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म्यांमार में प्रदर्शनकारियों की हत्या पर भारत, चीन, अमेरिका और रूस जैसे देश चुप क्यों हैं?

आज बात होगी, म्यांमार में चल रही हिंसा की. शनिवार, 27 मार्च को आर्मी ने एक बार फिर ख़ून की होली खेली. इस दिन 114 प्रदर्शनकारियों की बेरहमी से हत्या कर दी गई. इस घटना के बाद भी प्रोटेस्टर्स पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. क्या वजह है कि म्यांमार के लोग सबकुछ न्यौछावर करने पर तुले हैं? प्रदर्शनों और इंटरनैशनल कम्युनिटी के प्रतिबंधों को मिलिट्री हुंटा अनसुना क्यों कर रही है? पुरानी सरकार के लोग अब किस हालत में हैं? और, ‘ख़ूनी शनिवार’ के एक दिन बाद आई किस तस्वीर ने आग में घी डाल दिया है? सारी बातें विस्तार से बताते हैं.

Myanmar Capital
म्यांमार की राजधानी नेपिडॉ. (गूगल मैप्स)

तारीख़- एक फ़रवरी, 2021

तड़के सुबह का समय था. आमतौर पर वो सबसे शांत पहर होता है. मगर भारत की पूर्वोत्तर सीमा से सटे म्यांमार में फ़ौज़ी बूट और ट्रकों की हड़बड़ाहट ने ठहराव में खलल डाल दिया था. राजधानी नेपिडॉ में कुछ दरवाज़ों पर दस्तक हुई. कुछ लोगों को ट्रकों में बिठाया गया. जिन्होंने विरोध किया, उनके साथ हाथापाई हुई. बाकी समझदार थे, उन्होंने बिन बुलाए पहुंचे मेहमानों की कहा मान लिया. उस सुबह म्यांमार में कुछ बड़ा हो रहा था. लेकिन क्या? इसका पता तब चला, जब सुबह लोगों की नींद खुली.

Aang Saan Su Ki With Miin Aung Laing
म्यांमार की स्टेट काउंसलर ऑन्ग सान सू ची और सेना प्रमुख जनरल मिन ऑन्ग लाइंग. (तस्वीर: एपी)

जब लोग घरों से बाहर आए तो उन्हें सब बदला-बदला लगा. सैनिकों की आवाजाही बढ़ गई थी. जगह-जगह पर बैरिकेड लगे हुए थे. हर कोई शक की नज़र से देखा जा रहा था. वहां हो क्या रहा था? इसका जवाब मिला, स्टेट टीवी पर हुए ऐलान से. ऐंकर ने बताया-
‘देश में आपातकाल लगा दिया गया है. अब सेना प्रमुख जनरल मिन ऑन्ग लाइंग देश की कमान संभालेंगे.’

मतलब साफ़ था, म्यांमार में लोकतंत्र को ताले में बंद कर दिया गया था. इसके अलावा, एयरपोर्ट्स बंद. शहरों में इंटरनेट बंद. सत्तारूढ़ ‘नेशनल लीग फॉर डेमॉक्रेसी’ यानी, NLD के सैकड़ों नेता नज़रबंद. सभी 14 राज्यों के मुख्यमंत्री बंद. और सबसे बढ़कर, देश की सर्वोच्च सिविलियन लीडर, ‘स्टेट काउंसलर’ ऑन्ग सान सू ची को भी हिरासत में ले लिया गया था. म्यांमार में एक बार फिर सेना ने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार का तख़्तापलट कर दिया था.

Aang Saan Su Ki
म्यांमार की स्टेट काउंसलर ऑन्ग सान सू ची. (तस्वीर: एपी)

सेना की उम्मीदों पर पानी फिर गया?

सेना को लगा, हर बार की तरह इस बार भी जनता तख़्तापलट से डर जाएगी, कोई भी विरोध नहीं करेगा, जो हुआ उसे चुपचाप स्वीकार कर लिया जाएगा. सेना की उम्मीद पर तब पानी फिर गया, जब उसी दिन लोग सड़कों पर उतर आए. उनका प्रदर्शन शांतिपूर्ण था. वे जनरल लाइंग को ‘तानाशाह’ बता रहे थे. उनकी एक ही मांग थी, देश में लोकतंत्र को बहाल किया जाए.

