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वो नेता जिसने पुलिस की पिटाई में दोस्त को गंवाया और बन गया मुख्यमंत्री

मुथुवेल करुणानिधि स्टालिन. छोटा नाम एमके स्टालिन. एम करूणानिधि के बेटे. और स्टालिन को लेकर हालिया अपडेट ये है कि स्टालिन अब तमिलनाडु के अगले मुख्यमंत्री हो सकते हैं. उनकी पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम यानी DMK के अलायंस को 2021 विधानसभा चुनाव में बहुमत मिला है. लेकिन क्या करूणानिधि का बेटा होना ही स्टालिन की सियासी पहचान है? क्यों अपने दो अन्य बेटों को किनारे करके करुणानिधि ने ऐलान किया था कि स्टालिन उनके राजनीतिक वारिस भी होंगे? किस भरोसे पर? ऐसे में स्टालिन की कहानी सुनते हैं. उनको थोड़ा और क़रीब से जानने की कोशिश करते हैं.

1 मार्च 1953. इस दिन करुणानिधि और उनकी दूसरी पत्नी दयालु अम्मल के घर जन्म हुआ स्टालिन का. मद्रास में. वही मद्रास, जिसे अब चेन्नई के नाम से जाना जाता है. स्टालिन के जन्म के समय सोवियत रूस के राष्ट्रपति जोसफ स्टालिन की मौत हुई थी. और परिवार को वहीं से नाम मिल गया. ‘स्टालिन’. स्कूल के दिनों में ही स्टालिन की राजनीति में एंट्री हो चुकी थी. महज़ 14 साल की उम्र में. कैसे? साल 1967 के विधानसभा चुनाव में DMK के तत्कालीन प्रमुख सी एन अन्नादुरै की आंधी चल रही थी. स्टालिन को मन था कि इस राजनीति में कुछ हिस्सा उनका भी हो. स्टालिन और उनके दोस्त जिस नाई की दुकान पर मिलते थे, उसी दुकान पर एक संगठन का जन्म हुआ. स्टालिन और उनके दोस्तों ने मिलकर बनाई DMK गोपालपुरम यूथ विंग. अन्नादुरै के लिए जमकर प्रचार किया. अपने पापा करुणानिधि के साथ मिलकर. DMK को भारी जीत मिली. अन्नादुरै मुख्यमंत्री बन गए. 2 साल बाद जब अन्नादुरै नहीं रहे तब करूणानिधि मुख्यमंत्री बने. और इसके बाद स्टालिन की सियासी पारी रफ्तार पकड़ने लगी. 1973 में DMK की जनरल कमेटी में भी चुन लिए गए.

चुनावी रुझानों के मुताबिक तमिलनाडु में DMK और कांग्रेस का गठबंधन जीतता दिखाई दे रहा है एवं एम के स्टालिन का मुख्यमंत्री बनना तय लग रहा है. (फ़ोटो क्रेडिट : Gettyimages)

जेल की लाठी और स्टालिन के राजनीतिक करियर का तीर की तरह निकलना

फिर आयी इमरजेंसी. इस दौर में DMK इंदिरा विरोधी खेमे में जा चुकी थी. लिहाजा अंकुश DMK पर भी लगा. स्टालिन समेत कई सारे DMK कार्यकर्ता जेल चले गए. कहते हैं कि इन राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ बहुत हिंसा हुई. पुलिस पर बर्बरता के आरोप लगे. अपने बाद के दिनों में दिए एक इंटरव्यू में स्टालिन ने कहा था, ‘जेल में जाने पर मुझे पता चला था कि मुझे बड़ी क़ीमत चुकानी होगी.’ हुआ यूं था कि स्टालिन मद्रास सेंट्रल जेल में बंद थे. उनके साथ थे DMK के दूसरे बड़े नेता सी चिट्टीबाबू . पुलिस ने जेल में ही लाठी भांजी. स्टालिन को लाठियों से बचाने के लिए चिट्टीबाबू ने ख़ुद को ढाल बनाकर घेर लिया. लिहाज़ा सारी लाठियां चिट्टीबाबू को पड़ीं. अस्पताल ले जाया गया, वहां चिट्टीबाबू का निधन हो गया. इस घटना ने स्टालिन को राजनीति के प्रति थोड़ा और प्रतिबद्ध बना दिया. जेल से छूटे. आपातकाल की जांच के लिए इनक्वायरी कमीशन बना. कमीशन के सामने स्टालिन ने अपना बयान भी दिया था.

