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'चंद्रकांता' के क्रूर सिंह यानी अखिलेन्द्र मिश्रा आज कल कहां हैं?

90 के दशक में दूरदर्शन पर एक शो आता था. ‘चंद्रकांता’. लोगों में शो को लेकर ऐसा क्रेज़ था कि अपने काम पहले ही निपटा लेते थे. इधर शो का टाइटल सॉन्ग प्ले होता और उधर पूरा परिवार टीवी के सामने आसन जमा लेता. लोगों ने शो के किरदारों को खूब प्यार दिया. उनकी नकल की. उनके डायलॉग्स दोहराए. उन्हें यादगार बना दिया. शो से ऐसा ही एक किरदार था क्रूर सिंह. जिसकी भौं सामान्य पुरुष की मूंछों से भी घनी थीं. जो बात-बात में यक्क-यक्क करता था. जिसे बच्चे अक्सर यक्कू-यक्कू कहकर दोहराते रहते थे.

आज बात करेंगे ‘चंद्रकांता’ के क्रूर सिंह यानी अखिलेन्द्र मिश्रा की. जिन्हें हम ‘सरफरोश’ के मिर्ची सेठ और ‘गंगाजल’ के बेईमान पुलिसवाले भूरेलाल के रुप में भी पहचानते हैं.

Kaha Gaye Ye Log


# अच्छा हुआ कि देश को एक इंजीनियर कम मिला

डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद. हमारे देश के पहले राष्ट्रपति. बिहार से ताल्लुक रखते थे. वहां के छपरा जिला स्कूल से उन्होंने मेट्रिक की पढ़ाई पूरी की. वो स्कूल जहां से अखिलेन्द्र मिश्रा ने भी अपने मेट्रिक की पढ़ाई की थी. अखिलेन्द्र का अधिकांश बचपन छपरा में ही बीता. हालांकि, उनका जन्म सिवान जिले के कुलवा गांव में हुआ था. पिता स्कूल टीचर थे. गोपालगंज के डीएवी स्कूल में पढ़ाते थे. बिहार के तीन जिले –सिवान, छपरा और गोपालगंज उन्हें अपने यहां का बेटा बताते हैं. अखिलेन्द्र खुद अपने इंटरव्यूज़ में ये बात बता चुके हैं. जिस दौरान वो बड़े हो रहे थे, उन्हें अपने जिले का नाम सिर्फ सारण पता था. 1972 में जाकर सारण जिले को तीन उप जिलों में बांटा गया. जिनका नाम था गोपालगंज, छपरा और सिवान.

अखिलेन्द्र पढ़ाई से जी चुराते थे. उससे दूर रहने के बहाने खोजते. ऐसे ही उनका ध्यान गया गांव में होने वाले नाटक पर. जो दुर्गा पूजा के दौरान होते थे. तब अखिलेन्द्र आठवीं कक्षा में थे. उन्होंने भी अपने पहले नाटक में हिस्सा लिया. नाटक था, ‘गौना के रात’. एक भोजपुरी नाटक. मज़ा आया. इतना कि वो हर साल अपने चचेरे भाइयों और गांव के दोस्तों के साथ मिलकर दुर्गा पूजा पर नाटक करने लगे. वो भी दो. एक भोजपुरी भाषा में और दूसरा हिंदी में. ये सिलसिला चलता रहा. अखिलेन्द्र मिश्रा के राजेन्द्र प्रसाद से रहे एक कनेक्शन का ज़िक्र हम कर चुके हैं. अब बारी थी दूसरे कनेक्शन की. राजेन्द्र प्रसाद के बड़े भाई थे महेंद्र प्रसाद. उन्होंने छपरा में Amateur Dramatic Association खोला. महेंद्र बाबू के स्थापित किये एसोसिएशन से सभी जुड़ना चाहते थे. क्या शहर के बुद्धिजीवी और क्या कलाकार. अखिलेन्द्र भी एसोसिएशन के साथ मिलकर नाटक करने लगे.

Akhilendra Mishra 3
अखिलेन्द्र मिश्रा के बचपन का प्यार था एक्टिंग, जिसे वो भूले नहीं.

