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भूपेश बघेल से ये आंदोलन न संभला तो नक्सली जीत जाएंगे?

हज़ारों आदिवासियों ने एक महीने लंबा आंदोलन चलाकर इतना तो कर ही दिया है कि दिल्ली में कम से कम पत्रकार जान गए हैं कि छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले में एक जगह है सिलगेर नाम की. वो सुकमा का नाम पहले से जानते थे – छत्तीसगढ़ के दक्षिणी छोर पर बसा एक ज़िला जो दशकों से नक्सल प्रभावित है, यहां लगातार सुरक्षा बलों पर नक्सली हमले होते रहते हैं.

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में गोली चलना कोई बहुत बड़ी घटना नहीं होती. लेकिन सिलगेर में जो हुआ वो कई मायनों में अप्रत्याशित था. दर्शक जानते ही हैं, नक्सलियों ने अपने प्रभाव वाले इलाकों को ”लिबरेटेड ज़ोन” नाम दिया है. यहां वो अपनी सरकार भी चलाते हैं. सरकार ये समझती है कि नक्सली सुरक्षा के लिए खतरा हैं और इसीलिए इन्हें बलपूर्वक यहां से खदेड़ना होगा ताकि लोकतंत्र की स्थापना हो सके, सामान्य प्रशासन चल सके. और इसीलिए लिबरेटेड ज़ोन सुरक्षा बलों के निशाने पर हैं. वो धीरे धीरे इन इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं. और मौजूदगी बढ़ाने के लिए बनाए जाते हैं कैंप. जहां से इलाके पर काबू भी किया जा सके और ज़रूरत पड़ने पर नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन भी चलाया जा सके.

कैंप सिलगेर में ही क्यों?

इंडिया टुडे में 3 जून 2021 को छपी राहुल नरोन्हा की रिपोर्ट बताती है कि तकरीबन 10 हज़ार स्क्वेयर किलोमीटर के इलाके में पसरे एक लिबरेटेड ज़ोन पर अपना काबू करने के लिए सुरक्षा बल सुकमा और बीजापुर ज़िलों की सीमा पर नए कैंप्स बना रहे हैं. ऐसे ही कैंप्स सुकमा से दंतेवाड़ा तक भी बनाए जा रहे हैं. ऐसा ही एक कैंप एक बेहद अहम लोकेशन पर बनाया जाना था – सिलगेर.

सिलगेर से तीन नक्सल प्रभावित इलाके जुड़ते हैं. माओवादी कमांडर मादवी हिडमा का गांव पुवर्ती, सिलगेर से ज़्यादा दूर नहीं है. सिलगेर में अगर सुरक्षा बल अपना कैंप बना लेते तो नक्सल काडर का मूवमेंट मुश्किल हो जाता. ये कैंप खास तौर पर नक्सलियों की कुख्यात बटालियन नंबर एक का काम मुश्किल कर देता. और इसीलिए नक्सलियों ने यहां 15 साल से सड़कों का निर्माण नहीं होने दिया.

लेकिन 2020 आते आते इलाके की सड़क को सुधार लिया गया और सुरक्षा बल लिबरेटेड ज़ोन में काफी अंदर तक चले आए. सिलगेर से 5 किलोमीटर दूर तर्रेम में एक कैंप बन गया. राहुल अपनी रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा करते हैं कि 3 अप्रैल 2021 को सीआरपीएफ और डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड पर हुए नक्सली हमले की एक वजह तर्रेम कैंप और प्रस्तावित सिलगेर कैंप का विरोध भी था. इस हमले में 23 जवानों की जान चली गई थी.

बावजूद इस सबके 12 मई को सिलगेर में बासागुडा-जगरगुंडा रोड पर सीआरपीएफ का एक कैंप स्थापित कर दिया गया. बस्तर के 28 कैंप एक ही तरह से बने हैं. ग्राम सभा की अनुमति ली जाती है, फिर कैंप बनता है जिसमें से स्थानीय ग्रामीणों को मेडिकल कैंप वगैरह की सुविधा दी जाती है. यही सब सिलगेर में भी हुआ था. प्रशासन ने कहा कि ग्राम सभा से संकल्प पारित कराया गया, इसके बाद सरकारी ज़मीन पर कैंप बना लिया गया.

