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महात्मा गांधी का 103 साल पुराना भाषण, जिसका जिक्र कर प्रशांत भूषण ने कहा- माफी नहीं मांगूंगा

प्रशांत भूषण. वरिष्ठ वकील. हाल में सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के दोषी ठहराए गए हैं. 20 अगस्त को सजा पर बहस के दौरान उन्होंने अपना बयान दिया. महात्मा गांधी के एक पुराने भाषण का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वह माफी नहीं मांगेंगे. भूषण ने कहा था-

मैं पूरी विनम्रता से वह दोहराता हूं, जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने केस में कहा था- मैं रहम नहीं चाहता. मैं उदारता की अपील भी नहीं करता. मैं यहां हूं ताकि कानूनी रूप से मुझे जो भी सजा मिले, उसे खुशी-खुशी मंजूर कर सकूं.

पर महात्मा गांधी का वह वाकया आखिर था क्या, जिसका प्रशांत भूषण ने उल्लेख किया. और गांधी ने क्या कहा था और क्यों कहा था? आइए जानें-

जब चंपारण गए महात्मा गांधी 

महात्मा गांधी 15 अप्रैल 1917 को बिहार के चंपारण गए थे. उस समय चंपारण में किसान नील की खेती के चलते अंग्रेजों और नील प्लांटरों (नील के कारोबारियों) के अत्याचारों से त्रस्त थे. किसानों पर हो रहे अत्याचारों की जानकारी के बाद महात्मा गांधी चंपारण पहुंचे थे. इसी कड़ी में 16 अप्रैल को वह हाथी से चंपारण के जसौलपट्टी गांव जा रहे थे. रास्ते में उन्हें एक दरोगा ने सूचना दी कि जिलाधीश उनसे मिलना चाहते हैं. लिहाजा, महात्मा गांधी दरोगा के साथ एक बैलगाड़ी पर सवार होकर चंपारण की ओर लौट गए.

महात्मा गांधी ने जब आधी दूरी तय कर ली, तब उन्हें पुलिस का एक उच्चाधिकारी मिला. उसने उन्हें धारा 144 का नोटिस दिया. इस नोटिस में गांधी को बिना देरी किए चंपारण छोड़ने का आदेश दिया गया था. लेकिन गांधी ने इस नोटिस को अनदेखा कर दिया. उन्होंने जिलाधीश को जवाब में लिखा,

“मेरे लिए संभव नहीं है कि मैं आपके आदेश को मान सकूं. मैं जिला छोड़कर नहीं जाऊंगा.”

Mahatma Gandhi 2

अदालत में माफी के बजाए मांगी सजा

जिला प्रशासन ने दो दिन तक इंतजार किया. फिर 18 अप्रैल को गांधी जी पर आज्ञा उल्लंघन के मुकदमे की सुनवाई शुरू कर दी. वह मोतिहारी की अदालत में पेश हुए. पुष्यमित्र की किताब ‘चंपारण 1917: जब नील का दाग मिटा’ में गांधी ने जो कोर्ट में कहा था, वह बयान छपा है. उन्होंने कोर्ट में कहा था,

अदालत के आदेश से मैं संक्षेप में बताना चाहता हूं कि मुझे जो सीआरपीसी की धारा 144 का नोटिस मिला, मैंने उसकी अवज्ञा करने का कदम क्यों उठाया. मेरी विनम्र राय में यह स्थानीय प्रशासन और मेरे नजरिए में फर्क की बात है. मैंने मानवतावादी और राष्ट्रीय सेवाओं के ख्याल से इस इलाके में प्रवेश किया था. ऐसा मैंने बार-बार रैयतों द्वारा भेजे जा रहे बुलावे की वजह से किया. (बता दें, अंग्रेजों के मालिकाना हक वाली जमीन पर खेती करने वाले को रैयत कहा जाता था). 

