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चीन और UAE के बदलते संबंध विश्व राजनीति को किस तरफ़ ले जा रहे हैं?

एंकर महोदय डिबेट की मुद्रा अपनाए हुए हैं. मुद्दा रंगीन है. चर्चा चीन पर होनी थी. लेकिन स्कीन पर ड्रैगन उड़ रहा है. और साथ में बिजलियाँ कौंध रही हैं. अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ थोड़े हैरान परेशान है. तैयारी के दौरान ना उन्होंने ड्रैगन पर रिसर्च की थी और ना ही मौसम पर.

बहरहाल घड़ी समय बताती है और एंकर महोदय शिगूफ़ा छेड़ते हैं, ड्रैगन अपने पंख पसार रहा है, और इस कारण दुनिया पर कोल्ड वॉर के बादल मंडरा रहे हैं. जानकार थोड़ा राहत महसूस करते हैं कि मौसम का रिफ़्रेंस जायज़ और चीन से रिलेटेड था. अपनी बारी आने पर विशेषज्ञ महोदय बात की शुरुआत भारत के ईस्टर्न बॉर्डर पर चीन की दख़लंदाज़ी से करते हैं. एंकर महोदय खुश हैं. ये उनके फ़ोर्टे का मसला है. लेकिन पता नहीं कब बात चीन से अमेरिका, वहां से ईरान होते हुए, इज़राएल और संयुक्त अरब अमीरात तक पहुंच जाती है.

एंकर महोदय अब परेशान हैं . मुद्दा चीन था ये बात UAE तक कैसे पहुँच गई है.

तभी विशेषज्ञ महोदय, पाकिस्तान और ताइवान का नाम लेते हैं. एंकर की सांस में सांस आती है कि मुद्दा वापस पटरी पर लौट रहा है और साथ-साथ सारे कीवर्ड्स भी निपट रहे हैं.

घटनाक्रम का सार देखें तो चीन, अमेरिका, पाकिस्तान, ताइवान और इज़राएल. अंतर्राष्ट्रीय मामलों के ऐसे कीवर्ड्स हो गए हैं कि ज़िक्र हो जाए तो न्यूज़ कब खिचड़ी बन जाती है पता ही नहीं चलता.

खिचड़ी का अचार और अचार वाला अख़बार चींटियों से लबालब है. जिन्हें स्याही के काले बिंदु तो दिखाई दे रहे हैं. लेकिन बिंदुओं से बनने वाली बात नहीं दिखाई दे रही.

हम कहेंगे पानी का स्वाद पूछने से बेहतर है. पानी के स्त्रोत पर चला जाए. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये स्त्रोत वैसे तो अमेरिका है. लेकिन दुनिया की सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी धीरे-धीरे चीन की तरफ़ बढ़ रही है. जहां से निकलने वाली खबरें दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रही हैं.

आज बात चीन से सम्बंधित कुछ ऐसी ही खबरों की. जो इकलौती पकड़ ली जाएं तो कुछ ख़ास इशारा नहीं करती. लेकिन अपनी समग्रता में दुनिया में शक्ति के बदलते हुए समीकरणों की तरफ़ इशारा करती हैं.

साउथ-ईस्ट एशिया और इंडो-पसिफ़िक रीजन में पिछले दिनों कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हुए. चीन के बढ़ते दख़ल को देखते हुए, अमेरिका ने पहले QUAD की नींव रखी और फिर AUKUS का गठन हुआ. AUKUS के तहत अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया को न्यूक्लियर सबमरीन भी मुहैया कराई.

लाज़मी था कि चीन इससे परेशान होता और वो हुआ भी. लेकिन चीन के अलावा एक और देश है, जिसके लिए अमेरिका की बदलती प्राथमिकताएं मुसीबत खड़ी कर रही हैं. हम यूनाइटेड अरब अमीरात की बात कर रहे हैं. खाड़ी के देशों में अमेरिका का पुराना दोस्त. जो अब अमेरिका से नज़र-ए-इनायत की दरखवास्त कर रहा है. क्या है ये पूरा मामला. आइए जानते हैं

पर्शिया की खाड़ी पर मौजूद देशों को ‘खाड़ी के देश’ या गल्फ़ कंट्रीज़ की संज्ञा दी जाती है. मिडिल ईस्ट का ये हिस्सा दुनिया के लिए तेल का कुआं है. एक दशक पहले तक इस कुएं की गहराई नापने का एकाधिकार अमेरिका ने ले रखा था. आधी सदी पहले, इज़राएल को स्वीकार्यता देकर अमेरिका ने मिडिल ईस्ट के मुद्दों से खुद को जोड़ लिया था. और तब से यहां के हालात पर वो लगातार नज़र बनाए रखता है.