सेना को ये मंज़ूर नहीं था. उन्हें विरोध के स्वर से तकलीफ़ थी. इसलिए ऐसे लोगों को रास्ते से हटाना ज़रूरी था. सेना ने हिंसा का सहारा लिया. शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोलियां चलाई. तब से आज तक म्यांमार में ख़ून का बहना जारी है. सैनिक शासन दिनोंदिन क्रूर होता जा रहा है.

एक फ़रवरी के तख़्तापलट के बाद जो एक फ़्रेज़ लगातार सुनाई पड़ रहा है. वो है ‘सबसे ख़ूनी दिन’. बीते दो महीनों में ऐसे कई दिन गुज़र चुके हैं. हर बार नया आंकड़ा पुराने वाले को पीछे छोड़ देता है.

Myanamr Protest Aginst Coup
म्यांमार आर्मी ने 27 मार्च को 114 प्रदर्शनकारियों की बेरहमी से हत्या कर दी. (तस्वीर: एपी)

शुक्रवार, 27 मार्च 2021 का दिन भी कुछ ऐसा ही था. ये तारीख़ एक गौरवशाली अतीत से जुड़ी है. 1945 के साल में 27 मार्च के दिन म्यांमार की अस्थायी सेना ने जापान को बाहर खदेड़ दिया था. इस दिन को म्यांमार में ‘आर्म्ड फ़ोर्सेज़ डे’ के तौर पर मनाया जाता है. इस साल उस मौके की 76वीं वर्षगांठ मनाई जा रही थी. लेकिन जनता के बिना. लोगों से कहा गया था वे अपने घरों से बाहर न निकलें. अगर ऐसा किया तो गोली मार दी जाएगी.

लेकिन जनता ने इस चेतावनी को अनसुना कर दिया. वे जैसा करते आ रहे थे, उन्होंने वैसा ही किया. वे अपनी तख्तियां और भोंपू लेकर सड़कों पर बाहर आए. उन्होंने नारेबाज़ी की. इससे सेना नाराज़ हो गई. उसने फ़ायरिंग शुरू कर दी. लोग अपनी जान बचाने के लिए भागे. प्रदर्शनों पर विराम लग गया, लेकिन गोलीबारी नहीं रुकी. मोटरसाइकिल से जा रहे लोगों पर हमला किया गया. जब लोग बेहोश होकर गिरे, सैनिकों ने सामने से उन्हें गोली मार दी. वे लाशों को ट्रकों में लादकर अपने साथ ले गए. कईयों को जलते टायर पर फेंक दिया गया.
म्यांमार में सेना की बेरहमी की ये इकलौती घटना नहीं थी. बल्कि पूरे देश में 44 जगहों पर ऐसा ही हुआ. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 27 मार्च को म्यांमार में सेना ने 114 प्रदर्शनकारियों की हत्या की. मरनेवालों में कई बच्चे भी शामिल थे. कोई लोकल फ़ुटबॉल टीम का गोलकीपर था, तो कोई अपने मां-बाप की इकलौती संतान. एक शख़्स की लोकल मार्केट में जूस की दुकान थी. वो अपने घर के बाहर खड़ा होकर झड़प को देख रहा था. तभी आर्मी ने इलाके में छापा मारा और गोली मारकर उसकी हत्या कर दी. म्यांमार की हवाओं में ऐसी अनगिनत बेरहम कहानियां दर्ज़ हो चुकी हैं.

म्यांमार को रूस और चीन का सपोर्ट हासिल?

तख़्तापलट के बाद एक दिन में हुआ ये सबसे बड़ा हत्याकांड था. इससे पहले 04 मार्च को सेना के हमले में 38 लोग मारे गए थे. 27 मार्च की घटना ने पूरी दुनिया को सन्न कर दिया था. अगले दिन 12 विकसित देशों ने साझा बयान जारी किया. उन्होंने कहा,

‘हम म्यांमार की सेना द्वारा निहत्थे लोगों पर किए गए हिंसक बलप्रयोग की निंदा करते हैं. एक प्रफ़ेशनल आर्मी अनुशासन के अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करती है. वे लोगों की सुरक्षा करते हैं न कि उनकी हत्याएं.’

