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कांग्रेस में 23 नेताओं की चिट्ठी से उपजे बवाल और लीडरशिप के संकट का पूरा बैकग्राउंडर

बहुत पहले की बात है. एक ज़मींदार थे. उनके बेटे की शादी थी पड़ोस के गांव में. बारात लेकर पहुंचे. स्वागत हुआ. बारातियों को ससम्मान बैठाया गया. बढ़िया दावत दी गई. लेकिन ज़मींदार साहब के मन को एक बात कचोट रही थी. जो बारात में रूठे नहीं और चार लोग उन्हें मनाएं नहीं, तो काहे के ज़मींदार. तो ज़मींदार साहब ने अपने एक नौकर से पूछा कि बताओ इंतज़ाम में क्या कम पड़ रहा है. नौकर ने कहा, मालिक सब बढ़िया है. पंडाल बढ़िया है, खाना बढ़िया है. बारातियों के लिए रिटर्न गिफ्ट भी है. अब ये हो गई दिक्कत. मालिक रूठें तो किस बात पर? लेकिन मान बहुत ज़रूरी होता है. इसीलिए एक नौकर को हुक्म दिया गया- जाकर एक दरी फाड़ दो. इसके बाद ज़मींदार साहब वहां पहुंचे, दरी के छेद में अंगूठा डाला और चीखे- ये कैसा इंतज़ाम है. हम चलते हैं और दरी में पैर फंस जाता है. हम पंडाल से लौट रहे हैं.

अब मेज़बान के यहां हड़कंप. कि ज़मींदार साहब रूठकर जा रहे हैं. तुरंत दुल्हन के फूफा ज़मींदार साहब के पास पहुंचे. माफी मांगी. कहा कि दरी के छेद में फंसकर आपके पैर में मोच पड़ गई होगी. वापस चलिए. आपके पैर पर गुनगुने तेल से मालिश की जाएगी. फिर आप खाना खाकर, अपनी बहू को लेकर लौटें. ज़मींदार साहब को मान मिला. और तब वो गुस्सा छोड़कर पंडाल लौटे. बारात में सबसे खास मेहमान बनकर.

कांग्रेस में इंतज़ाम बढ़िया हो न हो, लेकिन वहां 2019 के लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद से रूठने-मनाने का सिलसिला चल रहा है. मनाने वाले तंग हैं. कि मालिक जब तक मानेंगे नहीं, तब तक लौटेंगे नहीं और जब तक लौटेंगे नहीं, तब तक भंवर नहीं पड़ेंगे. कांग्रेस में जो हो रहा है, उसकी जटिलता हमारे बताए किस्से से कहीं ज़्यादा है. राहुल गांधी अध्यक्ष पद छोड़ चुके. सोनिया गांधी कार्यकारी अध्यक्ष हुईं, लेकिन इतने वक्त में न कार्यकारी की जगह स्थायी लगा और न ही किसी तीसरे नाम की चर्चा रही. दूसरी तरफ भाजपा भारतीय राजनीति में बाली की तरह साबित हो रही है. जो लड़ने जाता है, उसकी आधी ताकत भाजपा में शामिल हो जाती है.

अब आते हैं चिट्ठी पर

ऐसे माहौल में कांग्रेस के 23 नेता एक चिट्ठी लिख देते हैं. बदलाव की मांग करते हैं. और इसके बाद पूरे देश के पीसीसी कार्यालयों से चिट्ठियां बरसने लगती हैं. अपने अपने गणित के मुताबिक कोई सोनिया की छत्रछाया में पनपना चाहता है और कुछ चाहते हैं कि राहुल गद्दी पर लौटें. कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग आते-आते चिट्ठियों की जगह ट्वीट ले लेते हैं. क्या पिछले छह साल से पनप रहा कांग्रेस का बिखराव अब अपने अंजाम पर पहुंच रहा है? क्या ये शोर कांग्रेस की राजनीति का न्यू नॉर्मल कहा जा सकता है? और सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या ये मंथन कोई अमृत जन पाएगा? और अगर ऐसा हुआ, तो विष किसे पीना पड़ेगा? भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी में मचे इस कोलाहल के मायने तलाशेंगे.