फिर चाहे ईरान से पुरानी दुश्मनी हो या 21 वीं सदी की शुरुआत में इराक़ पर हमला. 2020 में अब्राहम अकॉर्ड्ज़ के तहत अमेरिका ने इज़राएल और खाड़ी के कुछ देशों के बीच सम्बंधों की नई शुरुआत करवाई. इसके अलावा सऊदी अरब और UAE जैसे देश अमेरिका की आर्म्स डील का एक बड़ा हिस्सा हैं.

UAE काउंटर टेररिज़्म मामलों में US का साझेदार है. अमेरिका की फ़ोर्सेस UAE में तैनात हैं. यहां तक कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के साथ अपने सैनिक भेजने वाला UAE पहला देश था.

मिडिल ईस्ट में अमेरिका के प्रभाव पर सेंध लगाई चीन ने. 2010 के बाद चीन ने दुनिया में अपनी ताक़त बढ़ाने का सपना देखा तो मिडिल ईस्ट उसका अहम पड़ाव था. उसने अपने चिर परिचित अन्दाज़ में मिडिल ईस्ट को ट्रेड डील्स का लॉलीपॉप दिया. जिसे हाथों-हाथ लिया गया.

पश्चिमी देशों की चेतावनी को नज़रंदाज़ करते हुई UAE ने चीन की कम्पनी हुवावे को टेलिकॉम सेक्टर के बढ़े कॉंट्रैक्ट सौंपें. कोरोना माहामारी के दौरान चीन ने वैक्सीन कूटनीति की मदद से UAE के साथ संबंधों को मज़बूत किया. और इतना मज़बूत किया कि अमेरिका को पिछाड़ते हुए वो UAE का सबसे बढ़ा ट्रेड पार्ट्नर बन गया.

2021 आते-आते चीन का लॉलीपॉप अब वो लड्डू बन चुका है. जिसे पकड़ने के चक्कर में UAE के हाथ जार में फ़ंसते जा रहे हैं.

कारण है चीन की सैन्य महत्वाकांक्षाएं. 2015 में जब चीन ने अफ्रीकी देशों के साथ ट्रेड डील की तो साथ ही अपने लिए मिलिट्री बेस की मांग भी रखी. 2017 में जिबूती में चीन ने पहला मिलिट्री आउटपोस्ट बनाया. ताकि इंडियन ओशियन में नज़र पैनी कर सके. इसके बाद 2019 में ट्रेड डील की आड़ में कम्बोडिया में नेवल बेस बसा लिया. इसके अलावा श्रीलंका और पाकिस्तान में कमर्शियल गतिविधियों की आड़ में पोर्ट्स निर्माण का कार्य जारी है.

यूं तो UAE के साथ चीन का कोई सैन्य समझौता नहीं है. बात सिर्फ़ चोखे कारोबार तक सीमित है. अबु धाबी से क़रीब 80 किलोमीटर दूर, ख़लीफ़ा बंदर गाह को चीन कारोबार के लिए उपयोग करता है. लेकिन अमेरिकी ख़ूफ़िया विभाग द्वारा जारी नई रिपोर्ट के अनुसार मामला सिर कारोबार तक सीमित नहीं है.

अमेरिकी उपग्रहों से खींची तस्वीरों के अनुसार 2021 की शुरुआत से ही ख़लीफ़ा बंदर गाह में सैन्य आउटपोस्ट का निर्माण चल रहा था.

