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चीनी वैक्सीन इस देश के लिए भारी पड़ गया?

महाकवि फ़ैज अहमद फ़ैज लिख गए हैं-

कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल, कब रात बसर होगी
सुनते थे वो आएंगे, सुनते थे सहर होगी.

जब कोरोना आया, तो दुनिया ने सोचा. इस बर्बादी से निजात पाने का एक ही तरीका है- वैक्सीन. वैक्सीन आएगी, तो दिन बहुरेंगे. दुनिया पहले सी हो जाएगी. दवा कंपनियां रेकॉर्ड तेज़ी से वैक्सीन बनाने में जुट गईं. सालों का काम महीनों में पूरा कर लिया गया. वैक्सीन बनी. लगने भी लगी. वैक्सिनेशन की प्रक्रिया में कुछ गिनती के मुल्क आगे निकल गए. बाकी दुनिया अभी वैक्सीन की राह ही देख रही थी कि वो चुनिंदा देश अपनी अधिकतम आबादी को वैक्सीनेट कर चुके थे.

मगर क्या वैक्सीनेट करना ही काफी है?

क्या वैक्सिनेशन का मतलब है कि कोरोना का ख़तरा टल गया? जवाब है नहीं. आज हम जिस देश की तस्वीर दिखाने जा रहे हैं, वहां ऐसा ही हुआ. वो देश वैक्सिनेशन में दुनिया के टॉप तीन देशों में शामिल है. बावजूद इसके वहां कोरोना के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. ऐसा क्यों हो रहा है? टीकाकरण में इतना आगे होकर भी वहां हालात काबू में क्यों नहीं आ रहे? इसके पीछे किसकी चूक है? और इस चूक से बाकियों को क्या सबक सीखना चाहिए. विस्तार से बताएंगे.

दुनिया में एक बड़े नायाब कवि हुए. नाम था, पाब्लो नेरुदा. प्रेम, क्रांति और राजनीति पर हद ख़ूबसूरत और संवेदनशील कविताएं बुनीं उन्होंने.

कहां के थे पाब्लो नेरुदा?

उस मुल्क के, जिसके बारे में कभी नेरुदा ने लिखा था. कि अगर आपने यहां के जंगल नहीं देखे, उन्हें जाना नहीं, तो समझिए कि आप इस धरती को ही नहीं जानते. ये ज़िक्र है, दक्षिणी अमेरिका में बसे देश ‘चिले’ का. साउथ पसिफ़िक ओशन के किनारे बसा चिले. मानचित्र पर देखेंगे, तो इसकी आकृति एक लंबी पूंछ की तरह नज़र आएगी.

Chile Map
साउथ पसिफ़िक ओशन के किनारे बसा है चिले. (गूगल मैप्स)

चिले में मापुचे नाम का एक मूल निवासी समूह है. इनकी भाषा में एक शब्द है- चिली. ये अंग्रेज़ी वाला चिली नहीं. मापुचे भाषा में चिली का मतलब होता है, वो जगह जहां ज़मीन ख़त्म होती हो. इसी के आधार पर देश का नाम पड़ गया, चिले. इस नामकरण के पीछे वजह है, चिले की भौगोलिक स्थिति. अगर आप चिले के निचले सिरे से नाक की सीध में चलिए, तो समंदर पार करके सीधे अंटार्कटिका पहुंच जाएंगे.

करीब 1.9 करोड़ आबादी वाला चिले बड़े राजनैतिक उथल-पुथल का शिकार रहा. यहां लंबे समय तक तानाशाही रही. फिर जब लोकतंत्र आया, तो मुल्क ने तेज़ी से तरक्की की. ये लैटिन अमेरिका के सबसे धनी देशों में शुमार हो गया. क्लीन गवर्नेंस, पारदर्शिता और निवेश के लिए मुफ़ीद माहौल के चलते इसे लैटिन अमेरिका का गोल्डन बॉय कहा जाने लगा. स्थिरता और शांति के चलते इसकी अर्थव्यवस्था ने भी बहुत तेज़ी से तरक्की की. मगर इस शानदार रेकॉर्ड के अलावा चिले में एक दिक़्कत भी है. यहां आबादी की आर्थिक हैसियत में बहुत असमानता है. बल्कि इस मामले में चिले का रेकॉर्ड दुनिया के सबसे ख़राब देशों में है.

