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ईशनिंदा के नाम पर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हमले क्यों?

ढाई सौ रुपये, एक प्याली प्यास और सज़ा-ए-मौत.

वो रविवार का दिन था. मैं सुबह जल्दी जग गई थी. उस दिन ईंट-भट्ठे का काम बंद था. इसलिए मेरे पति सोकर नहीं उठे थे. मैंने अपनी बच्चियों की तरफ़ देखा. वे बेपरवाह होकर सोई हुईं थी. उनके स्कूल में छुट्टी जो थी. मैंने उनकी तरफ प्यार से देखा, ईश्वर का शुक्रिया अदा किया और घर से निकल गई.

मुझे पता चला था कि पास के खेत में फालसा की तुड़ाई होने वाली है. एक दिन की मज़दूरी ढाई सौ रुपये थी. मेरे परिवार को इसकी ज़रूरत थी. जब मैं खेत में पहुंची, वहां लगभग 15 औरतें पहले से काम कर रहीं थी. मुझे उन सबसे बड़ी टोकरी थमाई गई. और, कहा गया- अगर तुमने टोकरी भर दी तो पूरी मज़ूरी मिलेगी. फालसा तोड़ना बहुत मेहनत का काम है. दोपहर होते-होते सूरज सिर पर चढ़ आया था. शरीर भट्टी की तरह तपने लगा था. मुझे भयानक प्यास लगी.

 

आस-पास कोई नदी नहीं थी. अगर होती तो मैं उसमें डुबकी लगा लेती. पास में बस एक कुआं था. मैंने उसमें से एक बाल्टी पानी निकाला और कुएं की जगत पर रखी प्याली में भरकर पी लिया. मैं सांस ले पाती, तब तक दूसरी औरत आकर चिल्लाई-

‘इस ईसाई महिला ने हमारे पानी को अपवित्र कर दिया है. हम इसे नहीं पी सकते.’

यहां से झगड़ा शुरू हुआ और बात ईशनिंदा तक पहुंच गई.

मेरा नाम आसिया बीबी है. मुझे पानी की तलब के चलते मौत की सज़ा सुनाई गई है. मैं इसलिए जेल में बंद हूं, क्योंकि मैंने ईसाई होकर मुस्लिमों के कप से पानी पी लिया था.

ये कहानी आसिया नूरीन उर्फ़ आसिया बीबी ने अपनी किताब ‘ब्लासफ़ेमी: ए मेमॉयर’ में बयां की थी. इसे कलमबद्ध किया है, फ़्रेंच पत्रकार ऐन-इसाबेल टोलेट ने.

Anne Isabelle Tollet With Asia Bibi
फ़्रेंच पत्रकार ऐन-इसाबेल टोलेट के साथ आसिया बीबी. (तस्वीर: एएफपी)

आसिया कैसे पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून का चेहरा बनीं?

ये समझने के लिए दो हत्याओं की कहानी समझनी होगी.

आसिया बीबी को 2010 में दोषी ठहराया गया. निचली अदालत ने मौत की सज़ा दी. आसिया ने इस फ़ैसले को आगे चुनौती दी. उस वक़्त पंजाब के गवर्नर थे, सलमान तासीर. ईशनिंदा कानून के मुखर विरोधी. वो उससे मिलने जेल गए. उन्होंने आसिया को रिहा करने की भी मांग की. इसको लेकर तासीर कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गए.

आख़िरकार, 04 जनवरी 2011 को इस्लामाबाद में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई. हत्यारा कोई और नहीं, बल्कि उनका अपना बॉडीगार्ड था. मुमताज क़ादरी. उसे पुलिस ने तुरंत गिरफ़्तार कर लिया. क़ादरी ने कहा कि वो मुसलमान होने का फर्ज़ निभा रहा था. जब उसे अदालत लाया गया, वहां पर वकीलों ने उसके ऊपर फूलों की बारिश की. उसी साल क़ादरी को मौत की सज़ा सुनाई गई. उसे फांसी पर लटकाने में पांच साल का वक़्त लग गया. उसके जनाजे में हज़ारों की भीड़ शामिल हुई. कई शहरों में हिंसक प्रोटेस्ट भी हुए. आज भी पाकिस्तान में बड़ी संख्या में लोग मुमताज क़ादरी को अपना ‘हीरो’ मानते हैं.

