Submit your post

Follow Us

विजय रूपाणी को हटाकर बीजेपी ने भूपेंद्र पटेल को क्यों बनाया गुजरात का मुख्यमंत्री?

नरेंद्र मोदी गुजरात से दिल्ली आकर प्रधानमंत्री हुए, उसके बाद से 7 साल के भीतर सूबे को तीसरा मुख्यमंत्री मिल गया है. विजय रूपाणी से इस्तीफा ले लिया गया है और नए मुख्यमंत्री बने हैं पहली बार के विधायक भूपेंद्र पटेल. आखिर क्या वजह रही कि भाजपा को अपने सिर के ताज गुजरात में चुनाव से एक बरस पहले मुख्यमंत्री को बदल देना पड़ा.

भूपेंद्र पटेल ने आज गुजरात के 17वें मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है. एक नेता जो 2010 में पहली बार अहमदाबाद का पार्षद बनता है और 11 साल बाद सूबे की मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच जाता है. राजनीति में ऐसा प्रमोशन बहुत कम नेताओं को मिलता है. भूपेंद्र पटेल का नाम अपवादों में लिया जाएगा. शनिवार को जब गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने इस्तीफा दिया, तो नए मुख्यमंत्री के नामों की चर्चा शुरू हुई.

रेस में आगे कौन, पीछे कौन वाली लिस्ट विश्वसनीय सूत्रों के आधार पर चलने लगी. कहीं पर भी भूपेंद्र पटेल का नाम नहीं था. विधायक दल की बैठक के बाद ही ये नाम मीडिया में आया. और पहली बार विधायक बना ये नेता कहीं भी दावेदारी में नहीं था, इसीलिए फैसले पर हैरानी भी जताई गई. फैसले में खूब गोपनीयता भी बरती गई. शायद बीजेपी के भी दो तीन बड़े नेताओं के अलावा इस फैसले की पहले से किसी को भनक नहीं थी.

Vijay Rupani
भूपेंद्र पटेल से पहले विजय रूपाणी गुजरात के सीएम थे. फोटो- PTI

भूपेंद्र पटेल को भी पक्का भरोसा नहीं रहा होगा कि वो मुख्यमंत्री बनने वाले हैं. रविवार की सुबह भूपेंद्र पटेल गांधीनगर के अपने घर से फाफड़ा जलेबी का ब्रेकफास्ट करके निकले थे. पत्नी हेतल और बेटे अनुज को बोलकर गए थे कि गांधीनगर में एक मीटिंग है, शाम को आने में देर हो जाएगी. और फिर शाम को परिवार को टीवी से खबर मिलती है कि गुजरात के अगले मुख्यमंत्री के लिए भूपेंद्र पटेल का नाम चुना गया है. अमूमन होता ये है कि मुख्यमंत्री बनने वाले मिठाइयों का इतंजाम पहले से कर लेते हैं. ऐलान से पहले खबर बाहर आ ही जाती है. इस मामले में ऐसा नहीं हुआ.

तो पहले भूपेंद्र पटेल के सियासी करियर की बात करते हैं. ये कड़वा पाटीदार समुदाय से आते हैं. इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है. बिल्डर रहे हैं. 1995 में चुनावी राजनीति में आए. अहमदाबाद के तहत आने वाली मेमनगर नगरपालिका के अध्यक्ष रहे. 2010 में अहमदाबाद म्यूनसिपल कॉरपोरेशन यानी AMC के पार्षद बने. 2010-15 तक AMC की स्टैंडिंग कमेटी के चीफ रहे. नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद जब आनंदीबेन पटेल गुजरात की मुख्यमंत्री बनीं तब भूपेंद्र पटेल अहमदाबाद अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी के चेयरमैन थे.

अहमदाबाद के तहत ही आने वाली घटलोडिया सीट से आनंदी बेन चुनाव लड़ती थीं. उनके चुनाव अभियान के चीफ भी रहे हैं भूपेंद्र पटेल. जब आनंदी बेन राज्यपाल बना दी गईं और उनकी घटलोडिया सीट खाली हुईं तो टिकट मिला भूपेंद्र पटेल को. इस तरह से वो 2017 में पहली बार विधायक बने. मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली.