राहुल के एक बयान से बात बढ़ी

हमारे देश में अपने विरोधी को गद्दार बताने की परंपरा है. सामने वाला कह क्या रहा है, इसकी परवाह किए बिना उसे वफादारी साबित करने को मजबूर किया जाता है. कांग्रेस में आज यही होता दिखा भी. राहुल गांधी के नाम से ये बयान चल गया कि जिन्होंने नेतृत्व परिवर्तन वाली चिट्ठी पर दस्तखत किए हैं, वो भाजपा से मिले हुए हैं. इस बयान की पुष्टि हो पाती, इससे पहले ही लोग उंगलियों पर गिनकर देखने लगे कि इस टिप्पणी की चपेट में कौन-कौन आ रहा है. नाम सुनिए –

>> गुलाम नबी आज़ाद

>> शशि थरूर

>> कपिल सिब्बल

>> मनीष तिवारी

>> आनंद शर्मा

>> भूपिंदर सिंह हुड्डा

>> एम वीरप्पा मोइली

>> रेणुका चौधरी

>> पीजे कुरियन

>> पृथ्वीराज चवान

>> राज बब्बर

>> अखिलेश प्रसाद सिंह

ये सिर्फ कुछ चर्चित नाम हैं, जिन्होंने दस्तखत किए. कुल 23 दस्तखत हैं. ये पूछा जाने लगा कि अगर ये लोग भाजपा से मिले हुए हैं, तो कांग्रेस में बचा कौन? कपिल सिब्बल ने तो अपना गुस्सा सीधे ट्विटर पर निकाल दिया. राजस्थान से लेकर मणिपुर तक पार्टी के लिए किए काम का हवाला देने लगे. प्रेस में गुलाम नबी आज़ाद का ये बयान भी चलने लगा कि अगर ये इल्ज़ाम साबित हो गया, तो स्वेच्छा से सारे पद छोड़ देंगे. बाद में सिब्बल ने कहा कि राहुल ने स्वयं उनसे कहा कि उन्होंने ‘भाजपा से मिले हुए हैं’ वाली बात नहीं कही और ट्वीट डिलीट किया. रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कांग्रेस प्रवक्ता की हैसियत से बयान दिया कि राहुल ने ये नहीं कहा. बाद में गुलाम नबी आज़ाद ने भी बात को संभालते हुए कह दिया कि ये इल्ज़ाम राहुल का नहीं, कांग्रेस वर्किंग कमेटी से बाहर के लोगों का था. तब जाकर सिब्बल ने अपना ट्वीट हटाया.

वर्किंग कमेटी की बैठक

ये उस हाई वोल्टेज ड्रामा का सिर्फ एक अंक था, जो आज कांग्रेस वर्किंग कमेटी में देखा गया. मीटिंग ऑनलाइन थी. बैठक शुरू होते ही ये खबर आ गई कि कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी और इस पद नहीं रहना चाहतीं. इस खबर के साथ नत्थी होकर आया पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और एके एंटनी का ये आग्रह कि आप बनी रहिए, जब तक पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं मिल जाता. समाचार एजेंसी पीटीआई के सूत्रों के मुताबिक, सोनिया गांधी ने केसी वेणुगोपाल को एक खत सौंपा, जिसमें 23 नेताओं की चिट्ठी पर प्रतिक्रिया थी. इसे मीटिंग में पढ़ा भी गया.

इसके बाद बोले पार्टी के पूर्व और तमाम इनकारों के बावजूद कई टिप्पणीकारों के मुताबिक भावी अध्यक्ष राहुल गांधी. जैसा कि अनुमान था, राहुल बेहद नाराज़ थे. खासकर चिट्ठी की टाइमिंग को लेकर. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने कहा कि चिट्ठी ऐसे वक्त में लिखी गई, जब पार्टी राजस्थान के संकट से उबर ही रही थी और सोनिया गांधी की तबीयत ठीक नहीं थी. इसी बयान के आसपास ”भाजपा से मिले हुए हैं जी” वाले बयान की खबरें चली थीं.