Asia Bibi With Salman Taseer
पंजाब, पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर के साथ आसिया बीबी. (तस्वीर: एएफपी)

सलमान तासीर की हत्या के ठीक दो महीने बाद की बात है. शाहबाज़ भट्टी अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री थे. 2008 की गिलानी सरकार में इकलौते ईसाई सदस्य. उन्होंने भी आसिया बीबी को सपोर्ट किया था. नतीजा क्या हुआ? 02 मार्च 2011 को उन्हें भी इस्लामाबाद में गोली मार दी गई. कहा जाता है कि उनके ड्राइवर ने हमलावरों को देखते ही कार रोक दी थी. भट्टी की हत्या की ज़िम्मेदारी ली, तहरीक-ए-तालिबान ने. इस मामले में कभी किसी को सज़ा नहीं हो सकी. अब आप समझ गए होंगे कि ये मामला कितना संगीन था.

Shahbaz Bhatti
पाकिस्तान के तत्कालीन अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री शाहबाज़ भट्टी. (तस्वीर: एएफपी)

आसिया बीबी का आख़िर हुआ क्या? पाकिस्तान का ईशनिंदा कानून क्या कहता है? किस तरह ये कानून अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का हथियार बन गया? और, ये पूरा वाकया आज क्यों सुना रहे हैं? सब विस्तार से बताएंगे.

1860 से 1947 के बीच ईशनिंदा के सिर्फ़ सात केस?

साल 1860. भारत में ब्रिटिश राज का दौर चल रहा था. उस साल अंग्रेज़ों ने धार्मिक झगड़ों पर लगाम कसने के लिए एक कानून बनाया. इसके तहत, कई चीज़ों को अपराध की केटेगरी में दर्ज़ किया गया. क्या-क्या?
– किसी भी धार्मिक आयोजन में बाधा पहुंचाना
– अंतिम संस्कार की जगहों पर कब्ज़ा करना
– किसी की धार्मिक मान्यताओं का अपमान करना
– और, जान-बूझकर किसी धार्मिक स्थल को तोड़ना.

इस कानून के तहत दोषी व्यक्ति को एक से दस साल की सज़ा दी जाती थी. कहीं-कहीं पर ज़ुर्माने की भी व्यवस्था थी.

1920 के दशक में अलग मुस्लिम देश की मांग तेज़ होने लगी थी. इसको लेकर हिंदू और मुस्लिमों में तनाव बढ़ने लगा था. 1927 में अंग्रेज़ों ने एक और क्लाउज़ जोड़ दिया. कहा गया, जान-बूझकर किसी की धार्मिक भावना को भड़काने का कार्य अपराध की श्रेणी में गिना जाएगा.

सेंटर फ़ॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज़ की रिपोर्ट के अनुसार, 1860 से 1947 के बीच ईशनिंदा के सिर्फ़ सात केस दर्ज़ हुए.

Zulfikar Ali Bhutto
ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो. (तस्वीर: एएफपी)

1947 में अंग्रेज़ चले गए. भारत दो हिस्सों में बंट गया. एक नया मुल्क़ बना. धर्म के आधार पर. पाकिस्तान. उसने अंग्रेज़ों के कानून को अपने यहां जारी रखा. पाकिस्तान शुरुआती सालों में तख़्तापलट और सैनिक शासन से जूझ रहा था. स्थायी संविधान लागू होने में 25 बरस बीत गए. ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के नेतृत्व में पाकिस्तान का संविधान लागू हुआ. और अगले ही बरस एक बड़ा बदलाव हुआ.