अब वो सवाल कि सारे बड़े नेताओं को दरकिनार कर भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री क्यों बनाया? ये सवाल यहां से शुरू होना चाहिए कि विजय रूपाणी को हटाया क्यों गया? रूपाणी की कुर्सी जाने वाली है, इसकी अटकलें पहले से थीं. जब उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया था तब भी पार्टी में एकमत नहीं था. गुजरात की बीजेपी में दो बड़े धड़े माने जाते हैं. एक अमित शाह का और दूसरा आनंदीबेन पटेल का.

कहते हैं कि 2016 में आनंदी पटेल ने इसी शर्त पर इस्तीफा दिया था कि उनके बाद नितिन पटेल को मुख्यमंत्री बनाया जाए. तब नितिन पटेल का मुख्यमंत्री बनना तय माना जा रहा था. उनके समर्थकों ने मिठाइयां बांटनी शुरू कर दी थी. लेकिन विधायक दल की बैठक में मामला पलट गया. अमित शाह का वीटो हो गया. बैठक में अमित शाह विजय रूपाणी के नाम के साथ आए थे.

Amit Shah
गृहमंत्री अमित शाह का स्वागत करते भूपेंद्र पटेल. फोटो – PTI

रिपोर्ट्स के मुताबिक बैठक में अमित शाह और आनंदी बेन अपनी अपनी पंसद के मुख्यमंत्रियों के नामों पर भिड़ गए थे. तब आनंदी बेन पटेल ने ये तक कह दिया था कि उन्हें हटाने के लिए पार्टी के अंदर के लोगों ने ही पटेल आंदोलन डिजाइन किया था. अमित शाह ने तब कहा था कि उनका कोई रोल नहीं है. अमित शाह के आशीर्वाद स्वरूप विजय रूपाणी मुख्यमंत्री बने. लेकिन विजय रूपाणी को सीएम बनाकर बीजेपी पाटीदार समुदाय की नाराज़गी दूर नहीं कर सकी.

विजय रूपाणी की अगुवाई में 2017 में बीजेपी ने गुजरात विधानसभा का चुनाव जीता, लेकिन ये जीत उतनी बड़ी नहीं थी. पार्टी को 100 से कम सीटें मिली थी. तब लगा था कि शायद बीजेपी रूपाणी को रिपीट ना करे. नितिन पटेल के सीएम बनने की चर्चा फिर ज़ोर पकड़ने लगी थीं. लेकिन रूपाणी को ही दूसरा मौक दिया गया. तो अब उनको हटाने का फैसला क्यों लिया गया.

खबरें थीं कि बीजेपी के गुजरात प्रभारी भूपेंद्र यादव और महासचिव बीएल संतोष ने पार्टी की स्थिति का रिव्यू किया था. और इसमें ये सामने आया कि रूपाणी मास लीडर नहीं हैं. रिपोर्ट्स ये भी हैं कि गुजरात बीजेपी के अध्यक्ष सीआर पाटिल और विजय रूपाणी की भी ज्यादा नहीं बनती है. विजय रूपाणी को हटाने की और क्या वजह रहीं, ये समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार दीपल त्रिवेदी से बात की. उन्होंने कहा,

“पहली बार आम आदमी पार्टी ने सूरत, गोदरा और अहमदाबाद में अच्छा प्रदर्शन किया. उनके काफी काउंसलर्स जीत गए. और पिछले दो महीने से गुजरात में ये ट्रेंड चल रहा है था कि बहुत सारे पाटीदार यूथ आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे थे. तो जो पटेल जो बीजेपी की वोट बैंक थी वो बीजेपी से दूर जा रही थी. इसलिए पाटीदार मुख्यमंत्री होना जरूरी था. और विजय रूपाणी का छवि बहुत खराब हो चुकी थी – कोरोना से, पाटीदार आंदोलन से और उनके नीतिगत फैसलों की वजह से. इंटरनेशनल रिपोर्ट्स भी आई कि गुजरात ने कोरोना के टाइम डेटा में गड़बड़ी की है. इन सब की वजह से मुख्यमंत्री बदलना बहुत जरूरी था.”

