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क्या हुआ था जब मनमोहन सिंह के मंत्री ने उन्हें जातिगत जनगणना कराने के लिए पत्र लिखा था?

जातिगत जनगणना इन दिनों कीवर्ड बना हुआ है. एक तरफ विपक्ष के तमाम दल और ख़ुद सत्ताधारी भाजपा के भी कुछ नेता हैं, जो ये मांग रख रहे हैं कि जातिगत जनगणना कराई जानी चाहिए. मसलन संघमित्रा मौर्य, जो 2019 में बदायूं से भाजपा के टिकट पर जीतकर सांसद बनी थीं, वो भी इसकी मांग रख चुकी हैं. नीतीश कुमार और रामदास अठावले भी इसके पक्ष में बोल चुके हैं. लेकिन भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र की NDA सरकार ने इस पर रुख़ स्पष्ट कर दिया है. कि नो मीन्स नो. बीती 20 जुलाई को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा था कि केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति के अलावा किसी जाति की गिनती का कोई आदेश नहीं दिया है. यानी सिर्फ SC, ST ही जनगणना में होंगे.

ये तो है इस सरकार का अब तक का स्टैंड. लेकिन पिछली सरकार का क्या स्टैंड था? माने UPA-2 में जातिगत जनगणना को लेकर क्या बातें रहती थीं?

2010 में उठा था मुद्दा

जातिगत जनगणना का मुद्दा 2010 में भी उठा था. तब देश में कांग्रेस के नेतृत्व में UPA-2 सरकार थी. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और वीरप्पा मोइली थे कानून मंत्री. मोइली ने मनमोहन को पत्र लिखकर जातिगत जनगणना कराने की सलाह दी थी. मई 2010 में मोइली ने कहा था–

“मुझे लगता है कि अब जातिगत जनगणना कराने का समय है. ये ज़्यादा ऑथेंटिक होगी. क्योंकि 1931 के बाद से हमारे पास इस तरह का कोई डेटा नहीं है.”

जाहिर सी बात है उस वक्त भी इस पर तमाम रिएक्शन्स आए थे. उस समय के मंत्री फ़ारूक अब्दुल्ला ने कहा था–

“फिलहाल तो जनगणना शुरू हो चुकी है और अब इसमें जातिगत जनगणना का कंसेप्ट लागू कर पाना मुमकिन नहीं है. अगर ऐसा करना ही था तो इस पर बहुत पहले से विचार किया जाना चाहिए था और पर्याप्त विचार-विमर्श होना चाहिए था.”

मनमोहन तक पहुंची बात

एक मार्च 2011 को लोकसभा में भी ये मुद्दा उठा था. तब तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा था–

“केंद्र और राज्य के पास OBC की अपनी सूचियां हैं. जनगणना में जाति का प्रावधान लाने से ये प्रक्रिया जटिल हो सकती है. फिर जो लोग जनगणना का काम करते हैं – ख़ासतौर पर प्राइमरी स्कूल शिक्षक – उनके पास इस तरह के जातिगत जनगणना कराने का अनुभव या ट्रेनिंग भी नहीं है.”

तमाम पक्ष-विपक्ष की बातों के बाद तत्कालीन PM मनमोहन सिंह ने भरोसा दिलाया था कि कैबिनेट जातिगत जनगणना के मुद्दे पर विचार करेगा और जल्द ही इस बारे में फ़ैसला किया जाएगा. 2011 में ही प्रणब मुखर्जी की अगुवाई में एक समिति बनाई गई, जिसमें जातिगत जनगणना पर विचार शुरू किया गया.

Manmohan Pranab
मनमोहन सिंह ने प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में समिति गठित कर जातिगत जनगणना पर बात आगे बढ़ाई थई. (फाइल फोटो- PTI)

उस वक्त जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के प्रोफेसर सुरिंदर एस जोड़का ने इंडिया टुडे से बात करते हुए कहा था-

“जातिगत जनगणना अहम है. पहला कारण- नीति निर्धारण में जातियों की अहम भूमिका रहती है. दूसरा कारण- जातिगत भेदभाव को जड़ से मिटाने का पहला चरण है कि हमारे फैक्ट्स दुरुस्त हों. क्या पता कल को जातिगत जनगणना हो और ये बात निकलकर आ जाए कि OBC का सरकारी नौकरियों में काफी अच्छा प्रतिनिधित्व है. या ये भी मुमकिन है कि 25-30 फीसदी भारतीय अपनी जाति ही न बताना चाहें, जो कि प्रगतिवादी सोच का प्रतीक होगा. इस तरह के नतीजे आने से हमारा समाज और भी मजबूत होगा.”

वहीं टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के प्रोफेसर जीजी वानखेड़े ने कहा था-

“UP, बिहार, बंगाल और राजस्थान में ‘धोबी’ को SC माना जाता है. जबकि महाराष्ट्र में OBC माना जाता है. इसमें कोई सिंगल पैरामीटर नहीं है और इसलिए जातियों को एक टोकरी में नहीं रखा जा सकता.”

सोशियो-इकॉनमिक कास्ट सेंसस

प्रणब मुखर्जी की अगुवाई वाली समिति ने साल भर में ही सुझाव दिया. जातिगत जनगणना के पक्ष में सुझाव. कहा कि आर्थिक सामाजिक जातिगत जनगणना कराई जा सकती है. सरकार ने करीब 4800 करोड़ रुपये की लागत से जनगणना शुरू कराई. ग्रामीण विकास मंत्रालय को गांवों में और शहरी गरीबी उन्मूलन और हाउसिंग मंत्रालय को शहरी इलाकों में जनगणना का काम कराने की ज़िम्मेदारी दी गई.

जनगणना के डेटा को दोनों मंत्रालयों ने मिलकर कंपाइल किया और 2016 में ये डेटा प्रकाशित किया गया. 2011 की इस जनगणना में कुल 29 सवाल पूछे गए थे. इससे कुछ ख़ास बातें निकलीं.

# जनगणना के मुताबिक़ विश्व की कुल आबादी की 17.5 फीसदी भारत में है. 2001 की जनगणना में ये आंकड़ा 16.8 फीसदी था.

# इस जनगणना के मुताबिक भारत की आबादी 1 अरब 21 करोड़ निकली.

# उत्तर प्रदेश करीब 20 करोड़ लोगों के साथ देश में सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य रहा. सिक्किम करीब 6 लाख लोगों के साथ सबसे कम आबादी वाला राज्य है.

# 2011 में पहली बार NPR यानी नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर तैयार किया गया था. इसे 2016 में सरकार ने जारी किया था.

जातिगत डेटा नदारद

2011 में जनगणना हुई. 2016 में डेटा सार्वजनिक किया गया. लेकिन सबसे बड़ी बात ये रही कि इससे जातिगत डेटा अलग था. मोटे तौर पर जो जातिगत डेटा इकट्ठा हुआ था, उसे सामाजिक न्याय मंत्रालय को सौंप दिया गया. मंत्रालय ने इस डेटा के प्रबंधन और क्लासिफिकेशन के लिए नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई. लेकिन इस कमेटी की कोई रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई है. यानी जातिगत जनगणना का कोई डेटा अभी सामने नहीं है.


जानिए जनगणना क्यों होती है, और उससे क्या फायदा होता है?

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