ये पूरा बैकग्राउंड बताने के बाद चलते हैं कोरोना पर

चिले में कोरोना का पहला केस मिला 3 मार्च, 2020 को. मई आते-आते राजधानी सेंटियागो समेत देश के ज़्यादातर बड़े शहरों में कोरोना बेकाबू हो चुका था. जुलाई 2020 तक चिले कोरोना पॉजिटिव मामलों में दुनिया का छठा बड़ा देश बन चुका था.

इस स्थिति में भी चिले ने कोई देशव्यापी लॉकडाउन नहीं लगाया. लॉकडाउन की जगह संक्रमण का विस्तार रोकने के लिए कई छोटे-छोटे कदम उठाए गए. मसलन, रात 11 बजे से सुबह 5 बजे तक कर्फ़्यू लगाना. सार्वजनिक जगहों पर मास्क को अनिवार्य बनाना. 50 से ज़्यादा लोगों के जुटान पर रोक. इन यूनिफॉर्मल उपायों के अलावा स्थान विशेष की हालत देखकर फ़ैसले लिए जाते. मसलन, अगर किसी शहर या इलाके में केसेज़ बहुत बढ़ रहे हैं, तो वहां लॉकडाउन लगाया जाता. लॉकडाउन कितना सख़्त होगा, ये भी हालात देखकर तय किया जाता. फिर हालात ठीक होने पर धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से छूट दी जाती.

सितंबर 2020 से चिले की स्थिति सुधरने लगी!

सबसे ज़्यादा प्रभावित थी राजधानी सेंटियागो. यहां बहुत सख़्त लॉकडाउन लगाया गया था. 28 सितंबर को यहां भी लॉकडाउन हटा दिया गया. लॉकडाउन हटाने का मतलब ये नहीं था कि सारी सावधानियां तज दी गई हों. कुछ सहूलियतें दी गईं. मसलन, एक शहर से दूसरे शहर में आवाजाही की छूट. रेस्तरां को बिज़नस फिर शुरू करने की अनुमति. मगर कुछ पाबंदियां बरक़रार भी रहीं. मसलन, स्कूलों और कॉलेजों में ऑनलाइन क्लास का ही सिस्टम बनाए रखा गया. इसके अलावा चिले ने अपनी सीमाएं भी सील रखीं. पर्यटकों और विदेशियों के चिले में आने पर पाबंदियां लागू रहीं.

एक तरफ ये कंट्रोलिंग वाले तरीके अपनाए जा रहे थे. दूसरी तरफ, चिले वैक्सीन हासिल करने के लिए भी हाथ-पांव मार रहा था. उसे पता था कि बिना वैक्सीन के ख़तरा टलेगा नहीं. जितनी जल्दी वैक्सिनेशन शुरू होगा, उतनी ही तेज़ी से हालात सुधरेंगे. मगर वैक्सीन की सप्लाई लिमिटेड होने वाली थी. सारे देशों को एकसाथ और बराबर वैक्सीन मिलना संभव नहीं था. ऐसे में सभी साधन संपन्न देश आगे-आगे बढ़कर वैक्सीन निर्माता कंपनियों से डील कर रहे थे.

इनमें चिले भी आगे था. उसने कोरोना के शुरुआती महीनों में ही वैक्सीन निर्माता कंपनियों से बातचीत शुरू कर दी थी. यहां पहला केस आया 3 मार्च, 2020 को. और अप्रैल की शुरुआत में स्वास्थ्य मंत्रालय वैक्सिनेशन कैंपेन की तैयारी में जुट गया. एक विस्तृत प्लानिंग तैयार हुई. तय हुआ कि ज़्यादा से ज़्यादा वैक्सीन निर्माताओं के साथ डील की जाए. ताकि चिले को अलग-अलग टेक्नीक से तैयार होने वाली बेस्ट वैक्सीन्स मिल सकें. चिले ने फ़ैसला किया कि वैक्सीन्स निर्माताओं के साथ प्री-पर्चेज़ डील की जाए. उनके ट्रायल पूरा होने तक का इंतज़ार न किया जाए.

ताकि जब मार्केट में वैक्सीन आए, तो चिले के पास न केवल सबसे प्रभावी वैक्सीन्स हों. बल्कि एक से ज़्यादा सोर्स होने के चलते उसके पास वैक्सीन की पर्याप्त डोज़ भी हों. चिले ने ये भी तय किया कि वो वैक्सीन ख़रीद में वर्ल्ड पॉलिटिक्स का लोड नहीं लेंगे. जो बना रहा है, सबसे खरीदेंगे. चीन से भी. ब्रिटेन से भी. अमेरिका और यूरोप से भी. रूस से भी. जापान से भी. चिले ने स्पष्ट कर दिया कि कोरोना के मामले में उनका फ़ोकस जियो पॉलिटिक्स की खेमेबाज़ी पर नहीं, साइंस पर है.

