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पद्मावती एक भुला दी जानी वाली फिल्म ही तो है

तमाम स्पष्टीकरणों के बावजूद 'पद्मावती' के विरोध को जिस तरह भाजपा नेताओं ने हवा दी है, उस से ये सवाल पैदा होता है कि एक काल्पनिक कहानी के विरोध से पार्टी क्या हासिल करना चाहती है. इसी की पड़ताल करता हुआ एक लेख.

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ये आर्टिकल DailyO के लिए पथिक्रित सान्याल ने लिखा है. हम वेबसाइट की इजाज़त से इसका अनुवाद आपको यहां पढ़ा रहे हैं. ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए ये अनुवाद रुचिका किया है.


सत्ता में अगर एक तर्कहीन रूढ़िवादी पार्टी हो, तो वो कला और इतिहास दोनों के लिए दिक्कत खड़ी कर सकती है. संजयलीला भंसाली की फ़िल्म ‘पद्मावती’ के साथ हम ऐसा होते हुए देख भी रहे हैं.

फिल्म बनना शुरू ही हुई थी कि दक्षिणपंथियों ने इस पर अपनी नज़रें जमा ली थीं. ऐसे ही एक गुट श्री राजपूत करणी सेना के लोगों ने 27 जनवरी, 2017 को भंसाली को थप्पड़ जड़ दिया था. फिल्म का सेट भी तहस-नहस कर दिया था.

इस गुट का कहना है कि भंसाली ने अपनी फ़िल्म ‘पद्मावती’ के ज़रिए इतिहास को ‘तोड़ने-मरोड़ने’ की कोशिश की है. उन्हें लगता है फ़िल्म में रानी पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के कैरेक्टर्स के बीच एक ड्रीम सिक्वेंस शूट हुआ है. ड्रीम सिक्वेंस माने ऐसा सीन, जिसमें किसी का सपना दिखाया गया हो. उनका कहना है कि इस ड्रीम सिक्वेंस में रानी पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी को इंटीमेट होते दिखाया गया है.

आरोप है कि फिल्म में कुछ दृश्य ऐसे हैं, जहां सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी और राजपूत रानी पद्मावती के बीच नजदीकियां दिखाई गई हैं.
आरोप है कि फिल्म में कुछ दृश्य ऐसे हैं, जहां सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी और राजपूत रानी पद्मावती के बीच नज़दीकियां दिखाई गई हैं.

सेट के तहस-नहस होने के 10 महीने बाद, 8 नवंबर को भंसाली का एक वीडियो आया. इसमें उन्होंने बताया कि ‘पद्मावती’ को बनाते हुए राजपूत आन-बान-शान का ध्यान रखा गया है. फ़िल्म में कोई ड्रीम सिक्वेंस नहीं है. ये सिर्फ़ एक अफ़वाह है.

आखिर क्या वजह रही होगी जो भंसाली को इस तरह सफ़ाई देनी पड़ी? क्या वजह रही, जो उनके दिल में राजपूतों के लिए एक सॉफ़्ट कॉर्नर बन गया? क्या भंसाली ऐसा सोचते हैं कि जाने-अनजाने में उन्होंने राजपूत शान को चोट पहुंचा दी है? या फिर उनका इस देश से भरोसा उठ चुका है. ऐसा देश, जिसे ज़रा सी भी भनक लगी कि उसके विचार और आस्था पर चोट की जा रही है और वो अपना आपा खो देता है.

sanjay leela bhansali
संजय लीला भंसाली अपने वीडियो संदेश में. इनकी फिल्म ‘पद्मावती’ की रिलीज़ पर कुछ राजपूत संगठनों को आपत्ती है.

श्री राजपूत करणी सेना या दूसरे दक्षिणपंथी गुट जिस आन-बान-शान की बात कर रहे हैं, वो उतनी ही काल्पनिक है, जितनी सूफ़ी कवि मलिक मुहम्मद जायसी की लिखी कविता ‘पद्मावत’. यही वो कविता है जिससे प्रेरणा लेते हुए भंसाली ने अपनी फ़िल्म बनाई है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि कविता और फ़िल्म दोनों इतिहास से कुछ तो ताल्लुक रखते हैं. लेकिन इनमें बताई गई घटनाएं कहीं से भी वास्तविक नहीं हो सकती. जायसी ने ये कविता खिलजी के चित्तौड़ पर हमला करने के 237 साल बाद लिखी थी. इसमें राजपूत राजा का जो नाम है, वो इतिहास के किसी भी दस्तावेज़ में नहीं मिलता.

swarajyamag.com पर छपे एक आर्टिकल के मुताबिक, ‘अमीर खुसरो ने कभी पद्मिनी के बारे में कुछ नहीं लिखा. उनकी किताब ‘तारीख-ए-अलाई’ में पद्मिनी का ज़िक्र कहीं नहीं आता. खुसरो खिलजी के दरबारी कवि थे. जब खिलजी ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की थी, तब खुसरो उनके साथ ही थे.  