बाहरी हमले भी शुरू

ये सब चल ही रहा था कि कांग्रेस पर बाहर से भी हमले होने लगे. असदुद्दीन ओवैसी ने ट्वीट करके गुलाम नबी आज़ाद के घावों पर नमक रगड़ दिया. उन्होंने अंग्रेज़ी में ट्वीट भी किया प्रेस को बाइट देकर, आज़ाद को बी टीम वाला बयान याद दिलाया.

दूसरी तरफ उमा भारती थीं. उन्होंने कांग्रेस – नेतृत्व – गांधी और स्वदेशी. इन चार कीवर्ड्स के साथ अपनी बात कही.

“गांधी-नेहरू परिवार का राजनीतिक वर्चस्व समाप्त हो गया है. कांग्रेस को चाहिए कि विदेशी गांधी से मुक्ति पाए और स्वदेशी गांधी पर ध्यान दे. सोनिया जी का मैं बहुत आदर करती हूं और उसी के भाव से कह रही हूं.”

बैकग्राउंड क्या है?

पहला तो है फौरी कारण. सोनिया गांधी का कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर एक साल पूरा हुआ, तो उन्होंने पद छोड़ने की ‘इच्छा’ जताई. इससे पहले भी इस तरह की सुगबुगाहट कांग्रेस के भीतर से ही आ रही थीं कि अध्यक्ष गांधी परिवार से बाहर का कोई होना चाहिए. जाहिर है ये हर कांग्रेसी के मन की बात नहीं थी. ये सब पीक पर तब पहुंचा, जब एक लेटर बम की बात सामने आई. ये राजनीतिक का लेटर बम था. वैसे तो लेटर बम शातिर अपराधियों की कारस्तानी होते हैं. कि डाक से किसी को बम भेज दिया. इससे थोड़े अलग होते हैं राजनीति के लेटर बम. इन्हें उसके यहां नहीं भेजा जाता जिसका नुकसान करना है. ”सूत्र” इन्हें पत्रकारों को सौंपते हैं. और जब ये दगते हैं, तो बहुत शोर होता है.

कांग्रेस एक ऐसे ही धमाके से सकते में है. अब तक आप जान गए होंगे कि तकरीबन ढाई हफ्ते पहले कांग्रेस के 23 नेताओं ने कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक चिट्ठी लिखी. इस चिट्ठी में मांग की गई थी कि कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक व्यापक बदलाव किए जाएं. ये बदलाव कैसे हो, इसका रोडमैप भी लिखा था. लेकिन सोनिया गांधी ये लेटर पाते ही समझ गई होंगी कि ये चिट्ठी पार्टी की बेहतरी की सलाह की देने की जगह आलाकमान को कठघरे में खड़े करने के लिए थी.

कुछ कीवर्ड्स पर ध्यान दीजिए –

>> शक्ति के विकेंद्रीकरण,

>> राज्य यूनिट को मजबूत करना

>> हर स्तर पर कांग्रेस संगठन में चुनाव

सादी भाषा में लिखा गया था – जो चल रहा है, अब और नहीं चलेगा.

दो गुटों में दिखी कांग्रेस

23 अगस्त को ये खबर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार की तरफ से दी गई. इसके बाद पार्टी दो गुटों में बंटी दिखाई दी. एक गुट ने सोनिया को ही अध्यक्ष के रूप में समर्थन दिया. दूसरा गुट पार्टी हित के नाम पर नए चेहरों को आगे बढ़ाने की बात कह रहा है. इस बीच कुछ नेताओं ने वापस राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाए जाने की मांग की. कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों- कैप्टन अमरिंदर सिंह, अशोक गहलोत, वी नारायणसामी और भूपेश बघेल ने पार्टी नेतृत्व के लिए गांधी परिवार का समर्थन किया है. इसके अलावा लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी नेतृत्व में गांधी परिवार को चुनौती का विरोध किया.

