
वुहान सीफ़ूड मार्केट (फोटो: एपी)

चीन के मुताबिक, 1 जनवरी को इस मार्केट से 585 सैंपल जमा किए गए. इनमें 33 सैंपल कोरोना पॉज़िटिव मिले. मगर जानवरों के कितने सैंपल लिए थे. किन जानवरों से सैंपल लिए गए. ये बारे में चीन ने कोई जानकारी नहीं दी. कोरोना के सोर्स का पता लगाने के लिए ये जानकारी ज़रूरी है. मगर इन जानकारियों को बाहरी विशेषज्ञों के साथ साझा करने में चीन कोई सहयोग नहीं कर रहा.

सुझावों पर अमल नहीं
पैरिस स्थित एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है- वर्ल्ड ऑर्गनाइज़ेशन फॉर एनिमल हेल्थ. शॉर्ट में OIE. इसके 182 सदस्यों में चीन भी शामिल है. इस संस्था ने कहा कि चीन से कहा कि वो अपने यहां होने वाले वन्यजीवों के कारोबार की विस्तृत जांच करे. मगर इन अनुशंसाओं पर कितना अमल किया गया, ये मालूम नहीं है. OIE ने भी वायरस से सोर्स को खोजने में मदद का प्रस्ताव दिया है. मगर उसके इस प्रस्ताव पर चीन ने कोई सहमति नहीं दी है.

शोधकर्ताओं को रिसर्च की इजाज़त नहीं
इन सबके बीच एक बड़ा लाल झंडा ये है कि चीन बाहर के किसी रिसर्चर को भी अपने यहां आकर जांच नहीं करने दे रहा है. चूंकि संक्रमण की शुरुआत चीन में हुई, ऐसे में जांच के लिए वहां की फर्स्ट-हैंड जानकारी ज़रूरी है. मगर बाहरी शोधकर्ताओं के साथ सहयोग के नाम पर चीन ने अभी तक बस WHO की एक टीम को ही अपने यहां आने दिया है. ये टीम भी फरवरी में वहां गई थी. नौ दिनों तक ये टीम वहां रही, मगर उन्हें एक बार भी वुहान के उस बाज़ार तक नहीं पहुंचने दिया गया.

WHO क्या कह रहा है?
WHO की उस टीम में अमेरिका स्थित नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी ऐंड इन्फेक्शियस डिजिज़ेज़ के क्लिनिकल डायरेक्टर क्लिफोर्ड लेन भी शामिल थे. उन्होंने ‘वॉल स्ट्रीट जरनल’ को अपनी चीन यात्रा के दौरान चाइना के स्वास्थ्य अधिकारियों से हुई बातचीत का ब्योरा दिया. क्लिफोर्ड लेन के मुताबिक, चाइना के इन अधिकारियों ने WHO टीम से कहा था कि वो वुहान स्थित हुन्नान सीफूड मार्केट का एक मानचित्र बनाएंगे. इसमें पूरा ब्योरा होगा कि कौन सा जानवर कहां था. कब कौन सा मरीज़ बाज़ार के किस हिस्से में गया. मगर इस बात को तीन महीने होने वाले हैं. अब तक चीन ने ऐसा कोई मैप उपलब्ध नहीं कराया है. ‘वॉल स्ट्रीट जरनल’ ने जब इस बारे में WHO से सवाल पूछा, तो उनका कहना था कि वो कई बार चीन की सरकार से इस रिसर्च पर अपडेट मांग चुके हैं. मगर चीन की तरफ से उन्हें एक बार भी जवाब नहीं मिला है.

Clifford Lane
नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी ऐंड इन्फेक्शियस डिजिज़ेज़ के क्लिनिकल डायरेक्टर क्लिफोर्ड लेन (फोटो: ट्विटर)

अभी कितना सहयोग कर रहा है चीन?
चीन जांच में सहयोग का मौखिक आश्वासन तो दे रहा है, मगर सहयोग कर नहीं रहा. WHO बाकी देशों के विशेषज्ञों की एक दूसरी टीम भी चीन भेजना चाहता है. इस टीम का काम होगा, कोरोना के शुरुआती सोर्स का पता लगाना. मगर WHO के इस आग्रह पर चीन ने अब तक मुहर नहीं लगाई है. UN का ही हिस्सा है- फूड ऐंड अग्रीकल्चर ऑर्गनाइज़ेशन. शॉर्ट में, FAO. ये भी वुहान जाकर अपनी रिसर्च करना चाहता है. मगर इसके आग्रह को कई हफ़्तों से टाल रहा है चीन.