Coronavirus In Chile
चिले में 3 फरवरी, 2021 से आम आबादी का भी टीकाकरण शुरू हो गया. (तस्वीर: एपी)

24 दिसंबर, 2020 से चिले में कोविड वैक्सीनेशन शुरू हो गया

चिले वैक्सिनेशन शुरू करने वाले सबसे शुरुआती देशों में था. सबसे पहले फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स को वैक्सीन लगी. फिर 3 फरवरी, 2021 से आम आबादी का भी टीकाकरण शुरू हो गया. वैक्सिनेशन कैंपेन की शुरुआत में ही चिले बढ़िया स्थिति में था. उसे वैक्सीन का इंतज़ार नहीं करना था. उसके पास वैक्सीन की ज़रूरत से ज़्यादा सप्लाई थी. मसलन, चाइनीज़ वैक्सीन सिनोवैक के साथ एक करोड़, 40 लाख डोज़ का करार था. इसमें से एक करोड़ डोज़ उसे 1 मार्च तक मिल चुका था.

फ़ाइजर/बायोऐनटेक के साथ एक करोड़ डोज़ की डील थी. इसमें से सात लाख डोज़ मिल चुकी थीं. इनके अलावा एस्ट्राज़ेनेका और जॉनसन ऐंड जॉनसन के भी चालीस-चालीस लाख डोज़ मिलने थे. चिले की स्पूतनिक वी के लिए रूस से भी बातचीत जारी थी. वो कैनसिनो बायोलॉजिक्स नाम की चाइनीज़-कनैडियन कंपनी से भी डील कर रहा था.

उसने WHO के कोवैक्स प्रोग्राम में भी हिस्सेदारी की थी. यहां से भी उसे करीब 75 लाख डोज़ मिलनी हैं. संक्षेप में समझिए कि अधिकांश देश जहां वैक्सीन की राह देख रहे थे, वहां चिले ने जहां से हो सका, वैक्सीन ख़रीद ली. वो भी काफी अडवांस में. इसीलिए चिले वैक्सिनेशन को लेकर काफी कॉन्फ़िडेंट था. चिले की आबादी है लगभग 1 करोड़, 90 लाख. उसने कहा कि जून 2021 तक वो डेढ़ करोड़ लोगों को वैक्सीन की कम-से-कम एक डोज़ तो लगा ही देगा.

चिले में पब्लिक स्वास्थ्य सेवा का ढांचा काफी बढ़िया है. टीकाकरण का मज़बूत कल्चर रहा है यहां. चेचक, मीज़ल्स, पोलियो जैसी बीमारियों के टीकाकरण अभियान बहुत सफल रहे हैं. आप समझिए कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे तरक्कीपसंद माने जाने वाले देशों को वैक्सिनेशन के लिए इतनी ज़द्दोजहद करनी पड़ती है. लोगों को राज़ी करने के लिए पसीना बहाना पड़ता है. वहीं चिले में पिछली करीब एक सदी से वैक्सिनेशन की मज़बूत परंपरा रही है. अधिकतर लोग स्वेच्छा से वैक्सीन लगवाते हैं.

‘यो मी वैकुनो’

ये परंपरा कोरोना वैक्सिनेशन को फ़ुर्ती से निपटाने में भी बड़ी काम आई. चिले ने तय किया कि लोगों को टीका लगवाने के लिए सेंटर्स तक आने की मशक्कत न करनी पड़े. प्रशासन ख़ुद लोगों के पास पहुंच जाए. प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स, लोकल क्लिनिक, अस्पताल इन सब जगहों पर तो वैक्सिनेशन सेंटर्स बने ही. इनके अलावा बाज़ारों, स्टेडियम्स, कॉलेज, समझिए कि चप्पे-चप्पे पर टीकाकरण केंद्र खोल दिए गए.

टीका लगवाने के लिए अपॉइंटमेंट की भी ज़रूरत नहीं थी. स्वास्थ्य मंत्रालय के पास पहले से ही नागरिकों का इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड था. मंत्रालय ने उसी के आधार पर एक कैलेंडर जारी किया. इसमें दर्ज़ था कि किस-किस को वैक्सीन लगनी है. कब लगनी है. लोग इसी हिसाब से घूमते-टहलते सेंटर पर आते और टीका लगवा लेते.

