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बसवराज बोम्मई: भाजपा के ट्रबलशूटर, जिन्हें येदियुरप्पा ने कभी 'नंबर वन धोखेबाज' कहा था

31 जुलाई 2011 का दिन था. मौसम बरसात का था. लेकिन कर्नाटक में सियासी गर्मी बढ़ी हुई थी. राज्य के मुख्यमंत्री, दिग्गज भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने पद से इस्तीफा दे दिया था. खनन घोटाले में नाम आने के बाद येदियुरप्पा पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से खासा दबाव था. इसी दबाव में उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी. येदियुरप्पा को इससे धक्का लगा. जैसे-तैसे साल बीता. लेकिन अगले साल नवंबर में येदियुरप्पा ने विधायकी और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और कर्नाटक जनता पक्ष (KJP) नाम से पार्टी बनाई. कर्नाटक के कई बड़े नेता उनके साथ हो लिए. लेकिन एक नेता था, जिसे येदियुरप्पा ने खुद बुलाया. बार-बार बुलाया लेकिन वो नहीं गया. येदि ने उस समय कहा था –

“मैंने उनसे कहा था कि मेरे साथ आ जाइए. वो काफी दिन तक टरकाते रहे और फिर मना कर दिया. ये तो एक तरह का धोखा है. धोखेबाजों में उनका नंबर एक है.”

यहां येदियुरप्पा किसका ज़िक्र कर रहे हैं? वो ज़िक्र कर रहे हैं कर्नाटक के भाजपा नेता बसवराज बोम्मई का. कभी येदियुरप्पा की ‘धोखेबाजी लिस्ट’ में नंबर-1 रहा ये नेता आज उनकी जगह कर्नाटक के सीएम की कुर्सी संभाल चुका है. तब, जब येदि को एक बार फिर कार्यकाल के मध्य में ही कुर्सी छोड़नी पड़ी है. और संयोग देखिए कि 10 साल बाद आज 2011 में खुद येदियुरप्पा ही बोम्मई का नाम अगले मुख्यमंत्री के लिए प्रस्तावित करते हैं. शपथ ग्रहण के रोज बोम्मई भी येदियुरप्पा के पैर छूकर मंच की ओर बढ़ते हैं.

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शपथ लेने से पहले येदियुरप्पा के पैर छूते कर्नाटक के नए सीएम बसवराज बोम्मई. (तस्वीर- पीटीआई)

पिता CM, बेटा CM

बसवराज का पूरा नाम है – बसवराज सोमप्पा बोम्मई. सोमप्पा उनके पिता का नाम है, जो जनता दल (U) के बड़े नेता थे. वे कर्नाटक के 11वें मुख्यमंत्री रहे. सोमप्पा बोम्मई 1988 से 89 तक इस पद पर रहे. इसके अलावा देवगौड़ा और गुजराल सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे. 1996 से 98 तक.

1960 में पैदा हुए उनके बेटे बसवराज का राजनीति में आने का कोई इरादा था नहीं. उन्होंने कर्नाटक के ही एक कॉलेज से मकैनिकल इंजीनियरिंग की और टाटा ग्रुप में बतौर इंजीनियरिंग नौकरी करने लगे. लेकिन जैसा कि चौधरी चरण सिंह और अजित सिंह के साथ हुआ था, वैसा ही यहां हुआ. कि जब पिता की राजनीति अस्ताचल की ओर बढ़ी तो इंजीनियर बेटे को बुलाकर पॉलिटिकल डेब्यू करा दिया गया. बसवराज को बुलावा आया. 1995-96 में उन्होंने जनता दल यूनाइटेड जॉइन की. 1998 और 2004 में MLC बने. धारवाड़ स्थानीय प्राधिकरण निर्वाचन क्षेत्र से कर्नाटक विधानपरिषद के सदस्य चुने गए.

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गृह मंत्री रहने के दौरान बोम्मई. (फोटो- PTI)

बसवराज का बीजेपी युग

इंजीनियरिंग के बाद बसवराज की राजनीति भी ठीक-ठीक चल ही रही थी. लेकिन 2008 में उन्होंने एक बड़ा कदम उठाया. भारतीय जनता पार्टी जॉइन की. न सिर्फ जॉइन की, बल्कि पहला चुनाव भी लड़ा. शिग्गाव सीट से विधायकी लड़ी और जीते. पहली बार निर्वाचित हुए. और पहली बार राज्य में मंत्री भी बने. जल संसाधन मंत्रालय मिला. 2013 में जब प्रदेश में कांग्रेस सरकार आई, सिद्धारम्मैया मुख्यमंत्री बने, तब भी बसवराज ने अपनी सीट निकाली. इन्हीं चुनावों के पहले वो घटनाक्रम हुआ था, जिसके ज़िक्र के साथ हमने अपनी बात की शुरुआत की थी. येदियुरप्पा ने भाजपा छोड़ी और उनके करीबियों में गिने जाने वाले बसवराज उनके साथ नहीं हुए.