अखिलेन्द्र को नाटक का चस्का लग चुका था. ये वो दौर था जब मां-बाप नुक्कड़ नाटक जैसी चीज़ को बतौर हॉबी भी नहीं देखते थे. फिर प्रोफेशन तो दूर की बात ठहरी. मां चाहती थी कि उनका बेटा अखिलेन्द्र इंजीनियर बने. अखिलेन्द्र ने भी मां की बात नहीं टाली. जुट गए इंजीनियरिंग कॉलेज के एंट्रेंस की पढ़ाई करने में. आईआईटी और बिट्स जैसे कॉलेजेस के लिए एग्ज़ाम दिए. लेकिन सब में एक ही नतीजा आया. फेल. साइंस के बच्चों का इंजीनियरिंग में दाखिला न होने के बाद वाला प्लान चुना. और एडमिशन ले लिया छपरा के राजेन्द्र कॉलेज में. फिज़िक्स ऑनर्स से बीएससी की पढ़ाई करने लगे. पढ़ाई पूरी हुई. अब अखिलेन्द्र के सामने मास्टर्स करने का ऑप्शन था. जानते थे कि अगर मास्टर्स की तो आगे चलकर टीचर बनना पड़ेगा. खुद अच्छे स्टूडेंट नहीं बन सके तो भला दूसरों के लिए अच्छे टीचर कैसे बन पाएंगे. दूसरी ओर नाटक नाम का बचपन का प्यार ऐसा था जिसे ये भूलने को तैयार नहीं थे. और तो और, इंजीनियरिंग एग्ज़ाम की तैयारी के दौरान ही अपना पहला नाटक डायरेक्ट कर डाला था.

अब इस पॉइंट पर टफ चॉइस लेने का फैसला किया. कि ज़िंदगी चाहे जैसा भी रुख करे, करना तो थिएटर ही है. लेकिन वो दौर था एटीज़ का. ऊपर से ये मध्यम वर्गीय परिवार से आते थे. जहां नाटक, एक्टिंग जैसी चीज़ों को शालीनता से नहीं देखा जाता था. बेटे को आजीवन सिनेमा मे लीन होना है, ये बात घरवालों को कैसे समझाएं. खासतौर पर बाबूजी को. जिनका अखिलेन्द्र बड़ा सम्मान करते थे. उनसे सीधे-सीधे कुछ भी मांगने से झिझकते थे. इसलिए पहले मां को मनाया. मां ने हड़काकर भगा दिया. कहा, इंजीनियरिंग तुमसे निकला नहीं और चले हो एक्टर बनने. थोड़ी और कोशिश की लेकिन मां नहीं मानी. थक-हार कर अखिलेन्द्र पहुंच गए पिताजी के पास. देखा जाएगा जो होगा. पिताजी को अपनी मनोदशा कह सुनाई. लगा था कि डांटकर भगा दिए जाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पिताजी ने सबको अचंभित करते हुए अपनी हामी भर दी. इसके बाद जब तक बॉम्बे का स्टेशन नहीं आ गया, तब तक अखिलेन्द्र ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. बॉम्बे आए और Indian People’s Theatre Association यानी इप्टा जॉइन कर लिया. इप्टा के साथ जुड़कर उन्होंने कई नाटकों में काम किया. बैकस्टेज की बारीकियां सीखकर फ्रंटस्टेज तक आए.


# तकिया कलाम ऐसा पॉपुलर हुआ कि सबकी ज़बान पर चढ़ गया

अखिलेन्द्र एक्टिव तौर पर थिएटर में काम कर रहे थे. प्रेमचंद की कहानी पर आधारित उनका प्ले ‘मोटेराम का सत्याग्रह’ पृथ्वी थिएटर पर चल रहा था. उसी दौरान उन्हें पता चला कि नीरजा गुलेरी दिल्ली से बॉम्बे आई हुई हैं. अपना शो डायरेक्ट करना चाहती हैं. और उसी के सिलसिले में उन्हें एक्टर्स की तलाश है. उस वक्त ऑडिशन का चलन आम नहीं था. आर्टिस्टस को उनके थिएटर बैकग्राउंड के आधार पर फाइनल कर लिया जाता था. अखिलेन्द्र को नीरजा के असिस्टेंट का नंबर मिला. असिस्टेंट ने नीरजा के साथ उनकी मीटिंग फिक्स कर दी. अखिलेन्द्र मिलने पहुंचे. देखा कि उनसे पहले कतार में कई एक्टर्स लगे हैं. किसी से पूछ लिया कि भाई नीरजा जी कहां बैठी है. उनके समक्ष पहुंचे और खुद को इन्ट्रोडयूस किया. नीरजा ने बिना कोई फॉर्मैलिटी किए सीधा पूछा कि क्या ‘चंद्रकांता’ पढ़ी है? अखिलेन्द्र ने भी बिना ज्यादा वक्त गवाएं न में जवाब दिया. नीरजा को अखिलेन्द्र में कुछ अलग बात लगी. क्योंकि अब तक जितने भी एक्टर्स आए, सबने उन्हें इम्प्रेस करने के लिए कह दिया था कि उन्होंने ‘चंद्रकांता’ पढ़ी हुई है. अखिलेन्द्र की ईमानदारी ने उनपर अच्छा इम्प्रेशन डाला. बाकी वो अखिलेन्द्र के थिएटर में किए काम से भी अवगत थीं. इसलिए उन्हें तुरंत अपने शो में रोल ऑफर कर दिया.