1974 में संविधान संशोधन कर अहमदिया समुदाय को ‘गैर-मुस्लिम’ घोषित कर दिया गया. इस्लाम का पालन करने पर उनके लिए सज़ा की व्यवस्था भी की गई थी. पाकिस्तान की बहुसंख्यक सुन्नी आबादी का दबाव काम कर गया था. यहीं से बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक खाई बढ़नी शुरू हो गई.

1977 में भुट्टो का तख़्तापलट हो गया. उनके ही विश्वासपात्र जनरल ज़िया उल-हक़ ने उनके नीचे की ज़मीन खिसका दी थी. जनरल ज़िया के शासन में धार्मिक कट्टरता और पनपी. 1980 से 1986 के बीच ईशनिंदा कानून को और सख़्त बना दिया गया. पांच नए प्रावधान जोड़े गए. कुरान या पैगंबर मुहम्मद का अपमान या कुछ ख़ास धार्मिक नेताओं के ख़िलाफ़ ग़लतबयानी करने पर कठोर सज़ा की व्यवस्था की गई थी. पैगंबर मुहम्मद का अपमान करने पर सीधे मौत की सज़ा तय की गई.

Zia Ul Haq
जनरल ज़िया के शासन में पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता और पनपी. (तस्वीर: एएफपी)

कोर्ट से तो बच जाएंगे लेकिन कोर्ट के बाहर?

ज़िया उल-हक़ के शासन में ईशनिंदा के मामलों में आठ गुना बढ़ोत्तरी दर्ज़ की गई. ये ट्रेंड आज तक चलता आ रहा है. नेशनल कमीशन फ़ॉर जस्टिस एंड पीस की रिपोर्ट में 1987 से लेकर 2018 तक का डेटा दर्ज़ है. रिपोर्ट बताती है कि इस दरम्यान मुस्लिमों के ख़िलाफ़ ईशनिंदा के 776, अहमदिया समुदाय के ख़िलाफ़ 505, ईसाईयों के ख़िलाफ़ 226 और हिंदुओं के ख़िलाफ़ कुल 30 मामले सामने आए हैं. इनमें से किसी को भी मौत की सज़ा नहीं मिली है.

अधिकतर मामले इतने फ़र्ज़ी होते हैं कि पहली नज़र में ही अदालत की पकड़ में आ जाते हैं. बचकाने मामलों में ईशनिंदा का केस लगा दिया जाता है. जैसे, बच्चे के नाम में ग़लती, पानी को लेकर झगड़ा, गैर-धार्मिक किताब जलाना, फ़ेसबुक पर तस्वीर शेयर करना आदि.

पाकिस्तान में अदालत से छूट जाना आपकी सुरक्षा की गारंटी नहीं है. अभी तक 77 लोगों की कोर्ट के बाहर हत्या हो चुकी है. ईशनिंदा से छूट गए, लेकिन सनकी भीड़ से बच पाना बेहद मुश्किल है. ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है, जो अदालत से बरी होने के बाद भी छिपकर जीवन बिता रहे हैं. ये कानून दुश्मनी निकालने का हथियार बन चुका है.

मई 2019 में सिंध में एक हिंदू डॉक्टर रमेश कुमार को अरेस्ट किया गया. उनके ऊपर आरोप लगा कि वो कुरान वाले काग़ज़ में दवाईयां लपेटकर दे रहे हैं. पुलिस में शिकायत हुई. पुलिस ने उन्हें तुरंत अरेस्ट कर लिया. इसके बाद भीड़ ने डॉक्टर के क्लिनिक में आग लगा दी. उनके मुहल्ले में दंगा भड़क गया. कई हिंदुओं के घरों में आग लगा भी लगा दी गई.

पाकिस्तान में आए दिन हिंदू मंदिरों पर हमले की घटनाएं होती रहती हैं. ईशनिंदा की अफ़वाह फैलाकर भीड़ के द्वारा तोड़-फोड़ करवाई जाती है. हिंदू लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराने के लिए भी इस कानून का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है. अगर धर्म नहीं बदला तो ईशनिंदा का केस करा देंगे. ऐसे मामलों में केस दर्ज करने के लिए इमाम का बयान ही काफी होता है. उसके बाद बेगुनाही साबित करने का दारोमदार आपके ऊपर है.