न्यू यॉर्क स्थित ‘इको हेल्थ अलायंस’ नाम की एक संस्था है. ये संस्था पिछले 15 सालों से कोरोना फैमिली के वायरसों पर रिसर्च कर रही है. सार्स बीमारी के समय भी इस संगठन की रिसर्च बहुत काम आई थी. जिन लोगों ने सार्स का स्रोत पता किया था, उनमें ये संगठन भी शामिल था. इस बार भी ये संगठन कोरोना रिसर्च में मदद करना चाहता है. मगर इन्हें रिसर्च नहीं करने दिया जा रहा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इको हेल्थ अलायंस और उनके सहयोगियों को वुहान के उस बाज़ार तक नहीं जाने दिया गया है.

देर हो चुकी है अब?
जानकारों को एक और चिंता सता रही है. महामारी की शुरुआत हुए करीब छह महीने हो चुके हैं. ऐसे में सैंपल लेने के लिहाज से अब बहुत देर हो चुकी है. इस तरह के इलाके किसी क्राइम सीन की तरह होते हैं. जितना समय बीतेगा और जितने ज़्यादा लोगों की आवाजाही होगी, सही सैंपल मिलने की संभावना उतनी ही कम होती जाएगी.

कोरोना के सोर्स का पता लगाने के लिए ज़रूरी है कि चीन बाहरी शोधकर्ताओं के साथ सहयोग करे. वो एक्सपर्ट संस्थाओं को अपने यहां आने दे. उन्हें रिसर्च में खुला हाथ दे. सही डेटा मुहैया कराए. जब तक वो ये नहीं करता, सहयोग के सारे आश्वासन कोरी गप्प ही मानी जाएगी.

ताइवान का क्या हुआ?
इस साल की ‘वर्ल्ड हेल्थ असेंबली’ में कोरोना और चीन के अलावा सबसे ज़्यादा फोकस ताइवान के मुद्दे पर भी था. ताइवान के सपोर्ट में काफी माहौल भी बना. अमेरिका समेत 28 देशों ने WHA में बतौर पर्यवेक्षक ताइवान को शामिल किए जाने की मांग की थी. मगर WHO ने ऐसा नहीं किया. इसके बाद ताइवान ने भी फिलहाल के लिए अपना दावा वापस ले लिया.

Joseph Wu
ताइवान के विदेश मंत्री जोसफ़ वु (फोटो: एपी)

18 मई को WHA शुरू होने से पहले ताइवान ने ऐलान किया कि वो मौजूदा असेंबली में शिरकत पर ज़ोर नहीं देगा. ऐसे में WHA के अंदर ताइवान के शामिल होने पर बातचीत की अटकलें भी ख़त्म हो गईं. एक आशंका ये है कि शायद सदस्य देशों ने एक साथ कोरोना और ताइवान, दोनों को लेकर चीन पर दबाव बनाना सही नहीं समझा. ताइवान के मुद्दे पर सपोर्टर देश एक कदम पीछे हट गए. और शायद इसीलिए चीन ने WHA में बिना आक्रामक हुए रिव्यू के लिए अपनी सहमति भी दे दी. ये कुछ-कुछ इस हाथ ले, उस हाथ दे वाली स्थिति हो गई.

ताइवान इस घटनाक्रम से निराश है. ताइवान के विदेश मंत्री जोसफ़ वु ने कहा कि चीन के दबाव में एक बार फिर WHO ने अपने घुटने टेक दिए हैं. एक बार फिर WHO ने ताइवान की सवा दो करोड़ से ज़्यादा की आबादी को अनदेखा कर दिया है. चीन और WHO पर तलवार तानकर बैठे अमेरिका ने ताइवान को फिर सपोर्ट किया है. अमेरिका ने ये भी कहा कि वो अब कभी भी WHO को फंडिंग नहीं देगा. वॉशिंगटन के मुताबिक, मुमकिन है कि वो WHO जैसी एक वैकल्पिक संस्था का गठन कर दे. इस धमाचौकड़ी में मज़े की बात ये है कि WHO के लिए अमेरिका का विरोध जितना बढ़ रहा है, उतना ही चीन WHO को सहला रहा है.


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