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क्रूर सिंह का ‘यक्क’, वो ध्वनि जिसे अखिलेन्द्र ने तकिया कलाम में तब्दील कर लिया.

बताया कि उन्हें शो के विलेन क्रूर सिंह का किरदार निभाना है. विजयगढ़ के दीवान का बेटा जो चंद्रकांता से प्यार करता है. उसका रोल 10-12 एपिसोड तक चलेगा जिसके बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी. सुनने के बाद अखिलेन्द्र ने अपनी हामी भर दी. जल्द ही शूटिंग शुरू हुई. क्रूर सिंह को तैयार किया गया. एक सुंदर राजकुमार जिसकी लंबी-पतली मूंछें थी. अखिलेन्द्र ने किरदार के गेटअप पर नीरजा से बात की. कहा कि मेरा नाम क्रूर है और मैं दिख सुंदर रहा हूं. ये कैसा मेल! नीरजा को पहले तो उनकी बात पर हंसी आई. लेकिन फिर विचार किया तो लगा कि बात सही ही है. क्रूर सिंह का लुक बदला गया. अब उसे मोटी-घनी मूंछों के साथ उतनी ही घनी भौंहें भी दी गई. सर्वसम्मति से ये लुक फाइनल कर दिया गया. लेकिन यहां भी अखिलेन्द्र को एक चिंता थी. कि उनकी मूंछों और भौंहों की वजह से अब कोई उनका चेहरा नहीं पहचान पाएगा. बिना पूरा चेहरा दिखाए भी अपनी अलग पहचान कैसे बनाई जाए, इसका भी उन्होंने जुगाड़ निकाल लिया. दरअसल, स्क्रिप्ट में बार-बार ‘यक्क’ लिखा हुआ था. स्क्रिप्ट में ये शब्द एक ध्वनि के तौर पर लिखा गया था. अखिलेन्द्र को एक आइडिया आया. वो ‘यक्क’ ध्वनि को अपने किरदार का तकिया कलाम बनाना चाहते थे. नौ रसों को यूज़ कर ‘यक्क’ शब्द को अलग-अलग भाव के साथ बोलना चाहते थे. नीरजा से बात की. नीरजा ने पहले तो कहा कि यक्क का अर्थ अच्छा नहीं होता. इसे यूज़ करना सही नहीं होगा. लेकिन अखिलेन्द्र के मनाने पर वो मान ही गईं. इस तरह क्रूर सिंह को मिला अपना ‘यक्क’, जिसे सुनकर बच्चे ‘यक्कू-यक्कू’ किया करते थे.


# जब सलमान ने पेट्रोल डाल जलाया और मां रोने लगी

अखिलेन्द्र एक्टिंग करने के लिए बॉम्बे आए थे. उनके पीछे से छपरा में उनके मां-बाप का जीना मुश्किल हो गया. लोग ताने देने लगे कि इतना पढ़-लिख कर क्या करने चला गया. अब तो समझो बिगड़ गया तुम्हारा बेटा. रिश्तेदार उलाहना देते. कि अब उसकी शादी कैसे होगी. इंजीनियर, डॉक्टर बनता तो कुछ बात भी होती. लेकिन अखिलेन्द्र ने अपनी मेहनत को सार्थक कर ऐसे सभी लोगों को जवाब दिया. अपने काम के जरिए. ‘चंद्रकांता’ खासा पॉपुलर था. अब बारी थी अपने कमाल को बड़े परदे पर ले जाने की. 1995 में सलमान खान की एक फिल्म आई थी. ‘वीरगति’. वो फिल्म जहां ‘मेरे बदन पर लगे कपड़े को ही मैं कफन समझता हूं’ जैसे डायलॉग थे. फिल्म के शुरुआती क्रेडिट्स में लिखा था, ‘इन्ट्रोडयूसिंग अखिलेन्द्र मिश्रा’. ‘चंद्रकांता’ के दौरान ही अखिलेन्द्र को ये फिल्म ऑफर हुई थी. फिल्म में उन्होंने विलन का किरदार निभाया. इक्का सेठ, जिसकी भारी आंखों से हवस टपकती थी. गले में सोने की चेन लादे थे.