उन रैयतों का कहना है कि नील प्लांटर उनके साथ बेहतर बर्ताव नहीं करते. बिना समस्या को समझे मैं उनकी कोई मदद नहीं कर सकता था, इसलिए यहां अध्ययन करने आया हूं. अगर उपलब्ध हो तो स्थानीय प्रशासन और नील प्लांटरों की मदद भी लेना चाहता हूं. मेरा दूसरा कोई इरादा नहीं है. न ही मैं यह सोचता हूं कि मेरे आने से यहां की शांति व्यवस्था में कोई बाधा होगी या जन-धन की हानि हो सकती है.

मेरा मानना है कि इस कार्य का मुझे कुछ अनुभव भी है. हालांकि प्रशासन इस मसले पर दूसरी तरह सोचता है. मैं उनकी कठिनाई को समझता हूं कि उन्हें उन्हीं सूचनाओं के आधार पर काम करना होता है, जो उनके पास उपलब्ध होती हैं. कानून में विश्वास रखने वाले नागरिक के तौर पर मेरा पहला काम उस आदेश को मानना होता, जो मुझे दिया गया था. लेकिन मैं उन लोगों का भरोसा तोड़े बगैर ऐसा नहीं कर सकता था, जिन्होंने मुझे यहां बुलाया है. मेरी राय है कि मैं उन लोगों के बीच रहकर ही उनका भला कर सकता हूं. यही वजह है कि मैं स्वेच्छा से यहां से जा नहीं सकता. दो कर्तव्यों के परस्पर विरोध की दशा में यही कर सकता था कि मैं खुद को यहां से हटाने का जिम्मा यहां के शासकों पर छोड़ दूं.

मैं इस बात को लेकर काफी सजग हूं कि सार्वजनिक जीवन में मेरे जैसे छवि रखने वाले व्यक्ति को उदाहरण पेश करने के मामले में काफी चौकस रहना चाहिए. मेरा दृढ़ विश्वास है कि जिस परिस्थिति में मैं इस वक्त हूं, उसमें प्रत्येक प्रतिष्ठित व्यक्ति को वही काम करना चाहिए, जो मैंने किया. यानी आज्ञा न मानकर दंड सहने के लिए तैयार हो जाना.

आज मैंने जो यहां बयान पेश किया है, उसका मकसद यह नहीं कि मेरा दंड कम कर दिया जाए. उसका मकसद यह जाहिर करना है कि मैंने सरकार के आदेश की जो अवज्ञा की है, उसकी वजह सरकार के प्रति मेरी अश्रद्धा नहीं है. मैं सरकार से भी उच्चतर कानून, अपनी अंतरात्मा के कानून का पालन करना उचित समझ रहा हूं. सरकार चाहे तो इस अपराध के लिए मुझे दंडित कर सकती है. मैं दंड सहने को तैयार हूं.

जज ने जमानत के लिए कहा तो भी कर दिया इनकार

महात्मा गांधी का यह बयान सुनकर जज हैरान रह गया. उसे समझ ही नहीं आया कि इस पर क्या किया जाए. ऐसे में जज ने गांधी जी से कहा कि वे 100 रुपये का मुचलका भरें और जमानत ले लें. लेकिन गांधी जी ने इनकार कर दिया. कहा कि उनके पास न तो 100 रुपये हैं और न ही जमानतदार. वह सजा देने पर अड़ गए. ऐसे में जज के सामने अजीब मुसीबत हो गई.

Mahatma Gandhi 1

जज ने फिर कहा कि अगर गांधी जी कह देते हैं कि वह जिला छोड़ देंगे और फिर यहां नहीं आएंगे, तो वे मुकदमा बंद कर देंगे. लेकिन गांधी जी ने इससे भी मना कर दिया. थक-हारकर जज ने खुद ही महात्मा गांधी का मुचलका भर दिया और उन्हें जाने दिया. फिर यह केस भी खत्म कर दिया गया.

गांधी जी के मामले में तो जज को इस तरह से केस बंद करना पड़ा था. अब देखना होगा कि प्रशांत भूषण के मामले में सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला लेता है? क्या वह उन्हें माफ कर देगा या फिर सजा देगा?


Video: अदालत की अवमानना के वो मामले जब जजों पर टिप्पणी करने की वजह से लोगों पर केस दर्ज हो गया

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