साथ बुलाने के लिए मोदी ने जैन कमीशन की याद दिलाई

अब स्टालिन कांग्रेस के साथ हैं तो कई बार उनके गठबंधन के इस चुनाव पर सवाल भी उठे हैं. लोगों ने पूछा कि इमरजेंसी लगाने वालों के साथ ही आपने कैसे गठबंधन कर लिया. स्टालिन ने कहा कि भाजपा का शासन आपातकाल से भी बुरा है. भाजपा का नाम कहां से आ गया? नरेन्द्र मोदी ने भी 4 साल पहले स्टालिन और उनकी पार्टी पर डोरे डाले थे. ख़बरों के अनुसार, जब करुणानिधि से मिलने गये तो, नरेंद्र मोदी ने आपातकाल और जैन कमीशन की याद दिलाई थी. कौन से जैन कमीशन की? राजीव गांधी की हत्या की जांच के लिए बनाया गया जैन कमीशन, जिसकी अंतरिम रिपोर्ट में साज़िशकर्ताओं में करुणानिधि का नाम आ गया था. बहरहाल, आपातकाल के बाद 1977 के विधानसभा चुनाव में DMK को बड़ी जीत मिली और स्टालिन करूणानिधि के अनौपचारिक राजनीतिक सहायक के रूप में सामने आए. वे सत्ता-संचालन में करूणानिधि का हाथ बंटाने लगे.

1989 का लोकसभा और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव. बोफ़ोर्स का बवाल और इस बवाल को जन-जन तक पहुंचाने वाले वी पी सिंह के सबसे बड़े सहयोगियों में शामिल थे स्टालिन के पापा करूणानिधि. मद्रास शहर की थाउजेंड लाइट्स विधानसभा सीट से स्टालिन पहली बार चुनाव में उतरे. उनकी पार्टी की लहर भी थी लिहाजा वे जीत भी गए. इस सीट से स्टालिन लगातार 4 बार चुने गए. 1996 में चेन्नई शहर के मेयर भी बने. पहले ऐसे मेयर जो बिना किसी इलेक्शन के चुने गए. उनको डायरेक्ट अपॉइंट किया गया था.

इसके बाद उन्होंने अपनी विधानसभा सीट बदल दी. थाउजेंड लाइट्स से चले गए कोलाथुर. 2011 और 2016 में कोलाथुर विधानसभा से दोनो बार जीत दर्ज की. 2021 में तीसरी बार का आंकड़ा बना.

राहुल गांधी के साथ एम के स्टालिन. (फ़ोटो क्रेडिट : Gettyimages)
राहुल गांधी के साथ एम के स्टालिन. (फ़ोटो क्रेडिट : Gettyimages)

फिर साल 2009 तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करूणानिधि अब व्हीलचेयर पर आ चुके थे. उन्हें पार्टी और सरकार में एक औपचारिक नंबर 2 की जरूरत महसूस होने लगी. ऐसे में उन्होंने अपने बेटे स्टालिन को उप-मुख्यमंत्री बनाया. उस वक्त तक तमिलनाडु या पूर्ववर्ती मद्रास राज्य में कोई उप-मुख्यमंत्री नहीं बना था. इसके बाद एम के स्टालिन ने भविष्य को मद्देनजर रखते हुए जनता से जुड़ने की कोशिशें शुरू कर दी. ख़ुद के जनसम्पर्क कार्यक्रम किए. ‘ओरातची साबाई’ और ‘नामाकुनामे’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए जनता से जुड़ने की कोशिश करते रहे.