अब आते हैं भूपेंद्र पटेल पर. भपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाने की दो अहम वजह मानी जा रही हैं. पहली तो ये कि वो पाटीदार समुदाय से आते हैं, और दूसरी वजह उनका पूर्व सीएम आनंदी बेन पटेल के करीबी होना. भूपेंद्र पटेल की पाटीदार समाज में अच्छी पकड़ मानी जाती है. सरदारधाम और विश्व उमिया फाउंडेशन जैसे पाटीदार संगठनों में वो ट्रस्टी हैं. गुजरात की राजनीति के जानकारों के मुताबिक बीजेपी ने शहरी इलाके में पाटीदारों का चेहरा होने की वजह से उन्हें तवज्जो दी है.

Bhupendra Nitin Patel
शपथ ग्रहण से पहले भूपेंद्र पटेल ने पार्टी नेता नितिन पटेल से भी मुलाकात की. रूपाणी के इस्तीफे के बाद जिन लोगों के नाम सीएम पद के लिए मीडिया में चल रहे थे, उनमें नितिन पटेल भी थे. (फोटो PTI)

शहरी इलाकों में पाटीदार वोटों पर बीजेपी की ग्रीप ढीली हो रही है. इस साल फरवरी में सूरत म्यूनसिपल कॉरपोरेशन के चुनावों में आम आदमी पार्टी ने पहली बार 27 सीटें जीती थीं. पाटीदार बहुल इलाकों में केजरीवाल की पार्टी को समर्थन मिला. तो यहां बीजेपी को अपनी कमियां सुधारनी थीं. एक फैक्टर ये भी माना जा रहा है भूपेंद्र पटेल के नाम पर सहमति को लेकर. लेकिन यहां बात ये भी आती है कि पाटीदार समुदाय से तो बीजेपी में और भी कई बड़े नेता हैं. तो उनके बजाय भूपेंद्र पटेल को तरजीह क्यों मिली. इंडिया टुडे मैग्जीन के सीनियर एडिटर किरने तारे कहते हैं,

“नितिन पटेल का काम करने का तरीका थोड़ा अलग है. वो अपनी धुन में काम करते रहते हैं. उनकी किसी से बनती नहीं है. वो चाहे अमित शाह हों या मोदी हों, उनकी बात नहीं मानते हैं. वो हमेशा बगावत के मूड में रहते हैं. भूपेंद्र पटेल एकदम ब्लैंक स्टेल हैं. उनके ऊपर कोई आरोप नहीं हैं. इसके अलावा वो किसी कैंप में शामिल नहीं हैं. वो आनंदीबेन पटेल के करीबी होकर भी आंतरिक राजनीति में नहीं उलझे.”

वाइब्स ऑफ इंडिया के फाउंडर एडिटर दीपल त्रिवेदी कहते हैं,

“नितिन पटेल बहुत अनुभवी हैं, ये सही बात है. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये स्टाइल रहा है कि नए चेहरे को मौका देना. भूपेंद्र पटेल का रिकॉर्ड बिल्कुल क्लीन है. इनको अनुभव ना होना, इनकी सबसे बड़ी ताकत है. अभी जो 2022 में चुनाव आने वाला है, उसके लिए एक मुख्यमंत्री ऐसा चाहिए जिसकी छवि अच्छी हो.”

अब आते हैं भूपेंद्र पटेल की आनंदीबेन पटेल से करीबी के फैक्टर पर. कहते हैं कि 2017 में घटलोडिया सीट पर उम्मीदवारी की बात आई तो आनंदीबेन पटेल अपनी बेटी को उतारने के पक्ष में थीं. लेकिन अमित शाह इसके पक्ष में नहीं थे. फिर सहमति बनीं भूपेंद्र पटेल के नाम पर. तो क्या भूपेंद्र पटेल को सीएम बनाने में अमित शाह की सहमति रही होगी. दीपल त्रिवेदी कहते हैं,

“जब अमित शाह ग्रुप ने आनंदीबेन पटेल की बेटी अनार को घाटलोडिया सीट से टिकट देने से मना कर दिया गया था. तब नरेंद्र मोदी ने अमित शाह और आनंदीबेन की मीटिंग कराई थी. तब अमित शाह ने ही अनार पटेल की जगह भूपेंद्र पटेल का नाम दिया था. जहां तक मेरी जानकारी है पिछले 5 साल में भूपेंद्र पटेल अमित शाह के भी काफी नजदीक आ गए हैं.”