कैंप सिलगेर में ही क्यों?

लेकिन कैंप की स्थापना के साथ ही शुरु हुआ आदिवासियों का विरोध प्रदर्शन. प्रदर्शन में सर्व आदिवासी समाज नाम का एक संगठन भी जुड़ा. सर्व आदिवासी समाज में बस्तर की जनजातियों के प्रतिनिधी शामिल हैं. आदिवासियों ने कहा कि स्कूल-अस्पताल चाहिए, लेकिन कैंप नहीं चाहिए. प्रदर्शनकारी आदिवासियों ने ये दावा भी किया कि कैंप निजी ज़मीन पर जबरन बना दिया गया है और कैंप बनाने के लिए जिस ग्राम सभा के संकल्प की बात हो रही है, वो फर्जी थी.

कैंप को लेकर इसी मतभेद ने एक विरोध प्रदर्शन को जना. 17 मई को सिलगेर में तनाव बढ़ा, गोलियां चलीं और तीन प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई. प्रशासन का कहना है कि वहां नक्सली मौजूद थे जिनके भड़काने से प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए थे. भीड़ कैंप जलाने के लिए बढ़ रही थी इसलिए मजबूरन गोली चलाई गई. जबकि प्रदर्शनकारियों का दावा है कि उनके बीच नक्सली नहीं थे और सुरक्षा बलों ने अचानक गोली चलाई. वो ये भी दावा करते हैं कि गोली चलने के दौरान जो भगदड़ हुई उसमें भी एक गर्भवती महिला की जान गई थी. इसके बाद से सिलगेर में एक लकीर खिंच गई थी. एक तरफ सुरक्षा बल और एक तरफ प्रदर्शनकारी आदिवासी. भारी आलोचना के बाद छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने मैजिस्ट्रेट जांच के अलावा एक नौ सदस्यीय जांच दल भी बनाया. इसमें बस्तर से 8 विधायक और 1 सांसद को शामिल किया गया.
तीन मौतों के बाद आदिवासी लामबंद हो गए और तब बात सिर्फ पुलिस के विरोध की नहीं रह गई. लोग पेसा एक्ट की मांग करने लगे. माने Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996. इसके तहत शेड्यूल्ड एरिया में ग्राम सभाओं की स्थापना होती है. शेड्यूल्ड एरिया माने आदिवासी बाहुल वो इलाके जहां कुछ विशेष अधिकार दिए जाते हैं.

छत्तीसगढ़ में आदिवासी इलाकों में ग्रामीणों और सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष की ये पहली घटना नहीं थी. लेकिन अव्वल तो सिलगेर जैसा संगठित प्रदर्शन कहीं देखने को नहीं मिला था. फिर ये भी कहा गया कि छत्तीसगढ़ सरकार प्रदर्शनकारियों से ठीक से संवाद स्थापित नहीं कर रही. 20 मई को मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील बेला भाटिया के साथ प्रसिद्ध डेवलपमेंट इकॉनमिस्ट और मानवाधिकार कार्यकर्ता ज्यां द्रेज़ ने जब प्रदर्शकारियों से मिलना चाहा, उन्हें रोक दिया गया. वो अस्पताल में घायलों से भी नहीं मिल पाए. काफी टालमटोल के बाद वो प्रदर्शन स्थल की तरफ जा पाए. ऐसी घटनाओं ने सवाल पैदा किया कि अगर छिपाने को कुछ नहीं है तो फिर छत्तीसगढ़ सरकार रोक टोक में क्यों लगी है. और अगर वो कुछ नामों के लिए असहज है भी तो फिर वो अपनी तरफ से गतिरोध दूर करने का क्या प्रयास कर रही है. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार है. कांग्रेस ने 2018 के चुनाव से पहले आदिवासियों के साथ न्याय का मुद्दा उठाया था. पार्टी आदिवासी वोट पर दशकों से दावा ठोंकती आई है. सवाल किया गया कि क्या अब राहुल गांधी आदिवासियों की बात करने सामने नहीं आएंगे, क्योंकि एक कांग्रेस शासित राज्य का मामला है?

प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज?