जब ये खबर आई कि सोनिया इस इस खत के सामने आने के बाद पद छोड़ सकती हैं, उन्हें ‘अटूट’ समर्थन देने के लिए कांग्रेसियों में होड़ लग गई. 23 नेताओं के पत्र के जवाब में कई पत्र लिखे गए, जो सोनिया गांधी से ‘तुस्सी ना जाओ’ वाले अंदाज़ में भावुक अपील कर रहे थे. 23 अगस्त की रात तक कम से कम आधा दर्जन कांग्रेस नेताओं, सांसदों, राज्यसभा सदस्यों, विधायकों ने ट्विटर पर पत्र जारी किए, जो सोनिया गांधी के नाम थे. इनमें मानिकराम टैगोर, वर्षा गायकवाड़, मोहम्मद जवैद, रवनीत सिंह बिट्टू, अमी याज्ञ्निक, राजी साटव, पीएल पुनिया जैसे नाम हैं. सबमें भावुकता लिपटी पड़ी थी.

ये समस्या पुरानी है

लेकिन कई टिप्पणीकारों ने ध्यान दिलाया है कि कांग्रेस की ये समस्या न 23 अगस्त, 2020 को शुरू हुई, और न ही उससे 15 दिन पहले. सत्ता का केंद्रीकरण सिर्फ कांग्रेस में हुआ हो, ऐसा नहीं है. लेकिन एक संस्थान के रूप में कांग्रेस की मशीन ने जितना जंग खाया है, उतना हाल के दिनों में भारत की किसी राष्ट्रीय पार्टी के मामले में नहीं देखा गया. 1998 वो आखिरी साल था, जब गांधी परिवार से इतर कोई कांग्रेस अध्यक्ष था- सीताराम केसरी. उसके बाद से कांग्रेस में ग्लास सीलिंग को जैसे पार्टी के भीतर ही एक मौन स्वीकृति मिल गई थी. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप पैराशूट से आए हैं, या काम करते हुए ज़मीन से उठ रहे हैं. क्योंकि आप सबसे ऊपर नहीं पहुंच पाएंगे, ये तय है. नतीजा पार्टी न कुछ नया सोच पाती है, न कुछ नया कर पाती है. 2014 से जितने सबक कांग्रेस को लेने चाहिए थे, उससे ज़्यादा भाजपा ने लिए. नतीजा हम सबने देखा.

भविष्य में क्या होना है?

24 अगस्त को दोपहर में कर्नाटक के पूर्व सीएम और कांग्रेस नेता सिद्धारमैया की चिट्ठी सामने आई. उन्होंने लिखा कि अगर सोनिया पद पर न रहना चाहें, तो उन्हें राहुल को अध्यक्ष बनने के लिए राज़ी करना चाहिए. इससे ज़्यादा वज़नदार बयान था राज्यसभा सांसद और सोनिया गांधी के विश्वास पात्र अहमद पटेल का. उन्होंने ये तो कहा कि वरिष्ठ नेताओं को खत वगैरह लिखने से बचना चाहिए. लेकिन अपनी बात में ये जोड़ दिया कि राहुल को पार्टी की कमान संभालनी चाहिए. इसका मतलब इतनी भारी उथल-पुथल के बावजूद कांग्रेस जा उसी रास्ते पर रही है, जहां उसे ज़्यादा कुछ हासिल नहीं हुआ. चलते-चलते आपको एक और नाम के बारे में बता दें, जिसके बारे में आप जानने को उत्सुक होंगे. प्रियंका गांधी. उनके बारे में इतनी खबर ही आई कि उन्होंने गुलाम नबी आज़ाद को आड़े हाथों लिया. इसके अलावा पूरे दिन राहुल का नाम गूंजता रहा.

ख़ैर, इस क्राइसिस ऑफ लीडरशिप माने नेतृत्व के संकट से कांग्रेस कितना उबर पाएगी, ये समय ही बता सकता है.


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