Yo Ma Vacuno
यो मी वैकुनो, स्पैनिश भाषा के शब्द हैं. इसका मतलब होता है, मुझे भी टीका लग गया. (तस्वीर: एपी)

इसके अलावा एक नैशनल इम्यूनाइज़ेशन रजिस्ट्री बनाई गई. इसमें टीकाकरण का पूरा बहीखाता दर्ज़ था. लोग आसानी से ट्रैक कर सकते थे कि उन्हें वैक्सीन की सेकेंड डोज़ कब लगनी है. सरकार ने वैक्सिनेशन को फ़न एक्सरसाइज़ भी बनाया. लोगों को प्रोत्साहित किया गया कि वो सोशल मीडिया पर अपने वैक्सीनेटेड होने का ऐलान करें. लोग ‘यो मी वैकुनो’ के कार्ड शेयर करने लगे. यो मी वैकुनो, स्पैनिश भाषा के शब्द हैं. इसका मतलब होता है, मुझे भी टीका लग गया.

तो क्या चिले ने कोरोना को हरा दिया?

चिले में आम आबादी के लिए वैक्सिनेशन ड्राइव शुरू हुए करीब डेढ़ महीना बीत चुका है. इतने दिनों में वो वैक्सिनेशन रेट वाला दुनिया का तीसरे नंबर का देश बन चुका है. ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी द्वारा जारी डेटा के मुताबिक, केवल इज़रायल और ब्रिटेन ही चिले से आगे हैं. तो क्या इतने इम्प्रेसिव रेकॉर्ड का मतलब है कि चिले ने कोरोना को हरा दिया? यहां जीवन सामान्य हो गया? जवाब है, नहीं.

चिले की स्थिति अब भी बेहद नाज़ुक है. वहां कोरोना मामलों में रेकॉर्ड तेज़ी आई है. 8 अप्रैल को यहां कोरोना के कुल 8,195 नए मामले सामने आए. 9 अप्रैल को आंकड़ा पहुंच गया 9,171 पर. महामारी शुरू होने के बाद डेली संक्रमण की ये अधिकतम संख्या थी. इसके बाद के दिनों में नए संक्रमणों की संख्या में गिरावट आई है, लेकिन बेहद मामूली. बीते रोज़, यानी 15 अप्रैल को भी करीब साढ़े सात हज़ार नए केस आए. इस रोज़ कोरोना से 218 मौतें भी हुईं. अब तक वहां करीब 25 हज़ार लोग कोरोना से मर चुके हैं. जनसंख्या के अनुपात से देखिए, तो ये संख्या काफी ज़्यादा है.

चिले में कोविड से बिगड़ रही स्थिति को ग्राफ़ पर देखिएगा, तो शायद ज़्यादा स्पष्ट तस्वीर मिलेगी. 30 अप्रैल, 2020 को यहां कोरोना का ग्राफ़ एकाएक तेज़ी से उछला. इस रोज़ 1,332 नए केस मिले. जबकि 29 अप्रैल को ये संख्या 600 के लपेटे में थी. 30 अप्रैल के बाद संक्रमण का विस्तार होता गया. सबसे ख़राब स्थिति रही मई, जून और जुलाई 2020 में. 14 जून, 2020 को यहां 8,122 नए मामले सामने आए. ये चिले का पीक था.

Chile Covid
चिले में कोविड से बिगड़ रही स्थिति को ग्राफ़ पर देखिए.

इसके बाद संक्रमण का ग्राफ़ गिरने लगा. अगस्त से लेकर दिसंबर, 2020 तक कमोबेश एक सी स्थिति रही. इस दौरान डेली संक्रमण की संख्या हज़ार, डेढ़ हज़ार के बीच सिमटी रही. मगर फिर 1 जनवरी, 2021 से दोबारा ग्राफ़ उठने लगा. यही ग्राफ़ उठते-उठते 9 अप्रैल को नए पीक पर पहुंच गया. इस दिन 9,151 नए मामले मिले.

हालत ये थी कि मार्च 2021 ख़त्म होते-होते चिले के अस्पतालों में ICU के 95 पर्सेंट बेड भर चुके थे. नतीजतन, चिले को लॉकडाउन लगाना पड़ा. ये लॉकडाउन 2020 के मुकाबले ज़्यादा विस्तृत और सख़्त था. देश की 80 पर्सेंट से ज़्यादा आबादी लॉकडाउन में थी. उन्हें राशन का सामान खरीदने या दवा दुकान जाने के लिए भी घर से निकलने की इजाज़त नहीं थी. एक आदमी हफ़्ते में केवल दो बार घर से बाहर जा सकता था. वो भी बेहद अनिवार्य कारणों से और बेहद कम समय के लिए.

