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प्यार के देवता यश चोपड़ा ने क्यों कहा था: 'जो लव नहीं करते वो मर जाएं!'

इंसान और लव ऐसा विषय है जिसकी तह में जाते-जाते धुरंधर फिलॉस्फर भी पूरे हो गए. यश चोपड़ा भी करीब पांच साल पहले 21 अक्टूबर को ही 100 बरस पूरे कर गए थे लेकिन प्यार पर लम्हे, चांदनी, दिल तो पागल है, डर, कभी-कभी, सिलसिला, धूल का फूल, दाग़ जैसी अनोखी कहानियां दे गए. साथ ही कुछ ऐसा भी कह गए जो इन सबका सार है.

पंजाबी यश चोपड़ा जड़ों से जुड़े रहने वाले आदमी थे. रूढ़िवादी भी थे. लेकिन उन्होंने ‘लम्हे’ जैसी फिल्म भी बनाई जिसमें एक आदमी अपनी प्रेमिका की बेटी से प्रेम करने लगता है. जिसे समाज में अनैतिक माना जाएगा उस कृत्य को उन्होंने अपनी कमर्शियल फिल्म के जरिए डिबेट का विषय बनाया. सीटीमार, तालीमार दर्शकों ने भी इसे देखा और एंजॉय किया. उन्हें मालूम भी न चला कि इस आदमी ने अपनी इस कहानी से उनके भीतर बहुत कुछ बदल दिया है.

अपनी कई फिल्मों से यश जी ने ऐसा किया.

उनकी सब फिल्मों के केंद्र में इंसान और प्रेम का विषय रहा है. लेकिन फिल्में, हिट, फ्लॉप, गाने, कॉस्ट्यूम्स, शिफॉन, पीले फूल जैसे शब्दों के बीच हमने ये जानने की कोशिश नहीं की कि इस आदमी की फिलॉस्फी इस पर क्या है. एक इंटरव्यू में यश जी ने इस पर बात की थी. इसमें उन्होंने जो कहा वैसे विचार मुख्यधारा के निर्देशक कम ही रखते हैं.

वे इंसान होने की जटिलताओं पर बात करते हैं जो समझ एक सच्चा आर्टिस्ट होने की निशानी होती है. वे जीवन में बार-बार प्रेम होने पर भी सच्ची टिप्पणी करते हैं जिसके जवाब ज्यादातर लोग आज भी ढूंढ ही रहे हैं. और तो और वे ये भी कहते हैं कि अगर प्यार नहीं है तो उसे दुनिया में नहीं रहना चाहिए जो कि बहुत एक्सट्रीम बात है.

यश जी 80 साल के हुए तो अपने जन्मदिन पर उन्होंने ये छोटी टिप्पणी की थी. उसके अगले ही महीने उनका देहांत हो गया था. उन्होंने कहा था:

हर मानव की सबसे बड़ी इच्छा होती है कि उसे प्यार किया जाए. ज्यादा से ज्यादा प्यार किया जाए. बार-बार किया जाए.

बार-बार चाहे जाने की इच्छा की पूर्ति के कारण जीवन में कई किरदार (महिला/पुरुष) आ सकते हैं.

मैं अपनी फिल्मों को बोल्ड या रोमांटिक का नाम नहीं दूंगा, मैं कहूंगा कि मैं ह्यूमन रिलेशंस पर फिल्में बनाता हूं.

इंसान बहुत ही जटिल प्राणी है. मेरी पिक्चर में कोई विलेन या वैंप नहीं होता. रोमांटिक फिल्मों में. मेरा मानना है कि आदमी ख़ुद ही विलेन है और ख़ुद ही हीरो है. डेस्टिनी हीरो है और वो ही विलेन है.

मैंने ख़ुद सोच लिया कि मैं किसी से लव करूंगा. ये मेरा ही फैसला है न? वो गलत भी तो हो सकता है. और जीवन की इस यात्रा में आपको फिर प्यार हो सकता है. तब आप किसी के प्रति बेइमान नहीं हो रहे लेकिन तब आप विलेन हैं. नियति विलेन है. जैसे हम फिल्म ‘दाग़’ (1973) की बात करें. एक आदमी दो औरतों के साथ रहता है. इस कहानी में सब किया नियति का है. आदमी की कोई गलती नहीं है.

आपको अपने जीवन के किसी भी पड़ाव पर ये नहीं कहना चाहिए कि मैं अब प्यार नहीं करूंगा. मेरा निजी तौर पर मानना है कि अगर आप किसी से प्यार नहीं करते और कोई आपको प्यार नहीं करता तो आपको जीना नहीं चाहिए. आपको जीने का कोई अधिकार नहीं है. ये जीवन लव पर ही आधारित है.

यश चोपड़ा 1932-2012
यश चोपड़ा 1932-2012

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