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जिमी लाई से इतना क्यों डरता है चीन?

आज आपको बताएंगे चीन में पैदा हुए एक बच्चे की कहानी. वो 12 साल का था, जब एक दिन नाव पर बैठकर चुपके से अपना देश छोड़कर भाग गया. भागकर पहुंचा पड़ोस के एक द्वीप. वहां एक कारखाने में मज़दूरी शुरू की. 25 का होते-होते उसने अपना कारोबार जमा लिया. मगर फिर एक दिन उसने अपना जमा-जमाया धंधा छोड़कर एक अख़बार शुरू कर दिया. क्यों? क्योंकि उसके अपने मुल्क ने, उसकी सरकार ने हज़ारों निहत्थे लोगों की नृशंसता से हत्या कर दी थी. इसके बाद पूरी उम्र वो इंसान चीन से बिना डरे उसकी आलोचना करता रहा. चीन की तानाशाही का विरोध करने वालों का साथ देता रहा. उसे हज़ारों धमकियां मिलीं चीन से, मगर वो नहीं माना. अब ख़बर आई है कि चीन ने झूठे इल्ज़ाम लगाकर उसे गिरफ़्तार कर लिया है. ये क्या मामला है, विस्तार से बताते हैं आपको.

ये कहानी है हॉन्ग कॉन्ग में रहने वाले लाई ची यिंग उर्फ़ जिमी लाई की

जिमी हमेशा से हॉन्ग कॉन्ग में नहीं रहते थे. हॉन्ग कॉन्ग के उत्तर-पश्चिम में मेनलैंड चाइना का एक शहर है- ग्वानचो. 1948 में यहीं पैदा हुए जिमी. उनका परिवार शहर के अमीर लोगों में था. मगर 1949 में जब कम्यूनिस्टों ने चीन की सत्ता संभाली, तो जिमी के परिवार का सबकुछ छिन गया. वो सड़क पर आ गए. चीन का माहौल भी सही नहीं था. ऐसे में कुछ बरस बाद 1960 में जिमी का परिवार एक डोंगी में बैठकर हॉन्ग कॉन्ग भाग आया. इस वक़्त जिमी की उम्र थी 12 साल. परिवार का हाथ बंटाने के लिए उन्होंने हॉन्ग कॉन्ग की एक कपड़ा फैक्ट्री में बाल मज़दूरी शुरू की. कभी मिठाई की दुकान पर खटे. कभी बोझा उठाया. ये सब करते हुए ख़ुद से ख़ुद को पढ़ाया.

Guanghou
72 साल के जिमी हॉन्ग कॉन्ग के उत्तर-पश्चिम में मेनलैंड चाइना के ग्वानचो में पैदा हुए थे. (गूगल मैप्स)

मज़दूरी के दौरान कारोबार के गुर सीखते-सीखते जिम कारखाने के मैनेज़र बन गए. फिर उन्होंने ख़ुद का कारखाना खोल लिया. इस वक़्त उनकी उम्र थी 25 साल. शुरुआत में उनकी गारमेंट फैक्ट्री अमेरिका के बड़े-बड़े ब्रैंड्स को स्वेटर बनाकर भेजती थी. फिर 1981 में जिमी ने ख़ुद का एक क्लोदिंग ब्रैंड बना लिया. इसका नाम रखा- गिरडानो. कुछ ही वक़्त में उनकी ये क्लोदिंग लाइन दुनिया के कई हिस्सों में कपड़े सप्लाई करने लगी.