चिले में उल्टी गंगा क्यों बह रही है?

अब इस स्थिति को वैक्सिनेशन वाली तस्वीर के समकक्ष रखकर देखिए. एक तरफ़ चिले में फ़ुर्ती से टीके लग रहे हैं, दूसरी तरफ़ कोरोना का ग्राफ़ बढ़ रहा है. ये स्थिति कन्फ़्यूज़ करती है. क्यों? क्योंकि हमने तो सोचा था कि वैक्सीन रामबाण है. अधिकतम आबादी को वैक्सीन लगने का मतलब है हर्ड इम्युनिटी. फिर चिले में उल्टी गंगा क्यों बह रही है?

इसके पीछे कई वजहें हैं. सबसे पहली वजह है, ग़लतफ़हमी. लोगों ने सोचा, वैक्सीन आ गई. अब सावधानी की ज़रूरत नहीं. वो ढिलाई बरतने लगे. महीनों तक पाबंदी में जी रही जनता लापरवाही दिखाने लगी. सोशल डिस्टेन्सिंग और मास्क लगाने जैसी ज़रूरी सावधानियां बैकगियर में चली गईं. हमने आपको चिले का कोविड ग्राफ़ दिखाया था न. एकबार फिर ये ग्राफ़ देखिए. आपको नज़र आएगा कि कोविड में आई ये हालिया तेज़ी 1 जनवरी, 2021 के आसपास शुरू हुई.

इसका कारण क्या है?

इसकी वजह है, क्रिसमस और नए साल की छुट्टी. इस वक़्त तक महामारी से त्रस्त लोग रिलेक्स्ड हो गए थे. शॉपिंग मॉल्स में खचाखच भीड़ लगने लगी. पार्टियां होने लगीं. लोग परिवारों और दोस्तों के साथ छुट्टी मनाने जाने लगे. पर्यटन स्थलों पर भीड़ जुटने लगी.

सरकार ने देश की सीमाएं खोल दीं. विदेश यात्राओं को दोबारा हरी झंडी मिल गई. इसके चलते कई लोग छुट्टी मनाने विदेश भी गए. उनमें से कई जब चिले वापस लौटे, तो अपने साथ ब्राजील, ब्रिटेन और दक्षिण अफ़्रीका वाले घातक कोरोना वैरिएंट्स भी एक्सपोर्ट कर लाए. सरकार ने जगह-जगह टेस्टिंग की सुविधा रखी थी. मगर लापरवाही के चलते लोगों ने टेस्टिंग कराना ज़रूरी नहीं समझा. नतीजा ये हुआ कि वायरस को फलने-फूलने और भयावह होने का मुफ़ीद मौका मिला. नए कोरोना वैरिएंट्स पूरे चिले में फैल गए.

सरकार का कहना है कि उन्होंने दिसंबर आते-आते ढील ज़रूर दी थी. मगर जनता से ये नहीं कहा था कि अब बेफ़िक्र होकर मौज करो. पार्टियां और बड़ी सोशल गैदरिंग्स पर तब भी बैन था. मास्क पहनने की अनिवार्यता भी थी. मगर लोगों ने लापरवाही दिखाई. इसका नतीजा अब पूरा देश भुगत रहा है.

सिनोवैक पर सवाल!

चिले की इस नई कोरोना लहर को लेकर एक और भी आशंका है. इस आशंका का नाम है- सिनोवैक. ये चीन की बनाई कोरोना वैक्सीन है. चिले ने अपने वैक्सिनेशन कैंपेन में अभी तक सबसे ज़्यादा सिनोवैक का ही इस्तेमाल किया है. सिनोवैक का प्रभाव बहुत संदिग्ध है. ब्राजील में किए गए क्लिनिकल ट्रायल्स में सिनोवैक का एफिकेसी रेट केवल 50.4 पर्सेंट पाया गया.

इस तरह की वैक्सीन को अप्रूवल के लिए न्यूनतम 50 पर्सेंट रेट चाहिए होता है. जितनी ज़्यादा एफ़िसिएंसी, उतना बेहतर प्रॉटेक्शन. अगर वैक्सीन की एफिकेसी रेट ज़्यादा है, तो ये गंभीर संक्रमण के मामलों में ज़्यादा कवरेज़ देती है. मगर सिनोवैक तो मिनिमम एफिकेसी रेट से कुछ ही पॉइंट ऊपर है. चाइना की बनाई दो और वैक्सीन्स का रेट भी 66 और 79 पर्सेंट है.