गुजरात में करीब 15 महीने बाद विधानसभा का चुनाव है. बीजेपी भूपेंद्र पटेल की अगुवाई में चुनाव में जाएगी. चुनाव नतीजों से ही तय होगा कि बीजेपी की ये चॉइस कितनी ठीक बैठती है.

अन्य बड़ी खबरें

1. कर्नाटक में भाजपा विधायक श्रीमंत पाटिल ने 11 सितंबर को एक बयान देकर अपनी ही पार्टी को शर्मिंदा कर दिया. उन्होंने कहा,

”मैं बिना पैसे लिए भाजपा में आया. मुझसे पूछा गया था कि ऐसा करने के कितने पैसे लूंगा. लेकिन मैंने इनकार कर दिया और लोगों की सेवा करने के लिए मंत्री पद मांगा. मैं नहीं जानता कि मुझे इस सरकार में मंत्री क्यों नहीं बनाया गया. लेकिन अगले कैबिनेट विस्तार में मुझे मंत्री पद देने का वादा किया गया है.”

श्रीमंत पाटिल एक वक्त कांग्रेस में होते थे. 2018 में बेलगावी ज़िले की कागवाड सीट से कांग्रेस के टिकट पर जीते. लेकिन फिर भाजपा में आ गए. और वो अकेले नहीं आए थे. कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) से कुल 16 विधायकों ने जुलाई 2019 में अचानक अपनी पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था. इससे कांग्रेस-जेडी(एस) की एचडी कुमारास्वामी सरकार गिर गई थी. इसे कहा गया था ऑपरेशन लोटस. खुद पाटील ने ही कागवाड के ऐनापुर में लोगों से कहा कि पैसे का ऑफर ऑपरेशन लोटस के दौरान ही दिया गया था.

पाटिल अब भी कागवाड से ही विधायक हैं. जी हां उन्होंने कागवाड से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता. फिर भाजपा में आ गए. फिर भाजपा के टिकट पर कागवाड से वो उपचुनाव जीता, जो कि उनके ही दलबदल के चलते करवाना पड़ा था. और फिर बीएस येदियुरप्पा कैबिनेट में अल्पसंख्यक मामलों और टेक्सटाइल व हैंडलूम मंत्री भी रहे. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था. भाजपा ने इस साल जुलाई में येदियुरप्पा से ही इस्तीफा ले लिया. अब ये तो जग की रीत है कि मुख्यमंत्री का इस्तीफा माने पूरे कैबिनेट का इस्तीफा. और बसवराज बोम्मई ने अपने कैबिनेट में पाटील को लिया नहीं. सो पाटिल फिर से सिर्फ विधायक ही रह गए. लोगों की सेवा के लिए उनके पास मंत्रिपद न रहा. और यही अफसोस अब उन्हें कचोट रहा है.

लेकिन राजनीति का खेल ऐसा खराब, कि किसी के अफसोस को भी नहीं बख्शा जाता. कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री हालिया नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने कह दिया कि पाटिल बिलकुल सही कह रहे हैं. भाजपा ने कांग्रेस और जेडी(एस) विधायकों को पैसों का लालच दिया था. उन्हें 25 से 35 करोड़ की घूस दी गई. इसी तरह कई और विपक्षी नेताओं ने एक एक करके पाटिल के बयान से सहमति जतानी शुरू कर दी. विडंबना देखिए, विपक्ष के नेता भाजपा नेता की बात से सहमत हुए जा रहे थे. और भाजपा शर्मिंदा. लेकिन फिर सभी कहानियों की तरह इस कहानी का भी अंत होना लिखा ही था. श्रीमंत पाटिल ने आज प्रेस के सामने आकर ज़ोर देकर कहा,

”मुझे किसी ने पैसे की पेशकश नहीं की. मैं तो अपनी मर्ज़ी से भाजपा के पास गया था. उन्होंने पूछा, कि मैं उनके साथ क्यों आना चाहता हूं. तब मैंने कहा कि मुझे कुछ नहीं चाहिए. बस सरकार बनने पर एक अच्छा विभाग. अगर कोई मुझे पैसे दे, तब भी मैं नहीं लूंगा. मैंने कोई पैसा नहीं लिया.”

