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जब राज्यपाल आगे-आगे भाग रहे थे और लालू यादव उनका पीछा कर रहे थे

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नीतीश कुमार आज बिहार के मुख्यमंत्री हैं. लालू प्रसाद यादव सहयोगी की भूमिका में हैं. लेकिन ये अब की बात है. एक ज़माना था कि बिहार में एक जुमला गूंजता था – जब तक समोसे में रहेगा आलू, तब तक रहेगा बिहाल में लालू. लालू ने खुद ये इसे गढ़ा था. उन दिनों कोई इस बात पर शक भी नहीं करता था. लालू की पकड़ बिहार की राजनीति पर थी ही ऐसी. लालू के एक चरवाहे से बिहार के मुख्यमंत्री बनने की कहानी बहुत रोचक है. इसका एक अध्याय वो है जब लालू चार महीने के भीतर दिल्ली से बिहार लौट कर मुख्यमंत्री बन गए थे. जबकि चुनाव के वक्त न लालू मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे और न ही उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा था.

इस दिलचस्प किस्से का ज़िक्र संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब ‘द ब्रदर्स बिहारी’ में किया है. इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रभात प्रकाशन ने ‘बंधु बिहारी’ के नाम से छापा है. प्रकाशकों की अनुमति से हम वो किस्सा आपको पढ़वा रहे हैं. 


 

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जनता दल केकड़ों का एक टिन था, ऐसे तत्वों से भरा हुआ, जो एक-दूसरे के साथ असहज थे. वे निरंतर एक-दूसरे को पछाड़ने और पूर्ववत् करने के प्रयास में लगे रहते थे, निरंतर प्रभाव के अपने स्वयं के क्षेत्र बनाने की कोशिश में लगे रहते थे. ऐसे परिदृश्य में वी.पी. सिंह और देवीलाल दोनों के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी था कि बिहार में उनकी टीम का नेतृत्व उनका अपना आदमी करे.

 

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लेकिन जब बिहार की गद्दी —मुख्यमंत्री पद— की बात आई तो राह आसान नहीं थी. हालांकि लालू यादव विपक्ष के नेता बन गए थे, लेकिन मार्च 1990 के विधानसभा चुनावों में जनता दल के जीत जाने की स्थिति में वे अपने मुख्यमंत्री बनने की संभावना को लेकर निश्चित नहीं थे, बल्कि वास्तव में उन्होंने विधानसभा की एक भी सीट के लिए चुनाव नहीं लड़ा था. लोकसभा चुनाव नवंबर 1989 में हुए थे, बिहार के विधानसभा चुनावों के सिर्फ चार माह पूर्व. पटना में इंतजार करने के बजाय लालू यादव ने विपक्ष के नेता के पद से त्याग-पत्र देकर छपरा से सांसद के रूप में दिल्ली जाना बेहतर समझा.

अधिकांश लोगों के लिए यह निर्णय रहस्य से भरा था. यदि लालू यादव बिहार का मुख्यमंत्री पद ही चाहते थे तो उन्होंने लोकसभा का चुनाव क्यों लड़ा, जबकि विधानसभा चुनाव सिर्फ चार महीने बाद होनेवाले थे?

लेकिन लालू यादव ने जो किया, उसका कारण न्यायोचित भले ही न हो, समझ में आने योग्य तो था. वे असुरक्षित लोगों के दल में काम करनेवाले एक असुरक्षित व्यक्ति थे. जनता दल में कोई भी, न उस समय और न बाद में, निश्चित तौर पर जानता था कि कौन क्या कर रहा था या करना चाहता था. वहां कोई संगठन या निश्चित व्यवस्था नहीं थी, पार्टी में एक अस्थिरता और अनिश्चितता का वातावरण व्याप्त था. उसके सदस्यों को ‘पकड़ सको तो पकड़ो’ क्लब की तरह हमेशा ‘लॉबी’ और ‘जॉकी’ करना पड़ता था.