इसी साल अगस्त महीने में राष्ट्रपति जो बाइडन के पास ये मसला पहुंचा तो उन्होंने सीधे क्राउन प्रिन्स मुहम्मद बिन जायेद को फ़ोन लगाया. जिसके बाद अमेरिका और UAE के बीच कई राउंड की बातचीत हुई. सितम्बर महीने में अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सलिवन ने UAE का दौरा किया. जहां उन्होंने दो टूक शब्दों में आगाह किया कि अगर चीन ने UAE में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई तो ये अमेरिका और UAE के रिश्तों के लिए घातक होगा.

जेक सलिवन के दौरे के बाद UAE की तरफ़ से भी एक बयान जारी किया गया. जिसमें कहा गया,

‘चीन के साथ सैन्य अड्डे या अन्य किसी सैन्य चौकी की मेजबानी का UAE का इरादा नहीं है. UAE ने चीन के साथ ऐसा कोई समझौता, योजना, वार्ता या इरादा नहीं किया है”

चीन के सैन्य आउटपोस्ट के निर्माण में फ़िलहाल रोक लग गई है. लेकिन भविष्य में चीन इस मोर्चे पर निश्चित तौर पर अपनी स्थिति मज़बूत करना चाहेगा.

UAE की दिक़्क़त ये है कि चीन से मिलने वाला व्यापार वो किसी हाल में नहीं छोड़ सकता. लेकिन सुरक्षा मसलों और हथियारों की डील के लिए वो अभी भी अमेरिका पर निर्भर है. इसमें अमेरिका और UAE के बीच हुई 23 बिलियन डॉलर आर्म्स डील भी शामिल है. जिसके तहत इस साल के अंत तक अमेरिका UAE को पांचवीं पीढ़ी के 50 अमेरिकी F-35 लड़ाकू विमान, 18 रीपर ड्रोन और अन्य उन्नत युद्ध सामग्री देगा.

UAE की एक और बड़ी दिक़्क़त है ईरान. जिससे निपटने के लिए उसे अमेरिका की ज़रूरत है. अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के कारण अमेरिका पर दुनिया का भरोसा कम हुआ है. ऐसे में UAE जैसे साझेदार देश चाहते है कि अमेरिका नए सिरे से संबंधों को वरीयता दे.

अमेरिका की इस मसले में क्या दिक़्क़तें हैं?

ये समझने के लिए चलते हैं ताइवान के मसले पर. ताइवान को लेकर अमेरिका कई बार बयान जारी कर चुका है. जिसमें उसने ताइवान की रक्षा की बात की है. लेकिन पॉलिसी के लेवल पर वो किंकर्तव्यमूढ़ बना हुआ है. दिक़्क़त ये है कि बाइडन प्रशासन ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने हाथ जिस जल्दबाज़ी में खींचे, उससे दुनिया को संदेश गया कि अमेरिका विदेशी ज़मीन पर सैन्य हस्तक्षेप नहीं करना चाहता.

अमेरिका का ये संदेश दोस्तों के साथ-साथ दुश्मनों को भी मिला. NATO फ़ोर्सेस की वापसी के बाद से ही चीन लगातार हमलावर बना हुआ है. ताइवान को लेकर नित नए बयान जारी किए गए है. शुरुआती बयानों में थोड़ी सतर्कता बरतने के बाद अब वो खुलकर ताइवान पर कब्जे की बात कह रहा है.

पिछले हफ़्ते ताइवान को लेकर चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक नया बयान जारी किया. उन्होंने कहा,

“चीन दुबारा एक हो जाए, ये राष्ट्र के हर बेटे और बेटी की आकांक्षा है. हम पूरी ईमानदारी से शांतिपूर्ण एकीकरण की संभावना तलाश रहे हैं. लेकिन इसके साथ ये भी साफ़ कर देना चाहिए कि ‘ताइवान स्वतंत्रता’ के लिए अलगाववादी ताकतों ने हमें उकसाया, हमारे हाथों को मजबूर किया, या किसी लाल रेखा को पार किया तो हम कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर होंगे”

ताइवान भी अपनी तरफ़ से चीन की आक्रामकता का जवाब देने की कोशिश कर रहा है. ताज़ा रिपोर्ट्स के अनुसार ताइवान ने अपनी सीमा पर एडवांस F-16 लड़ाकू विमान तैनात कर दिए हैं. अपग्रेडेड श्रेणी के 64 F-16V लड़ाकू विमानों को भी वायुसेना में शामिल किया गया है. जिनकी जल्द ही तैनाती सम्भव है. अमेरिका के लिए एक और बड़ी दिक़्क़त उसकी आंतरिक राजनीति के चलते है.

अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ में युद्ध हस्तक्षेप के दौरान प्रशासन को अमेरिकी जनता का समर्थन मिला हुआ था. लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अमेरिकी सैनिक एक और युद्ध का हिस्सा बने, तो बाइडन प्रशासन को जनता की नाराज़गी का सामना करना पड़ेगा.

इन्हीं सब कारणों के चलते सैन्य मोर्चे पर ताइवान को लेकर अमेरिका साफ़ तौर पर कोई बड़ा कदम उठाता हुआ नहीं दिख रहा. लेकिन अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ़ डिफ़ेंस के आँकडें कुछ और गवाही दे रहे हैं. पिछले दिनों अमेरिकी रक्षा विभाग ने एक डेटा जारी किया. जिसके अनुसार पिछले एक साल में अमेरिका ने ताइवान में अपनी सैन्य मौजूदगी लगभग दोगुनी कर दी है.

इसकी शुरुआत शुरुआत ट्रम्प के कार्यकाल में ही हो गई थी लेकिन बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही ट्रूप्स की संख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है.

अमेरिकी ट्रूप्स का ध्यान फ़िलहाल ताइवान की सेना को ट्रेनिंग देने पर है. लड़ाई शुरू हो जाने की स्थिति में ये ट्रूप्स हिस्सा लेंगे या नहीं. ये अभी साफ़ नहीं है. इसके अलावा ताइवान की सेना ऑफ़िसरों की कमी से भी जूझ रही है. रिक्रूटमेंट के नए तरीक़ों के लिए अमेरिकन ट्रूप्स ने मदद का हाथ बढ़ाया है.

यहां एक सवाल ये उठता है कि चीन ये सब कुछ कर क्यों रहा है? एक जवाब तो ये है कि वो अपनी ताक़त बढ़ाना चाहता है, लेकिन घूम-फिर कर वही सवाल दुबारा हाज़िर होता है कि चीन क्यों अपनी ताक़त बढ़ाना चाहता है. वो भी तब जब सैन्य हस्तक्षेप को लेकर दुनिया में विरोध के स्वर उठ रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया और यूरोप से साथ व्यापार संबंधों में लगातार खटास बढ़ रही है और इंडो पसिफ़िक में जापान-अमेरिका और बाकी देश उसे घेरने की कोशिश कर रहे हैं.

जवाब है  एंट्रॉपी. फ़िज़िक्स का वो गुणांक जो किसी भी स्थिति को स्थिर नहीं रहने देता. चीन को लगता है कि अगर वो अपनी शक्ति में लगातार विस्तार नहीं करेगा तो उसकी शक्ति सिकुड़ती जाएगी. और वर्तमान परिदृश्य में, जब अमेरिका की ताक़त कम हो रही है, तो उसके पास अपनी शक्ति बढ़ाने का यही सही मौक़ा है.

इसी के चलते ताइवान को लेकर चीन लगातार आक्रामक है. और UAE में सैन्य मौजूदगी हासिल करने की कोशिश में लगा हुआ है. चीन को पहले से अपेक्षा थी कि इन मोर्चों पर उसे रेजिसटेंस का सामना करना पड़ेगा. लेकिन अब एक और नई मुसीबत उसके सामने खड़ी हो रही है. वो भी ऐसे मोर्चे पर, जिसे वो अपनी जेब में मानकर चल रहा था.

पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह. नाम के लिए ग्वादर पाकिस्तान में है. लेकिन जगज़ाहिर है कि चीन का उस पर कब्जा हो चुका है. ग्वादर पोर्ट चीन की वन बेल्ट वन रोड इनिशिएटिव (OBOR) का हिस्सा है. जो चीन के शिनजियांग प्रांत को पाकिस्तान के बलूचिस्तान से जोड़ती है. ये गलियारा पाक अधिकृत कश्मीर यानी POK से गुजरता है. इसलिए भारत भी इसको लेकर समय-समय पर चीन के सामने आपत्ति  जताता रहता है.