ये औसत फ़ाइजर, मॉडेर्ना और स्पूतनिक वी से कहीं नीचे है. ऐसे में कई जानकार सवाल उठा रहे हैं कि कहीं चिले के बढ़ते कोविड ग्राफ़ की वजह चाइनीज़ वैक्सीन की कम प्रॉटेक्शन रेट तो नहीं. वैसे भी ख़ुद चीन ने माना है कि उसकी बनाई वैक्सीन बहुत प्रभावी नहीं है. चाइनीज़ सेंटर फॉर डिजिज़ कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन के डायरेक्टर हैं, गाओ फु. 10 अप्रैल को उन्होंने ख़ुद स्वीकार किया कि चीन में विकसित मौजूदा वैक्सीन्स की प्रॉटेक्शन रेट ज़्यादा नहीं है.

Gao Fu
चाइनीज़ सेंटर फॉर डिजिज़ कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन के डायरेक्टर गाओ फु. (तस्वीर: एपी)

एक और भी मसला है!

बाकी बहुत सारे लोगों की तरह चिले में भी जनता ने वैक्सीन को जादू की छड़ी समझ लिया. कइयों को लगा कि वैक्सीन का मतलब है, अब संक्रमण नहीं हो सकता. ये अवधारणा ग़लत है. ऐसा नहीं कि वैक्सीन लगने के बाद आप संक्रमण से पूरी तरह इम्यून हो जाते हैं. इसके बाद भी संक्रमण मुमकिन है. मगर उम्मीद की जाती है कि संक्रमण माइल्ड होगा. अस्पताल में भर्ती होने की नौबत नहीं आएगी. जान पर नहीं बन आएगी.

इसके अलावा वैक्सीन को असर दिखाने में भी समय लगता है. शरीर के इम्युन सिस्टम को इसके हिसाब से अजस्ट होने, वैक्सीन के प्रति ऐंटीबॉडी रेस्पॉन्स बढ़ाने के लिए समय चाहिए होता है. मोटामाटी समझिए कि वैक्सीन की फ़ाइनल डोज़ लगने के करीब दो हफ़्ते बाद जाकर शरीर को फुल प्रॉटेक्शन मिलता है. चूंकि कोविड की ज़्यादातर वैक्सीन अभी दो डोज़ वाली हैं, ऐसे में ये सोचना कि पहले डोज़ के बाद ही आप अपराजेय हो गए, ग़लत है.

Enrique Paris
चिले के स्वास्थ्य मंत्री एनरिक़ पैरिस. (तस्वीर: एपी)

बल्कि फ़ाइनल डोज़ पड़ने के बाद भी मास्क पहनने जैसी सावधानियां ज़रूरी क्यों?

क्योंकि जिसे वैक्सीन लगी है, वो तो प्रॉटेक्ट हो जाएगा. मगर उसके संक्रमित होने की आशंका रहेगी. इसका मतलब कि वैक्सिनेटेड इंसान भी वायरस का कैरियर हो सकता है. वो अनजाने में ही अपने संपर्क में आए ग़ैर-वैक्सीनेटेड लोगों को संक्रमित कर सकता है. ऐसा न हो, इसके लिए अभी वैक्सिनेटेड लोगों को भी मास्क लगाने जैसी एहतियात बरतनी होगी.

चिले की मिसाल पूरी दुनिया के लिए सबक है. वहां सरकार और जनता, दोनों से लापरवाहियां हुईं. इसके चलते वैक्सिनेशन में आगे होकर भी चिले सामान्य नहीं हो पा रहा है. अच्छी बात ये है कि चिले की सरकार अपनी भूल मान रही है. वहां स्वास्थ्य मंत्री हैं एनरिक़ पैरिस. उन्होने माना कि ग़लतियां हुईं. और इनके चलते कई परिवारों ने अपनों को खोया. जनता ने दुश्वारियां भोगीं. मंत्री ने जनता से माफ़ी भी मांगी. उम्मीद है कि चिले अब ऐसी लापरवाही नहीं बरतेगा. उम्मीद है कि उसकी ग़लतियों से बाकी दुनिया भी सबक लेगी.


विडियो- कोविड वैक्सीनेशन के टॉप देशों में शामिल चिले में कोरोना क्यों बढ़ा?

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