27 मई को बेला भाटिया और ज्यां द्रेज़ ने अपनी फैक्ट फाइडिंग रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट के मुताबिक सिलगेर कैंप 11-12 मई की दरम्यानी रात 3 बजे के आसपास स्थापित किया गया. 12 मई की सुबह 40-50 लोगों ने इकट्ठा होकर कैंप का विरोध शुरू किया. 14 से 16 मई के बीच प्रदर्शन बड़ा हो गया. रिपोर्ट आगे कहती है कि 17 मई के दौरान तकरीबन 10 हज़ार लोग इकट्ठा हो गए. लाठीचार्ज हुआ, तो प्रदर्शनकारियों ने पत्थर चलाने शुरू कर दिए. इसके बाद भीड़ को तितर बितर करने के लिए सुरक्षा बलों ने हवा में गोलियां चलाईं. लोग जान बचाकर भागे. ज्यां द्रेज़ और बेला भाटिया ने एक प्रेस रिलीज़ भी जारी की थी. इसके मुताबिक उन्हें बताया गया कि फायरिंग के दौरान आपाधापी में कुछ प्रदर्शकारियों ने हो हल्ला मचाया था कि वो सुरक्षा बलों की गाड़ियां फूंक देंगे. लेकिन आगज़नी हुई नहीं थी. इतना होते तक सड़क के दोनों तरफ सुरक्षा बल जुट गए थे और प्रदर्शनकारी बीच में थे. फिर गोलियां चलीं. कम से कम एक मृतक नाबालिग है. रिपोर्ट ने ये भी कहा कि प्रदर्शनकारियों के बीच माओवादियों की मौजूदगी और कैंप पर हमला करके उसे जलाने की योजना वाली बात में दम नहीं है क्योंकि 17 मई को जब घटना हुई, तब तक इलाके में भारी संख्या में सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए थे. ऐसे में कैंप पर चढ़ाई करना असंभव था.

लेकिन बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक सुंदर राज पी ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि 13 मई को ही एग्ज़ीक्यूटिव मैजिस्ट्रेट और पुलिस के अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को कैंप और कैंप के मकसद के बारे में विस्तार से जानकारी दी थी और तब प्रदर्शनकारी संतुष्ट होकर लौटे भी थे. इसी के बाद अपने कॉरीडोर को बचाने के लिए नक्सलियों ने अपना काडर सिलगेर की तरफ भेजा ताकि हिंसा भड़काई जाए और कैंप लोगों के निशाने पर आ जाए. गोलीकांड को लेकर उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों ने घातक हथियारों का इस्तेमाल तब तक नहीं किया जब तक उनपर हथियारबंद कैडर ने हमला नहीं किया. सुंदर राज पी के मुताबिक उस दिन किसी नाबालिग की मौत नहीं हुई थी.

इसके बाद सरकार की फैक्ट फाइंडिंग का वक्त भी आया. 3 जून को 9 सदस्यीय जांच दल सुकमा में प्रदर्शनकारियों से मिला. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इस मुलाकात में कोरसा सोमा नाम का एक किसान भी शामिल हुआ जिसका दावा है कि कैंप की ज़मीन उसकी है. सुकमा प्रशासन ने इस दिन भी कहा कि रिकॉर्ड के मुताबिक ज़मीन सरकारी है, लेकिन इस आपत्ति पर जांच की जाएगी. लेकिन एक मुद्दे पर बात बन नहीं पाई. प्रदर्शनकारी चाहते थे कि सरकार माने कि पुलिस की गोली से मरे लोग नक्सली नहीं हैं. लेकिन जांच दल इस बारे में कोई आश्वासन नहीं दे पाया.

छत्तीसगढ़ सरकार में कृषि मंत्री रवींद्र चौबे का एक बयान खूब चर्चित हुआ इस बीच. उन्होंने कहा,

”हम जानते हैं कि प्रदर्शनकारियों को कौन भड़का रहा है. कैंप नहीं हटेगा. हम और कैंप लगाने जा रहे हैं.”

मज़बूती दर्शाते ये बयान अपनी जगह थे लेकिन छत्तीसगढ़ में प्रशासन देख पा रहा था कि सिलगेर में ज़ोर-ज़बरदस्ती से बात बनेगी नहीं. इसीलिए सामाजिक कार्यकर्ताओं से रोक-टोक बंद हुई और उनके माध्यम से बातचीत शुरू हुई. बेला भाटिया और छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के प्रतिनिधी प्रदर्शनकारियों की मांगों के साथ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और राज्पाल अनुसुइया उइके से रायपुर में मिले. खबर है कि ये मुलाकात सकारात्मक नतीजों के साथ खत्म हुई और मुख्यमंत्री और राज्यपाल प्रदर्शनकारियों से मिलने के लिए तैयार हो गए हैं.