2018 में बसवराज तीसरी बार विधायक चुने गए और 2019 में फिर मंत्री बने. इस बार उन्हें गृह मंत्रालय जैसी अहम ज़िम्मेदारी दी गई. दो साल इस पद पर रहे और जुलाई 2021 में एक बार फिर जब येदियुरप्पा कुर्सी से हटे तो उन्होंने ही बसवराज का नाम आगे कर दिया. इस नाम पर मुहर लगी और बसवराज कर्नाटक के 23वें मुख्यमंत्री बने.

क्यों फ्रंटरनर बने बसवराज?

बसवराज की कर्नाटक में छवि ठंडे दिमाग वाले नेता की है. ऐसा नेता, जिसकी बात विपक्षी दल वाले भी सुनते हैं. इसी खूबी के चलते उन्हें गृह मंत्रालय जैसी ज़िम्मेदारी दी गई थी. कर्नाटक भाजपा के लिए वे लंबे वक्त से ट्रबलशूटर रहे हैं. येदियुरप्पा ने विधायक दल की बैठक में मुख्यमंत्री पद के लिए बसवराज का नाम सुझाया. दूसरी तरफ धर्मेंद्र प्रधान और किशन रेड्डी ने कर्नाटक भाजपा प्रभारी अरुण सिंह के साथ बैठक की और फिर बसवराज के नाम का ऐलान हो गया.

बसवराज के मुख्यमंत्री बनने के पीछे उनके लिंगायत समुदाय से आने का भी बड़ा हाथ रहा. कर्नाटक में लिंगायत सबसे बड़ा समुदाय है. राज्य की करीब 17 फीसदी आबादी लिंगायतों की है. हालांकि लिंगायत समुदाय में भी लगभग 98 छोटे पंथ हैं. कर्नाटक की 224 विधानसभा सीटों में से करीब 122 में लिंगायत समुदाय के अच्छी तादाद में वोटर्स हैं. इनमें से लगभग आधी सीटें बीजेपी के पास हैं.

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बोम्मई कर्नाटक के 23वें सीएम हैं. (फोटो- PTI)

लिंगायत की अहमियत

लिंगायत वोटों के बिना भाजपा सरकार में नहीं आ सकती, ऐसा माना जाता है. और लिंगायत वोटों को भाजपा में लाने वाले येदियुरप्पा हैं. कर्नाटक में लिंगायत वोटों को नाराज़ करना किसी भी पार्टी को कितना भारी पड़ सकता है, इसे समझने के लिए 1990 का उदाहरण दिया जाता है. 1990 में लिंगायत समुदाय से ही आने वाले कांग्रेस नेता वीरेंद्र पाटिल कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे. उनके कार्यकाल में कांग्रेस में सांप्रदायिक दंगे हुए.

राजीव गांधी दंगा प्रभावित इलाकों के दौरे पर गए. वे उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष थे. उन्होंने पाटिल को पद से हटा दिया. राजीव गांधी के इस फैसले से कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ. लिंगायत समुदाय कांग्रेस के खिलाफ हो गया. और अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार हुई. कहा जाता है इसके बाद ही येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय के नेता बनकर उभरे. लिंगायत को भाजपा का कोर वोटर भी माना जाता है. यही कारण है कि येदियुरप्पा के हटने के बाद भाजपा ने इस समुदाय को नाराज़ करने का रिस्क लेना ठीक नहीं समझा और जब येदि ने बसवराज का नाम आगे किया तो झट से हां हो गई.

बसवराज के बारे में एक किस्सा बड़ा मशहूर है. जब उन्होंने JD (S) छोड़ी तो कांग्रेस के संपर्क में आए. वहां के एक वरिष्ठ नेता से पार्टी में शामिल होने की हरी झंडी मिलने के लिए हफ्तों इंतजार किया लेकिन कोई रिप्लाई नहीं आया. इसके बाद भाजपा के संपर्क में आए और कई दिन येदियुरप्पा के घर, दफ्तर पर बैठकर भी इंतजार किया.

बसवराज ने तब BBC हिंदी से कहा था –

“मैं कुछ कहता नहीं था. मैं बस वहां जाकर चुपचाप बैठता था. एक दिन येदियुरप्पा ने किसी से बात करते हुए मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा- इन्हें देखिए, कितने धैर्य के साथ इंतज़ार कर रहे हैं.”

बसवराज को उनके धैर्य का फल मिल गया है. अब वो कर्नाटक के मुख्यमंत्री हैं और उनकी बड़ी अग्निपरीक्षा होगी 2023 में, जब राज्य में विस चुनाव होंगे.


कर्नाटक में येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद किसे मुख्यमंत्री बना रही है BJP?

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