घर का झगड़ा और बाप का हाथ सिर पर

लेकिन स्टालिन का उप-मुख्यमंत्री बनना और उनका सीधे जनता के बीच जाना करूणानिधि परिवार में बवाल करवा गया. इसके बाद पिता के उत्तराधिकार को लेकर स्टालिन का उनके भाईयों – एमके मुत्थु और एमके अलगिरी – के साथ विवाद शुरू हो गया. लेकिन आखिरकार 2013 में  करूणानिधि ने ये ऐलान कर दिया कि उनकी मौत के बाद पार्टी के प्रमुख स्टालिन होंगे. मुत्थु और अलगिरी को पार्टी से निकाल भी दिया गया. तब जाकर स्टालिन के पास पार्टी के अंदर काफी ताक़त आ गयी. इसके बाद उन्होंने युवाओं के बीच पार्टी को लोकप्रिय बनाने का बीड़ा उठाया. जानकार बताते हैं कि युवाओं को अपनी पार्टी की तरफ लाने के लिए स्टालिन ने एक कूल मेकओवर किया. फॉर्मल शर्ट, ट्राउज़र, स्टाइलिश चश्मा और स्पोर्ट शूज़ पहन कर स्कूटर पर निकले. और हालिया नतीजे बता रहे हैं कि स्टालिन अपने मिशन में कामयाब रहे हैं.

2013 में एम करूणानिधि ने औपचारिक रूप से एम के स्टालिन को अपना राजनीतिक वारिस घोषित कर दिया. (फ़ोटो क्रेडिट : इंडिया टुडे)
2013 में एम करूणानिधि ने औपचारिक रूप से एम के स्टालिन को अपना राजनीतिक वारिस घोषित कर दिया. (फ़ोटो क्रेडिट : इंडिया टुडे)

केस मुक़दमा और फ़िल्मबाज़ी

स्टालिन अक्सर केस-मुकदमों के पचड़े में भी फंसते रहे हैं. 2 दशक पहले उन्हें चेन्नई का मेयर पद इसलिए छोड़ना पड़ा था क्योंकि उनपर पद का दुरूपयोग कर फ्लाईओवर घोटाले में शामिल होने का आरोप लगा था. हाल ही में चुनाव के ठीक पहले 2 अप्रैल 2021 को स्टालिन  के दामाद सबारीसन के परिसर में इनकम टैक्स का छपा पड़ा था. सबारीसन डीएमके के मुख्य रणनीतिकार और एमके स्टालिन के सलाहकार हैं. इस छापेमारी के बाद एमके स्टालिन ने कहा भी था,

“इसका जवाब जनता 6 अप्रैल को देगी. मैं डरने वाला नहीं हूं. जब मैं इमरजेन्सी की ज्यादतियों में नहीं टूटा तो भला ये लोग मुझे क्या तोड़ पाएंगे.”

पापा करूणानिधि की तरह स्टालिन ने भी तमिल फिल्मों और टीवी सीरियलों में भी काम किया था. उनकी डेब्यू फिल्म थी 1988 में आई ‘ओरे रथम’. उन्होंने कुरिंजी मलार और सुरिया  नाम के सीरियलों में भी काम किया. स्टालिन का करियर भी ज्यादातर नेता पुत्रों के फिल्मी कॅरियर की तरह रहा. चिराग़ पासवान के करियर की तरह. लम्बा नहीं चला. अब एमके स्टालिन के नाम के आगे मुख्यमंत्री लिखा जाएगा. उनके सामने अपने पिता और पार्टी के मेयार पर टीके रहने का दारोमदार है. उसे देखना और परखना तमिलनाडु के अगले पांच सालों की सबसे बड़ी सुर्खी रहेगी.


वीडियो : वो शख़्स जिसने ऐसी पार्टी बनाई कि इंदिरा गांधी को ही चुनौती दे डाली!

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