जैसा कि वर्ष 1989 के लोकसभा चुनावों की पूर्व संध्या को लालू यादव देख पा रहे थे, बिहार विधानसभा चुनाव अभी बहुत दूर थे. उस अवधि के दौरान कई दुर्घटनाएं बाधा उत्पन्न कर सकती थीं, कई वफादारियां बदल सकती थीं, बहुत से वादे किए और तोड़े जा सकते थे. क्या गारंटी थी कि वे लोग उन्हें सिर्फ इसलिए मुख्यमंत्री बना देंगे, क्योंकि वे विपक्ष के नेता थे? क्या गारंटी थी कि जनता दल को बिहार में बहुमत मिल ही जाएगा? लोकसभा परिणाम अधिक अपेक्षित था. मूड निश्चित रूप से राजीव-विरोधी और कांग्रेस-विरोधी था. वी.पी. सिंह के सितारे बुलंद थे और लालू पीछे नहीं छूटना चाहते थे. वे झाड़ी में दो पक्षियों के वादे से खुश नहीं थे; उस समय उन्हें हाथ में एक पक्षी चाहिए था.

वह छपरा से जीत गए; लेकिन चार महीने बाद मार्च 1990 में भागे-भागे बिहार गए बिहार के मुख्यमंत्री पद के दावेदारों के बीच अपनी जगह लेने. उत्तरी गढ़ में अभी भी जनता दल की लहर चल रही थी और केंद्र की तरह कांग्रेस सत्ता से बाहर कर दी गई थी. जनता दल ने अपने बूते पर 324 सदस्यों की विधानसभा में 132 सीटें हासिल कीं और अपने सहयोगी दलों के साथ, जिनमें से प्रमुख थी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सी.पी.आई.)— एक अच्छा बहुमत प्राप्त किया.

वीपी सिंह (बाएं) राजीव गांधी के साथ
वीपी सिंह (बाएं) राजीव गांधी के साथ

लेकिन सत्ता के लिए असली लड़ाई परिणाम घोषित होने के बाद ही आरंभ हुई. लालू की शंकाएं सही साबित हुईं. मुख्यमंत्री पद अनिवार्य रूप से उन्हें नहीं मिलनेवाला था. वफादारियों ने जनता दल के गुटों के भीतर खुद को पुनः व्यवस्थित कर लिया था. वादे भुला दिए गए थे. वी.पी. सिंह, जो प्रधानमंत्री बन चुके थे, अब लालू यादव का समर्थन नहीं कर रहे थे. वे एक दलित नेता को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने के इच्छुक थे. वे लालू को रास्ते से हटाने के लिए सिद्धांतों की दुलकी चाल चल रहे थे.

वे तो विधानसभा के सदस्य भी नहीं हैं. वे मुख्यमंत्री कैसे बन सकते हैं, जब हमारे नव-निर्वाचित सदस्यों के बीच योग्य उम्मीदवार मौजूद हैं? प्रधानमंत्री ने प्रश्न उठाया.

उनके आदमी थे—रामसुंदर दास, जो सन् 1979-80 के संक्षिप्त कार्यकाल में मुख्यमंत्री रह चुके थे. अजीत सिंह, जो प्रधानमंत्री के कृपापात्र बनने के लिए उत्सुक थे और उससे भी अधिक उत्सुक केंद्र सरकार में खुद को एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में पेश करने के लिए थे, ने वी.पी. सिंह की बात का समर्थन किया और दास की मुख्यमंत्री के रूप में स्थापना की देख-रेख करने के लिए पटना भेज दिए गए. लेकिन अजीत सिंह राजनीति में अभी भी नौसिखिए थे. वी.पी. सिंह यह जिम्मेदारी सिर्फ उन पर छोड़कर निश्चिंत नहीं थे. उन्होंने रामसुंदर दास की टीम को मजबूत करने के लिए जॉर्ज फर्नांडीस और सुरेंद्र मोहन को भी पटना भेज दिया.