कहानी को फॉरवर्ड करके आते हैं 1989 पर

इस बरस 4 जून को चीन के टियनानमैन स्क्वैयर में एक भीषण नरसंहार हुआ. इसमें करीब 10 हज़ार निहत्थे नागरिक मार डाले गए. ये चीनी तानाशाही के सबसे नृशंस एपिसोड्स में से एक था. देश-विदेश के अख़बारों ने इसपर रिपोर्ट की. इसमें एक रिपोर्ट न्यू यॉर्क टाइम्स की भी थी. 22 अक्टूबर, 1989 को छपी इस ख़बर की थीम थी, टियनानमैन स्क्वैयर नरसंहार का हॉन्ग कॉन्ग पर असर. ख़बर में लिखा था कि इस नरसंहार के बाद से हॉन्ग कॉन्ग के लोग अपने भविष्य को लेकर डरे हुए हैं. डर की वजह ये थी कि 1997 में ब्रिटेन हॉन्ग कॉन्ग को चीन के हाथों सौंपने वाला था. NYT ने अपनी इस ख़बर में हॉन्ग कॉन्ग के कई लोकतंत्र समर्थकों से बात की. इनमें एक जिमी लाई भी थे. जिमी ने अक्टूबर 1989 में न्यू यॉर्क टाइम्स से जो कहा था, वो आपको जानना चाहिए. उन्होंने कहा था-

मैं चीन का रहने वाला था, लेकिन तब भी मैं ख़ुद को कभी उस देश से नहीं जोड़ सका. ये ज़रूर था कि मेरे भीतर अपनी चीनी पहचान को लेकर थोड़ा जुड़ाव बना हुआ था. मगर टियनानमैन नरसंहार ने सबकुछ बदल दिया. इस नरसंहार के बाद मैं कमोबेश हर दिन रोया हूं. हम चीन के लोग यहूदियों की तरह हैं. हमें भी एक मसीहा का इंतज़ार है. टियनानमैन के वो छात्र हमारे मसीहा थे. इस नरसंहार से पहले मैं पैसा कमाने के लिए पैसा बनाता था. मगर अब मैं आदर्शों की राह पर चलते हुए पैसे कमाऊंगा.

Tiananmen Square Protest
1989 का टियनानमैन स्क्वैयर के बाद चीन में बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शन हुए थे. (फोटो: एएफपी)

टियनानमैन स्क्वैयर के बाद जिमी प्रदर्शनों में हिस्सा लेने लगे

टियनानमैन स्क्वैयर नरसंहार के बाद ही असल में जिमी लाई का ऐक्टिविस्ट रोल शुरू हुआ. वो हॉन्ग कॉन्ग में होने वाले चीन विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लेने लगे. उन्होंने हॉन्ग कॉन्ग में पनप रही लोकतंत्रक समर्थक मुहिम को बढ़-चढ़कर डोनेशन देना भी शुरू किया.

जिमी के अंदर आया ये बदलाव उनके बिज़नस में भी दाखिल हुआ. उस दौर में हॉन्ग कॉन्ग के अंदर ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का पासपोर्ट हासिल करने की होड़ थी. लोगों को लगता, यही पासपोर्ट उन्हें आने वाले दिनों में चीन से बचाएगा. हॉन्ग कॉन्ग के बड़े कारोबारी भी सुरक्षित ठिकाने की तलाश में अपना बिज़नस ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसी जगहों पर शिफ़्ट करने की तैयारी में लगे थे. मगर जिमी लाई इन सबसे अलग निकले. उन्होंने हॉन्ग कॉन्ग में अपना एक मीडिया हाउस खोला. शुरुआत में उनके पब्लिकेशन्स फिल्म और एंटरनेटमेंट टाइप की चीजें कवर करते. मगर फिर जल्द ही उनका फोकस डेमोक्रेसी और चीनी सरकार की आलोचना की तरफ शिफ़्ट हो गया. इसमें सबसे आगे था 1995 में शुरू किया गया उनका टैब्लॉइड- ऐपल डेली.

1997 में हॉन्ग कॉन्ग चीन को हैंडओवर किया गया. इस वक़्त तक ‘ऐपल डेली’ हॉन्ग कॉन्ग का दूसरा सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला अख़बार बन चुका था. ये अख़बार अभिव्यक्ति की आज़ादी और लोकतंत्र जैसे मुद्दों को तवज़्जो देता था. बाद के बरसों में जैसे-जैसे चीन की हॉन्ग कॉन्ग में दखलंदाज़ी बढ़ती गई, ऐपल डेली और मुखर होता गया.