Imran Khan
पाकिस्तान के पीएम इमरान खान. (तस्वीर: एपी)

अगर ईशनिंदा कानून का इतना दुरुपयोग होता है, तो सरकार इसे बदलती क्यों नहीं?

आज तक किसी भी सरकार में हिम्मत नहीं हुई. जब भी इसपर बात चली, कट्टरपंथी धड़ा मुखर होकर बदलाव के विरोध में खड़ा हो गया. इमरान ख़ान ने चुनावी रैली के दौरान साफ़ कर दिया था कि वो किसी भी क़ीमत पर ईशनिंदा कानून की रक्षा करेंगे. इमरान ख़ान चुनाव जीत भी गए. पाकिस्तान की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ईशनिंदा कानून को जायज मानता है. इसलिए, कोई भी सरकार उसमें छेड़छाड़ करने का जोख़िम नहीं उठाना चाहती. भले ही उसके चलते बेगुनाहों की गर्दन फंसती रहे.

Asia Bibi Pakistan
आसिया बीबी का ऐपिसोड पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून का चेहरा बन गया. (तस्वीर: एएफपी)

ये तो हुई पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून की बात. हमने शुरुआत में आसिया बीबी की कहानी सुनाई थी. उसका आख़िर हुआ क्या?
2015 में लाहौर हाईकोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर दी. बाद में वो सुप्रीम कोर्ट पहुंची. नवंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने आसिया बीबी की सज़ा को रद्द कर दिया. ये ऐतिहासिक फ़ैसला था. इसके ख़िलाफ़ पूरे पाकिस्तान में प्रदर्शन हुए. तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान, वही पार्टी जो फ़्रेंच राजदूत को देश से बाहर निकालने की मांग को लेकर हाल में खूब चर्चा में थी. इसने राजधानी इस्लामाबाद को जाम कर दिया था. बहुत समझाने-बुझाने के बाद ये जाम खत्म हुआ.

आसिया बीबी मई 2019 में पाकिस्तान छोड़कर कनाडा चली गई. उसका पाकिस्तान में रहना असंभव हो चुका था.

Tehreek E Labbaik
तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान ने आसिया के विरोध में पाकिस्तान में खूब हल्ला काटा था. (तस्वीर: एएफपी)

पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून की कहानी आज क्यों सुना रहे हैं?

इसकी वजह है, पाकिस्तान की अदालत का एक फ़ैसला. तीन जून को लाहौर उच्च न्यायालय ने ईशनिंदा के मामले में निचली अदालत के फ़ैसले को पलट दिया है. निचली अदालत ने अप्रैल 2014 में एक ईसाई दंपत्ति को ईशनिंदा का दोषी पाया था. दोनों को मौत की सज़ा सुनाई गई थी. दंपत्ति ने इसके ख़िलाफ़ लाहौर हाईकोर्ट में अपील की. सात साल के बाद हाईकोर्ट का फ़ैसला आया है. हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि उन्हें दोषी बताने के लिए दिए गए सबूत पर्याप्त नहीं हैं. इसलिए उन्हें जेल से रिहा कर दिया जाए.

पूरा मामला क्या था?

जुलाई 2013 की बात है. पाकिस्तानी पंजाब के टोबा टेक सिंह जिले का एक गांव है, गोजरा. शफ़क़त इमैनुअल गांव के ही एक स्कूल में चौकीदारी का काम करता था. उसकी पत्नी शगुफ़्ता कौसर एक स्कूल में केयरटेकर थी. एक दिन गांव के दुकानदार से किसी बात पर उनकी बहस हो गई. इस तकरार में मस्जिद का इमाम भी शामिल हो गया. उस दिन तो बात शांत पड़ गई.