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव अंतोनियो गुतेरेस ने भी इस घटना पर दुख प्रकट किया. उन्होंने कहा कि इस स्थिति से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की ज़रूरत है. अमेरिका नए प्रतिबंध लगाने की तैयारी में जुटा है, लेकिन म्यांमार की सैन्य सरकार पर इसका कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है. वजह है, रूस और चीन का सपोर्ट.

Antonio Guterres
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव अंतोनियो गुतेरेस. (तस्वीर: एपी)

जब पूरे म्यांमार में शोक की लहर दौड़ रही थी. बाकी दुनिया सदमे में थी. उस वक़्त आर्मी हुक्मरान क्या कर रहा था? सबसे पहले तो सेना ने हिंसा को जायज ठहराया. कहा कि मरनेवाले लोग दंगा कर रहे थे, इसलिए उनका जवाब देना ज़रूरी था.

उसी रात मिलिट्री हुंटा के मुखिया जनरल लाइंग ने एक आलीशान डिनर का आयोजन किया. इसमें वो रेड कार्पेट पर चलते नज़र आए. ये आयोजन ‘आर्म्ड फ़ोर्सेज़ डे’ समारोह का हिस्सा था. जनरल लाइंग ने बड़ी खुशी से मेहमानों का स्वागत किया. उनके चेहरे पर हल्का सा भी शोक या तनाव नहीं दिख रहा था. म्यांमार के लोगों का चैन छीनने वाला जनरल शातिराना अंदाज़ में मुस्कुरा रहा था.

इस डिनर की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हैं. इसने हंगामा मचा दिया है. लोग सेना के हमले में मरे लोगों से इसकी तुलना कर रहे हैं. जनरल लाइंग की खूब लानत-मलानत हो रही है.

Miin Aung Laing Dinner
जनरल लाइंग की डिनर पार्टी की तस्वीर वायरल हो गई है.

इस समारोह की वजह से भारत की आलोचना क्यों हुई?

क्योंकि म्यांमार आर्म्ड फ़ोर्सेज़ डे में सिर्फ़ आठ देशों ने हिस्सा लिया. इसमें से एक भारत भी था. बाकी के देश थे – रूस, चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, लाओस और थाईलैंड. अधिकतर मुल्क़ों ने मिलिट्री तख़्तापलट की वजह से समारोह में हिस्सा लेने से मना कर दिया था.

अब भारत से ये सवाल पूछा जा रहा है कि क्या वो मिलिट्री हुंटा का समर्थन करते हैं? आरोप ये भी लगाए जा रहे हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र उन जनरलों से दोस्ती बढ़ा रहा है, जिनके हाथ ख़ून से रंगे हैं. भारत ने अभी तक इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है.

Myanmar Armed Forces Day
म्यांमार आर्म्ड फ़ोर्सेज़ डे में भारत सहित आठ देशों ने हिस्सा लिया था. (तस्वीर: एपी)

क्या ‘ख़ूनी शनिवार’ ने म्यांमार के लोगों का हौसला तोड़ दिया है?

जवाब है, कतई नहीं. सच्चाई ये है कि लोगों का डर लगभग खत्म हो गया है. वे पूरी ताक़त के साथ वापस लौटे. प्रदर्शनकारियों में अधिकतर युवा हैं. उनका कहना है कि अगर हम अभी डर गए तो हमें पूरी ज़िंदगी इसी डर के साए में गुज़ारनी होगी.

हर वर्ग के, हर पेशे के, हर समुदाय के लोग सैन्य शासन के आतंक के ख़िलाफ़ आ गए हैं. सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरियां छोड़कर प्रोटेस्टर्स की मदद कर रहे हैं. डॉक्टर्स जमा-जमाया क्लिनिक छोड़कर घायल लोगों का इलाज करने में जुटे हैं. जेल में बंद क़ैदी गिरफ़्तार हुए प्रदर्शनकारियों का ख्याल रख रहे हैं. जो जिस तरह से सक्षम हैं, उन्होंने अपना पूरा सामर्थ्य झोंक दिया है.