Jimmy Lai In Protest
टियनानमैन स्क्वैयर के बाद जिमी भी लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों में भाग लेने लगे. (फोटो: एएफपी)

जिमी सिर्फ मीडिया हाउस तक महदूद नहीं थे

वो हॉन्ग कॉन्ग के प्रो-डेमोक्रेसी मूवमेंट के साथ भी जुड़े हुए थे. वो चीन द्वारा प्रतिबंधित सरकार विरोधी रैलियों में हिस्सा लेते थे. चीन के शासकों को खुलेआम तानाशाह और हत्यारा बुलाते. बाकी कारोबारियों से इतर वो किसी भी तरह पेइचिंग के आगे झुकने को तैयार नहीं थे. इस तरह जिमी हॉन्ग कॉन्ग के लोकतंत्र समर्थक गुट के सबसे प्रभावी चेहरों में शुमार हो गए.

इसी वजह से जिमी और उनका अख़बार चीन की आंखों में खटकने लगा. चीन ने गुस्सा निकाला जिमी के बिज़नस पर. चाइनीज़ मेनलैंड स्थित उनके गारमेंट स्टोर बंद करवाए जाने लगे. इतना परेशान किया गया जिमी को कि उन्हें अपना गारमेंट बिज़नस बेचना पड़ा. इसके बाद भी चीन उनके पीछे लगा रहा. चीन की सरकारी मीडिया कभी जिमी के मोटापे का मज़ाक उड़ाती. तो कभी उन्हें CIA का एजेंट बताती. चीन के दबाव में हॉन्ग कॉन्ग की कंपनियों ने जिमी के अख़बारों और उनकी वेबसाइट्स में विज्ञापन देने बंद कर दिए. इस वजह से जिमी को लाखों का घाटा होने लगा. मगर वो डटे रहे.

Jimmy Lai Apple Today
1997 तक जिमी का ‘ऐपल डेली’ हॉन्ग कॉन्ग का दूसरा सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला अख़बार बन चुका था. (फोटो: एएफपी)

इसी कड़ी में आया फरवरी 2020. इस महीने जिमी गिरफ़्तार कर लिए गए. उनके ऊपर ग़ैरक़ानूनी सभाओं में हिस्सा लेने और लोगों को उकसाने का आरोप लगा. सरकार जिसे ग़ैरक़ानूनी सभा बता रही थी, वो असल में चीनी तानाशाही का विरोध था.

क्या इस गिरफ़्तारी ने जिमी को बदल दिया?

जवाब है, नहीं. जमानत पर छूटने के बाद भी वो उसी बेबाकी से चीनी तानाशाही का विरोध करते रहे. मई 2020 में चीन हॉन्ग कॉन्ग के लिए विवादित सिक्यॉरिटी बिल लाया. इसके विरोध में भी जिमी आगे थे. इस क़ानून के लागू हो जाने पर हॉन्ग कॉन्ग में लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की कोई उम्मीद नहीं थी. ऐसे में जिमी ने अपने अख़बार के पहले पन्ने पर एक चिट्ठी छापी. इस चिट्ठी में डॉनल्ड ट्रंप से हॉन्ग कॉन्ग को बचाने की अपील की गई थी.

तमाम विरोधों के बावजूद 1 जुलाई से ये क़ानून हॉन्ग कॉन्ग में लागू हो गया. इसके बाद जिमी पर शिकंजा कसने लगा. आशंका थी कि वो किसी भी समय अरेस्ट किए जा सकते हैं. 10 अगस्त को ये आशंका सही साबित हुई. इस रोज़ जिमी अरेस्ट कर लिए गए. उनके ऊपर विदेशी ताकतों के साथ मिलकर राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरे में डालने का आरोप लगाया गया है. जिमी के दो बेटे और उनके अख़बार के कुछ और लोग भी अरेस्ट किए गए हैं. ‘ऐपल डेली’ के दफ़्तर पर भी छापेमारी हुई है. हॉन्ग कॉन्ग में जिमी की गिरफ़्तारी का बहुत विरोध हो रहा है. लेकिन तब भी शायद जिमी को चीन ले जाकर उनपर मुकदमा चलाया जाएगा. आशंका है कि उन्हें उम्रकैद की सज़ा मिले. जिमी 72 साल के हैं. सज़ा मिली, तो शायद वो ज़िंदा जेल से बाहर न आ सकें.