बेटा फिल्म में आ रहा है. वो भी सलमान खान के साथ. खबर छपरा तक पहुंच गई. आंखों में खुशी भर अखिलेन्द्र के माता-पिता छपरा के सिनेमा हॉल में पहुंच गए. ‘वीरगति’ देखने. फिल्म का क्लाइमैक्स आया. जहां सलमान का किरदार इक्का सेठ के साथ खूब मार-काट मचाता है. अंत में उसपर पेट्रोल की बारिश कर देता है. मतलब उस समय पेट्रोल सस्ता ही था, तो ये मुमकिन भी लगता है. पेट्रोल स्नान के बाद इक्का को आग में जलते घर में फेंक देता है. इक्का जलकर मर जाता है. सीन चल रहा था. एकाएक हॉल में एक महिला फूट-फूटकर रोने लगी. सिसककर कहने लगी कि मेरे बाबू को कोई बचा लो. अर्रे उसपर पेट्रोल डाल दिया. इतनी बेदर्दी कौन करता है. ये महिला अखिलेन्द्र की मां थीं.

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अपने बेटे को पेट्रोल से जलता देख उनकी मां रोने लगी. (फोटो में पेट्रोल की बर्बादी नहीं हुई, उस वक्त पेट्रोल सस्ता हुआ करता था)

इस घटनाक्रम के बाद अखिलेन्द्र किसी भी फिल्म पर काम शुरू करने से पहले पिता को फोन करते. बताते कि इस फिल्म में वो ये किरदार निभाने वाले हैं. पिता का एक ही जवाब होता. कि ये ज्यादा विलन वगैरह के रोल मत किया करो. अच्छे आदमी का रोल किया करो भाई. अखिलेन्द्र ने शायद पिता की प्यारभरी सलाह नहीं मानी. क्योंकि ‘वीरगति’ के बाद उनकी अगली फिल्म थी ‘सरफरोश’. जहां उन्होंने मिर्ची सेठ का किरदार निभाया. मिर्ची सेठ कैसा धूर्त था, ये हम सभी जानते हैं.


# जब आमिर ने पूछा कि गायत्री मंत्र का अर्थ बताओ

‘लगान’. हिंदी सिनेमा की महानतम फिल्मों में से एक. ऑस्कर्स में भी नॉमिनेट हुई. फिल्म किसी एक नायक की नहीं, बल्कि 11 नायकों की कहानी थी. कि कैसे ये 11 लोग अंग्रेजों के खिलाफ क्रिकेट मैच जीत कर लगान माफ़ करवाते हैं. उन्हीं 11 में से एक था अर्जन. जिसका किरदार निभाया अखिलेन्द्र मिश्रा ने. आमिर खान ‘लगान’ को प्रड्यूस कर रहे थे. वो इससे पहले अखिलेन्द्र के साथ ‘सरफरोश’ में भी काम कर चुके थे. उनके काम से वाकिफ थे. नतीजतन, ‘लगान’ के लिए अखिलेन्द्र को बुलाया गया. आशुतोष गोवरिकर ने नैरेशन दिया. डायरेक्टर को अपने सब्जेक्ट को लेकर कितनी स्पष्टता थी, ये देखकर अखिलेन्द्र बहुत खुश हुए. और फौरन ‘लगान’ को हां कर दिया. फिर चाहे किरदार कोई भी हो. उन्हें अर्जन के लिए फाइनल कर लिया गया.

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11 खिलाड़ी जिन्होंने अंग्रेजों का हृदय परिवर्तन, नहीं उनकी वाट लगा दी.

शूटिंग शुरू हुई. रोज़ पूरी टीम बस से शूटिंग स्पॉट पर जाती. जहां उन्हें पहुंचने में करीब 05 घंटे का वक्त लगता था. सफर शुरू होने से पहले अखिलेन्द्र बस में गायत्री मंत्र चला दिया करते थे. पहले तो सबको लगता कि ऐसा क्यों कर रहे हैं. लेकिन धीरे-धीरे ये टीम का रूटीन बन गया. शूट पर जाने से पहले लगातार गायत्री मंत्र सुनते और काम शुरू करते. अखिलेन्द्र अपने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि गायत्री मंत्र का टीम पर बड़ा पॉज़िटिव असर हुआ. खुद आमिर खान भी प्रभावित हुए. उन्होंने अखिलेन्द्र से पूरे गायत्री मंत्र का अर्थ पूछा और उसे समझा भी.