कुछ जगहों पर लोगों ने अपनी तरफ से बैरिकेडिंग लगा रखी है. उन्होंने सड़कों पर रेत की बोरियां जमा कर दी हैं. ताकि गोलियों से बचा जा सके. साथ ही सेना की टुकड़ी को इलाके में घुसने से रोका जा सके. इसके अलावा, एंटी-कू पोस्टरों और क्रिएटिव स्लोगन्स के जरिए भी सेना को मात देने की कोशिश जारी है. लोग मानते हैं कि ये सब नाकाफी है, लेकिन उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है. वे इसके लिए अपना सबकुछ न्यौछावर करने के लिए तैयार हैं. इसकी तीन बड़ी वजहें हैं.

Myanamr Protest 2021
म्यांमार के लोग हर हालत में सैन्य शासन से निजात पाना चाहते हैं. (तस्वीर: एपी)

#1
पहली, म्यांमार के लोगों ने 60 बरस तक सैन्य शासन का आतंक भुगता है. उन्होंने आवाज़ों पर लगे पहरे देखे हैं. विरोधों को कुचलते देखना उनकी रोज़मर्रा का हिस्सा रहा है. इस बार भी सेना का रुख़ कुछ वैसा ही है. जनता एक बार फिर से उस आतंक के दौर में लौटना नहीं चाहती.

#2
दूसरी वजह है, लोकतांत्रिक सरकार में मिली आज़ादी. जब म्यांमार में चुनी हुई सरकार ने शपथ ली, तब लोगों ने बुनियादी अधिकारों का इस्तेमाल किया. पहली बार उन्हें अपने मन की सरकार चुनने का अधिकार मिला था. वे विरोध करने के लिए स्वतंत्र थे. इसके अलावा, उन्हें बाहर की दुनिया से जुड़ने का मौका मिला था. म्यांमार का बाज़ार दुनिया के लिए खुला. विदेशी प्रतिबंध हट गए. ये सब म्यांमार के लोगों के लिए अभूतपूर्व था. उन्होंने अपनी स्वछंदता के लिए बड़ी क़ुर्बानियां झेली हैं. अब वे इसे गंवाने की इच्छा नहीं रखते.

#3
तीसरी बड़ी वजह है, लोगों का ख़ौफ़. सेना सिर्फ़ सड़क पर आए प्रदर्शनकारियों पर हमला नहीं कर रही है. बल्कि वे लोगों को तकनीक के सहारे ट्रैक कर रहे हैं. वे प्रोटेस्टर्स के घरवालों को भी नहीं बख़्श रहे हैं. इससे लोगों में डर है कि अगर सैनिक शासन नहीं हटा तो उन्हें पूरी उम्र उनके रहमोकरम पर रहना होगा. हर वक़्त डरके रहना होगा. इसी खौफ़ ने उनके अंदर हौसला भर दिया है. युवा प्रदर्शनकारी अपनी आनेवाली पीढ़ी को खुला, आज़ाद और बेखौफ़ म्यांमार देना चाहते हैं.

क्या वो अपना सपना जीत पाएंगे? इसका जवाब अधर में लटका है. पुरानी लोकतांत्रिक सरकार के प्रतिनिधि अभी भी हिरासत में हैं. मिलिट्री हुंटा चुनाव करवाने का वादा कर रही है. लेकिन कब? इसको लेकर उन्होंने कोई आश्वस्ति नहीं दी है. वैसे भी, उनकी निगरानी में हुए चुनाव निष्पक्ष होंगे, इसकी कोई गारंटी भी नहीं है. जब तक म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार नहीं लौट जाती, लोगों के बुनियादी अधिकार कुचले जाते रहेंगे. दुनिया के जिम्मेदार देश और संस्थाएं क्या कदम उठाते हैं, म्यांमार का भविष्य काफी हद तक उसी पहल पर निर्भर करेगा.


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