 

डिप्टी पीएम देवी लाल लालू के समर्थन में थे
डिप्टी पीएम देवी लाल लालू के समर्थन में थे

 

लेकिन लालू यादव आलाकमान के फरमानों को सुनने के मूड में नहीं थे. वे एक ऐसा चुनाव करवाने पर तुले हुए थे, जो उन्हें उसी प्रकार से जीतना था, जिस प्रकार वे आगे कई चुनाव जीतनेवाले थे—अपने खिलाफ जानेवाले वोटों का विभाजन करके. जहां वी.पी. सिंह रामसुंदर दास के अधिष्ठापन की योजना बना रहे थे, लालू यादव अपना स्वयं का बल एकत्रित कर रहे थे. उन्हें इस अवसर का कब से इंतजार था. वे इसे हाथ से जाने नहीं दे सकते थे. उन्हें देवीलाल का समर्थन अब भी प्राप्त था. बुजुर्ग जाट ने दो यादवों — शरद और मुलायम सिंह — को संकटग्रस्त तीसरे (लालू) के समर्थन का प्रचार करने भेजा था और फिर लालू ने इस बड़ी चुनौती से लड़ने के लिए खुद एक बड़ा मोर्चा खोल दिया. उन्होंने चंद्रशेखर से मदद मांगी.

जिन दिनों वे विपक्षी दलों के बीच एकता के लिए प्रचार कर रहे थे, लालू यादव ने कई बार चंद्रशेखर पर जनता दल में विलय के उनके प्रारंभिक इनकार को लेकर हमला किया था; लेकिन वे हमेशा सावधान रहते थे कि उन्हें बहुत अधिक नाराज न कर दें. वे एकता मंच से उनके ऊपर विस्फोट करते और अगली ही सुबह हाथ जोड़कर माफी मांगने और प्रार्थना करने उनके घर पहुंच जाते.

‘‘नेताजी, आपके बिना हम एक विश्वसनीय विपक्ष कैसे बना सकते हैं? कृपया हमारे साथ शामिल हो जाइए.’’

और अब वे उनसे समर्थन के लिए प्रार्थना कर रहे थे. वे जानते थे कि चंद्रशेखर को मनाने के लिए उन्हें क्या कहना है. ‘‘यह राजा हमारी संभावनाओं को खत्म करने पर तुला हुआ है.’’ उन्होंने लगभग एक छोटे बच्चे की तरह शिकायत की, ‘‘कृपया हमारी मदद कीजिए, वरना वी.पी. सिंह अपने आदमी को बिहार का मुख्यमंत्री बना देंगे.’’ चंद्रशेखर, बिना शक, वी.पी. सिंह से इतनी नफरत करते थे कि उनकी किसी भी इच्छा का विरोध कर सकते थे. उन्होंने लालू यादव को आश्वासन दिया कि वे इस मामले में कुछ करेंगे.

 

चंद्रशेखर, लालू के खास मददगार
चंद्रशेखर, लालू के खास मददगार

 

जिस दिन नेता के चुनाव के लिए जनता दल के विधायकों की बैठक थी, वहां अचानक मुख्यमंत्री पद के दो के बजाय तीन दावेदार प्रकट हो गए — रघुनाथ झा चंद्रशेखर के उम्मीदवार के रूप में दौड़ में शामिल हो गए थे. निस्संदेह वे मुख्यमंत्री पद के गंभीर उम्मीदवार नहीं थे. वे वहां सिर्फ विधायक दल के वोटों का विभाजन करने आए थे, ताकि लालू यादव को फायदा हो जाए. झा को अपने मिशन में अच्छी सफलता मिली. वोट जाति के आधार पर विभाजित हो गए, हरिजनों ने रामसुंदर दास के लिए वोट किया, सवर्णों ने रघुनाथ झा का साथ दिया. लालू मामूली अंतर से जीत गए. उन्हें पिछड़ी जाति के अधिकांश वोट मिल गए.