Shagufta Kausar And Shafqat Emmanuel
शफ़क़त और शगुफ़्ता को निचली अदालत की मौत की सजा दी थी. (तस्वीर: एएफपी)

लेकिन कुछ दिनों बाद शफ़क़त और शगुफ़्ता के घर 40 पुलिसवाले आए. हथकड़ियों के साथ. वे दोनों को गिरफ़्तार कर अपने साथ ले गए. किस आरोप में? दरअसल, दुकानदार और इमाम ने पुलिस में शिकायत लगाई थी कि उनके फ़ोन पर नापाक मेसेज आए हैं. इनमें पैगंबर मुहम्मद की निंदा की गई थी. जांच में पता चला कि जिस फ़ोन नंबर से मेसेज आए थे, वो शगुफ़्ता के नाम पर रजिस्टर्ड था. इसी वजह से उन्हें अरेस्ट किया गया था.

अगले नौ महीने तक डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट में सुनवाई चली. अप्रैल 2014 में जज ने अपना फ़ैसला सुना दिया. पति-पत्नी को मौत की सज़ा सुनाई गई और दोनों को एक-एक लाख का ज़ुर्माना भरने के लिए भी कहा गया. इसी फ़ैसले के ख़िलाफ़ पति-पत्नी लाहौर हाईकोर्ट की शरण में गए.

13 अप्रैल 2014 की पाकिस्तानी अख़बार डॉन की रिपोर्ट है. जिस मिशनरी स्कूल में शगुफ़्ता हेल्पर का काम करती थी, वहां की प्रिंसिपल ने बताया था कि शगुफ़्ता को न तो पढ़ना आता है और न ही लिखना. उसका काम था, बच्चों को क्लास से टॉयलेट तक लाना और ले जाना. वहीं, उसका पति शफ़क़त शारीरिक तौर पर विकलांग था. उसकी मोबाइल रिपेयर की छोटी-सी दुकान भी थी.

2009 में जब गोजरा में ईसाईयों पर हमला हुआ था, तो?

गोजरा में लगभग एक लाख ईसाई रहते हैं. उनके ऊपर 2009 में भयानक हमला हुआ था. किसी ने अफ़वाह उड़ा दी कि गोजरा में कुरान का अपमान किया गया है. बात जंगल की आग की तरह फैल गई. उसके बाद हज़ारों मुस्लिमों ने इकट्ठा होकर गांव में तबाही मचा दी. 40 से अधिक घरों और एक चर्च को जला दिया गया. इस घटना में आठ ईसाईयों की हत्या हो गई थी. नतीजा जानते हुए क्या कोई इस्लाम-विरोधी मेसेज भेजने की सोच भी सकता है?

2009 Gojra Riots
साल 2009 में गोजरा में ईसाईयों पर भयानक हमला किया गया था. (तस्वीर: एएफपी)

हाईकोर्ट में दलील दी गई थी कि उनके पड़ोसी ने बदला चुकाने के लिए उनके नाम से सिम खरीदकर मेसेज भेजा. यानी, उन्हें साज़िशन इस केस में फंसाया गया.

अप्रैल 2021 में ये मामला यूरोपियन यूनियन की संसद में भी उठा था. वहां पाकिस्तान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की मांग चल रही थी. हाईकोर्ट के डिसिजन को इस दबाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है. इस दावे में कितना दम है, कुछ पक्का कहा नहीं जा सकता.

बहरहाल, शगुफ़्ता कौसर और शफ़क़त इमैनुअल की बेगुनाही पर मुहर लग चुकी है. उन्हें अगले हफ़्ते जेल से छोड़ दिया जाएगा. आगे बस दो सवाल बचे रहे जाते हैं.
पहला, उनके आठ सालों के संघर्ष की भरपाई कौन करेगा? क्या वे पहले जैसी ज़िंदगी जी पाएंगे?
और दूसरा, जेल से छूटने के बाद वे कितने दिनों तक सुरक्षित रह पाएंगे?

फिलहाल, दोनों का जवाब किसी के पास नहीं है.


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