10 जून से खत्म हो जाएगा प्रदर्शन?

दूसरी तरफ सिलगेर में प्रदर्शनकारियों और प्रशासन के बीच मध्यस्थता कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी ने भी संकेत दिया कि प्रदर्शनकारी सिलगेर का धरना खत्म कर सकते हैं. इस आशय की खबरें भी मीडिया में चल पड़ीं. तो क्या वाकई सिलगेर का प्रदर्शन 10 जून से खत्म हो जाएगा?

इन सारे सवालों के साथ हमने बात की लगातार सिलगेर से रिपोर्टिंग कर रहे रानू तिवारी से. रानू आज भी सिलगेर में ही मौजूद थे. उन्होंने दी लल्लनटॉप को बताया कि सिलगेर की तरफ जाने वाले सभी रास्तों पर भारी पुलिस बल तैनात है जो बिना तलाशी के किसी को आगे नहीं जाने दे रहा है. रानू आज ही के दिन 30 चेकिंग पॉइंट्स से गुज़रे. उन्होंने सिलगेर में देखा कि बड़ी संख्या में ग्रामीण ट्रैक्टर्स पर सवार होकर प्रदर्शन स्थल पर आए थे. एक बड़ी आम सभा हुई जिसके बाद कुछ प्रदर्शनकारी लौटने की तैयारी करते दिखे. दरअसल सर्व आदिवासी समाज और प्रदर्शनकारी आदिवासियों के प्रतिनिधियों का मानना है कि कोरोना संक्रमण काल में इतना बड़ा प्रदर्शन जारी रखना सुरक्षित नहीं है. न सिर्फ बीमारी का डर है, बल्कि इस बात का भी कि सरकार कहीं महामारी कानून के तहत ही कार्रवाई न कर दे. ऐसे में आंदोलन का पूरा मोमेंटम खत्म हो जाएगा. इसीलिए ग्रामीण धरना स्थल खाली कर सकते हैं. लेकिन इसे आंदोलन खत्म होने की तरह देखना गलती होगी. क्योंकि सरकार ने आंदोलनकारियों की दो प्रमुख मांगों को लेकर कोई पुख्ता आश्वासन नहीं दिया है –

1. सिलगेर कैंप हटाया जाए
2. सरकार गोलीकांड पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए दोषियों पर कार्रवाई करे. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ये सामान्य ग्रामीण थे जो बेमौत मारे गए. सरकार को अगर वो नक्सली लगते हैं, तो फिर वो उनके परिजनों को मुआवज़ा क्यों दे रही है?

बस्तर में बारिश अब सिर पर है. ग्रामीणों को अपने खेतों में काम करने लौटना है. फिर जब कुछ ही दिनों में मूसलाधार बारिश होने लगेगी, तो प्रदर्शन स्थल पर रुकना भी मुश्किल हो जाएगा. इसीलिए प्रदर्शनकारियों का मानना है कि बड़ा धरना खत्म करके ज़िला मुख्यालय में प्रशासन की अनुमति के साथ प्रदर्शन किया जाए. जिसमें सीमित संख्या में लोग शामिल हों. लेकिन इन सारी चीज़ों को पक्का होने में कुछ वक्त लग सकता है क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में लोगों में एक राय बनने में वक्त लगता है.

इसका मतलब सिलगेर में गतिरोध अभी कुछ दिन और जारी रहेगा. और इस लंबे खिंचते गतिरोध से ही एक चिंता पैदा होती है. हिंसा के दोराहे पर खड़ा बस्तर गलत रास्ता न चुन ले. इस खबर पर हमारी नज़र बनी हुई है. जैसे ही कोई महत्वपूर्ण जानकारी हमारे हाथ लगेगी, हम एक बार सिलगेर की बात करेंगे.


विडियो- IPS अमित लोढ़ा ने बताया कैसे एक गलती नक्सल मुठभेड़ में उन पर भारी पड़ गई थी

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