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लेकिन अभी तो और नाटक होने बाकी थे. विधायक दल में लालू यादव की चतुराई से तिलमिलाए अजीत सिंह ने उन पर जवाबी हमले की जिम्मेदारी खुद पर ले ली. वे चुनाव में लालू यादव को हराने में असफल रहे थे, लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचने की राह में वे अभी भी उनका पसीना बहा सकते थे. वे चुपचाप बिहार के राज्यपाल के पास गए, जो उस समय मोहम्मद यूनुस सलीम नाम के लोक दल के पुराने आदमी थे और उन्हें लालू यादव के चुनाव पर केंद्र की स्वीकृति की मुहर लगने तक शपथ ग्रहण समारोह स्थगित रखने के लिए तैयार कर लिया. यूनुस सलीम के लिए अजीत सिंह की बात ठुकराना मुश्किल था.

वे अजीत सिंह के पिता चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व के समय लोक दल के उपाध्यक्ष रह चुके थे. इसके अलावा, अजीत सिंह देश के प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह से अधिकार प्राप्त करके बात कर रहे थे. वे दुविधा में थे. एक ओर लालू यादव थे, विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के विधिवत् निर्वाचित नेता, जो उन्हें लगातार फोन कर रहे थे, यह जानने के लिए कि शपथ ग्रहण कब होगा; दूसरी ओर अजीत सिंह थे, उनके गुरु के पुत्र और प्रधानमंत्री के दूत, जो उन्हें रुकने के लिए कह रहे थे. उन्होंने आसान रास्ता निकाला और दिल्ली की उड़ान भरने का निर्णय ले लिया.

 

मोहम्मद यूनुस सलीम
मोहम्मद यूनुस सलीम

 

लालू यादव को किसी प्रकार राज्यपाल की योजना की हवा लग गई और वे उनके पीछे हवाई अड्डे तक गए. रास्ते भर वे ड्राइवर को एक्सेलरेटर दबाने के लिए बोलते रहे और राज्यपाल को कोसते रहे. ‘‘इस गवर्नर को राइट और रॉन्ग और ड्यूटी समझाना पड़ेगा. इलेक्टेड आदमी का ओथ कैसे नहीं करा रहा है?’’

लेकिन जब तक उनका काफिला हवाई अड्डे पहुंचा, राज्यपाल का विमान उड़ चुका था. लालू यादव बहुत क्रोधित हो गए. वे घर लौटे और देवीलाल को फोन किया, जो केंद्र सरकार में नंबर 2 थे. ‘‘क्या चौधरी साहेब, ये आपके राज में क्या हो रहा है? हम इलेक्टेड सी.एम. हैं और गवर्नर अजीत सिंह के कहने पर ओथ से पहले ही भाग गया!’’

देवीलाल का भी यूनुस सलीम के साथ लोक दल के समय से लंबा संबंध रहा था. सलीम राजनीति में उनसे बहुत कनिष्ठ थे. वे यह सुनकर भड़क गए कि अजीत सिंह, चौधरी चरण सिंह का वह छुटभैया बेटा, जो घर भर में घूमता रहता था, जब वे चौधरी के साथ बैठकर देश के भविष्य पर चर्चा करते थे, इतना बड़ा बनने की कोशिश कर रहा था. उन्होंने दिल्ली में बिहार के राज्यपाल से संपर्क किया और उन्हें निर्देश दिया कि वे पटना लौट जाएं और लालू यादव को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाएं.

आखिरकार 10 मार्च, 1990 को लालू यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, स्वतंत्रता के बाद से पच्चीसवें और पटना राजभवन के बाहर शपथ लेनेवाले पहले मुख्यमंत्री. लालू यादव ने पटना के विशाल गांधी मैदान में शपथ ली. वह स्थान, जहां उन्होंने सोलह साल पहले जेपी की छाया में राजनीति की दीक्षा ली थी और जहां वे अपनी हर मुसीबत के समय सार्वजनिक मंजूरी लेने आते थे. उनके निकट उस व्यक्ति की प्रतिमा थी, जिसने अनिच्छा से ही सही, उनकी राह निर्धारित की थी—जय प्रकाश नारायण.

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