Jimmy Lai Arrested
जिमी फरवरी 2020 में भी गिरफ़्तार किए गए थे. (फोटो: एपी)

जिमी की गिरफ़्तारी होनी ही थी!

चीन बरसों से इसका बहाना खोज रहा था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले कुछ साल से चीन के कुछ सरकारी पत्रकार 24 घंटे जिमी के घर के बाहर मौजूद रहते थे. वो जिमी के घर आने-जाने वाले हर इंसान की तस्वीर उतारते. इस उम्मीद में कि शायद इनमें से कोई आदमी जिमी के कथित CIA कनेक्शन का सबूत बन जाए. चीन के पिट्ठू आएदिन जिमी के घर के बाहर पहुंचकर बलवा करते. उन्हें अमेरिका का पालतू कुत्ता बताते. कुछ दिनों पहले चीन के एक अख़बार ने जिमी के बेटे के रेस्तरां का नाम और पता छापा. कहा कि लोग इस रेस्तरां का बहिष्कार करें. आप सोचिए, जब खुलेआम जिमी को गिराने की इतनी कोशिशें हो रही थीं तो परदे के पीछे चीन कितना कुछ कर रहा होगा. कितना डरा हुआ होगा चीन इस एक आदमी से!

ऐसा नहीं कि जिमी को अपने इस अंज़ाम का अंदेशा नहीं था. वो कई बार कह चुके थे कि उनके साथ इस तरह का सलूक होने वाला है. अभी जून में ही उन्होंने न्यूज़ एजेंसी AFP से कहा था कि वो ख़ुद को जेल जाने के लिए तैयार कर चुके हैं. 29 मई को न्यू यॉर्क टाइम्स में लिखे गए अपने एक आर्टिकल में भी उन्होंने ऐसी ही बात लिखी थी. जिमी ने लिखा था-

मैं जानता हूं कि मुझे जेल भेज दिया जाएगा. मगर हॉन्ग कॉन्ग के लिए संघर्ष करने का मतलब बस इसे बचाना नहीं है. हम हॉन्ग कॉन्ग के लोग अपनी आज़ादी, अपने नागरिक अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. अगर दुनिया हमें सपोर्ट करे, तो वो देख सकेगी कि चीन इस पूरी दुनिया की शांति के लिए ख़तरा है.

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29 मई को न्यू यॉर्क टाइम्स में लिखे गए अपने एक आर्टिकल में जिमी ने कहा था कि हॉन्ग कॉन्ग के लोग अपनी आज़ादी, अपने नागरिक अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं.

जिमी चाहते तो  हॉन्ग कॉन्ग छोड़कर जा सकते थे लेकिन!

पता है, जिमी के पास ब्रिटिश पासपोर्ट था. बड़े-बड़े विदेशी राष्ट्राध्यक्षों तक उनकी पहुंच थी. वो आसानी से हॉन्ग कॉन्ग छोड़कर जा सकते थे. मगर वो नहीं गए. एक अरबपति कारोबारी ने लोकतंत्र जैसी चीज के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी.  दुनिया में जहां लोग छोटे-छोटे फ़ायदों के लिए आदर्शों पर थूक देते हैं, वहां ये आदमी अंज़ाम जानते हुए भी चीनी हुकूमत से लड़ता रहा.

अब सवाल है कि क्या जिमी लाई को बचाया जा सकेगा? या एक और बेक़सूर आदमी तानाशाही सिस्टम का शिकार बन जाएगा? ये सवाल बस एक जिमी लाई का नहीं है. ये सवाल केवल हॉन्ग कॉन्ग के अस्तित्व का नहीं है. ये सवाल ताइवान का भी है. ये सवाल उस हर इंसान का है, जो दमन के आगे बग़ावत करने की हिम्मत दिखाता है.


विडियो- भयंकर बाढ़ झेल रहे चीन को दुनिया का सबसे बड़ा बांध भी क्यों नहीं बचा पाया?

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