# ‘ये रावण इतनी जल्दी नहीं मर सकता’

साल 1987. इंडियन टेलिविजन का इतिहास बदलने वाला साल. या यूं कह लीजिए कि टीवी का इतिहास लिखने वाला साल. रामानंद सागर की ‘रामायण’ दूरदर्शन पर प्रसारित हुई थी. वो रामायण जिसे देखने के लिए लोग अपनी शादियां रोक देते थे. सड़कों को वीरान कर देते थे. रामानंद सागर की ‘रामायण’ के करीब 20 साल बाद उनके बेटे आनंद सागर ने भी ‘रामायण’ बनाने का फैसला लिया. रावण के रोल के लिए वो अखिलेन्द्र मिश्रा को लेना चाहते थे. अखिलेन्द्र को कॉल किया. रोल के बारे में बताया. अखिलेन्द्र उस दौरान 3-4 फिल्मों की शूटिंग पर काम कर रहे थे. अपनी व्यस्तता का हवाला देकर टाल दिया. साथ ही वो पुरानी वाली रामायण में अरविंद त्रिवेदी के निभाए रावण की लेगसी से भी परिचित थे. जानते थे कि उस लेगसी को दोहरा नहीं पाएंगे. इसलिए मेकर्स को मना कर दिया. मेकर्स ने कहा कि ठीक है जैसा आप चाहें. बस एक बार आकर मिल लीजिए.

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रावण का अनदेखा पहलू दिखाने के लिए अखिलेन्द्र की प्रशंसा हुई थी.

अखिलेन्द्र को लगा कि आधे-एक घंटे में मीटिंग निपटा कर निकल लेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वो मीटिंग चार घंटे तक चली. मीटिंग के एंड तक अखिलेन्द्र मान गए. लेकिन एक शर्त के साथ. शर्त थी कि वो रावण को अपने हिसाब से पोर्ट्रे करेंगे. मेकर्स को कोई हर्ज नहीं था. खुद के हाथ में किरदार का क्रिएटिव कंट्रोल लेने से उन्हें फायदा हुआ. क्योंकि आगे चलकर एक सीन में रावण रोने लगता है. ये अखिलेन्द्र ने खुद जोड़ा. रावण का वलनरेबल साइड दिखाने का असर ऐसा हुआ कि उनके काम को जमकर सराहना मिली. आनंद सागर के बड़े भाई सुभाष सागर ने उन्हें कॉल कर पूछा कि ये तूने क्या कर दिया? रावण ऐसा भी हो सकता है? ये तुम्हारे दिमाग में कैसे आया?

कॉन्ट्रैक्ट के हिसाब से अखिलेन्द्र को छह महीनों तक ही शो पर काम करना था. उनका डेथ सीन शूट कर लिया गया. और उनका शो से पैकअप हो गया. अचानक एक दिन उनके पास आनंद सागर का फोन आया. पूछा कि किसी और प्रोजेक्ट पर काम कर रहो हो? अखिलेन्द्र ने बताया कि अभी तो कुछ नहीं है. न सुनते ही दूसरी ओर से आवाज आई कि शो में रावण का ट्रैक बढ़ाना पड़ेगा. पब्लिक डिमांड के मुताबिक ये रावण इतनी जल्दी नहीं मर सकता. बस फिर क्या था, अखिलेन्द्र ने एक महीना और रावण के सीन्स शूट किए.


# आज कल कहां हैं Akhilendra Mishra?

अखिलेन्द्र का अगला बड़ा प्रोजेक्ट है शंकर के डायरेक्शन में बनी ‘इंडियन 2’. पहले पार्ट की तरह यहां लीड रोल कमल हासन ही निभाएंगे. इसके अलावा उन्होंने हाल ही में एक वेब सीरीज़ की शूटिंग भी पूरी की है. जिसका टाइटल है ‘व्हाइट गोल्ड’. शूटिंग पूरी होने के बाद लॉकडाउन लग गया था. इसलिए डबिंग और पोस्ट-प्रोडक्शन का काम अभी बचा हुआ है. सीरीज़ के प्लॉट और बाकी कास्ट को लेकर अभी कोई भी डिटेल्स रिलीज़ नहीं की गई हैं.

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फिल्मों के अलावा टीवी पर भी एक्टिव तौर पर काम करते रहते हैं.

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