कुछ राजपूत संगठनों ने 'पद्मावती' को बैन करने की मांग की है.
कुछ राजपूत संगठन ‘पद्मावती’ को बैन करने की मांग कर रहे हैं.

अब सवाल आता है फ़िल्म में पद्मिनी के चित्रण का. शिकायत की जा रही है कि भंसाली ने एक ऐसी राजपूत रानी का ‘सनसनीखेज़’ चित्रण किया है जो बाकी महिलाओं के साथ ‘जौहर’ कर लेती है. हारे हुए राजपूतों की पत्नियां बलात्कार और कैद से बचने के लिए एक साथ आत्महत्या कर लेती थीं. इसी को जौहर कहते थे. इस ऐतराज़ को दो तरह से गलत ठहराया जा सकता है.

अव्वल ये कि जब हम ‘जौहर’ जैसी चीज़ को सम्मान देते हैं और गर्व करने लायक समझते हैं, तब हम भूल जाते हैं कि बलात्कार से बचने के लिए आत्महत्या करना कोई महान परंपरा हो ही नहीं सकती. दूसरी बात ये कि एक ‘मुस्लिम’ राजा के हमले की पृष्ठभूमि पर ”हिंदू” राजपूत मान को महान बताने की कोशिश ऐतिहासिक तथ्यों के खिलाफ जाती है. इससे भी गंभीर बात ये कि एक राष्ट्र के तौर पर भारत हमेशा से मौजूद नहीं था. राजपूत इतिहास पर एक अंग्रेज़ी वेबसाइट ‘यूथ की आवाज़’ पर एक बढ़िया निबंध छपा है. “The problem with Rajput Hindutva: History shows they were as much Muslim as Hindu” शीर्षक से छपे इस निबंध में लिखा है-

”…मुगल काल में ज़्यादातर राजपूत राजा मुगलों के अधीन थे. उन्हें लगान भेजते थे. आज के औसत राजपूत को ये बात शर्मिंदा करती है. थार के मुसलमानों के साथ राजपूतों का मिला-जुला इतिहास है, जिसे वो नकारते आ रहे हैं. राजपूत मुसलमानों की एक बड़ी आबादी को वो घृणा की नज़र से देखते हैं. यही कुछेक वजहें है, जिनकी वजह से उस चीज़ ने सर उठाया, जिसे आज हम ”राजपूताना” पहचान कहते हैं. राजपूताना पहचान और आज-कल एक औसत राजपूत में नज़र आने वाले ”हिंदुत्व” में एक समानता है. दोनों अंग्रेज़ों के राज में अस्तित्व में आए थे…” 

केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता ऊमा भारती ने 10 नवंबर को एक बात कही. उन्होंने कहा, ‘क्यों न इतिहासकारों, फ़िल्म निर्माताओं, प्रदर्शनकारियों और सेंसर बोर्ड की एक समिति बनाई जाए, जो इस विवाद पर फ़ैसला ले.’

बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने भंसाली पर एक राजपूत रानी का अपमान कर पैसे कमाने के आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि भंसाली का ऐसा करना हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचा रहा है. साक्षी महाराज ने ये भी जोड़ा-

“मैं इसकी निंदा करता हूं और भंसाली से आग्रह करता हूं कि वो पैगंबर मोहम्मद पर एक फिल्म बनाएं. इससे उन्हें पता चलेगा कि उनका कद (या औकात?) क्या है.’

वो वाघेला ही हैं, जो पद्मावती को गुजरात चुनाव में मुद्दा बनाकर लाए हैं.
सवाल ये है कि क्या बीजेपी पद्मावती को गुजरात चुनाव का मुद्दा बनाना चाह रही है?

संसद के बीजेपी सदस्य चिंतामणी मालवीय ने फेसबुक पर लिखा था, ‘भंसाली जैसे लोग किसी और भाषा को नहीं समझते. उन्हें केवल जूते की भाषा समझ आती है. ये देश रानी पद्मावती की बेइज़्ज़ती नहीं सहेगा. हमारे इतिहास के साथ जो छेड़खानी हो रही है, उसे हम बर्दाश्त नहीं करेंगे.’