2. अगली सुर्खी का ताल्लुक है पेगासस मामले से. सुप्रीम कोर्ट ने आज पेगासस मामले में दायर याचिकाओं पर अपना अंतरिम आदेश सुरक्षित रख लिया. आज केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि वो नया हलफनामा दायर नहीं करने वाली. केंद्र ने कहा कि वो पेगासस मामले पर सभी सवालों के उत्तर देने को तैयार है, लेकिन विशेषज्ञ समिति को ही. चूंकि सवाल राष्ट्रीय सुरक्षा का है, इसीलिए हलफनामे के माध्यम से जानकारी नहीं दी जा सकती. क्योंकि वो सार्वजनिक होगा.

सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना की बेंच ने साफ किया कि अदालत राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मसलों पर जानकारी नहीं चाहती है. अदालत बस ये जानना चाहती है कि कानून में बताए गए तरीकों से परे जाकर जासूसी हुई है कि नहीं. अदालत दो से तीन दिनों के भीतर अंतरिम आदेश दे सकती है.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मामला जाने के बाद कहा था कि वो पेगासस मामले को दिखवाने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति बनाने को तैयार है. ये समिति अदालत के प्रति जवाबदेह होगी. पेगासस मामले का संबंध भारत में अवैध रूप से पत्रकारों और विपक्षी नेताओं की कथित जासूसी से है. इल्ज़ाम ये है कि भारत सरकार ने इज़रायल से पेगासस सॉफ्टवेयर खरीदा और फिर इसका अवैध इस्तेमाल किया.

3. आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव पंकज गुप्ता को प्रवर्तन निदेशालय माने ED ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट 2002के तहत एक नोटिस थमा दिया है. और इस नोटिस को आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा ने ट्विटर पर मोदी सरकार की पसंदीदा एजेंसी की तरफ से आया लव लेटर बता दिया. गुप्ता को मिले नोटिस का संबंध पंजाब से पूर्व आम आदमी पार्टी विधायक सुखपाल सिंह खैरां के मामले से है. खैरां ने आम आदमी पार्टी के लिए US से 1 लाख डॉलर जुटाए थे. इस मामले में ED खैरां के खिलाफ जांच कर रही है. फिलहाल ये साफ नहीं है कि ईडी पंकज गुप्ता से इस संबंध में क्या पूछताछ करना चाहती है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस नोटिस को आगामी पंजाब, गोआ, उत्तराखंड और गुजरात के चुनावों से जोड़कर देखा.

4. आज सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र को 23 सितंबर तक की डेडलाइन देकर कहा इस तारीख तक सरकार को कोरोना संक्रमण से मरने वालों के परिजनों को मुआवज़ा देने को लेकर गाइडलाइन्स अदालत को बतानी होंगी. सरकार ने फिलहाल कहा है कि वो ज़हर, आत्महत्या, हत्या या दुर्घटना के मामलों में डेथ सर्टिफिकेट पर मृत्यु का कारण कोविड नहीं लिखेगी. अदालत ने इस बिंदु पर सरकार से पुनर्विचार करने को कहा है. मुआवज़े में देरी और मृत्यु प्रमाणपत्र पर बतौर मौत का कारण कोविड न लिखने को लेकर केंद्र को कई बार सर्वोच्च न्यायालय से डांट पड़ चुकी है.

5. पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता ऑस्कर फर्नांडिस ने 80 बरस की उम्र में मंगलुरु के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली. ऑस्कर फिलहाल राज्यसभा सांसद थे. कर्नाटक के उड्डीपी से आने वाले ऑस्कर कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे हैं. पार्टी में उन्होंने AICC के संयुक्त महासचिव के पद पर भी सेवाएं दीं. पांच बार सांसद रहे. मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल में ऑस्कर सड़क एवं परिवहन मंत्री भी रहे. बीते दिनों कसरत करते हुए ऑस्कर गिर गए, जिसके बाद उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया था.


वीडियो- दी लल्लनटॉप शो: BJP को गुजरात में चुनाव से एक साल पहले CM को क्यों बदलना पड़ा?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

अलवारो मोर्टे ने वेटर तक का काम किया हुआ है. और एक वक्त तो ऐसा था कि बकौल उनके कैंसर से जान जाने वाली थी.

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

जब ट्रेलर आया था, तबसे लगातार विरोध जारी है.

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

आज जानते हो किसका हैप्पी बड्डे है? माधुरी दीक्षित का. अपन आपका फैन मीटर जांचेंगे. ये क्विज खेलो.