OBOR के अंदर CPEC यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना भी आती है. जिसके तहत चीन ने ग्वादर पोर्ट के विकास के लिए पाकिस्तान को 60 अरब डॉलर की मदद दी है. और पोर्ट का कामकाज अपने हाथ में ले लिया है.

60 अरब डॉलर की रक़म मिलने का बाद ज़ाहिर है पाकिस्तान प्रशासन की प्राथमिकता क्या होगी. ग्वादर में जगह-जगह पर सैनिक चौकियाँ बनाई गई है. आम नागरिकों को आवाजाही में दिक़्क़त आ रही है. उन्हें शक की निगाह से देखा जाता है, और बार-बार उनका नाम-पता पूछा जाता है.

स्थानीय नागरिकों में लंबे समय से इसको लेकर ग़ुस्सा पनप रहा था, जो अब सड़कों पर उतर आया है. पिछले एक हफ़्ते से ग्वादर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. हज़ारों की संख्या में लोग ग्वादर के वाई चौक पर प्रदर्शन के लिए जुट रहे हैं. यह प्रदर्शन ग्वादर में चीन की बढ़ती मौजूदगी के विरूद्ध असंतोष का हिस्सा है.

प्रदर्शनकारियों में नेता, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, मछुआरों के प्रतिनिधि और स्थानीय लोग शामिल है. इन लोगों की शिकायत है कि ग्वादर पर काम शुरू होने के बाद से इलाक़े में बिजली और पानी की भारी क़िल्लत हो गई है.

ग्वादर को डीप सी पोर्ट के रूप में तैयार किया जा रहा है. लोगों को उम्मीद थी कि इससे इलाक़े में रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे. लेकिन हुआ ठीक उल्टा. सरकार ने चीन की ट्रॉलर नावों को मछली पकड़ने की पर्मिशन दे दी. छोटी नाव चलाने वाले स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर संकट आ गया.

पाकिस्तान के जंग अख़बार की खबर के अनुसार प्रशासन लोगों की शिकायतों के प्रति गंभीर नहीं है. और इसी के चलते उन्हें प्रदर्शन करने को मजबूर होना पड़ा है. प्रदर्शनकारियों की मांग है कि शहर से अनावश्यक सुरक्षा चौकियां हटाई जाएं. इसके अलावा मकरान तट से मछली पकड़ने वाली नावें हटाई जाएं और ईरान से लगी सीमा को पंजगुर से ग्वादर तक खोला जाए.

ग्वादर में इतने बढ़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का ये पहला मामला है. स्थिति की नज़ाकत को देखते हुए बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री ने अपना एक डेलीगेशन भेजा प्रदर्शनकारियों से मिलने भेजा. लेकिन उन्हें भी खाली हाथ लौटना पड़ा.

लगातार एक हफ़्ते से इस मामले में ‘ग्वादर को अधिकार दें’ नाम की एक रैली भी आयोजित की जा रही है. रैली के प्रमुख मौलाना हिदायत उर रहमान का कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं हो जाती तब तक विरोध जारी रहेगा.

चीन के सामने मुश्किल है कि ग्वादर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों से वो अपने तरीक़े से नहीं निपटा सकता. पाकिस्तान थोड़ा बहुत ही सही, अभी भी एक लोकतांत्रिक देश है. जहां विरोध प्रदर्शनों को सेना के ज़ोर पर निपटाना कठिन होगा. चीन के पास रास्ता है कि वो डॉलर दिखा सकता है, जिससे पाकिस्तान सरकार उसके इशारे पर नाचने के लिए मजबूर होगी. लेकिन बाकी मोर्चों पर मुश्किलें झेल रहा चीन पाकिस्तान में दिक़्क़तें फ़ेस करने के मूड में बिलकुल भी नहीं है. ख़ासकर तब जब अभी-अभी पाकिस्तान अमेरिका की गोद से उठकर उसकी बग़ल में जाकर बैठा हो.


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