फरीदाबाद से बीजेपी विधायक और हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी को एक पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने कहा कि अल्लाउद्दीन खिलजी के कैरेक्टर को जिस तरह दिखाया जा रहा है वो ऐसे लोगों की प्रशंसा करने जैसा है जो महिलाओं पर तेज़ाब फेंकते हैं.

बीजेपी विधायक राज पुरोहित ने भी फ़िल्म का विरोध किया और इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की. उन्होंने कहा, ‘ये फिल्म राजपूतों की परंपरा और भारतीय इतिहास के खिलाफ़ है. ये महिलाओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाती है. जब निर्देशक ट्रेलर जारी कर सकते हैं, अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म पर वीडियो डाल सकते हैं, तो वो हमें फ़िल्म क्यों नहीं दिखा सकते?’

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‘पद्मावती’ 1 दिसंबर, 2017 को रिलीज़ होगी.

और जैसे ये सब काफ़ी नहीं था, कि बीजेपी नेता अर्जुन गुप्ता ने भंसाली की फिल्म पर रोक लगाने की मांग करते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिख दिया. उनका कहना है, ‘न सिर्फ राजपूत समुदाय, बल्कि पूरा देश इस फ़िल्म के खिलाफ़ है. भंसाली को देशद्रोह के आरोप में सज़ा होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी निर्माता ऐसा प्रोजेक्ट करने से पहले दस बार सोचे. भंसाली ने इतिहास के साथ छेड़छाड़ की है.’

एक सामान्य व्यक्ति को यही लगेगा कि बीजेपी एक ऐसी पार्टी है जो अपने इतिहास को संरक्षित करके रखना चाहती है. वो इतिहास, जिस पर वो बहुत घमंड करती है. लेकिन सच तो ये है कि बीजेपी वो पार्टी है, जो अपने हिसाब से एक ‘वैकल्पिक इतिहास’ गढ़ना चाह रही है.

द इंडियन एक्सप्रेस की फ़रवरी में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, वसुंधरा राजे की बीजेपी सरकार के तीन वरिष्ठ मंत्रियों ने इतिहास को फिर से लिखने का एक प्रस्ताव रखा है. इस प्रस्ताव में यूनिवर्सिटी लेवल पर जो पढ़ाई हो रही है, उसमें कुछ बदलाव करने का सुझाव दिया गया है. अब छात्रों को ये सिखाया जाएगा कि महाराणा प्रताप ने अकबर की मुग़ल सेना के खिलाफ़ हल्दीघाटी का युद्ध जीत लिया था.

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महाराणा प्रताप सिंह उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजवंश के राजा थे.

सतीश चंद्रा की किताब ‘Medieval India: From Sultanat to the Mughals – Mughal Empire’ के मुताबिक ये बात बिलकुल बेतुकी है. सतीश चंद्रा अपनी किताब में बताते हैं कि हल्दीघाटी का युद्ध अकबर और महाराणा प्रताप के बीच लड़ा गया था. अकबर के सेनाध्यक्ष थे मान सिंह और महाराणा प्रताप का साथ एक अफ़गान टुकड़ी ने दिया था, जिसे यलगार हकीम सुर नाम के एक जनरल ने दिया था. महाराणा प्रताप ये युद्ध जीतने में नाकामयाब रहे थे. चंद्रा के मुताबिक जब इस लड़ाई में दोनों पार्टियों में हिंदू-मुस्लिम बराबर बंटे हुए थे, तो ये कहा नहीं जा सकता कि ये लड़ाई हिंदुओं और मुसलमानों के बीच थी. न ही इसे राजपूतों की स्वतंत्रता की लड़ाई कहा जा सकता है.

मुझे नहीं लगता कि बीजेपी ये सब इसलिए कर रही है क्योंकि उसे अपने इतिहास से कोई प्यार है. तो फिर आखिर क्या वजह है कि वो बेकार में लगाई गई एक आग में घी डालने का काम कर रही है? क्या वो हमें बांटना चाहती है? क्या वो इतिहास को बदलकर कर मुसलमानों को हाशिए पर धकेलना चाहती है?

एक फिल्म के तौर पर ‘पद्मावती’ हमारे इतिहास में बहुत बड़ी घटना नहीं है. ये बस एक फ़िल्म है जिसे कुछ हफ़्तों में भुला दिया जाएगा. लेकिन ये फिल्म ठीक उस तरह का मौका पैदा करती है जिसकी तलाश में बीजेपी रहती है. एक मौका, जिसमें लोगों के मूड और उनकी सहनशक्ति की सीमाओं को भांपा जा सके, ताकि उन्हें एक ‘नए और मुफीद’ इतिहास वाले भारत में धकेला जा सके.


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