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जब वाजपेयी के समर्थन के लिए मुसलमानों ने बनाई 'अटल हिमायत कमिटी'

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भारतीय जनता पार्टी भले ही पूरे मुल्क से वोट बटोरकर सत्ता में हो लेकिन उसकी एक छवि हमेशा से बरकरार रही. यही कि उसे मुसलमान वोट नहीं देते. हालांकि हमारे मुल्क में मतदान गुप्त रखने की प्रथा है. इस वजह से ये पता लग पाना असंभव है कि किसने किसको वोट दिया. बहरहाल, पॉपुलर मत यही है कि मुसलमान भाजपा को वोट नहीं करते. भले ही फिर भाजपा का अपना अल्पसंख्यक मोर्चा हो.

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि ये छवि बिल्कुल ही हवा-हवाई हो. भाजपा में ऐसा कोई नेता नज़र नहीं आता जो मुस्लिम समुदाय में काबिलेकबूल रहा हो. सिवाय अटल बिहारी वाजपेयी के.

अटल बिहारी इकलौते ऐसे भाजपाई थे जिन्हें मुस्लिम समुदाय में भी खासा पसंद किया जाता रहा. यही नहीं उनका समर्थन करने के लिए बाकायदा एक कमिटी भी बनी थी. नाम था ‘अटल बिहारी वाजपेयी हिमायत कमिटी’.

हिमायत कमिटी के मेंबर.
हिमायत कमिटी के मेंबर.

दिल्ली में हुई वो मीटींग

25 मार्च 2004 को दिल्ली के फिक्की ऑडिटोरियम में एक मीटिंग हुई. ये मीटिंग आने वाले चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी के लिए मुस्लिम समर्थन हासिल करने के एकमात्र एजेंडे से हुई थी. ‘अटल बिहारी वाजपेयी हिमायत कमिटी’ ने, जिसे शॉर्ट में ‘अटल हिमायत कमिटी’ भी कहा जाता था, ये स्पष्ट किया था कि वो किसी पार्टी के नहीं बल्कि व्यक्ति के समर्थन में थे. कमिटी के संयोजक ख्वाजा इफ्तिखार अहमद का बड़ा सीधा बयान था,

“किसी नेता को उसके किरदार की रोशनी में देखा जाना चाहिए. आज के राजनीतिक परिदृश्य में कोई भी नेता अटल जी के कद के बराबर नहीं नज़र आता. पंडित जवाहरलाल नेहरु के बाद सिर्फ अटल जी ही हैं, जिन्होंने मुसलमानों के दिल में जगह बनाई है.”

उन्होंने आगे ये भी कहा था कि सेक्युलर कहलाने वाली पार्टियां अपने राजनीतिक फायदे के लिए मुस्लिमों का शोषण करती रही हैं. उन्होंने हमेशा ये डर दिखाया कि भाजपा के सत्ता में आने पर मुसलमानों की पहचान को ख़तरा होगा, उनके धार्मिक हक़ छीन लिए जाएंगे वगैरह-वगैरह. जबकि पूरे छह साल तक वाजपेयी के शासन ने ये साबित किया कि ये सब मिथ्या बातें हैं.

सिर्फ ये कमिटी ही नहीं और भी धुरंधर थे वाजपेयी फैन

2004 में ये वो दौर था जब मुस्लिम समुदाय काँग्रेस के अलावा कोई और खूंटा तलाश रहा था. मौलाना वहीउद्दीन ख़ान जैसे इस्लामिक स्कॉलर मुसलमानों को ‘पॉलिटिकल यू-टर्न’ लेने की सलाह दे रहे थे. हालांकि उन्होंने सीधे तौर से भाजपा को समर्थन देने की बात नहीं की थी लेकिन ये ज़रूर कहा था कि ‘भाजपा को वोट देना ही नहीं है’ जैसे माइंडसेट को चेंज करना होगा.

यही वो समय था जब बॉम्बे मर्कंटाइल बैंक के तत्कालीन चेयरमैन और अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर डॉक्टर महमुदुर रहमान ने कहा था कि एएमयू की ग्रांट 80 करोड़ से बढ़ाकर 200 करोड़ करने का क्रेडिट वाजपेयी को जाता था.

उधर ऑल इंडिया मुस्लिम ऑर्गेनाईजेशन के प्रेसिडेंट मौलाना जमील अहमद इलयासी ने दावा किया था कि वाजपेयी ही मुसलमानों के सच्चे हितचिंतक हैं.

हज कमिटी के तत्कालीन चेयरमैन तनवीर की भी कुछ-कुछ ऐसी ही राय थी. उन्होंने मुसलमानों से अपील की थी कि वो नकारात्मक सोच को छोड़कर पॉजिटिव रवैया अपनाएं. उन्होंने ये भी कहा था कि वाजपेयी शासन के दौरान हज यात्रियों की संख्या में इज़ाफा हुआ है.

Atal Bihari Vajpayee (4)

कहने की बात ये कि वाजपेयी के सक्रीय राजनीति से संन्यास लेने तक मुस्लिम समुदाय में उनकी पर्याप्त लोकप्रियता रही. लोग यहां तक कहते कि ‘नो टू भाजपा, यस टू वाजपेयी’. पार्टी लाइन से इतर किसी राजनेता को इतना सम्मान मिलना दिखाता है कि उसमें लोगों का किस हद तक विश्वास था. वाजपेयी डिज़र्व करते थे ये यकीन. उनके बाद भाजपा में कोई नहीं बचा है, जिससे मुस्लिम समुदाय कोई करीबियत महसूस करे.


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When muslims backed Atal Bihari Vajpayee before 2004 elections by forming Atal Himayat Committee

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